Jantar mantar jaipur history in hindi – जंतर मंतर जयपुर का इतिहास

Hanger manger Jaipur

प्रिय पाठको जैसा कि आप सभी जानते है। कि हम भारत के राजस्थान राज्य के प्रसिद् शहर व गुलाबी नगरी के नाम से पहचाना जाने वाले एक खुबसुरत शहर जयपुर के भ्रमणपर है। इस भ्रमण के दौरान हमने जयपुर के प्रसिद पर्यटन स्थलो की सैर कर रहे है। तथा वहा की राजपूताना विरासत की धरोहरो और संस्कृति को विस्तार से जानने की कोशिश कर रहे है। पिछली पोस्टो मे हमने जयपुर के प्रमुख पर्यटन स्थल हवा महल तथा सिटी महल की सैर की थी और उसके बारे मे विस्तार से जाना था। इस पोस्ट मे हम जयपुर के टूरिस्ट प्लेस मे से एक तथा जयपुर टूरिस्ट पैलेस मे प्रमुख स्थान रखने वाले पर्यटन स्थल जंतर मंतर ( jantar mantar Jaipur ) की सैर करेगे और उसके बारे म विस्तार से जानेगें।

 जंतर मंतर कहाँ स्थित है ?
 जंतर मंतर जयपुर शहर के मध्य गंगोरी बाजार मे है। यह भव्य इमारत हवा महल तथा सिटी प्लेस के बीच मे स्थित है। तथा यह सिटी प्लेस मे स्थित चन्द्र महल से जुडी हुई है।

 जंतर मंतर क्या है Jantar mantar jaipur

 जंतर मंतर एक खगोलीय वेधशाला है तथा एक आश्चर्यजनक मध्यकालीन उपलब्धि है।

janter manter Jaipur
जंतर मंतर जयपुर के सुंदर दृश्य

 जंतर मंतर का निर्माण कब हुआ?
 जंतर मंतर का निर्माण सन (1724) मैं शुरू हुआ था तथा सन 1734 मैं यह बनकर तैयार हो गया था।

 जंतर मंतर का निर्माण किसने करवाया था?
 जंतर मंतर का निर्माण महाराजा सवाई जयसिंह दितीय द्वारा कराया गया था महाराजा सवाई जयसिंह द्वारा देश भर मै ऐसी पाँच वेधशालाओ का निर्माण कराया गया था।

 जंतर मंतर  का निर्माण किस शास्त्र के अनुसार किया गया है?Jantar mantar Jaipur

जंतर मंतर का निर्माण खगोलीय शास्त्र के आधार पर किया गया है था। तथा इसके निर्माण के लिए उस समय के प्रसिद्ध खगोल शास्त्रीयो कि मदद ली गई थी।

 जंतर मंतर का निर्माण क्यों किया गया था?
 जंतर मंतर का निर्माण खगोलीय दृष्टि से किया गया था जो समय मापने ग्रहण कि भविष्यवाणी करने किसी तारे कि गति व स्थिति जानने ग्रहों की स्थिति जानने आदि के उद्देश्य से किया गया था।

 महाराजा सवाई जयसिंह द्वारा निर्मित जंतर मंतर कहा कहा है?
 महाराजा सवाई जयसिंह द्वारा जंतर मंतर का निर्माण देश के पांच शहरों मै कराया गया था जो इस प्रकार है:- जयपुर, दिल्ली, उज्जैन, बनारस, मथुरा जिसमे जयपुर का जंतर मंतर इन सब इमारतो मै सबसे बडा है। सवाई जयसिह द्वारा निर्मित इन पाँच वेधशालाओ मैं आज केवल दिल्ली ओर जयपुर के ही जंतर मंतर ही शेष बचे हैं बाकी काल के गाल मैं समा गए।

जल महल जयपुर

हवा महल का इतिहास

सिटी प्लैस की जानकारी

  जंतर मंतर मैं कितने यन्त्र है? Jantar mantar jaipur

जंतर मंतर मै कुल 14 यन्त्र है जो इस प्रकार है:-
1-उन्नातांश यंत्र
2- दिशा यन्त्र
3- सम्राट यन्त्र
4- जय प्रकाश यन्त्र (क)
5- नाड़ीविलय यंत्र
6- राम यन्त्र
7- पाषांश यंत्र
8- ध्रुवदर्शक पट्टिका
9- लघुसम्राट यंत्र
10- शशि वलय यंत्र
11- चक्र यंत्र
12- दिगंश यंत्र
13- दळिणोदक यंत्र
14- जयप्रकाश यत्र (ख)

Jantar mantar jaipur जंतर मंतर जयपुर को विश्व धरोहर में कब शामिल किया गया
जंतर मंतर जयपुर को 1 अगस्त 2010 को विश्व धरोहर कि सूची मैं शामिल किया गया।

 

 

Jantar mantar history in hindi

 

 

जयपुर के ऐतिहासिक पर्यटन स्थलों मे जो महल, मंदिर, बाग-बगीचे और जलाशय हैं उनका अपनी-अपनी जगह महत्व है, लेकिन महाराज सवाई जय सिंह के बनवाये हुए ज्योतिष यंत्रालय या वैधशाला jantar mantar Jaipur का तो अन्तर्राष्ट्रीय महत्व है। यह वैधशाला जंतर मंतर के नाम से वर्तमान में विख्यात है। भारतीय इतिहास के अत्यन्त अंधकारपूर्ण काल मे निर्मित यह वैधशाला सोवियत संघ के सोलह प्रजातंत्रों मे से एक उज़्बेकिस्तान के प्राचीन ऐतिहासिक नगर समरकन्द मे वहां के शासक उलूग बेग (1339- 1449 ई)द्वारा निर्मित वेधशाला का परिवर्द्धि और संशोधित संस्करण है, और है खगोल विद्या के पाषाण युग का अन्तिम स्मारक।

 

 

अन्तरिक्ष के अध्ययन के लिए 1734 ई में बनाई गई इस महान वैधशाला का निर्माता अपने विषय का एकाकी चिन्तक या, जैसा जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है, ”अपने समय की भूल नही था। ज्योतिष और गणित के परम्परागत हिन्द ग्रन्थी से पूर्ण परिचित होने के साथ-साथ उसने इस विषय के यूनानी ग्रन्थों यूक्लिड तथा सरल और गोलाकार त्रिकोणमिति एव लघुगणकों की रचना और उनके उपयोग के सम्बन्ध मे तत्कालीन यूरोपियन ग्रन्थों का भी अध्ययन कर लिया था, जिनके संस्कृत अनुवाद उन पंडितो और विद्वानों ने, जिन्हे इस ज्योतिषी नरेश ने अज्ञान की घाटी और इसकी भूल भुलैया से बचने के लिए अपने पास रखा था।

 

 

ऐसी बौद्धिक कुशाग्रता और सत्य को खोजने की लगन के कारण यह सवाई जय सिंह का ही कार्य था कि उसने भारतीय ज्योतिष शास्त्र के अध्ययन को संजीवनी दी, पंचाग का परिष्कार किया, नक्षत्रों की एक संशोधित सूची बनायी और सूर्य, चन्द्रमा तथा ग्रहों की एक नवीन तालिका प्रस्तुत की, जिससे पूर्ववर्ती समरकन्द के ज्योतिषी शासक के निर्णयों मे सशोधन और सुधार हुआ। सवाई जयसिंह के मतानुसार लगभग 300 वर्षों से सही वैध न किये जाने के कारण उलग बेग की मान्यताये विश्वस्त नही रह गई थी

 

 

फिर भी जय सिंह वैध-क्रिया मे फारसी और तर्क ज्योतिषियों के अध्यवसाय ओर उनकी सावधानी से बहुत प्रभावित था और उनके ठीक-ठीक माप लेने तथा शुद्ध गणना करने की प्रशंसा करता था। यद्यपि उलूग बेग की प्रचलित खगोल गणना को वह “समय की भूल” मानता था, किंतु उसने समरकंद के इस ज्योतिषी शासक की वेध-प्रणाली को एक बडी सीमा तक अपनाया। अमीर तैमूरलंग के पौत्र उलूगबेग ने अपना सारा जीवन आकाश का अध्ययन करने में ही खपा दिया था और 1449 ई मे अपने पुत्र के हाथों उसकी मृत्यु हुई थी। सवाई जयसिंह ने उलूगबेग की तालिकाओं को ही, जिसने 300 वर्ष पूर्व प्रसिद्ध यूनानी ज्योतिषी टोलेमी की तालिकाओ ‘सिनटेक्सिस” अथवा “अलमजेस्ती”’ का परिष्कार किया था, अपने अनुसंधान और प्रयोगों का आधार बनाया। जयसिंह की सुविख्यात पण्डित- मण्डली के एक विद्वान गुजराती ब्राह्मण पण्डित केवलराम ने तारा सारणी ” के नाम से उलूगबेग की तालिकाओं का संस्कृत मे अनुवाद किया। यही नही जय सिंह ने ‘एस्ट्रोलेब” तथा ऐसे ही अन्य यंत्रो का भी पूर्ण उपयोग किया, जो उलूगबेग तथा पूर्ववर्ती अरब एवं मुसलमान ज्योतिषियो को बहुत प्रिय थे। किन्तु शीघ्र ही जयसिंह धातु के यंत्रो के परिणामों के विषय मे सशंकित हो गया, क्योंकि “अपनी यांत्रिक अपूर्णता और अशुद्धता के कारण इनसे कभी सही परिणाम नही निकल सकते थे। अतः उसने पहले यंत्रो का सुधार करने का निश्चय किया और इसके लिये राजसी पैमाने पर वृहदाकार पक्के पाषाण-यंत्र चुने। दिल्‍ली के मुगल सम्राट मुहम्मद शाह की अनुमति और सहमति से जयसिंह ने प्रमुख नगरो मे वेधशालाये स्थापित करने का निश्चय किया और इस प्रकार प्रत्येक वैधशाला मे की जाने वाली गणना दूसरी वैधशाला के परिणामों से मिलाने और नियमित रूप से समय-समय पर उनकी जांच करने का कम आरम्भ किया। वह अपनी वेधशालाओं jantar mantar को नियमित और व्यापक अनुसंधान का स्थायी साधन बनाना चाहता था।

पहली वेधशाला jantar mantar 1724 ई मे दिल्ली मे बनायी गयी और इसके दस वर्ष बाद जयपुर मे वेधशाला jantar mantar बनी। लगभग 5 वर्षो के भीतर उज्जैन, बनारस और मथुरा मे तीन ओर वेधशालाये jantar mantar खडी की गईं। इन सब में जयपुर की वेधशाला सबसे विशाल ओर संपूर्ण होने के साथ-साथ आज भी बडी सुरक्षित अवस्था मे है। जयपुर तथा दिल्‍ली, दोनो ही वेधशालाओ मे प्राचीन पद्धतियो के प्रसिद्ध यंत्रो के साथ अधिक शुद्ध निष्कर्ष निकालने की दृष्टि से स्वयं जयसिंह द्वारा आविष्कृत तीन यंत्र-सम्राट, जयप्रकाश और रामयंत्र- भी हैं
जिनकी सामान्य शुद्धता आधुनिक वैज्ञानिको को भी विस्मित करती है।

 

 

जयपुर में धर्म और शास्त्र की गंगा-यमुना मे विज्ञान की सरस्वती मिलाकर सवाई जयसिंह ने जो त्रिवेणी संगम किया, वह इस वेधशाला jantar mantar से आज भी प्रकट है। धर्म के मामले मे जयसिंह कट्टर हिन्दू था लेकिन अंतरिक्ष का अध्ययन करने मे वह हिन्दू भी था, मुसलमान भी और ईसाई भी। दूसरे शब्दो मे वह मात्र वैज्ञानिक था और उसका दृष्टिकोण खगोल विद्या और ज्योतिष की सभी परम्पराओं में जो सबसे अच्छा था उसे ग्रहण कर अपना रास्ता स्वयं बनाने का था। उसने स्वयं लिखा है कि ज्योतिष विज्ञान के सिद्धान्त और नियमो का उसने निरन्तर गहराई के साथ अध्ययन किया और अपने परिणामों को वेध किया अथवा स्वय अपनी आंखो से देखने की कसौटी पर परखा। किसी भी वैज्ञानिक का इससे अधिक तात्विक दृष्टिकोण और क्‍या हो सकता है।

 

 

जयसिंह के आविष्कृत यंत्रों मे पहला “सम्राट यंत्र” है जो इस वेधशाला मे सबसे बडा और सबसे ऊंचा यंत्र है। इसकी चोटी ठीक आकाशीय धुव्र को सूचित करती है। ऊपर चढ़ने की सीढ़ियो के दोनो ओर की दीवारों के बाहरी किनारे पृथ्वी की धुरी के समानान्तर हैं और इनकी परछाई से सवेरे के समय यंत्र की पश्चिमी और तीसरे पहर पूर्वी भुजाओं पर, जो बेलनाकार हैं और जिन पर घंटे, मिनट, चौथाई मिनट, घडी और पल के चिन्ह भी अंकित है, समय पढ़ा जा सकता है। दो सदियां बीत जाने पर भी सम्राट अभी तक शुद्ध समय जानने का एक आश्चर्यजनक साधन बना हुआ है।

 

 

जयप्रकाश यंत्र मे दो नतोदरीय अर्द्धगोल हैं। दोनो अर्दगोल मिलकर आकाशीय गोल के आधे भाग के प्रतीक हैं। अर्द्धगोल मे अनेक बारीक चिन्ह बने हुए हैं, जिनसे उन्‍नताश, दिगश, रेखाश, अक्षाश, कान्ति और राशियों का पता चलता है। तथाकथित गोल सिद्धान्त और सूर्य की गति के दिग्दर्शन के लिए यह जयप्रकाश एक आदर्श यंत्र है।

 

 

जयसिंह के तीसरे आविष्कार “रामयंत्र” मे दो गोलाकार दीवारे हैं जो एक दूसरे की पूरक हैं। दोनो ‘ दीवारो के केन्द्र अथवा बीच मे एक-एक स्तम्भ है जिनके पार्श्व मे दृश्य वस्तु देखी जाती है। इससे उन्‍नताश और दिग्श पढे जाते हें तथा नक्षत्रो का अवलोकन किया जाता है। जयसिंह ने इसी से अपनी प्रसिद्ध तालिका “जीज मुहम्मदशाही ” बनाई थी जो वस्तुत उलूग बेग की तालिका का संशोधन एव परिष्कार थी। इन तीन यंत्रों के अतिरिक्त और भी अनेक यंत्र हैं, सब पत्थर-चूने से बने हुए। उनमे आकाशीय जक्षाश तथा देशातर का ज्ञान कराने वाला 12 छोटे यंत्रों का समूह ”राशिवलय यंत्र,” मध्यान्ह सूर्य का उन्‍नताश बताने वाला ‘ दक्षिणवृत्ति यंत्र” ओर ‘यंत्रराज” मुख्य हैं। यंत्रराज उन थोडे से धातु यंत्रो मे से एक है, जिसे जयसिंह ने अपनाया था और ऐसे यंत्रो का विरोध करने के बावजूद इसके सिद्धान्त और उपयोग पर एक पुस्तक ‘यंत्रराज- कारिका” लिखवाई थी। यह आकाशीय गोल के मध्य भागो का प्रतिनिधि है और इससे उन्‍नताश, दिग्श, अक्षांश, देशान्तर और नक्षत्रों व ग्रहों के काल एव स्थिति सम्बन्धी अनेक समस्याओं का समाधान होता है।

 

 

यह उल्लेखनीय है कि उज्बेकिस्तान के सोवियत समाजवादी प्रजातंत्र के अधिकारी समरकन्द मे उलूग बेग की प्रसिद्ध वेधशाला का भी जो सवाई जयसिंह की वेधशालाओ के विकास की एक अनिवार्य एव महत्वपूर्ण कडी है, जीर्णोद्धार करा चुके हैं। धातु और शीशे के आधुनिकतम सूक्ष्म यंत्रों और टेलिस्कोप के उपयोग के सामने उलूग बेग और जयसिंह की वेधशालाएं भारी भरकम और अनपयुक्‍त प्रतीत हो सकती हैं, किन्तु यह नही भूलना चाहिये कि अपने समय मे यही वेधशालाएं अपूर्व और नवीनतम थी। भारतीय ज्योतिष विज्ञान के पुनरुद्धार और ऐसे समय मे जबकि यूरोप आधुनिक ज्योतिष विज्ञान के सिद्धातों को मूर्त्तरूप देने के लिये अपने विचारो को श्रृंख्लाबद्ध ही कर कहा था, इस प्राचीनतम विद्या के अध्ययन को नई गति और बल प्रदान करने का बहुत बडा श्रेय सवाई जयसिंह को है, इसमे संदेह नही। पचागों की अपेक्षा वेध क्रिया को अधिक प्रामाणिक मानने वाले, अपरिमित एव असीम ब्रहमांड के इस विद्यार्थी के लिए सहज ही यह कल्पना की जा सकती है कि यदि विज्ञान के आधुनिक उपकरण उसकी सहायता के लिए उपलब्ध रहते तो उसकी असाधारण प्रतिभा ने न जाने क्या-क्या चमत्कार बताये होते। उसकी वेधशाला के विविध यंत्रो को देखते हुए अठारहवी सदी के चौथे दशक के उन दिनो की कल्पना की जा सकती है जब जयपुर का संस्थापक यह ज्योतिषी शासक यहां असीम आकाश के अध्ययन मे जुटा रहता था और कभी कोई गणितज्ञ, कभी कोई जर्मन विद्वान तो कभी कोई पाश्चात्य खगोल शास्त्री वैज्ञानिक उससे और विविद मंडली से परस्पर विचारों का आदान-प्रदान करता था। जयसिंह के जीवन-काल मे यह वेधशाला सचमुच एक अतर्राष्ट्रीय मंच जैसी हो गई थी जहा ज्योतिष विज्ञान के जानने वाले बराबर विनिमय करते थे। बडे-बडे नामी दर्शनीय स्थानों से भरपूर जयपुर मे अकेली यह वेधशाला jantar mantar ही ऐसा ऐतिहासिक स्मारक है जो इस शहर की कीर्ति को विश्व-व्यापी बनाए हुए है। सवाई जयसिंह की इस वेधशाला jantar mantar पर अनेक अच्छी -अच्छी पुस्तके उपलब्ध है, इसके यंत्रो तथा उनके उपयोग के सम्बन्ध मे विस्तार से जानना चाहते हैं, तो उन्हे वेटरी एण्ड इट्स बिल्डर (1902) देखनी चाहिये।

 

 

हमारे यह लेख भी जरूर पढ़े:—

 

 

ईसरलाट मीनार जयपुर
राजस्थान  के जयपुर में एक ऐतिहासिक इमारत है ईसरलाट यह आतिश के अहाते मे ही वह लाट या मीनार है Read more
त्रिपोलिया गेट जयपुर राजस्थान
राजस्थान  की राजधानी जयपुर एक ऐतिहासिक शहर है, यह पूरा नगर ऐतिहासिक महलों, हवेलियों, मंदिरों और भी कितनी ही ऐतिहासिक इमारतों Read more
गोपीजन वल्लभ जी मंदिर जयपुर
राजस्थान  की राजधानी जयपुर में श्री जी की मोरी में प्रवेश करते ही बांयी ओर गोपीजन वल्लभ जी का मंदिर Read more
ब्रजराज बिहारी जी मंदिर जयपुर
राजस्थान  के जयपुर शहर में ब्रजराज बिहारी जी का मंदिर चंद्रमनोहर जी के मंदिर से थोडा आगे जाने पर आता Read more
श्री गिरधारी जी का मंदिर
राजस्थान  की राजधानी जयपुर में राजामल का तालाब मिट॒टी और कुडे-कचरे से भर जाने के कारण जिस प्रकार तालकटोरा कोरा ताल Read more
गोवर्धन नाथ जी मंदिर जयपुर
राजस्थान  राज्य की राजधानी जयपुर के व्यक्तित्व के प्रतीक झीले जाली-झरोखों से सुशोभित हवामहल की कमनीय इमारत से जुड़ा हुआ Read more
लक्ष्मण मंदिर जयपुर
राजस्थान  की गुलाबी नगरी जयपुर के मंदिरों में लक्ष्मणद्वारा या लक्ष्मण मंदिर भी सचमुच विलक्षण है। नगर-प्रासाद मे गडा की Read more
सीताराम मंदिर जयपुर
राजस्थान  की चंद्रमहल जयपुर के राज-परिवार का निजी मंदिर सीतारामद्वारा या सीताराम मंदिर कहलाता है, जो जय निवास मे  के उत्तरी- Read more
राजराजेश्वरी मंदिर जयपुर
राजस्थान  की राजधानी और गुलाबी नगरी जयपुर के चांदनी चौक के उत्तरी-पश्चिमी कोने मे रसोवडा की ड्योढी से ही महाराजा Read more
ब्रज निधि मंदिर जयपुर
राजस्थान  में जयपुर वाले जिसे ब्रजनंदन जी का मन्दिर कहते है वह ब्रज निधि का मंदिर है। ब्रजनिधि का मंदिर Read more
गंगा - गोपाल जी मंदिर जयपुर
भक्ति-भावना से ओत-प्रोत राजस्थान की राजधानी जयपुर मे मंदिरों की भरमार है। यहां अनेक विशाल और भव्य मदिरों की वर्तमान दशा Read more
गोविंद देव जी मंदिर जयपुर
राजस्थान  की राजधानी और गुलाबी नगरी जयपुर के सैंकडो मंदिरो मे गोविंद देव जी मंदिर का नाम दूर-दूर तक श्रृद्धालुओं Read more
रामप्रकाश थिएटर जयपुर
राजस्थान  की राजधानी जयपुर में जयसागर के आगे अर्थात जनता बाजार के पूर्व में सिरह ड्योढ़ी बाजार मे खुलने वाला Read more
ईश्वरी सिंह की छतरी
बादल महल के उत्तर-पश्चिम मे एक रास्ता ईश्वरी सिंह की छतरी पर जाता है। जयपुर के राजाओ में ईश्वरी सिंह के Read more
जनता बाजार जयपुर
राजा के नाम पर बन कर भी जयपुर जनता का शहर है। हमारे देश में तो यह पहला नगर है जो Read more
माधो विलास महल जयपुर
जयपुर  में आयुर्वेद कॉलेज पहले महाराजा संस्कृत कॉलेज का ही अंग था। रियासती जमाने में ही सवाई मानसिंह मेडीकल कॉलेज Read more
बादल महल जयपुर
जयपुर  नगर बसने से पहले जो शिकार की ओदी थी, वह विस्तृत और परिष्कृत होकर बादल महल बनी। यह जयपुर Read more
तालकटोरा जयपुर
राजस्थान  की राजधानी जयपुर नगर प्रासाद और जय निवास उद्यान के उत्तरी छोर पर तालकटोरा है, एक बनावटी झील, जिसके दक्षिण Read more
जय निवास उद्यान
राजस्थान  की राजधानी और गुलाबी नगरी जयपुर के ऐतिहासिक इमारतों और भवनों के बाद जब नगर के विशाल उद्यान जय Read more
चंद्रमहल जयपुर
राजस्थान  की राजधानी जयपुर के ऐतिहासिक भवनों का मोर-मुकुट चंद्रमहल है और इसकी सातवी मंजिल ''मुकुट मंदिर ही कहलाती है। Read more
मुबारक महल सिटी प्लेस जयपुर
राजस्थान  की राजधानी जयपुर के महलों में मुबारक महल अपने ढंग का एक ही है। चुने पत्थर से बना है, Read more
पिछली पोस्टो मे हमने अपने जयपुर टूर के अंतर्गत जल महल की सैर की थी। और उसके बारे में विस्तार Read more
Hawamahal Jaipur
प्रिय पाठकों पिछली पोस्ट में हमने हेदराबाद के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल व स्मारक के बारे में विस्तार से जाना और Read more

write a comment

%d bloggers like this: