Hawamahal history in hindi- हवा महल का इतिहास

प्रिय पाठकों पिछली पोस्ट में हमने हेदराबाद के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल व स्मारक के बारे में विस्तार से जाना और उसकी सैर की थी। इस पोस्ट में हम आपको लेकर चलेंगे राजस्थान राज्य की राजधानी और पिंक सिटी के नाम से प्रसिद्ध ऐतिहासिक शहर जयपुर की सैर पर। यूँ तो यह गुलाबी शहर अपने आप में अपनी खुबसूरती और पर्यटन के क्षेत्र में ऐतिहासिक स्थलों से पर्यटकों में खास महत्व रखता है। हर वर्ष यहाँ लाखों की संख्या में देशी और विदेशी पर्यटक इस शहर की खुबसूरती को निहारने आते है। वैसे तो इस शहर में घुमने के लिए बहुत कुछ है। परन्तु इस पोस्ट में हम यहाँ के प्रसिद्ध स्थल हवा महल की सैर करेंगे और हवा महल hawamahal के बारे में विस्तार से जानेगें। इस पोस्ट में हम जानेगें कि:-

  • हवा महल कहाँ स्थित है
  • हवा महल का निर्माण किसने कराया
  • हवा महल का निर्माण कब हुआ
  • हवा महल का निर्माण क्यों किया गया था
  • हवा महल का इतिहास क्या है
  • हवा महल की कहानी
  • हवा महल के वास्तुकार कौन थे
  • हवा महल किस वास्तु शैली से बना है।
  • हवा महल का स्थापत्य क्या है
  • हवा महल का नाम हवा महल क्यों पडा
  • हवा महल में कितने झरोखे है
  • हवा महल की ऊचांई क्या है
  • हवा महल को बनाने में किस मटेरियल का प्रयोग किया गया है।
  • हवा महल कैसे पहुँचे

ये सारे सवाल आपके जहन में भी घुम रहे होगें इस पोस्ट में हमें इन सभी सवालों के जवाब मिल जायेंगे

Hawamahal history in hindi
हवा महल जयपुर के सुंदर दृश्य

सिटी प्लैस की जानकारी

जल महल जयपुर

हवा महल hawamahal

हवा महल भारत के राजस्थान राज्य की राजधानी जयपुर शहर के बडी चौपड़ चौराहे के मुख्य रोड़ पर सिटी प्लेस के किनारे स्थित हैं। तथा यह जयपुर शहर के दक्षिण में है। हवा महल जयपुर में स्थित आलिशान महल है। वास्तव में ये एक विशाल आवरण वाली दीवार है। जिसें मुख्य तौर पर शाही परिवार की औरतो के लिए बनवाया गया था। ताकि वे सडक पर हो रहे त्योहारों उत्सवों और प्रजा की दैनिक दिनचर्या का भीतर से ही आनंद ले सके। क्योंकि पर्दा प्रथा के चलतें उन्हें बाहर जाने की अनुमति नहीं थी।

हवा महल का निर्माण सन 1799 में महाराजा सवाई प्रताप सिंह ने करवाया था। हवा महल को डिज़ाइन करने की जिम्मेदारी प्रसिद्ध वास्तुकार लालचंद उस्ताद को दी गई थी। जिन्होंने हिन्दू देवता भगवान श्रीकृष्ण के मुकुट के रूप के समान इस इमारत को डिज़ाइन किया था। इस अनोखी इमारत के डिज़ाइन की एक खास बात यह भी है की बाहरी ओर से देखने पर यह मधुमक्खी के उलटें छत्ते की भाँति दिखाई पडती है। इस पांच मंजिला अनोखी इमारत जिसमें ऊपर से नीचे तक 953 छोटी बडी जालीदार खीडकीयाँ है। जिन्हें झरोखा भी कहा जाता है। इन जालियों को लगाने के पीछे यही मकसद था कि पर्दा प्रथा का पालन भी हो सके और इन जालीयो द्वारा महल परिसर के भीतरी भाग में ठंडी हवा का संचार हो सके। जिससे महल का वातावरण वातानुकूलित सा रहता है। इसी से इस महल का नाम हवा महल पड गया था।

 

 

हवा महल की संरचना Hawamahal

यह एक पांच मंजिला पिरामिड आकार की स्मारक है। जो इसके आधार से लगभग 15 मीटर ऊंची हैं। महल के ऊपरी तीन मंजिलों की संरचना का परिमाप एक रूम की चौड़ाई के बराबर है। जबकि पहली और दूसरी मंजिलों के सामने आंगन भी मौजूद है। खुबसूरत जालीदार खिड़कियाँ नक्काशीदार गुम्बद इसकी सुंदरता और बढा देते है। महल की इमारत के पीछे के आंतरिक परिसर में जरूरत के मुताबिक खम्भों के साथ कमरों का निर्माण किया गया है। और गलियारों को हल्की सजावट के साथ बनाया गया है। जिनके द्वारा सबसे ऊपरी मंजिल तक पहुँचा जाता है। हवा महल के आंगन में सोने के पानी से मढित ( सोने के पोलिश ) एक खूबसूरत फव्वारा आंगन के केन्द्र में स्थित है। हवा महल के निर्माण में लाल गुलाबी बलुआ पत्थर का प्रयोग किया गया है। जो जयपुर की ज्यादातर इमारतों में भी प्रयोग हुआ है। हवा महल hawamahal की संस्कृति और वास्तुकला विरासत हिन्दू राजपूत वास्तुकला और इस्लामिक मुग़ल वास्तुकला का यथार्थ प्रतिबिंब है। राजपूत वास्तुकला में गुम्बदाकार छतरियां स्तंभ कमल पुष्प प्रतिमा के आकार सम्मिलित है। जबकि मुग़ल वास्तुकला में चंडी के महीन काम द्वारा पत्थरों को जोडना और मेहराब सम्मिलित हैं।

(hawamahal) हवा महल में प्रवेश पिछे की तरफ सिटी प्लेस से होकर एक शाही दरवाजे के माध्यम से किया जाता है। यह दरवाजा एक विशाल आंगन में खुलता हैं। जिसके तीनो ओर एक दो मंजिला इमारत है। और जो हवा महल के पूर्वी भाग से जुड़ी हुई है। महल के आंगन में एक पुरातत्व संग्रहालय भी है।

हवा महल के बारे में कुछ ओर रोचक बातें

  • हवा महल बिना आधार के बना हुआ विश्व का सबसे ऊचां महल है
  • हवा महल की छोटे छोटे जालीदार झरोखों वाली उन्नत दीवार मात्र 8 इंच चौड़ी है। जिस पर पूरी पांच मंजिलें खड़ा होना निर्माण कला की अपनी एक विशिष्टता है
  • हवा महल की सबसे ऊपरी मंजिल पर पहुँच कर सिटी प्लेस और जंतर मंतर के सुंदर दृश्य दिखाई पडता है।

 

हवामहल महल का संक्षिप्त इतिहास

 

 

जयपुर के गुलाबी शहर को देखने के लिये हर साल दुनिया भर से जो हजारों पर्यटक खिंचे चले आते है उसके पीछे खुला राज है- हवामहल Hawamahal। जैसे खादी का नाम लेते ही चर्खा याद आ जाता है, वैसे ही जयपुर के नाम के साथ हवामहल की बुलन्द इमारत अपने आप आंखो के सामने खडी हो जाती है। देश भर में रेलवे स्टेशनों और अंतराष्ट्रीय हवाई अड्डों के प्रतीक्षालयों में टंगे हुए इस भव्य इमारत के चित्र देखकर ही न जाने कितने भारतीय और विदेशी पर्यटक इस गुलाबी नगर की यात्रा करने और गुलाबी आभा से अलंकृत पांच मंजिल की इस शिल्पकृति के ललित सौन्दर्य को निहारने के लिये प्रेरित हो जाते हैं।

 

नयनाभिराम शिल्प-सज्जा से सम्पन्न झूलते हुए झीने झरोखों ओर वितान युक्त वातायनो का एक के ऊपर एक मडराती हुई अवलियो से सुन्डाकार स्वरूप का यह महल सहज सुपमा एवं समीर का एक पर्वत-सा प्रतीत होता है, जिसकी सह्त्रों जालियों ओर वृत्ताकार मेहराबों में होकर अभ्रकश अट्टालिकाओं की छतों पर भारतीय समीरण उन्मुक्त भाव से शीतलता की लहरियो का संचार करता है।

 

 

हवामहल Hawamahal की सुन्दरता का यह वर्णन सर एडविन आर्नॉल्ड ने किया है। सर एडविन का सारा जीवन इग्लैंड के लिये भारत की विद्याओं और उनके रहस्यों के उदघाटन के लिए समर्पित था, क्योकि भारत भी उसे उतना ही प्रिय था जितना इग्लैंड। हवामहल की प्रशस्ति में उसने आगे कहा है कि ”अलादीन का जादूगर इससे अधिक मोहक निवास-स्थान वी सृपष्टि नही कर सकता था और न ही पेरीबेनान का रजत- मुक्‍ता महल इससे अधिक सुरम्य रहा होगा।

 

 

फिर भी जयपुर में जिन्हे कुछ अधिक रहने और हवामहल से सान्निध्य प्राप्त करने का अवसर मिलता है उन्हे इस अति प्रसिद्ध राजप्रासाद की झांकी ऊबाने वाली हो जाती है ओर वे आश्चर्य करते हैं कि आखिर इस चुने-पत्थर की इमारत मे, जिसमे न कही नक्काशी है और न कोई अन्य अलंकरण, ऐसा क्या है जो यह जयपुर के स्थापत्य की नाक बनी हुई है। राजस्थानी कहावत है, रूप की रोबै, करम की खाय” हवामहल Hawamahal पर जैसे सोलहों आने सही उतरती है। इसी जयपुर में आमेर के नयनाभिराम दुर्ग और चन्द्रमहल, मुबारक महल तथा सवाई मानसिंह संग्रहालय की आलीशान इमारतें क्या कम हु, लेकिन हवामहल है कि इन सब पर हावी है।

 

Hawamahal हवामहल के सामने खडे होकर, जो वास्तव में इसकी पीठ है, दर्शक को संदेह होने लगता है कि इस अजीबो-गरीब भवन को हवामहल नाम देना सही भी हैं अथवा नहीं। जो खिडकियां वह सामने देखता है, वे बस नाम लेने भर की है, आदमी का सिर कठिनाई से उनमें होकर बाहर निकल सकता हैं। फिर यह खिडकियां खुलती भी है पूर्व की ओर, जिधर से वर्षाकाल की पुरवाई को छोडकर वर्ष के शेष भाग मे हवा आने की कोई संभावना नही रहती। अधिकतर दर्शक और पर्यटक हवामहल को यही से देखते हैं और यह कहते हुए विदा ले जाते हैं कि इसकी तो तस्वीर ही शायद इससे अधिक अच्छी थी।

 

लेकिन Hawamahal हवामहल में स्थापत्य की दृष्टि से देखने-समझने को बहुत कुछ है। इसके पश्चिमाभिमुख मुख्य द्वार मे होकर प्रवेश कीजिये, हवामहल नाम की सार्थकता प्रकट हो जायेगी। इस मेहराबदार प्रवेशद्वार से आगे बढते ही एक खुला चौक मिलता है जिसके चारो और बरामदे तथा निवास कक्ष है। इससे आगे बढने पर
कुछ ऊंचाई पर एक और चौक है जिसके मध्य में सफेद संगमरमर का हौज बना हुआ है। पहले से दूसरे चौक में पहुचने के लिए एक प्रवेशद्वार है जिसके दोनो ओर द्वारपालों तथा हिंदू देवी- देवताओ की कुछ पाषाण-प्रतिमाएं हैं। ऊपर वाले चौक से सीढियों के स्थान पर एक घुमावदार सीढ़ियां ऊपर चढती है जिसके द्वारा सिरह ड॒योढी बाजार मे खडे इस मुख्य महल की विभिन्‍न मजिलों मे पहुचा जा सकता है। दूसरी और तीसरी मंजिल में रहने के कमरों के सामने दोनो और दो चांदनिया अथवा खुली छते है। चौथी मंजिल मे फिर एक चांदनी है, ठीक बीच मे। पांचवी तथा सर्वोच्च मंजिल मध्य मे थोडी संकुचित हो गई है जिससे इस विशाल भवन में अनुपात का निर्वह होने के साथ- साथ इसे पिरामिड जैसा आकार भी मिल गया है। इमारत के दोनो और दो गुम्बददार छतरिया हैं जो अवश्य ही दृश्यावलोकन के लिए बनाई गई होगी। दक्षिण की और जो छतरी है वहां से एक ढालू सीढ़ी नगर की,सुरम्य माणक चौक चौपड के कोने तक चला गया है जहा से मुख्य बाजारों का दृश्य और भी खुल जाता हैं।

 

 

Hawamahal Jaipur
Hawamahal Jaipur

 

Hawamahal हवामहल मे नीचे के दोनो खुले हुए चौक तथा ऊपर की चांदनिया उल्लेखनीय है। पश्चिम की ओर से मुख्य प्रवेश द्वार तथा उसके ऊपर होकर आने वाली ताजी हवा कही अवरुद्ध नही होती और चौको व चांदनियों मे होकर पहली से पांचवी मंजिल तक के कक्षों मे सहज रूप मे जाती है। पूर्व की ओर बाजार मे खुलने वाली छोटी खिडकियां तो मात्र ‘क्रासवेन्टीलेशन’ के लिए हैं। इमारत मे अलंकरण और नक्काशी का जो अभाव है वह भी हल्के-हल्के बाहर झुकती हुई लघु खिडकियों की झरोखियों से पूरा हो जाता है जिनमे झिलमिल जालियां लगी हुई हैं। इनके छोटे-छोटे गोलाकार और चपटे छत कलशों से सुशोभित है। अपने गहरे गुलाबी रंग में, जिस पर सफेद कलम से सामान्य सजावट की गई है, पांच मंजिल का यह भव्य राजभवन सुर्योदय के समय अपनी अपूर्व आभा से दमकता हुआ स्वप्नलोक जैसा दृश्य उपस्थित कर देता है।

 

Hawamahal हवामहल की निर्माण कला की विशेषता इतने विशाल और ऊंचे भवन मे चौकों और चांदनियो की यह व्यवस्था ही हैं जो सिद्ध करती है कि देशी निर्माण-पद्धति मे भी प्रकाश और वायु-संचार के लिए कैसी तजवीजे की जाती थी, जो आधुनिक इमारतों मे बहुत सावधानी रखते रखते भी कठिन हो जाती है। फिर यह भवन जितना भव्य है, उतना ही हल्का-फुल्का भी। छोटे-छोटे जाली-झरोखों वाली उन्नत दीवार कठिनाई से आठ इंच चौडी होगी जिस पर पूरी पांच मंजिले उठा ले जाना जयपुर की निर्माण कला की अपनी विशिष्टता है। लगभग 200 वर्ष पुराना यह महल अपनी कमनीय कारीगरी के साथ आज भी ऐसे खडा है जैसे हाल ही मे बना हो। जयपुर मे उस काल मे उपलब्ध कली और चुने को भी इसका कम श्रेय नही है जिसके पलस्तर ने इस इकहरी प्राचीर मे दबे पाषाण को लोहा बना दिया हैं।

 

 

जयपुर तो 1733 ई तक भली-भांति बस चुका था, लेकिन जब Hawamahal हवामहल बनने लगा तो जयपुर और राजस्थान ही क्या, सारा उत्तरी भारत ही इतिहास के अंधेरे दौर से गुजर रहा था। यह जानकर हैरत होती है कि उन दिनो, जब इस महल को बनाने वाला अपने राज्य और अपने जीवन को एक दिन के लिए भी सुरक्षित मानकर निश्चित नही हो सकता था निर्माण की ऐसी महत्त्वाकांक्षा की न केवल कल्पना की गई, वरन्‌ उसका मूर्त रूप भी दिया गया।

 

 

सवाई प्रताप सिंह 1778 ई मे बडी अशुभ और खतरनाक परिस्थितियो मे जयपुर की राजगद्दी पर बैठा था। नाबालिग राजा की ओर से सारा राज-काज राजमाता चूडावत जी चलाती थी जो फीरोज नामक एक फीलवान (महावत) और खुशालीराम बोहरा पर बडी कृपा रखती थी। कर्नल टॉड ने लिखा है कि प्रताप सिंह
एक धीर-वीर शासक था लेकिन उसके राज्य की आंतरिक फूट और पडयंत्र तथा बाहरी दुश्मनों से निपटने के लिए यह धीरता और वीरता, दोनो ही कम पड़ते थे। फीरोज और वोहरा की आपसी कशमकश ने जयपुर की उलझनों को ओर बढा दिया और नौजवान प्रताप सिंह जिन्दगी भर मरहठा हमलावरो से लडता-झगडता और भारी रकमे ले-देकर फैसले करता रहा। प्रताप सिंह की शान मे एक बडी बात यह है कि उसने महादजी सिधियां जैसे प्रबल मरहठा सेनापति को बस्सी के पास तुगा की लडाई मे जबर्दस्त मात दी और भागने पर मजबूर कर दिया। लेकिन यह विजय बडी महंगी पडी थी। जयपुर का खजाना प्राय खाली हो गया था।

 

 

मरहठों ने इस हार के बाद भी पिंड नही छोडा। उनका कोई न कोई सेनापति जब-तब जयपुर पर चढ आता और चौथ वसूल करता। प्रताप सिंह को एक बहुत बडी रकम तुकोजी होल्कर को देकर सिर पर मडराते हुए खतरे को टालना पडा। ऐसे आक्रमणों और घेरो, दुर्व्यवस्था और कलह के बीच प्रताप सिंह स्थिर-चित्त भी रहा और ‘औला-दोला’ भी। इसका प्रमाण हवामहल ही नही, उसके समय मे बने प्रीतम निवास आदि चंद्रमहल के अनेक विशाल कक्ष और पोयीखाने के मूल्यवान ग्रंथ तथा सूरतखाने के वे लाजवाब चित्र हैं जिनकी चर्चा यथास्थान की जा चुकी है। इन सबके अलावा प्रताप सिंह की अपनी काव्य-रचना और उसकी ”कवि बाईसी” के कवियों की रचनाये और गूणीजनखाने के संगीतज्ञों की स्वर-साधना भी इसके सुबूत है। तत्कालीन इतिहास का यह अद्भुत विरोधाभास हैं।

 

 

वह युग वास्तव मे विरोधाभास का ही युग था। जीवन नगण्य होने पर भी उन दिनो नीरस नही था। राजपूत के लिये जीवन की सार्थकता या तो रणक्षेत्र की मार-काट मे थी या अंतपुर के भोग विलास मे। फिर प्रताप सिंह राजा होने के साथ-साथ कवि भी था, सैनिक होने के साथ-साथ कला-रसिक और विलास-प्रिय भी था। तभी उस उथल-पुथल के बीच वह इस नगर के विकास मे इतना रचनात्मक योग दे पाया था। कुछ लोगो का मानना है कि हवामहल का आरंभ माधोसिंह प्रथम ने करा दिया था जिसके और प्रतापसिंह के बीच एक अल्पवयस्क शासक पृथ्वीसिंह का कुछ वर्षों का शासन आता है। किंतु प्रताप सिंह ने एक दोहे मे स्वयं इस हवामहल के निर्माण का श्रेय लिया है।

 

हवामहल याते कियो, सब समझो यह भाव।
राधा-कृष्ण सिधारसी, दरस- परस को हाव।।

 

इस कवि-नरेश ने फारसी तर्ज के अपने एक रेखते मे हवामहल का जो वर्णन किया है उससे भोग-विलास की उस प्रभूत सामग्री का विवरण मिलता है जो उस काल मे इस भवन मे होने वाले आयोजनो मे सहायक होती होगी। हवामहल का प्रधान मिस्त्री था लालचन्द उस्ता, जिसके वंशजो के पास अभी हाल तक एक गांव की जागीर थी। यह गाव लालचन्द को हवामहल के निर्माण- कौशल के पुरस्कार स्वरूप मिला था। अपनी निराली कमनीयता और स्वप्नलोक जैसी छवि के कारण हवामहल जयपुर के व्यक्तित्व और इसकी सुन्दरता का पर्याय बन गया है। अपने ढंग की यह एक ही इमारत आज भी उस विशिष्ट व्यक्तित्व का प्रतीक बनकर खडी है जो जयपुर ने मुगल साम्राज्य के क्षय के अनन्तर एक नगर के रूप मे विकसित किया था।

 

Hawamahal हवामहल मे प्रताप सिंह ओर जगत सिंह के समय में बडे रंगारंग होते रहे होगे। चंद्रमहल के खास महलों से हवामहल़ तक जो सुरंग बनी है, प्रतापसिंह ने ही बनवाई थी। यह सुरंग या ढका हुआ रास्ता हवामहल से त्रिपोलिया बाजार की दुकानों की छतों और त्रिपोलिया से होती हुई जनानी ड्योढी तक गई है। इसमे होकर रानिवास की औरतें इस जादुई महल में आती-जाती होगी और उन महफिलो- मजलिसों मे शामिल होती होगी जिनका संकेत प्रताप सिंह ने अपने रेखते’ (गजल) में किया है

 

करते है हवामहल हवा राधे श्री बिहारी।
संग सखिया सुधर सुथरी बिथरी सी फल-क्यारी।।
मरजी को पाय दस्त लिए सबहि सौज त्यारी।
खाना-पीना अगर- चोवा अतरदान- झारी।।
पानदान पीकदान ले रूसाल न्यारी।
चबर लिए मोरछल को ले अडानि धारी।।
छत्तर लिए काच और कलमदान थारी।
लई पी फल- माल आसा लिए नारी।।
केई लिए जर जेवर औ पुसाक भारी।
केई लिए शमेदान बह गुना तियारी।।
केई धरे दुसाखे कहे ओ चिराग लारी।
महताब छ्रेड़ै केई चश्म खुशी को लगा री।।
लीए हजार बान दुरबीन चित्रकारी।
केई लिए है ख्याल लाल तूृती सुक सारी।।
पैरो के कोश लीए खडी रौस की अगारी।
करती है बाज गश्ती पंखा पौन की हस्यारी।।
लेके गुलाबदानी से करती है आब जारी।
रखती है अगरबत्ती धूप रूप की उजारी।।
कुरसी पै अजब ले मरोड बैठ खुश मुरारी।
क्या फावि रही है जेब से प्रीतम के पास प्यारी।।
लटकन से मटक नाचती ज्यो जमकनी दिवारी।
बाजे बजाती गाती है कोइल सी कुहक कारी।।
कीती मुराद परी मैं तो बारी वारी वारी।
ब्रजनिधि’ पे फिदा होके जान फीनी है बलिहारी।।

 

आगे के जमाने में हवामहल में कुछ समय तक पोथीखाने का भी काम चला और यह महाराजा का अतिथिगृह भी रहा। जयपुर के राज परिवार की और से समय- समय पर आयोजित होने वाले ब्रह्म भोजो या हजारो लोगो के ”हेडो ‘ के लिए भी यही महल उपयुक्त समझा गया। 1880 ई मे महाराजा रामसिंह के मरने पर पूरे जयपुर शहर को जिमाने के लिए जो सामान बनाया गया वह हवामहल मे ही सेठ नथमल दीवान की देख-रेख मे बना था। जो हवामहल आज विदेशी पर्यटकों का आकर्षण है, उसमे जयपुर के ब्राह्मणों ने छक कर ‘लाडू-कचोरी ” खाये है, और बार- बार खाये है। वह जमाना हवा हुआ, हवामहल अब देखने भर का ही महल हैं।

 

 

हमारे यह लेख भी जरूर पढ़े:—

 

 

ईसरलाट मीनार जयपुर
राजस्थान  के जयपुर में एक ऐतिहासिक इमारत है ईसरलाट यह आतिश के अहाते मे ही वह लाट या मीनार है Read more
त्रिपोलिया गेट जयपुर राजस्थान
राजस्थान  की राजधानी जयपुर एक ऐतिहासिक शहर है, यह पूरा नगर ऐतिहासिक महलों, हवेलियों, मंदिरों और भी कितनी ही ऐतिहासिक इमारतों Read more
गोपीजन वल्लभ जी मंदिर जयपुर
राजस्थान  की राजधानी जयपुर में श्री जी की मोरी में प्रवेश करते ही बांयी ओर गोपीजन वल्लभ जी का मंदिर Read more
ब्रजराज बिहारी जी मंदिर जयपुर
राजस्थान  के जयपुर शहर में ब्रजराज बिहारी जी का मंदिर चंद्रमनोहर जी के मंदिर से थोडा आगे जाने पर आता Read more
श्री गिरधारी जी का मंदिर
राजस्थान  की राजधानी जयपुर में राजामल का तालाब मिट॒टी और कुडे-कचरे से भर जाने के कारण जिस प्रकार तालकटोरा कोरा ताल Read more
गोवर्धन नाथ जी मंदिर जयपुर
राजस्थान  राज्य की राजधानी जयपुर के व्यक्तित्व के प्रतीक झीले जाली-झरोखों से सुशोभित हवामहल की कमनीय इमारत से जुड़ा हुआ Read more
लक्ष्मण मंदिर जयपुर
राजस्थान  की गुलाबी नगरी जयपुर के मंदिरों में लक्ष्मणद्वारा या लक्ष्मण मंदिर भी सचमुच विलक्षण है। नगर-प्रासाद मे गडा की Read more
सीताराम मंदिर जयपुर
राजस्थान  की चंद्रमहल जयपुर के राज-परिवार का निजी मंदिर सीतारामद्वारा या सीताराम मंदिर कहलाता है, जो जय निवास मे  के उत्तरी- Read more
राजराजेश्वरी मंदिर जयपुर
राजस्थान  की राजधानी और गुलाबी नगरी जयपुर के चांदनी चौक के उत्तरी-पश्चिमी कोने मे रसोवडा की ड्योढी से ही महाराजा Read more
ब्रज निधि मंदिर जयपुर
राजस्थान  में जयपुर वाले जिसे ब्रजनंदन जी का मन्दिर कहते है वह ब्रज निधि का मंदिर है। ब्रजनिधि का मंदिर Read more
गंगा - गोपाल जी मंदिर जयपुर
भक्ति-भावना से ओत-प्रोत राजस्थान की राजधानी जयपुर मे मंदिरों की भरमार है। यहां अनेक विशाल और भव्य मदिरों की वर्तमान दशा Read more
गोविंद देव जी मंदिर जयपुर
राजस्थान  की राजधानी और गुलाबी नगरी जयपुर के सैंकडो मंदिरो मे गोविंद देव जी मंदिर का नाम दूर-दूर तक श्रृद्धालुओं Read more
रामप्रकाश थिएटर जयपुर
राजस्थान  की राजधानी जयपुर में जयसागर के आगे अर्थात जनता बाजार के पूर्व में सिरह ड्योढ़ी बाजार मे खुलने वाला Read more
ईश्वरी सिंह की छतरी
बादल महल के उत्तर-पश्चिम मे एक रास्ता ईश्वरी सिंह की छतरी पर जाता है। जयपुर के राजाओ में ईश्वरी सिंह के Read more
जनता बाजार जयपुर
राजा के नाम पर बन कर भी जयपुर जनता का शहर है। हमारे देश में तो यह पहला नगर है जो Read more
माधो विलास महल जयपुर
जयपुर  में आयुर्वेद कॉलेज पहले महाराजा संस्कृत कॉलेज का ही अंग था। रियासती जमाने में ही सवाई मानसिंह मेडीकल कॉलेज Read more
बादल महल जयपुर
जयपुर  नगर बसने से पहले जो शिकार की ओदी थी, वह विस्तृत और परिष्कृत होकर बादल महल बनी। यह जयपुर Read more
तालकटोरा जयपुर
राजस्थान  की राजधानी जयपुर नगर प्रासाद और जय निवास उद्यान के उत्तरी छोर पर तालकटोरा है, एक बनावटी झील, जिसके दक्षिण Read more
जय निवास उद्यान
राजस्थान  की राजधानी और गुलाबी नगरी जयपुर के ऐतिहासिक इमारतों और भवनों के बाद जब नगर के विशाल उद्यान जय Read more
चंद्रमहल जयपुर
राजस्थान  की राजधानी जयपुर के ऐतिहासिक भवनों का मोर-मुकुट चंद्रमहल है और इसकी सातवी मंजिल ''मुकुट मंदिर ही कहलाती है। Read more
मुबारक महल सिटी प्लेस जयपुर
राजस्थान  की राजधानी जयपुर के महलों में मुबारक महल अपने ढंग का एक ही है। चुने पत्थर से बना है, Read more
पिछली पोस्टो मे हमने अपने जयपुर टूर के अंतर्गत जल महल की सैर की थी। और उसके बारे में विस्तार Read more
Hanger manger Jaipur
प्रिय पाठको जैसा कि आप सभी जानते है। कि हम भारत के राजस्थान राज्य के प्रसिद् शहर व गुलाबी नगरी Read more

3 Comments

write a comment