मुहर्रम क्या है और क्यो मनाते है – कर्बला की लड़ाई – मुहर्रम के ताजिया

मुहर्रम मुस्लिम समुदाय का एक प्रमुख त्यौहार है। जो बड़ी धूमधाम से हर देश हर शहर के मुसलमान बड़ी श्रृद्धा भाव के साथ मनाते है। भारत में भी यह उसी श्रृद्धा भाव के साथ मनाया जाता है अपने इस लेख में हम मुहर्रम त्यौहार या मुहर्रम फेस्टिवल के बारे में विस्तार से जानेगें। सबसे पहले जानते है कि मुहर्रम क्या है और मुहर्रम क्यों मनाते है?।

 

 

मुहर्रम क्या है? — मुहर्रम क्यो मनाते है

 

 

सारे संसार के मुस्लिम बहुल देश व राज्यों में कई प्रकार के सन् चलते है। किंतु मुस्लिम समुदाय का सर्वमान्य सन् हिजरी है। हिजरी शब्द हिजरत से बना है। हिजरी का अर्थ है कुटुम्ब से पृथक होना या अपने मूल स्थान को छोड़ देना या देश को छोड़ देना आदि। इस्लाम धर्म के आखिरी पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब (स०) अपने शत्रुओं के अत्याचारों से बचने के लिए अपना जन्म स्थान मक्का शहर (सऊदी अरब में) को सन् 622 ई. में छोड़कर मदीना शहर में जा बसे थे। यानि मक्का से हिजरत कर गये थे। इसी के उपलक्ष्य मे मुसलमानों ने अपने सन् का नाम हिजरी रखा।

 

 

मुहर्रम हिजरी सन् के प्रथम महिने का नाम है। मुहर्रम का अर्थ है। वर्जित किया गया। इस्लाम धर्म के प्रचलित होने से इस महीने में युद्ध करना वर्जित था। इस कारण इस महिने का नाम मुहर्रम पड़ गया। परंतु भारत और अन्य देशों में आज यह महिना उस त्यौहार के लिए जाना जाता है जो इसी महीने की दसवीं तारीख को हजरत इमाम हुसैन साहब की वफात ( मृत्यु) के उपलक्ष्य में मानाया जाता है।

जिस प्रकार हिन्दू धर्म में चैत्र, बैसाख, ज्येष्ठ, आषाढ़ आदि बारह महीने मानते है। उसी प्रकार इस्लाम धर्म में के महीने—  मोहर्रम, सफर, रबी-उल-अव्वल, रबी-उल-सानी, जमादी अव्वल, जमादी सानी, रजब, शाबान, रमजान, शव्वाल, जीकाद और जिलहिज्जा नामक बारह महीने माने गये है।

 

 

 

हजरत इमाम हुसैन साहब की शहादत से पहले मोहर्रम का महीना प्राचीनकाल में शुभ समझा जाता था। और अब भी यह एक पवित्र महीना है। इसे सैय्यदुल अशहर भी कहा जाता है। अर्थात समस्त महिनों का राजा। इस्लामी कलैंडर में चन्द्रमा के अनुसार दिन महीना और साल की गणना होती है। इस्लामी कलैंडर मे द्वितीय का चन्द्रमा देखकर प्रत्येक महीने की पहली तारीख निश्चित करते है। और रात को दिन से पहले मानते है। उदाहरण के लिए यह जानना चाहिए कि सोमवार और मंगलवार के बीच में जो रात्रि पड़ती है, मुस्लिम समुदाय उसे मंगल की रात मानते है।

 

 

 

हजरत इमाम हुसैन साहब कौन थे? जिनकी शहादत के शोक में यह त्यौहार मनाया जाता है

 

 

सन् 3 या 4 हिजरी में मदीना शहर में हजरत इमाम हुसैन साहब का जन्म हुआ था। ये अपने बड़े भाई हजरत इमाम हसन साहब से साल डेढ़ साल छोटे थे। हजरत अली साहब आपके पिता, तथा हजरत मुहम्मद साहब (स०) की पुत्री बीबी फातिमा आपकी माता थी। सन् 61 हिजरी अर्थात अक्टूबर सन् 680 ई. 57 या 58 वर्ष की आयु में हजरत इमाम हुसैन साहब दुश्मनों द्वारा बड़ी बेरहमी से शहीद कर दिये गये। इसी बलिदान की बदौलत आप ‘सैय्यदतुल शोहदा’ शहीद-ए-आज़म के नाम से भी जाने जाते है। इसके अलावा शब्बीर, सैय्यद, तैय्यब, वली आदि नामों से भी आपको जाना जाता है।

 

 

अनेक लेखकों का कहना है कि आप सर से लेकर पांव तक अपने नाना पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब की मूरत थे। सन् 632 ई. में हजरत मुहम्मद साहब (स०) वफात कर गये। उस समय इस विषय पर मतभेद हुआ कि आपके बाद आपके स्थान पर अब मुसलमानों का खलीफा कौन हो?। दो समुदाय हो गए। एक का नाम शिया और दूसरे का नाम अहलेसुन्नत अल जमात अर्थात सुन्नी हुआ। इन सुन्नी का कथन है कि सर्व सम्मति या बहु सम्मति से जो खलीफा निश्चित हो, वही खलीफा हो। इस प्रकार हजरत अबूबकर, हजरत उमर, हजरत उस्मान, और हजरत अली साहब क्रमानुसार खलीफा हुए। किन्तु शिया लोग कहते है कि पहले खलीफा होने का हक वास्तव में हजरत अली साहब का था। पहले उक्त तीनों खलीफाओं ने अपनी नीति से हजरत अली साहब का हक ले लिया। शिया लोग जिन बारह इमामों को विशेष रूप से मानते है। उनमें प्रथम हजरत अली साहब, दूसरे हजरत इमाम हसन साहब और तीसरे हजरत इमाम हुसैन साहब है।

 

 

हजरत इमाम हुसैन के दुश्मन कौन थे

 

बहुत से लोग ऐसा समझते है कि मुहर्रम की जंग जो हुई और जिसमें हजरत इमाम हुसैन साहब और उनके साथियों व परिवार वालो पर जो जुल्म हुआ है। उनमें इमाम हुसैन साहब के दुश्मन मुसलमान नहीं, अर्थात किसी अन्य मत के अनुयायी थे। किन्तु यह बात ऐसी नहीं है। क्योंकि विरोधी भी मुसलमान ही थे और उनमें कुछ ऐसे मुसलमान भी थे जिनको पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब (स०) के दर्शानों का सौभाग्य प्राप्त था। और जिन्होंने हजरत मुहम्मद साहब (स०) के समय मे तथा उनके बाद इस्लाम की सेवाएं की थी।

 

 

 

उक्त बात के अलावा यह भी जान लेना चाहिए कि अरब में नजर बिन कनान नामी व्यक्ति को कुरैश की उपाधि दी गई थी। फिर उसी के पौत्र कहर की संतान कुरैश कही जाने लगी और धीरे धीरे कुरैश घराने की बहुत सी शाखाएं हो गई। उन्हीं में से जिन शाखाओं के उल्लेख की यहां आवश्यकता है। उनमें एक बनी हाशिम और दूसरी बनी उमैय्या है। अतः पहली बनी हाशिम शाखा के हजरत मुहम्मद साहब (स०) हजरत अली और हजरत इमाम हुसैन साहब है। और माविया और यजीद जो हजरत इमाम हुसैन तथा हजरत अली साहब के विरोधी थे, बनी उमैय्या नामक दूसरी शाखा के थे। निदान यह है कि हजरत हसन और हुसैन साहब के विरोधी भी कुरैश कुल के ही थे। जो कि अरब में सबसे बड़े और सर्वश्रेष्ठ कुलीन माने जाते हैं।

 

 

 

एक इतिहासकार लिखता है कि कई अवसर ऐसे पड़े थे, जिन पर बनी उमैय्या की शाखा के लोगों को बनी हाशिम के मुकाबले में नीचा होना पड़ा था। इन कारणों से बनी उमैया के लोग बनी हाशिम वालों के कट्टर दुश्मन हो गये थे। और वे लोग बनी हाशिम वालों की सदैव बुराई चाहा करते थे।

 

 

यह बात अभी ऊपर बतलाई जा चुकी है कि पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब (स०) बनी हाशिम शाखा में से थे। अब यह जानना चाहिए कि हजरत मुहम्मद साहब (स०) ने जब इस्लाम का प्रचार किया तब बनी उमैय्या की शाखा के अबूसुफ़यान नामी व्यक्ति तथा कुछ अन्य लोगों ने हजरत मुहम्मद साहब (स०) का घोर विरोध किया था। और यथा शक्ति हजरत साहब को हानि पहुंचाने में कोई कसर बाकी न रखी थी। परंतु जब इस्लाम फैलता गया और मुस्लमान लोग बहुत शक्तिशाली हो गए, और उनका पूरा अधिकार मक्का पर हुआ तथा विरोधियों ने मजबूरन इस्लाम को स्वीकार किया। और इस प्रकार द्वेष की आग जो बनी उमैय्या शाखा वालो के ह्रदय में प्रवजलित थी उस पर पानी फिर गया। किंतु वास्तव में यह आग पूर्णरूप से न बुझी क्योंकि उसी अग्नि के पुनः प्रचंड होने का ही यह फल है, जो कि हजरत अली तथा उनके अन्य परिवार वालों को अनेक प्रकार के कष्ट पहुंचे जिसकी स्मृति आज भी बड़े जोरों के साथ मनाई जाती है।

 

 

 

विरोधियों की शक्ति वृद्धि

 

सन् 632 ई. में पैगम्बर हजरत मुहम्मद साहब (स०) की वफात के बाद हजरत अबूबकर साहब मुसलमानों के पहले खलीफा माने गये। यह दो वर्ष के लगभग खलीफा रहे और 634 ई. में इनकी वफात हुई। इन्होंने शाम देश पर आक्रमण करने के लिए जो सेना भेजी थी, उसमें अबूसुफ़यान का पुत्र माविया भी अपने बड़े भाई के साथ गया था। शाम देश पर विजय होने पर माविया का भाई वहां का उत्तराधिकारी बना था। किंतु 639 ई. या 642 ई. मे अपने भाई की मृत्यु के बाद माविया ही यहां का उत्तराधिकारी बनाया गया। और लगभग 40 वर्षों तक वह वहां का शक्तिशाली हाकिम रहा। इससें इनकी जड़े वहां मजबूत हो गई।

 

 

हजरत अबूबकर के बाद हजरत उमर लगभग 11 वर्षों तक खलिफा रहे। इनके बाद हजरत उस्मान लगभग 12 वर्षों तक खलीफा रहे। हजरत अबूबकर व हजरत उमर कुरैशी थे किंतु वे न तो बनी हाशिम की शाखा के थे न बनी उमैय्या की शाखा के थे। किंतु हजरत उस्मान बनी उमैय्या की शाखा के थे। इन्होंने अपने खलिफा काल में बनी उमैय्या वालों के प्रति बड़ा पक्षपात व झुकाव दिखलाया था। माविया इनका संबंधी था। इस कारण माविया की समस्त शक्ति शाम देश मे बहुत ज्यादा जोर पकड़ गुई थी।

 

 

656 ई. में हजरत उस्मान के वफात करने के बाद अनेक लोगों ने हजरत अली साहब को अपना खलिफा माना किंतु माविया ने स्वीकार न किया। यह बात ऊपर बताई गई हैं कि हजरत अली बनी हाशिम शाखा के है। और माविया बनी उमैया शाखा से। अतः अतः दोनो शाखाओं में दुश्मनी की आग जो पहले लगभग बुझ सी गई थी, वह फिर भड़क उठी। बडे बड़े झगड़े बखेड़े व टकराव हुए। अन्त मे यह निश्चय हुआ कि शाम तथा उसके पश्चिम के मुसलमानी राज्य का उत्तराधिकारी माविया को माना जाये और पूर्व का बाकी राज्य हजरत अली साहब के अधिकार में रहे।

 

 

सन् 661 ई. मे हजरत अली साहब कूफा मे शहीद हो गए। उनके स्थान पर बहुत से लोगों ने उनके पुत्र हजरत इमाम हसन साहब को खलीफा माना परंतु अमीर यजीद ने उन पर आक्रमण किया। वह संत स्वभाव के थे। लडाई झगड़ा बिल्कुल पसंद न करते थे। अतः आपने यजीद के पास निम्नलिखित आशय का संदेश भेजा:—

1.  आपके पश्चात खिलाफत मेरे निमित्त हो।
2.  इराक (मैसोपोटामिया) और हजाज (अरब) देशों की आय मे खर्चे के निमित्त रहे।

3.  मेरे पिता के क्षण चुकाये जाये।

यजीद ने उक्त शर्तों को सहर्ष स्वीकार किया। इसके अनुसार इमाम हसन साहब ने खिलाफत त्यागी और वह सारे इस्लामी राज्य का बादशाह माना गया।

 

 

हजरत इमाम हसन साहब लगभग 6 महिने तक ही खलीफा रहे, संधि हो जाने पर मदीना में ईश्वर भक्ति में जीवन व्यतीत करने लगे। किंतु माविया या यजीद पक्ष के किसी अन्य शत्रु ने आपकी अस्मा नामी धर्म पत्नी के द्वारा आपको विष दिलवा दिया। जिससे सन 670 ई. 46 वर्ष की आयु में आपकी वफात हो गई।

 

 

दुश्मनी का कारण

 

अमीर यजीद की मृत्यु सन् 679 ई. 77 या 80 वर्ष की आयु में हुई। उपरोक्त संधि के अनुसार अब हजरत इमाम हुसैन साहब खलीफा होते। पर अपनी मृत्यु से पहले ही माविया ने बहुतों से यह प्रतिज्ञा करा ली थीकि इसके बाद उनके पुत्र यजीद को ही लोग खलीफा मानेंगे। मुसलमान लोग पहले सर्व या बहुसम्मति जिसको चाहते थे अपना खलीफा बनाते थे। किंतु बाप के बाद बेटे के खलीफा होने की प्रथा अमीर यजीद से ही चली है। जिसके फलस्वरूप माविया की मृत्यु के बाद यजीद समस्त इस्लामी राज्य का खलीफा बन बैठा। पर कूफा निवासियों ने हजरत इमाम हुसैन साहब को निमंत्रित किया और उनको अपना खलीफा मानने की इच्छा प्रकट की। इमाम हुसैन साहब उस समय मक्का में थे। इस पर अपने परिवार और साथियों सहित कूफा (मैसोपोटामिया) की ओर चले।

 

 

मुहर्रम की झलकियां
मुहर्रम की झलकियां

 

हजरत इमाम हुसैन के साथ मे परिवार तथा अन्य साथी लोग संख्या में बहुत कम थे। ये सब लोग फुरात नदी के पास ही पश्चिम की ओर उस स्थान पर ठहरे जो कर्बला के नाम से जाना जाता है। यहां कूफा में इनका कोई सच्चा सहायक नहीं था उसी समय यजीद की ओर से ओबैदुल्लाह बिन जयाद कूफा में इमाम हुसैन साहब के मुकाबले में आया। उसने उमर बिन साद को चार हजार सवारों के साथ भेजा। इन लोगों ने इमाम हुसैन साहब का खेमा घेर लिया और फुरात नदी पर पहरा बैठा दिया। अर्थात वहां से पानी लेना बंद कर दिया। इससे हुसैन साहब के परिवार और साथियों को बड़ा कष्ट हुआ। आपने निपटारे की कई शर्तें शत्रुओं के सामने रखी, परंतु एक भी कारगर साबित न हुई। अंत में आपने यहां तक भी कहा कि मेरे बाल बच्चों और साथियों को कष्ट न दो। मेरे साथियों को न मारो केवल मुझे ही मार करके झगड़ा सुलझा लो। जब शत्रु इस बात पर भी राजी न हुए तब आपने अपने साथियों से कहा कि तुम जान को खतरे में न डालो, परंतु किसी ने भी आपका साथ छोड़ना पसंद न किया। और सबके सब बड़ी वीरता और साहस से रणक्षेत्र में काम आये।

 

 

कर्बला की लड़ाई

 

पहले दोनों ओर से एक एक व्यक्ति के बीच युद्ध हुआ। इसमें इमाम हुसैन के साथियों ने आश्चर्यजनक कार्य कर दिखलाया। ऐसी वीरता का परिचय दिया की शत्रुओं के दिल दहल उठे। फिर शत्रु ने यह कूटनीति की कि थोडी सेना लेकर इमाम हुसैन साहब के खेमे अर्थात स्त्री व बच्चों की ओर बढ़ा, और उनसे छेडछाड करनी चाही। परंतु हुसैन साहब ने ललकार कर कहा — मेरा तुम्हारा मुकाबला है। स्त्रियों और बच्चों को सताने से क्या मतलब, क्या वे तुम से लड़ रहे है। जो तुम उन्हे सता रहे हो। ऐसा सुनकर शत्रुओं ने उनको छोड़ दिया। अब हुसैन साहब को आ घेरा भीषण युद्ध शुरु हो गया। दूर से शत्रु लोग बाण बरसाने लगे। धीरे धीरे हुसैन साहब के सब साथी शहीद हो गये। अपने साथियों के शहीद होने तक हजरत हुसैन साहब भी बहुत जख्मी हो चुके थे। इसके अलावा प्यास की जो शिद्दत थी उसके बारे में कहा ही क्या जाएं। किन्तु अपने धैर्य और शौर्य को उन्होंने न जाने दिया। बड़ी वीरता के साथ घोड़े पर सवार होकर शत्रु की सेना पर टूट पड़े। बहुतों को मार गिराया। परंतु विकट रूप से घायल होने के कारण आप कब तक लड़ सकते थे। अंत में शत्रु दल के एक निर्दयी ने निष्ठुरता के साथ तलवार से आपका सिर धड़ से अलग कर दिया।

 

 

एक लेखक का कथन है कि हजरत हुसैन साहब के शहीद होने के बाद कूफा में ओबैदुल्लाह बिन जयाद और शाम मे यजीद ने रोशनी सारे नगर में कराई खूब बाजे बजवाएं नाना प्रकार के तमाशे हुए और बड़ी खुशिया मनाई।

 

 

कर्बला के बाद क्या हुआ

 

हजरत इमाम हुसैन साहब जब तक जीते रहे शत्रुओं की ओर से उन्हें अनेक प्रकार के असहनीय दुख पहुंचाये गये, किंतु मृत्यु के बाद भी उनके मृत शरीर तथा उनके बचे हुए खानदानियो और साथियों के साथ भी शत्रुओं का जो व्यवहार हुआ वह भी कुछ कम दुखमय नहीं है। कहा जाता हैं कि हजरत इमाम हुसैन साहब की शहादत के बाद शत्रु खेमे मे आएं। वहां कुल 12 व्यक्ति जीवित थे। जिनमें ग्यारह स्त्रियां और लड़कियां थी। केवल इमाम जैनुलाबदीन साहब पुरूष थे। उनकी आयु उस समय 23 वर्ष की थी। वे इमाम साहब के पुत्र थे किन्तु बिमारी के कारण नहीं लड़े थे। ये सभी कैद कर लिए गये।

 

 

सारा सामान लूट लिया गया सारे कैदी और शहीदों के सिर नेजो पर रखकर कूफा भेजे गए। कूफा पहुंचने पर ओबैदुल्लाह इबने जयाद की आज्ञा से सबसे पहले शहीदों के सिर नेजो पर खोंसकर औ सारे कैदी (स्त्रियों) बिना परदे के ऊंटों पर बैठाकर समस्त नगर में घुमाया गया। फिर दरबार मे उसके सम्मुख पेश किये गए। उसने हजरत इमाम हुसैन के सर के साथ बड़ी बेअदबी का बर्ताव किया। इसके बाद सारे कैदी और सिर यजीद के पास दमिश्क भेजे गए। वहां धूमधाम के साथ दरबार हुआ, बहुत सारा मजमा एकत्र हुआ। फिर हजरत इमाम हुसैन साहब के सर और परिवार के साथ बड़ा दुर्व्यवहार किया गया।

 

 

कुछ लोग उसके दुर्व्यवहार को देख बहुत रूष्ट भी हुए। बाद मे यजीद ने आज्ञा दी कि सारे सिर दमिश्क के दरवाजे पर लटकाए जाये। अतः आज्ञा का ठीक उसी प्रकार पालन हुआ। फिर तीन दिन के बाद सारे सिर और कैदी मदीने भेज दिये गए। वहां उन सभी के पहुंचने पर बड़ा कोहराम मच गया। सभी उनके साथ किये व्यवहार से दुखी थे। बाद मे हजरत इमाम साहब का सिर उनकी माता और बड़े भाई की कब्र के पास दफना दिया गया।

 

 

इस्लामी जगत में हलचल

हजरत इमाम हुसैन साहब, पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब (स०) की प्यारी पुत्री के पुत्र थे, और आप अपने नवासे हसन और हुसैन को बहुत प्यार करते थे। उस समय सैकड़ों जीवित व्यक्ति ऐसे थे जो भलिभाँति जानते थे कि इमाम हुसैन साहब को हजरत अली कितना प्यार करते थे। इसके अलावा माविया और यजीद ने हजरत इमाम हुसैन साहब के पूज्य पिता हजरत अली साहब तथा भ्राता हजरत हसन के साथ जो सलूक किया था वह भी असंतोष पैदा करने वाला था। इन सब बातों से हजरत इमाम हुसैन साहब की शहादत के समाचार से इस्लामी संसार में कोहराम मच गया। यजीद का बड़ा जोर था। उसके भीषण अत्याचार का उदाहरण इससे बढ़कर और क्या हो सकता है। कि हजरत इमाम हुसैन साहब आदि की बड़ी दुर्गति हुई। तथापि बहुत से लोगों को सारा दुर्व्यवहार असहनीय हुआ कुछ लोगों ने खुल्लमखुल्ला यजीद के सामने ही उसे बहुत बुरा भला कहा। इस पर वे भी मारे गये। किन्तु सारे इस्लामी जगत ने जो दुख मनाया और जो अब भी मुहर्रम के रूप में मनाते है, उसे कोई भी न रोक सका।

 

 

कर्बला क्या है

 

 

कर्बला का अर्थ वास्तव में कर्बला शब्द कर्ब और बला अर्थात दुख और आपत्ति से बना है। कर्बला को आदर की दृष्टि से कर्बला-ए-मुअल्ला अर्थात उच्च अथवा श्रेष्ठ कर्बला भी कहते है। (इसी कर्बला के नाम पर भारत के अनेक स्थानों पर मुस्लिम समुदाय ने कर्बला नाम का एक स्थान नियुक्त कर रखा है। मुहर्रम के ताजिया वहीं पर जाते है। ताजियों का थोड़ा सा अंश वही पर गाड दिया जाता है) इसके सिवाय यह स्थान मशहद हुसैन अर्थात हजरत इमाम हुसैन साहब के बलिदान का स्थान भी कहा जाता हैं। कर्बला मे हजरत इमाम हुसैन साहब के साथियों पर जो बीता है। वह सब का सब वस्तुतः अति ह्रदय विदारक है। केवल पानी के लिए ही वे इतने तरस गये थे कि बोलने तक की शक्ति उनमे न रही थी। विवष होकर वह इशारों में ही बात करते थे। कहा जाता हैं कि इमाम हुसैन साहब के एक भाई हजरत अब्बास साहब बहुत प्यासे थे। वो फुरात नदी के तट पर गये, पीने के लिए हाथ में पानी लिया और वो पिने को ही थे कि इतने में उन्हें इमाम हुसैन साहब और बच्चों की प्यास याद आ गई। दोनों हाथों से पानी फेक दिया और पानी की मशक भरकर चले। इस पर शत्रुओं ने बाण चलाना आरम्भ कर दिये। मशक में छेंद हो गए और सारा जल बह गया। तब हजरत अब्बास साहब ने हजरत इमाम हुसैन साहब की सेवा में लौटकर निवेदन किया कि तलवार के बिना फुरात नदी का जल हमारे भाग्य में नहीं है।

 

 

कहा जाता हैं कि हजरत इमाम हुसैन साहब का सिर काट लेने के बाद उनकी लाश छोड़ दी गई थी। बीस सवारों ने घोड़ा दौडा दौडा कर टापों से उसे खूब रौंदा। शत्रुओं ने अपने मृतकों की लाशों को तो दफना दिया पर इमाम हुसैन साहब और उनके साथियों की लाशों को वहीं पड़ा रहने दिया। तीन दिन के बाद कर्बला के समीप एक गाँव के निवासियों ने हजरत इमाम हुसैन साहब तथा अन्य साथियों की लाशों को दफनाया।

 

 

एक लेख से ऐसा भी मालूम होता है कि हजरत इमाम साहब का सिर दमिश्क से कर्बला क वापस भेज दिया गया था और वह धड़ के साथ ही दफनाया गया था। इसी की स्मृति में कर्बला में प्रत्येक वर्ष बड़ा मेला होता है। कर्बला में हजरत इमाम हुसैन साहब का सबसे प्रथम स्मारक जिसने बनवाया उसकी बाबत कुछ पता नहीं चलता। और न यही मालूम होता है कि वह किस सन् में बनवाया गया था। किन्तु इस बात को मानना पड़ता है कि ईसा की नवीं सदी में इमाम साहब का कोई स्मारक वहां अवश्य था। खलीफा मुतवल्लिक सन्  846 से सन् 861 तक बगदाद के राजसिंहासन का स्वामी था। उसने जल प्रवाह से हजरत इमाम साहब के स्मारक को नष्ट करवा दिया था। और उस स्थान पर लोगों को जाने से रोक दिया था। किंतु बाद को दसवीं सदी में ईरान के कूफा राजघराने के आजुदुदौल्ला नामक बादशाह ने एक बड़ा सुंदर स्मारक बनवा दिया। ग्यारहवीं शताब्दी में कर्बला में एक पाठशाला की स्थिति का पता चलता है। उस समय यह एक छोटा सा नगर था। अब तो यह सारे मैसोपोटामिया में सबसे बड़ा और प्रसिद्ध नगर है। शिया मुसलमानों के विचार से सबसे पवित्र स्थान नज़फ अशरफ है। जहाँ हजरत अली साहब की कब्र है। उसके बाद कर्बला का ही नंबर है। मैसोपोटामिया के शिया मुसलमान नज़फ अशरफ में अपने को दफन किया जाना सबसे बड़ा सौभाग्य समझते है। परंतु भारत और ईरान के शिया कर्बला को ही पसंद करते है। और कर्बला का वह स्थान भी आदर की दृष्टि से देखा जाता है जहां पर कि हजरत इमाम हुसैन साहब आकर ठहरे थे।

 

 

चौदहवीं सदी में इब्नबतूता नामक मुसलमान यात्री हुआ है। उसने कर्बला की भी यात्रा की थी। वह लिखता है कि कर्बला एक छोटा सा शहर है। जिसके चारों ओर खजूर के बाग है। फुरात नदी के पानी से यह शहर तर रहता है। पवित्र कब्र शहर मे ही है। वहां एक बड़ी पाठशाला है और एक खानकाह भी है। इस खानकाह में प्रत्येक आने जाने वाले को भोजन मिलता है।

 

 

पवित्र कब्र वाले मकान के दरवाजे पर आदमी तैनात रहते है। उनकी आज्ञा के बिना कोई भी आदमी अंदर नहीं जा सकता है। भीतर जाने से पहले लोग डयोढ़ी को चुमते है। यह चांदी की बनी हुई है। कब्र पर सोने और चांदी की कंदीलें (लालटेन) लटकी हुई है। और दरवाजे पर रेशम के परदे पड़े हुए है।

 

 

इस शहर में दो घरानों के लोग रहते है एक रखीक की संतान कहलाती है दूसरी फायज़ की। दोनों में सदैव झगड़ा रहा करता है। सब शिया है और निःसंदेह दोनों एक ही दादा की संतान है इनके पारस्परिक लड़ाई झगड़ों से यह शहर उजड़ सा गया है।

 

 

कर्बला में अन्य प्रतिष्ठित कब्रें

 

कर्बला मे ही हजरत इमाम हुसैन साहब के भाई हजरत अब्बास साहब का भी एक सुंदर स्मारक है। ईरान के बादशाह नादिरशाह ने दोनों स्मारको के गुंबद व मिनारों को सुनहरा करवा दिया था। वहाबी मुसलमानों का मत है। कि कब्रों को सजाना धजाना व उन पर गुंबद या शानदार मकान बनाना अधर्म है। और जो ऐसा करते है वे अधर्मी है। सन् 1791 से लेकर सन्  1803 तक अरब में वहाबियों का नेता अब्दुल अजीज था। सन् 1801 की बात है कि दो लाख सेना लेकर वह कर्बला में पहुंचा– सेना को मारधाड़ की आज्ञा दी। छः घड़ी तक मार धाड़ हुई सात हजार के लगभग मनुष्य मारे गये। हजरत इमाम हुसैन साहब तथा हजरत अब्बास साहब की कब्रों की बहुमूल्य वस्तुएं विशेष रूप से लूटी गई, परंतु वह दोनों मकबरे आज भी कुछ कम मूल्य के नहीं है।

 

 

हजरत इमाम हुसैन साहब की शहादत का समय

 

हजरत इमाम हुसैन साहब दोपहर के बाद कुछ दिन ढले जुमा की नमाज के समय या उसके कुछ ही बाद शहीद हुए थे। उस दिन सन् 61 हिजरी के मुहर्रम की दसवीं तारीख थी। इसी कारण इस तिथि पर विशेष रूप से शोक मनाया जाता है। परंतु प्रत्येक मुहर्रम महीने के प्रथम दिन से ही शोक की घड़ी का श्रीगणेश हो जाता है। और मोहर्रम की दसवीं तक या दसवीं को बहुत ज्यादा शोक मनाया जाता है। यहां तक की कहीं कहीं लोगों की जान भी खतरे मे पड़ जाती है। अथवा किसी किसी को शहादत भी नसीब हो जाती है। वास्तव में इसी ह्रदय विदारक घटना के कारण पूरा महिना शोक का महीना माना जाता है। और मोहर्रम शब्द तक से शोक का अर्थ लिया जाने लगा है। उदाहरणार्थ:– कभी कभी सूनने मे आता है क्या मोहर्रम सूरत बनाये बैठे हो। मुहर्रम की सातवीं आठवीं और नवीं तारिख को पानी व भोजन न मिलने के कारण भूख प्यास से इमाम साहब और सहाबियों को बहुत कष्ट पहुंचा था इसलिए इन तारीखों की भी बहुत बड़ी महत्ता है। इसलिए इन तारिखों को मुस्लिम समुदाय शरबत और खाना तक्सीम करते है। नवीं और दसवीं तारीख के बीच की रात्रि कतल की रात्रि होती है। इस रात्रि को हजरत इमाम हुसैन साहब ने सबको उपदेश दिया तथा सबको समझाया था। सन् 61 हिजरी के मुहर्रम की दसवीं तारीख ईसवीं सन् के अनुसार संभवतः 10 अक्टूबर सन्  680 ई. बैठती है।

 

 

 

मुहर्रम की दसवीं तारीख की अन्य महत्वपूर्ण घटनाएं

 

 

मुहर्रम की दसवीं तारीख हजरत इमाम हुसैन साहब की मृत्यु के कारण अधिक विख्यात है। किन्तु इस्लामी ग्रंथों तथा किताबों मे इस तारीख के संबंध मे अन्य जिन बातों अथवा इस्लाम की विशेष घटनाओं का उल्लेख है उनमें से दसवीं तारीख की कुछ बातें निम्नलिखित है:—–

  •  अल्लाह ताला ने आकाश, पृथ्वी, कलम तख्ती, फरिश्ते तथा तथा बाबा आदम अलेहिसलाम को इसी तारीख को पैदा किया था।
  •  पैगंबर हजरत सुलेमान को मुल्क दिया गया।
  •  पैगंबर हजरत दाऊद साहब के गुनाहों को माफ किया।
  •  बाबा आदम आलेहीस्लाम की तौबा स्वीकार हुई।
  •  हजरत इब्राहीम साहब आग से बचे।
  •  हजरत युसूफ साहब कैद से छुटे।
  •  पैगंबर हजरत यूनुस साहब मछली के पेट से निकले।
  •  हजरत याकूब साहब की आंख ठीक हो गई।
  •  ईसा अलेहीस्लाम के मानने वालों के लिए नील नदी मे मार्ग बना।

उक्त घटनाओं के अलावा और भी बहुत सी बातें मोहर्रम महीने की दसवीं तारीख के विषय में पाई जाती है। ऐसा भी माना जाता है की प्रलय (कयामत) की भी यही तारीख होगी। इस तारीख को आशोरा भी कहते है। और हजरत मुहम्मद साहब ने भी इस तारीख की बड़ी महिमा बतलाई है।

 

 

मोहर्रम महीने की अन्य महत्वपूर्ण घटनाएं

 

अलग अलग समय मे मोहर्रम के महिने की अन्य तारीखों में जो और घटनाएं हुई है। उनमें से कुछ महत्वपूर्ण घटनाएं निम्नलिखित है:—

  •  पहली मुहर्रम से हिजरी सन् का आगाज हुआ।
  •  सातवीं मोहर्रम सन् 61 हिजरी को खुरासान में अलमुकन्ना नामी व्यक्ति ने नबी होने का दावा किया था।
  •  19 मुहर्रम सन् 94 हिजरी को हजरत इमाम जैनुलाबदीन साहब की वफात हुई थी।
  •  18 मुहर्रम सन् 612 हिजरी को शहाबुद्दीन गौरी की मृत्यु हुई थी।
  •  28 मोहर्रम सन् 30 हिजरी को इराक और शाम के मुसलमानों मे शुद्ध कुरान शरीफ पर मतभेद हुआ था।
    इनके अलावा और भी बहुत सी बातें है जिनको मुस्लिम समुदाय बहुत महत्व देते है।

 

 

 

मुहर्रम मनाने की प्रथा कब से शुरु हुई

 

 

इसमें संदेह नहीं है कि हजरत इमाम हुसैन साहब और उनके परिवार व साथियों पर जो जुल्म हुआ है। यदि कोई भी मनुष्य उस पर भलिभांति विचार करे तो वो किसी समय मे भी शोक प्रकट किये बिना नहीं रह सकता। किंतु प्रतिवर्ष मुहर्रम महिने मे विशेष रूप से जो शोक स्मृति मनाई जाती है। उसको हम मुहर्रम कहते है। भारतवासियों मे से शायद ही कोई ऐसा होगा जो मोहर्रम से परिचित न हो। बहुत सी जगह अन्य धर्मों के लोग भी इसमें भाग लेकर शोक प्रकट करते है। हजरत इमाम हुसैन साहब सन् 680 मे शहीद हुए थे। किंतु उनके शहादत दिवस के रूप में जो शोक प्रतिवर्ष किया जाता है, उसकी नीवं ग्यारहवीं शताब्दी में पड़ी थी। इस शताब्दी से पहले बगदाद के खलीफा का जोर था। वे लोग कट्टर सुन्नी थे। उनके डर के मारे उस समय शिया लोग सुन्नियों मे ही मिल मिलाकर रहते थे। परंतु जब बगदाद के राजघरानों का पतन हुआ और शिया लोगों ने कुछ जोर पकड़ा तब शिया राज्य के समय में पहली बार सन् 400 हिजरी अर्थात सन् 1009 ई. मे मुहर्रम का शोक मनाने की रस्म चली। एक लेखक का कथन है कि शुरू शुरू मे यह दस्तूर था कि लोग बाजारों में काले झंडे लटकाते और रोते पीटते थे। थोड़े ही दिनों में इस बात ने बहुत जोर पकड़ा और इस प्रकार शोक मनाने की शैली कुछ न कुछ बदलती ही गई। और कुछ काल पश्चात भयंकर तथा करूणाजनक स्थिति धारण कर बैठी।

 

 

ताजिया और उसका चलन

 

बादशाह तैमूर के नाम से तो आप सभी परिचित होगें। वह सन् 1360 ई. मे पैदा हुआ व सन् 1405 ई. मे उसकी मृत्यु हुई। ऐसा प्रतीत होता है कि वह धूमधाम और महोत्सव प्रेमी था, क्योंकि अपने लड़कों के विवाह में उसने ऐसा महोत्सव मनाया था जो दो महिने तक होता रहा था। उसमें बहुत दूर दूर के लोग सम्मिलित थे। कहते है कि तैमूर बादशाह ने ही सबसे पहले ताजिया रखने की शुरुआत की थी। ताजिया को उस स्मारक का प्रतिरूप समझा जाता है जो हजरत इमाम हुसैन साहब की कब्र है। ताजिया का अर्थ है शोक का स्मारक।

 

 

रोने पीटने मातम करने की नीवं पहले से ही पड़ी थी। इस कारण ताजियादारी और मातम करने का चलन बड़े जोरों के साथ शीघ्र फैल गया। भारत में बनावट श्रंगार के साथ उत्सव मनाने की रिति है। अन्य धर्म के लोग भी इसमें सहर्ष भाग लेते है। इसलिए ताजियादारी की धूमधाम बहुत जल्द मच गई। भारत में अनेक लोग ऐसे है जिनमें ताजिया के प्रति असीम श्रृद्धा है। और वो स्वंय अपने हाथो से प्रत्येक वर्ष ताजिया बनाते है। वास्तव में यह श्रृद्धा भक्ति का ही फल है कि कोई अपना ताजिया सुंदर चमकीले रंगबिरंगे कागज का बनाता है। तो कोई अभ्रक का बनाता है। धुना रूई का बनाता है। लौहार लोहे का बनाता है। गंडेरीवाला गंडेरी का बनाता है। सिरकी वाला सिरकी से तैयार करता है शीशे वाला शीशे की कारीगरी दिखाकर तैयार करता है। सभी अपनी अपनी प्रतिभा के अनुसार ताजिया मे कार्य कर उसको अनोखा और अलग बनाने का प्रयास करते है। इस प्रकार भक्त लोग भिन्न भिन्न प्रकार के ताजिया तैयार करते है। परंतु कुछ स्थानों पर सुंदर होने के साथ साथ इतने बड़े आकार के ताजिया बनते है कि उनके उठाने के लिए 50-60 लोगों की जरूरत पड़ती है।

 

 

मुहर्रम की धूमधाम

 

 

इसमे संदेह नहीं है कि मुहर्रम का महत्व निर्विवाद रूप से शिया मुसलमानों मे ही बहुत ज्यादा है। शिया मुसलमान इसे धर्म का एक अंग मानते है। परंतु संसार के भिन्न भिन्न देशों में इसके मनाने की जो प्रथा है। वह बहुत कुछ एक दूसरे से भिन्न है। वास्तव में ईद आदि के मनाने में इतना अंतर नहीं जितना मोहर्रम मनाने में है। उत्तर भारत के कई स्थानों जैसे इलाहाबाद, आगरा लखनऊ आदि के मोहर्रम हमने कई बार अपनी आंखों से देखे है। लखनऊ में दसवीं को कर्बला मे ताजिया पहुंचाये जाते है। जबकि पाकिस्तान के लाहौर में केवल घोड़े को दसवीं के दिन कर्बला मे ले जाते है। और उसी मे बड़ी धूमधाम होती है। इसके अलावा कहीं मेंहदी नामक उत्सव का की धूम होती है कही दुलदुल की धूम खास होती है। कही झंडों की विचित्र बहार होती है। कही मेले की बहार होती है। कही कत्ल की रात बड़ी धूमधाम से मनायी जाती है। कही कही शौकगवारो के मातम की ह्रदय विदारक धूम होती है। ताजिये खूब सजाये जाते है। फूल, माला, गजरा, रेवड़ी मलीदा, शर्बत, पानी आदि प्रसाद के रूप में बांटा जाता है तथा मनौती मांगी जाती है।

ताजिये की रोटी भी पवित्र समझी जाती है। और जब ताजिया कर्बला जा रहा हो तब उसके नीचे से निकलकर जाना कही कही शुभ समझा जाता है। ढोल, तासे, नगाड़े आदि खूब बजाये जाते है। और कही कही इतने बड़े ढोल होते है कि वे छोटी छोटी गाडियों पर लदे रहते है। जब दो मनुष्य बजाते है तब कही उनसे पूरी आवाज निकलती है। कही कही ढोल को बजाने की प्रतियोगिता होती है या ढोल बजाते हुए ढोल फाडने पर उचित इनाम रखा जाता हैं। लोग छाती पिटते हुए जूलूस की शक्ल मे या हुसैन या हुसैन व मरसिये पढ़ते हुए ताजिये के साथ चलते है। हजरत इमाम हुसैन साहब आदि प्यासे ही शहीद हुए थे। अतः इस दिन पानी या शर्बत पिलाना लोग पुण्य कार्य मानते है। एक मान्यता यह भी है। कि कुछ लोग अपने बच्चे को इमाम हुसैन साहब का फकीर बनाते है और उससे दूकानों और घरों पर भीख मंगवाते है ताकि बच्चा जिवित रहे।

भारत के प्रमुख त्यौहारों पर आधारित हमारे यह लेख भी जरूर पढ़े:——-

 

 

ओणम दक्षिण भारत के सबसे महत्वपूर्ण त्यौहारों मे से एक है। यह केरल के सबसे प्रमुख त्यौहारों में से एक
भारत विभिन्न संस्कृति और विविधताओं का देश है। यहा के कण कण मे संस्कृति वास करती है। यहा आप हर
थेय्यम केरल में एक भव्य नृत्य त्योहार है और राज्य के कई क्षेत्रों में प्रमुखता के साथ मनाया जाता है।
भारत के प्रसिद्ध त्यौहारों में से एक, केरल नौका दौड़ महोत्सव केरल राज्य की समृद्ध परंपरा और विविध संस्कृति को
अट्टूकल पोंगल केरल का एक बेहद लोकप्रिय त्यौहार है। अट्टुकल पोंगल मुख्य रूप से महिलाओं का उत्सव है। जो तिरुवनंतपुरम
तिरूवातिरा केरल का एक प्रसिद्ध त्यौहार है। मलयाली कैलेंडर (कोला वर्षाम) के पांचवें महीने धनु में क्षुद्रग्रह पर तिरुवातिरा मनाया
मंडला पूजा उत्सव केरल के त्योहारों मे एक प्रसिद्ध धार्मिक अनुष्ठान फेस्टिवल है। मंडला पूजा समारोह मलयालम महीने के वृश्चिक
अष्टमी रोहिणी केरल राज्य में ही नही बल्कि पूरे भारत मे एक प्रमुख त्यौहार है। यह त्यौहार भगवान कृष्ण के
भारत में अन्य त्योहारों की तरह, लोहड़ी भी किसानों की कृषि गतिविधियों से संबंधित है। यह पंजाब में कटाई के
दुर्गा पूजा भारत का एक प्रमुख त्योहार है। जो भारत के राज्य पश्चिम बंगाल का मुख्य त्योहार होने के साथ
भारत में आज भी लोक देवताओं और लोक तीर्थों का बहुत बड़ा महत्व है। एक बड़ी संख्या में लोग अपने
गणगौर का व्रत चैत्र शुक्ला तृतीया को रखा जाता है। यह हिंदू स्त्री मात्र का त्यौहार है। भिन्‍न-भिन्‍न प्रदेशों की
बिहू भारत के असम राज्य का सबसे बड़ा पर्व है। असल में यह तीन त्योहारों का मेल है जो अलग-अलग दिनों
भारत शुरू ही से सूफी, संतों, ऋषियों और दरवेशों का देश रहा है। इन साधु संतों ने धर्म के कट्टरपन
नौरोज़ फारसी में नए दिन अर्थात्‌ नए साल की शुरुआत को कहते हैं। ईरान, मध्य-एशिया, कश्मीर, गुजरात और महाराष्ट्र के
अगर भारत की मिली जुली गंगा-जमुना सभ्यता, हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे के आपसी मेलजोल को किसी त्योहार के रूप में देखना हो
ईद मिलादुन्नबी मुस्लिम समुदाय का प्रसिद्ध और मुख्य त्यौहार है। भारत के साथ साथ यह पूरे विश्व के मुस्लिम समुदाय
ईद-उल-फितर या मीठी ईद मुसलमानों का सबसे बड़ा पर्व है। असल में यह रमजान के महीने के समाप्त होने की खुशी
बकरीद या ईद-उल-अजहा ( ईदुलजुहा) ईदुलफितर के दो महीने दस दिन बाद आती है। यह ईद चूंकि महीने की दस
बैसाखी सिक्ख धर्म का बहुत ही प्रमुख त्योहार माना जाता है। इस दिन गुरु गोविंद सिंह ने खालसा पंथ की
चैत्र शुक्ला प्रतिपदा को अरुंधती व्रत रखा जाता है। इस व्रत को रखने से पराये मर्द या परायी स्त्री से
रामनवमी भगवान राम का जन्म दिन है। यह तिथि चैत्र मास की शुक्ला नवमी को पड़ती है। चैत्र पद से चांद्र
चैत्र पूर्णिमा श्री रामभक्त हनुमान का जन्म दिवस हैं। इस दिन हनुमान जयंती मनाई जाती है। कुछ लोग यह जन्म दिवस
वैशाख, आषाढ़ और माघ, इन्हीं तीनों महीनों की किसी तिथि में रविवार के दिन आसमाई की पूजा होती है। जो
ज्येष्ठ बदी तेरस को प्रातःकाल स्वच्छ दातून से दन्तधोवन कर उसी दिन दोपहर के बाद नदी या तालाब के विमल
ज्येष्ठ शुक्ला दशमी को गंगा दशहरा कहते हैं। गंगा दशहरा के व्रत का विधान स्कन्द-पुराण और गंगावतरण की कथा वाल्मीकि रामायण
रक्षाबंधन:-- श्रावण की पूर्णिमा के दिन दो त्योहार इकट्ठे हुआ करते है।श्रावणी और रक्षाबंधन। अनेक धर्म-ग्रंथों का मत है कि
श्रावण शुक्ला पंचमी को नाग-पूजा होती है। इसीलिये इस तिथि को नाग पंचमी कहते हैं। भारत में यह बडे हर्षोल्लास
कजरी की नवमी का त्योहार हिन्दूमात्र में एक प्रसिद्ध त्योहार है। श्रावण सुदी पूर्णिमा को कजरी पूर्णिमा कहते है। इसी
भारत भर में हरछठ जिसे हलषष्ठी भी कहते है, कही कही इसे ललई छठ भी कहते है। हरछठ का व्रत
भाद्र शुक्ला द्वितीया को अधिकांश गृहस्थो के घर बापू की पूजा होती है। यह बापू की पूजा असल में कुल-देवता
गणेशजी के सम्पूर्ण व्रतों में सिद्धिविनायक व्रत प्रधान है। सिद्धिविनायक व्रत भाद्र-शुक्ला चतुर्थी को किया जाता है। पूजन के आरम्भ
श्रावण मास की शुक्ला चतुर्थी से लगाकर भादों की शुक्ला चतुर्थी तक जो मनुष्य एक बार भोजन कर के एक
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तीज हस्ति नक्षत्र-युक्त होती है। उस दिन व्रत करने से सम्पूर्ण फलों की प्राप्ति
भाद्रपद शुक्ल सप्तमी को संतान सप्तमी व्रत किया जाता है। इसे मुक्ता-भरण व्रत भी कहते है। यह व्रत सध्यान्ह तक
अश्विन शुक्ला अष्टमी को जीवित्पुत्रिका व्रत होता है। इस व्रत को जीतिया व्रत के नाम से भी जाना जाता है।
कार्तिक कृष्णा-अष्टमी या अहोई अष्टमी को जिन स्त्रियों के पुत्र होता है वह अहोई आठे व्रत करती है। सारे दिन
कार्तिक कृष्णा द्वादशी को गोधूलि-बेला मे, जब गाये चर- कर जंगल से वापस आती हैं, उस समय उन गायों और बछडों

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *