हेमकुंड साहिब गुरूद्वारा – Hemkund Sahib Gurudwara history in hindi

हेमकुंड साहिब के सुंदर दृश्य

समुद्र तल से लगभग 4329 मीटर की हाईट पर स्थित गुरूद्वारा श्री हेमकुंड साहिब (Hemkund Sahib) उतराखंड राज्य (Utrakhand state) के सीमांत district Chamoli में स्थित है। गोविंदघाट (Govindghat) से लगभग 12 किमी की पैदल यात्रा के बाद घोघरीया (Ghoghriya) नामक स्थान आता है। यहां से आगे 6 किमी की यात्रा में नैसर्गिक सौंदर्य को निहारते हुए हेमकुंड साहिब (Hemkund sahib) पहुंचा जाता है। हेमकुंड साहिब  (Hemkund sahib) से लक्ष्मण गंगा (lakshman ganga) बहती है। हर साल May, june में हेमकुंड साहिब (Hemkund sahib) के द्वार (gate) दर्शनार्थियों के लिए खुलते है। और सर्दियों के मौसम (winter weather) में बंद हो जाते है। जिसका मुख्य कारण यहां अधिक बर्फबारी (Snowfalls) है, जिसमें हेमकुंड साहिब का तापमान माइनस(temperature minus) में चला जाता है। और यहां मनुष्य का रहना संभव नहीं है।

हेमकुंड साहिब का इतिहास (Hemkund sahib history in hindi)

हेमकुण्ड साहिब क वर्णन स्कन्दपुराण (Skand puran) में वर्णित बदरिकाश्रम महात्म्य में भी है। कई विद्वान हेमकुंड की खोज को इसके काफी बाद की बताते है। तो कुछ विद्वान 1920 में पटियाला राज घराने (patiyala raj gharane) के एक सदस्य द्वारा भी खोज करना बताते है। 1935 में यह स्थान हेमकुंड साहिब (Hemkund sahib) के रूप में प्रतिष्ठापित हुआ। भाई वीर सिंह जी (Veer singh ji) द्वारा सोहन सिंह जी (Sohan singh ji) को दो हजार रुपये (two thousand rupees) देकर जब हेमकुंड साहिब (Hemkund Sahib) में एक कमरा (Room) बनवाने को कहा तो बाबा सोहन सिंह जी (Baba Sohan singh ji) और सेनावृत सेना के हवलदार बाबा मोहन सिंह जी  (military hawaldar baba mohan singh ji) ने मिलकर यह कमरा (room) सन् 1936 में तैयार करवाया। हेमकुण्ड साहिब में श्री गुरू ग्रंथ साहिब का पहला प्रकाश 1937 में किया गया।

1938 में sohan singh के स्वर्ग सिधारने के बाद baba Mohan singh ji ने हेमकुंड साहिब का कार्यभार संभाला। 1944- 45 में बाबा जी ने हयात सिंह भंडारी (Hayat singh bhandari) ठेकेदार से गुरूवाणी के प्रचार का स्थान तथा दो कमरे बनवाये। इससे पूर्व हेमकुंड में व मार्ग में आने जाने के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी।

गुरु गोविंद सिंह जी (Guru Govind Singh ji) के जीवन के चरित्र की जानकारी देने वाले विचित्र नाटक ग्रंथ के अध्ययन से यह जानकारी देने वाले विचित्र नाटक ग्रंथ के अध्ययन से यह जानकारी मिलने पर कि सिक्खों के दसवें Guru Govind singh ji जब तपस्या कर रहे थे कि आकाशवाणी हुई हेमकुण्ड सुमेर पर्वत का एक कोना है।

हेमकुण्ड नामक स्थान जहां है वहाँ सप्तश्रृंग नामक पर्वत है। उसी स्थान पर पांडवों के पिता आजा पाण्डु ने तपस्या की थी। वहीं Guru Govind singh ji ने महाकाल की तपस्या की।

गुरमुख प्यारे संत सोहन सिंह जी जो Tihri garhwal में संतो की वाणी का उपदेश दे रहे थे, के मन में इस पवित्र स्थान को ढूंढने की इच्छा हुई, वे गुरु के प्रति असीम श्रद्धा व भक्ति रखते थे, अतः Sohan singh ji ने अपने मन में यह फैसला कर लिया था, कि जिते जी गुरूजी के तप स्थली को ढूंढ निकालू तो जीवन सफल हो जायेगा।

हेमकुंड साहिब के सुंदर दृश्य
हेमकुंड साहिब के सुंदर दृश्य

Sohan singh ji ने धर्म ग्रंथों, साधुओं, महात्माओं से जानकारी प्राप्त करनी शुरू की, उन्हें दृढ़ विश्वास था की हरिद्वार से बद्रीनाथ की पवित्र भूमि ऋषि मुनियों की तपोभूमि रही है। जहां न जाने कितने महात्माओं, मनीषियों ने तपस्या व साधना की है। गुरुजी ने भी अवश्य इसी Devbhoomi में तप किया होगा।

अपने इसी दृढ़ विश्वास के साथ Sohan singh ji कई वर्षों तक इस देव भूमि में इधर उधर भटकते हुए Badrinath पहुंचे। वहां से लौटते समय किसी कारण से वे पाण्डुकेश्वर में Night stay के लिए रूके। यहां उन्हें पाण्डुकेश्वर के बारें में पता चला कि Pandukeshwar को राजा पाण्डु का तपस्थान कहते है। इसलिए इसका नाम पाण्डुकेश्वर पड़ा। Sohan singh ji जो एक संत थे, को इस स्थान के प्रति विशेष आकर्षण होना स्वभाविक था, क्योंकि यहां राजा पाण्डु ने तपस्या की थी।

सप्तश्रृंग को ढूंढने की उनकी इच्छा इस स्थान पर आकर ओर तीव्र हो गई। सवेरे उठ कर सोहन सिंह जी कहीं जाते इससे पूर्व उन्होंने देखा कि Garhwali लोगों का एक समूह नये वस्त्र पहनकर कहीं जाने की तैयारी में है। पूछने पर संत सोहन सिंह जी को पता चला कि वे लोग Hemkund lokpaal tirth में स्नान करने जा रहे है। पता नहीं किस भावना में वशीभूत सोहन सिंह जी भी उन्हीं के साथ चल दिये। मार्ग में Alaknanda river पड़ी जिसको पार करना था। जबकि उस पर लकड़ी का पुल भी नहीं था। सब लोगों के साथ सोहन सिंह जी भी रस्सों के झूले द्वारा Alakannda river पार करके पहुंचे।

वहां पहुंचते ही Sohan singh ji को सात चोटियों वाला पर्वत दिखाई दिया। जिसे देखकर सोहन सिंह जी अतिप्रसंन थे, उन्हें सप्तश्रृंग मिल गया था। जहां कि गुरू गोविंद सिंह जी ने महाकाल की तपस्या की थी। अब सोहन सिंह जी उस स्थान की पहचान करना चाहते थे, जहाँ कि गुरू जी ने तपस्या की थी। लेकिन उस स्थान का पता करना अति कठिन था। सोहन सिंह जी ने वहीं किसी स्थान पर गुरु जी की अरदास करना प्रारंभ की कि हे प्रभु आपकी कृपा से आपके तप स्थल तक तो मैं आ गया हूँ, प्रभु वह स्थान भी बताओ जहाँ आप ज्योत जगाते थे।

कहते है कि अरदास समाप्त करके ज्यों ही संत सोहन सिंह जी ने मत्था टेका तो कमर तक जटा, नाभि तक दाढ़ी रखे, शेर की खाल लपेटे एक अवधूत प्रकट हुआ, और बोला खालसा जी किसे ढूंढते हो! सोहन सिंह जी हाथ जोडकर बोले — हे जोगेश्वर महाराज! मैं गुरु जी का स्थान ढूंढ रहा हूँ! जोगेश्वर बोले — अच्छा! दुष्ट दमन का। यह शिला है जहां पर दुष्ट दमन जी आकर बैठते थे। यह सुनकर सोहन सिंह जी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा वे दौड़कर उस शिला से लिपट गये।

सोहन सिंह जी की आंखो से खुशी के आंसुओं की धारा बह निकली। वह बार बार शिला पर मत्था टेक रहे थे। अचानक उन्होंने सोचा कि जोगेश्वर से कुछ ओर पूछे, लेकिन देखते क्या है कि Devdoot वहां नहीं थे। जोगेश्वर की चरण धूलि मस्तक पर लगाकर ईश्वर का धन्यवाद करते हुए सोहन सिंह जी वापिस लौट गये।

कुछ दिनों बाद संत सोहन सिंह जी ने Amritsar पहुंच कर भाई Veer singh ji को सारा वृतान्त सुनाया। जिसे सुनकर Saradar Veer singh ji बहुत प्रसन्न हुए। और उन्होंने ने संत सोहन सिंह जी को शाबाशी दी और कहा कि एक समय आयेगा जब गुरू का यह स्थान बहुत प्रसिद्ध होगा। तुमने बहुत बडा काम किया है। भाई वीर सिंह जी ने सोहन सिंह जी को दो हजार रुपए देकर कहा जाओ हेंमकुंड साहिब में कमरा बनवाकर वहां श्री गुरू ग्रंथ साहिब का प्रकाश कर दो।

हेमकुण्ड साहिब का यह पवित्र गुरूद्वारा हिमालय की घाटियों के बीच 15 हजार फिट की ऊंचाई पर Utrakhand के Chamoli district में Badrinath के पास स्थापित है। आज यह गुरूद्वारा गुरू के भक्तों के साथ साथ पर्यटकों में भी काफी प्रसिद्ध है। इस Gurudwara Shri Hemkund Sahib के दर्शन करने हेतु पूरे संसार से भक्तगण यहां आते है। यहां का प्राकृतिक सौंदर्य बहुत ही मन भावन है। हेमकुण्ड साहिब आने वाले भक्त Rishikesh, Shringar और Joshimath के गुरूद्वारों के दर्शन करते हुए यहां पहुंचते हैं। यहां से लौटते समय भक्तगण Ponta Sahib, Bhavnari Sahib, Trigrahi Sahib और Shergarh Sahib गुरूद्वारा का दर्शन करते हुए वापस लौटते है।

हेमकुण्ड साहिब (Hemkund Sahib) जाने के लिए विश्व विख्यात फूलों की घाटी (Velley of flowers) का आनंद उठाते हुए भक्तगण हेमकुंड साहिब पहुंचते है। यह गुरूद्वारा सिख धर्म का मुख्य स्थान होने के नाते तो Famous है ही परंतु अपनी अद्भुत वास्तुकला के कारण भी Famous है।

हेमकुण्ड साहिब का गुरूद्वारा कई मायनों में अन्य गुरूद्वारों से अलग है। यह गुरूद्वारा 15210 फिट की ऊंचाई पर स्थापित है। इसके चारों ओर बर्फ से ढकी हुई हिमालय की पहाड़ियां शोभायमान है। इस गुरूद्वारे की वास्तुकला अन्य गुरूद्वारे से अलग है। यह संसार का सबसे अद्भुत गुरूद्वारा है। हेमकुण्ड साहिब दुष्ट दमन की तपोस्थली है।

हेमकुण्ड साहिब गुरूद्वारे के वास्तुविद मनमोहन सिंह स्याली थे। हेमकुण्ड साहिब गुरूद्वारे का निर्माण स्टील, सीमेंट के मिश्रण से किया गया है। हेमकुण्ड साहिब गुरूद्वारे की स्थापना 1960 में की गई थी।

हेमकुंड सरोवर (Hemkund sarovar)

हेमकुंड सरोवर, गुरुद्वारा के पास का पवित्र तालाब है। कहा जाता है कि सरोवर के पवित्र जल में डुबकी लगाने से पाप धुल जाते हैं। सरोवर 200 गज चौड़ा और 400 गज लंबा और हिमालय की चोटियों से घिरा है। इसके तीन ओर सात चोटियाँ जिन्हें सप्त श्रृंग के नाम से भी जाना जाता है, शान से खड़ी हैं। वातावरण की स्थितियों के अनुसार, ये चोटियाँ अपना रंग बदलती हैं। कभी वे सुनहरे दिखते हैं, कभी लाल लाल रंग के तो कभी बर्फ सी सफेद। सरोवर का पानी बेहद ठंडा-ठंडा है। जून के मध्य तक, सरोवर के साथ पानी बर्फ से ढक जाता है। स्नान के लिए पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग खंड हैं। पुरुष एक आश्रय के नीचे स्नान करते हैं जबकि महिलाएं गुरुद्वारे के अंदर स्नान करती हैं। अधिकांश लोग धीरे-धीरे पानी में प्रवेश करते हैं भक्त एक प्रार्थना करते हैं और फिर सरोवर के किनारे वापस जाने से पहले कुछ डुबकी लेते हैं।सरोवर के जल को जल (पवित्र जल) या अमृत माना जाता है। भक्त सरोवर में बिकने वाली बोतलों में पवित्र जल भरते हैं। और अपने साद ले जाते है।

हेमकुंड साहिब का तापमान (Hemkund Sahib temperature)

मई से मध्य जून तक

मई के दौरान, गंगरिया से 6 किमी ट्रेक के अंतिम 3 किमी बर्फ से ढके रहते हैं। हेमकुंड के रास्ते पर आप कुछ खूबसूरत अल्पाइन फूलों को देख सकते हैं। इस समय यहां का औसत तापमान 11 डिग्री सेल्सियस से 23 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है। यदि आप इस अवधि हेमकुंड साहिब की यात्रा के साथ फूलों की घाटी की यात्रा भी जोड़ रहे हैं, तो कृपया ध्यान दें कि इस अवधि के दौरान आपको विभिन्न प्रकार के फूल देखने को नहीं मिलेंगे।

मध्य जून से मध्य जुलाई

जून में, बर्फ पिघलने लगती है। इस अवधि के दौरान, औसत तापमान 13 डिग्री सेल्सियस से 21 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है।

मध्य जुलाई से अगस्त अंत तक

चूंकि यह वैली ऑफ फ्लॉवर्स के लिए पीक सीज़न है, इसलिए आपको अल्पाइन फूलों की व्यापक विविधता का पूरा आनंद मिलेगा। इस अवधि के दौरान हेमकुंड झील में प्रसिद्ध ब्रह्म कमल भी देखे जा सकते हैं। इस अवधि मे हेमकुंड का औसत तापमान 13 डिग्री सेल्सियस से 20 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है।

मौसम के लिहाज से हेमकुंड साहिब की यात्रा के लिए यह शायद सबसे अच्छी अवधि है। हालांकि, सितंबर से पहले भारी बारिश सड़क की स्थिति को चुनौतीपूर्ण बना सकती है। इस अवधि के दौरान औसत हेमकुंड साहिब का तापमान 13 डिग्री सेल्सियस से 20 डिग्री सेल्सियस है, आसमान अधिकतर साफ रहता ​​है, मानसून बीत चुका होता है और ब्रह्म कमल का फूल पूरी तरह खिल चुके होते है।

हेमकुंड साहिब का पैदल मार्ग (Hemkund Sahib trek)

हेमकुंड साहिब तक की यात्रा की शुरुआत गोविंदघाट से होती है जो अखलनंदा नदी के किनारे समुद्र तल से 1 हजार 828 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। गोविंदघाट तक तो अच्छी सड़कें हैं और यहां तक गाड़ियां आराम से जाती हैं लेकिन इसके ऊपर यानी गोविंदघाट से घांघरिया तक 13 किलोमीटर की चढ़ाई है जो एकदम खड़ी चढ़ाई है। इसके आगे का 6 किलोमीटर का सफर और भी ज्यादा मुश्किलों से भरा है।  ट्रेक गोविंदघाट से शुरू होता है, जो लक्ष्मण गंगा घाटी और भायंदर का प्रवेश द्वार है। ट्रेक पर, आप रोडोडेंड्रोन और देवदार के पेड़ों के घने जंगलों में आते हैं। यहां प्रचुर मात्रा में चारों ओर अल्पाइन फूल देखे जा सकते हैं। आप लक्ष्मण गंगा नदी के बहते पानी को भी देख सकते हैं। 13 किमी के ट्रेक के बाद, आप हेमकुंड और फूलों की घाटी के लिए बेसकैंप, घांघरिया पहुंचते हैं। यहाँ से हेमकुण्ड साहिब और फूलों की घाटी का अलग अलग मार्ग विभाजित हो जाते है। यहां से हेमकुंड साहिब तक 6 किमी की खड़ी चढ़ाई है।

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