सिंहगढ़ का युद्ध – शिवाजी और औरंगजेब की लड़ाई

सिंहगढ़ का युद्ध 4 फरवरी सन् 1670 ईस्वी को हुआ था। यह सिंहगढ़ का संग्राम मुग़ल साम्राज्य और मराठा साम्राज्य के मध्य हुआ था। उस समय मुग़ल सम्राज्य की बागडोर औरंगजेब के साथ में थी और मराठा साम्राज्य की बागडोर शिवाजी के साथ में थी, ये शिवाजी और औरंगजेब की लड़ाई भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में आज भी अमर है। औरंगजेब और शिवाजी की लड़ाई में हजारों वीर सैनिकों ने दोनों ओर से अपने प्राणों का बलिदान दिया था। अपने इस लेख में हम सिंहगढ़ की इसी भीषण लड़ाई के बारे में जानेंगे, और निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर विस्तार से जानेंगे:—–

 

 

 

सिंहगढ़ का युद्ध कब हुआ था? सिंहगढ़ की लड़ाई किस किस के मध्य हुई थी? सिंहगढ़ के संग्राम में किसकी जीत हुई थी?
शिवाजी ने सिंहगढ़ का किला कब जीता? सिंहगढ़ पर शिवाजी ने आक्रमण किया था तब देश पर किसका राज्य था? पुरंदर की संधि कब और किसके बीच हुआ था? 1665 में कौन सी संधि हुई?पुरंदर की संधि क्यों हुई थी? शिवाजी का राज्याभिषेक कहाँ हुआ था? पुरंदर की दूसरी संधि कब हुई? देवगिरी का शासक कौन था? अलाउद्दीन खिलजी के समय देवगिरी का शासक कौन था? अलाउद्दीन खिलजी ने देवगिरी पर कब आक्रमण किया? देवगिरी के राजा कौन थे? देवगिरी का युद्ध कब हुआ था? देवगिरी का किला? देवगिरी का यादव सम्राज्य? तालीकोटा का युद्ध कब और किसके मध्य हुआ? तालीकोटा का युद्ध क्यों हुआ था? विजयनगर साम्राज्य का पतन कैसे हुआ? विजयनगर के युद्ध में कौन पराजित हुआ था? तालीकोटा युद्ध में विजयनगर राज्य की सेना का सेनापति कौन था? किस युद्ध ने विजयनगर साम्राज्य को कमजोर कर दिया?

 

सिंहगढ़ के युद्ध से पहले भारत के दक्षिणी राज्य

 

भारत के दक्षिण में भी अनेक हिन्दुओं का राज्य था। इस देश
में होने वाले बाहरी आक्रमणों से वहां के राज्य बहुत समय तक सुरक्षित रहे और तेरहवीं शताब्दी के लगभग अन्तिम दिनों तक वहां के राजाओंने स्वतन्त्रता के साथ अपने-अपने राज्यों का शासन किया। परन्तु द्वेष और ईर्षा के कीटाणु उनके जीवन में भी बहुत पहले से प्रवेश कर चुके थे, जिनके कारण वे स्वयं एक दूसरे के शत्रु हो गये थे।

 

 

सन्‌ 1290 ईसवी में जलालुद्दीन खिलजी बुढ़ापे की अवस्था में
दिल्ली के सिंहासन पर बैठा था। वह स्वभाव का अत्यन्त सरल और दयालु था। उसके राज्य में सदा अशान्ति और अव्यवस्था बनी रही। सरलता, दयालुता और धार्मिकता शासक को निर्बल बना देती है। इस प्रकार के राजा के शासन में अराजकता की वृद्धि हो जाती है। जलालुद्दीन के साम्राज्य की भी यही अवस्था हो गयी थी। उसके सगे और सम्बन्धी भी उसके मिटाने का प्रयत्न करते रहे। अपनी इन कमजोरियों से घबरा कर उसने अपने भतीजे अलाउद्दीन खिलजी को कड़ा का अधिकारी बना दिया और दो वर्षों के पश्चात उसने अवध का शासन भी उसी को सौंप दिया।

 

अलाउद्दीन स्वयं एक महत्वाकांक्षी, स्वार्थी, उत्साही और आशावादी युवक था। उसने अपने चाचा जलालुद्दीन को निर्बल और वृद्ध समझ कर सम्राट बनाने का इरादा किया। लेकिन इसके लिए सब से पहले उसको सम्पत्ति की आवश्यकता थी। इसलिए उसने सन्‌ 1293 ईस्वी में भिलसा और चन्देरी में मनमानी लुट की और उसके बाद वह दक्षिण की और रवाना हुआ। सिंहगढ़ युद्ध का वर्णन जारी है…..

 

 

देवगिरि पर आक्रमण

 

अलाउद्दीन खिलजी अवसरवादी और राजनीतिज्ञ था। उसे मालूम था कि दक्षिण के राज्य अभी तक सुरक्षित हैं और उनके पास अपरिमित सम्पत्ति है। यह भी मालूम था कि दक्षिणी भारत में जो हिन्दुओं के राज्य हैं उनमें परस्पर ईर्षा और वेमनस्य है। वे स्वयं निर्बल आलसी और विलासी हैं। उनकी अपार सम्पत्ति ने इतना ही नहीं किया था, बल्कि जीवन के अनेक अवगुणों के साथ, उनमें जो ईर्षा की आग जल रही थी, उसको उसने अत्यन्त भयानक बना दिया था। इस अवसर का लाभ उठाने के लिए अलाउद्दीन खिलजी ने सन्‌ 1294 ईसवी में अपने साथ आठ हजार अश्वारोही सेना लेकर दक्षिण के देवगिरि राज्य पर आक्रमण किया। वहां के शासक रामदेव को परास्त करके उसने लूट-मार के बाद सन्धि कर ली और वहां से दिल्‍ली लौट कर अपने चाचा जलालुद्दीन को मार
कर वह दिल्‍ली के सिंहासन पर बैठ गया। सिंहगढ़ का युद्ध वर्णन जारी है…..

 

 

दक्षिण की लूट

भारत के दक्षिणी राज्य अलाउद्दीन के पहले तक बाहरी हमलों से
सुरक्षित थे, वे अब अलाउद्दीन के लगातार आक्रमणों से अक्रान्त हो उठे। देवगिरि को परास्त करने के बाद, दक्षिणी राज्यों पर आक्रमण कर देना अलाउद्दीन के लिए बहुत सरल हो गया। उसने वहां पर भयानक लूटमार की। मन्दिरों तीर्थ स्थानों और राजाओं की लूट से उसने दिल्ली का खजाना भर दिया। सन्‌ 1347 ईसवी में गुजरात और देवगिरि में विद्रोह हुए और उनके अन्त में हसनगंगू नामक एक अफ़ग़ान योद्धा देवगिरि का सुलतान हो गया। इसी वर्ष भारत के दक्षिण में वहमनी राज्य की नींव पड़ी। सिंहगढ़ का युद्ध वर्णन जारी है….

 

 

तालीकोटा का युद्ध

सन्‌ 2335 ईसवी में हरिहर और बुक्का राय नामक दो राजपूत
भाइयों ने विजय नगर राज्य की स्थापना की थी। आरम्भ से ही बहमनी राज्य के साथ उसकी शत्रुता पैदा हो गयी थी और उसका परिणाम यह हुआ था कि विजयनगर की सीमा उत्तर की ओर बढ़ाई जा सकी। सदाशिवराव के शासन-काल में विजयनगर की अवस्था निर्बल हो गयी थी। राजा स्वयं विलासी और आलसी था। उन दिनों में बहमनी राज्य बरार, बीजापुर, अहमदनगर, बीदर और गोलकुंडा नामक पाँच मुस्लिम राज्यों में विभक्त हो गया था। सन्‌ 1565 ईसवी में इन पाँचों मुस्लिम राज्यों के सुलतानों ने मिल कर विजयनगर पर आक्रमण किया। राजा सदाशिव राव ने अपनी सेना ले कर उनका सामना किया। बीजापुर और रायचुर के बीच वाली कोट के मैदान में दोनों और की सेनाओं का युद्ध हुआ। अन्त में सदाशिव राव की पराजय हुईं। मुसलमान सैनिकों ने उस राज्य में भयानक लूट-मार की। राज्य के बहुत-से निर्दोष स्त्री-पुरुष और बच्चे जान से मारे गये। अभी तक दक्षिण भारत में जो युद्ध हुए थे, उनमें तालीकोट का युद्ध सबसे भयानक था। इस लड़ाई के पश्चात विजयनगर से हिन्दू शासन का अस्तित्व मिट गया। सिंहगढ़ का युद्ध वर्णन जारी है….

 

 

भोंसला वंश की प्रतिष्ठा

राजपूताने का सीसोदिया वंश बहुत पुराना वंश था। दिल्ली में जब पठानों का शासन था, शिवराम जी नामक एक राजपूत ने सीशोदिया वंश में जन्म लिया था। मुसलमानों के भयानक आक्रमणों से भयभीत होकर शिवराम जी का वंशज कर्णाखेल राजपुताना को छोड़कर दौलताबाद के निकटवर्ती वेरूला नामक ग्राम के भोसला दुर्ग में जाकर बसा था। उसके बाद उसके वंशज भौसले कहलाएं। इसी भोंसला वंश में शम्भा जी ने सन्‌ 1531 ईसवी में जन्म लिया था। उस समय उसके पूर्वजों के अधिकार में तीन-चार ग्राम थे, जिनसे उनका साधारण जीवन व्यतीत होता था। शाह जी शम्भा जी का वंशज था उसके पिता का नाम मल्ल जी था।

 

मुगल सम्राट अकबर ने सन्‌ 1562 ईसवी में खानदेश का राज्य
जीत लिया था। उत्तर भारत के झगड़ों से छुटकारा पाते ही अकबर का ध्यान दक्षिण की ओर गया। उसने अहमदनगर पर आक्रमण किया। अहमदनगर का पतन हुआ, लेकिन संघर्ष का अन्त न हुआ। दीनदयाल दक्षिण का सूबेदार बनाया गया और अहमदनगर के युद्ध में अकबर स्वयं लड़ने के लिए गया अहमदनगर का फिर पतन हुआ और वहां का नवाब कैद करके बुरहानपुर भेज दिया गया, फिर भी नवाब के वंशजों ने मुगल सम्राट की अधीनता स्वीकार न की और वे जुनार को राजधानी बनाकर वहीं पर रहने लगे। मल्ल जी ने इस विपदा काल में अहमदनगर की सहायता करने का विचार किया। उस राज्य की अवस्था सभी प्रकार जीणा-शीर्ण हो चुकी थी। उसके नवाब को धन और जन दोनों को आवश्यकता थी इन दिनों में मल्ल जी के पास अच्छी सम्पत्ति थी। उसने पाँच हजार अश्वारोही सैनिक एकत्रित किये और उनको लेकर उसने अहमदनगर के नवाब की सहायता की। इस आर्थिक और सैनिक सहायता के बदले में नवाब ने प्रसन्न होकर मल्ल जी को चाकन और शिवनेर के दुर्ग दे दिये। इसके साथ ही पूना तथा सूपा नामक स्थानों की जागीर देकर नवाब ने मल्ल जी के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की। सन्‌ 1604 ईसवी में लुक जी यादव की पुत्री जीजा बाई के साथ शाह जी का विवाह हो गया।

 

सन्‌ 1620 ईसवी में मल्ल जी की मृत्यु हो गयी। जागीर का अधिकार शाह जी के हाथों में आया। अकबर की मृत्यु हो चुकी थी और और मुग़ल सम्राज्य में जहाँगीर का शासन चल रहा था। मल्ल जी के जीवन काल में ही सन्‌ 1616 ईसवी में जहांगीर ने शाहजहा को अहमदनगर की विजय के लिए भेजा था। लिम्बालकर, लुक जी और शाह जी अहमदनगर की सहायता में थे। अहमदनगर का पतन हुआ। निजामशाही अहमदनगर राज्य के पतन के बाद, लुक जी यादव मुगलों में जा कर मिल गया। लेकिन शाह जी ने अहमद नगर का साथ नहीं छोड़ा। पतन के बाद भी मुगलों के साथ अहमदनगर के संघर्ष बराबर जारी रहे और इन्हीं का परिणाम था कि शाह जी और लुक जी का कई बार आमना सामना हुआ संभवतः दोनों में एक शत्रुता पैदा हो गई।युद्ध में मुगलों के साथ अहमद नगर की और शाह जी की हार हुई। मुग़ल सेना का अधिकारी लुक जी यादव था। शाह जी पराजित होकर भागा। लुक जी यादव ने उसका पीछा किया। अपनी सेना के साथ लुक जी यादव शाह जी के निवास स्थान पर पहुँचा। शाहजी वहां से भाग गया था। लुक जी ने लड़की के सम्बन्ध को ठुकरा कर अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे जीजा बाई को बन्दी करके शिवनेर के दुर्ग में भेज दें। वह दुर्ग मुगलों के अधिकार में पहुँच गया था। यही हुआ जीजा बाई बन्दी अवस्था में उस दुर्ग में भेज दी गयी। वहां पर पहुँचने के दो मास उपरान्त, अप्रेल सन्‌ 1627 ईसवी में जीजा बाई के जो पुत्र उत्पन्न हुआ, उसका नाम शिवा जी रखा गया। कुछ दिनों के बाद लुक जी यादव की मृत्यु हो गयी और उसके बाद जीजा बाई को स्वतन्त्रता मिल गयी। परन्तु इसके बाद भी उसे शान्ति न मिली। सन्‌ 1633 ईसवी में शाह जी ने अपना दूसरा विवाह कर लिया था। उससे दुखी होकर जीजा बाई अपने पुत्र शिवाजी को लेकर शाह जी से अलग रहने लगी।

 

 

निजाम शाही के समाप्त हो जाने पर शाह जी आदिल शाह के
यहाँ बीजापुर राज्य में चला गया। वहां पर भी उसको बहुत सम्मान मिला। उन दिनों में जीजा बाई उसके साथ न रह सकी और अपने पुत्र के साथ वह पूना में जाकर रहने लगी। जीजा बाई का बहुत कुछ जीवन बन्दी और निर्वासित अवस्था में व्यतीत हुआ। पूना जागीर के रूप में शाह जी के पिता को अहमद नगर राज्य से मिला था। जीजा बाई वहीं पर रहा करती थी। जागीर का प्रबन्ध नारोपन्थ और दादा कोणदेव के हाथ में था। दादा जी पूना मैं ही रहकर जागीर का काम देखता था और शिवा जी को युद्ध कला की शिक्षा भी दिया करता था। लड़कपन से ही शिवा जी तलवार चलाने और बाण मारने में चिर-अभयस्त हो गया था। वह घोड़े का अद्भुत सवार था। उसमें इस प्रकार के गुण स्वाभाविक रूप से थे और दादा जो ने उसकी इन सभी बातों में उसकी बहुत बड़ी सहायता की थी। सिंहगढ़ का युद्ध वर्णन जारी है….

 

 

तोरण दुर्ग पर अधिकार

 

यौवनावस्था में प्रवेश करते ही शिवा जी की धीरता, गम्भीरता और वीरता एक सैनिक के रूप में परिवरतित होने लगी। उन दिनों में मराठों में मावली जाति असभ्य और अशिक्षित मानी जाती थी। लेकिन युद्ध में वह लड़ाकू थी। आरम्भ से ही उस जाति के साथ शिवा जी का प्रेम था। उस जाति से लोगों में एकता का अभाव था। शिवा जी ने मावली लोगों के साथ प्रेम करके उनको एकता के सूत्र में बाँधने का प्रयत्न किया और इस कार्य में उसे सफलता भी मिली। शिवा जी के सदभावों के कारण समस्त मावली सरदार उसके अधिकार में आ गये और उस जाति के लोग शिवा जी के प्रभुत्व को स्वीकार करने लगे।

 

 

उन दिनों औरंगजेब मुग़ल साम्राज्य का शासक था। मुगल बादशाहों की और से दक्षिण में बहुत दिनों से आक्रमण होते चले आ रहे थे। इसका परिणाम यह हुआ था कि दक्षिण से समस्त राज्य करीब-करीब मुगलों के अधिकार में आ गये थे और जो बाकी रह गये थे, वे बिलकुल निर्बल हो गये थे। उन्हीं निर्बलों में बीजापुर राज्य भी था। पूना की जागीर में अब शिवा जी ने अपना प्रभुत्व कायम कर लिया था। उस जागीर में कोई दुर्ग न था। शिवा जी को अपना यह अभाव बार-बार खटकता था। वह जानता था कि बिना दुर्ग के सुरक्षा का और कोई साधन नहीं हो सकता। अपनी इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए बीजापुर-राज्य के तोरण दुर्ग पर उसने अपनी दृष्टि डाली। निकटवर्ती दूसरे दुर्गों की अपेक्षा यह दुर्ग अधिक मजबूत था। बीजापुर-राज्य की और से उस दुर्ग पर जो सेना रहती थी, उसके सरदार को मिला कर शिवा जी ने उस दुर्ग पर अधिकार कर लिया और बीजापुर के शासक आदिल शाह के पास अपने आदमियों से उसने एक पत्र भेज दिया। उसमें शिवा जी ने लिख दिया कि तोरणा के दुर्ग पर मेरे अधिकार कर लेने पर आप किसी प्रकार का भ्रम न करे। आपके प्रति किसी शुभ कामना को प्रोत्साहन देने के लिए मुझे ऐसा करना पड़ा है। वहां के शासक ने इस पत्र के बाद किसी प्रकार का असंतोष अनुभव नहीं किया। सिंहगढ़ का युद्ध वर्णन जारी है…

 

 

 

सिंहगढ़ का युद्ध
सिंहगढ़ का युद्ध

 

 

 

दूसरे दुर्गो पर अधिकार

 

पहले यह लिखा जा चुका है कि इन दिनों में दक्षिण के राज्य विपदा ग्रस्त हो रहे थे। बीजापुर राज्य की अवस्था भी अत्यन्त निर्बल हो चुकी थी। इन्हीं दिनों में शिवाजी ने बडी बुद्धिमानी से तोरण दुर्ग पर अधिकार कर लिया था। इस दुर्ग से उसे बहुत बड़ी सम्पत्ति प्राप्त हुईं, जिससे उसने अस्त्र-शत्र और गोला-बारूद खरीदने का काम किया और बहुत से वीरों की भर्ती करके उसने अपनी एक सेना तैयार कर ली। तोरण दुर्ग से तीन कोस की दूरी पर महोरबद्ध नामक पहाड के ऊपर उसने सन्‌ 1647 ईसवी में एक दुर्ग तैयार कराया और उस किले का नाम उसने रायगढ़ रखा। इस किले की तैयारी का समाचार पाकर बीजापुर का शासक अप्रसन्न हुआ। लेकिन शिवा जी के पिता शाह जी ने अनेक प्रकार की बातें कह कर उसका सन्देह दूर कर दिया। शिवाजी की अपनी एक योजना थी। उसके अनुसार उसने बीजापुर राज्य के अन्य किलों पर भी अधिकर करने के उपाय सोचे। शिवाजी के पक्ष में इस समय अनेक बातें थीं। शाह जी के सिवा उस राज्य के बहुत से ऊंचे अधिकारी मराठा थे। शिवाजी ने चाकन कोट के अधिकारी फिरंगी की और सूपा परगने के अधिकारी बाजी मोहिते को मिलाने का प्रयत्न किया। चाकन कोट पर शिवा जी का अधिकार हो गया परन्तु बाजी मोहिते उसके कहने में न आया। वह शिवा जी का सौतेला भाई था, इसलिए एक दिन रात को कुछ मावलियों को लेकर शिवाजी ने बाजी मोहिते पर आक्रमण किया और उसे परास्त करके उस परगने में अधिकार कर लिया। इसके बाद शिवा जी ने कोडाण किला लेने का विचार किया। उसका किलेदार एक मुसलमान था। शिवा जी ने ले देकर उसको अपने अनुकूल कर लिया और उस दुर्ग पर अधिकार करके उसने उस किले का नाम सिंहगढ़ रखा। इस किले के चारों ओर मावली जाति के लोगों को बहुत बड़ी आबादी थी। इसलिए दुर्ग का अधिकार शिवाजी के हाथों में आते ही वहां के समस्त मालवी उसके प्रभुत्व में आ गये।

 

 

लगातार दुर्गो पर अधिकार करने के बाद शिवाजी को अनेक लाभ हुए। प्रत्येक दुर्ग से उसको सम्पत्ति और युद्ध की सामग्री मिली। इस धन से उसने अपनी सेना के बढ़ाने का कार्य किया। इन दुर्गो के अतिरिक्त शिवाजी ने बारामती और इन्द्रपुर पर अधिकार करके उन दोनों स्थानों को उसने अपनी जागीर पूना और सूपा में शामिल कर लिया। उसके थोड़े दिनों के बाद ही रोहिंड और कल्याण आदि दुर्ग भी उसके अधिकार में आ गये। इन्हीं दिनों में शिवाजी को समाचार मिला कि कल्याण दुर्ग के सूबेदार मौलाना अहमद के साथ खजाना जा रहा है। अपनी एक छोटी-सी सेना लेकर शिवाजी रवाना हुआ और उसने आक्रमण करके उस खजाने को अपने अधिकार में कर लिया। शिवाजी के इन कार्यों का एक ऐसा क्रम आरम्भ हुआ कि एक-एक दुर्ग उसके अधिकार में अपने आप आने लगा और काड़ोडी, टोंग, टिकोना, भूरूप और कारी के दुर्ग भी उसके अधिकार में आ गये। कोकन की लूट में उसने बहुत सम्पत्ति पायी जिससे उसने अपनी सैन्य शक्ति में बहुत वृद्धि कर ली। सिंहगढ़ का युद्ध वर्णन जारी है…

 

 

 

बीजापुर के साथ शत्रुता

शिवाजी के इन समस्त कार्यों के समाचार बीजापुर राज्य के
शासक को मिले। उसने शिवा जी के दमन का निर्णय किया और सब से पहले उसने शिवा जी के पिता शाह जी को कैद करके एक कोठरी में बन्द करा दिया। आदिल शाह ने शिवाजी के विरुद्ध अपनी कोई सेना नहीं भेजा। शाह जी को कैद करने के बाद, अपने जागीरदारों को शिवाजी के विरुद्ध उसने तैयार किया। वे जागीरदार हिन्दू थे। बाजीश्याम राजे और चन्द्रराव मोरे ने शिवा जी पर आक्रमण करने का भार अपने ऊपर लिया, इन्हीं दिनों में राज्य के अन्तर्गत कर्नाटक में विद्रोह हो गया। बीजापुर के सुलतान आदिल शाह के अनेक प्रयत्नों के बाद भी वहां की अशान्ति दूर न हुईं। उसके बाद विद्रोह शांत कराने के लिए विवश हो कर सुलतान ने शाह जी को भेजा। कर्नाटक का विद्रोह शांत हो गया और उसके फल-स्वरूप शाह जी बन्दी अवस्था से मुक्त कर दिया गया। लेकिन शिवाजी का विनाश करना सुलतान के लिए आवश्यक था। उसने बाजीराव राजे और चन्द्रराव मोरे को भेजकर शिवा जी पर आक्रमण कराया । लेकिन वे दोनों ही शिवा जी के मुकाबले में परास्त हुए। शिवाजी ने उनको पराजित कर चन्द्रराव की जागीर जबाली पर आक्रमण किया और उस जागीर के दुर्ग बसोता की सेना को परास्त करके उसने जाबाली पर अधिकार कर लिया और वसोता का नाम बदल कर उसने उसका नाम वज़ीरगढ़ रखा। जाबाली के आस-पास जो दूसरे दुर्ग थे और जिनसे किसी भी समय शिवा जी को हानि पहुँच सकती थी, उसने उन दुर्गो पर भी आक्रमण किया और उनको जीत कर उसने उन पर भी अधिकार कर लिया। सिंहगढ़ का युद्ध वर्णन जारी है….

 

 

मुगलों के साथ संघर्ष

 

मुगल सम्राटों में सब से पहले अकबर ने भारत के दक्षिणी राज्यों
के साथ हस्तक्षेप किया था और खानदेश, असीरगढ़ और बरार को मुगल साम्राज्य में मिला लिया था। अहमदनगर का दुर्ग भी उसके अधिकार में चला गया था। बीजापुर और गोलकुंडा ने कर देना आरम्भ कर दिया था। अपने शासन-काल में जहाँगीर ने भी दक्षिण की ओर अपने पैर फैलाये थे, लेकिन उसे सफलता न मिली थी। अहमदनगर ने मुगल पराधीनता के बन्धनों को तोड़ने की कोशिश की थी, परन्तु वह असफल रहा और बाद में अधिक दृढ़ता के साथ वह पराधीनता में जकड़ दिया गया था। सन्‌ 1636 ईसवी में शाहजहाँ का तीसरा पुत्र औरंगजेब दक्षिण का सूबेदार होकर आया था। उस समय उसकी अवस्था अठारह वर्ष की थी। उसने दक्षिण पहुँच कर निर्बल अहमदनगर का अन्त किया ओर उसके सुलतान को कैद करके उसमे ग्वालियर के दुर्ग में भेज दिया। सन्‌ 1643 ईसवी में औरंगजेब दक्षिण से लौट गया और सन्‌ 1655 ईसवी में वह फिर सूबेदार होकर दक्षिण में पहुँचा। उसने गोलकुण्डा पर आक्रमण किया और उसे परास्त कर उसको अपने एक सन्धि-पत्र को स्वीकार करने के लिए विवश किया।वहां का वजीर मीर जुमला औरंगजेब की शरण में चला गया। इसके बाद औरंगजेब ने बीजापुर के विरुद्ध आक्रमण किया और कल्याणी तथा गुलबर्गा मुगुल-राज्य में शामिल कर लिए गये। इन्हीं दिनों में शिवा जी ने जाबाली नामक जागीर पर अधिकार कर लिया था। दक्षिण में बढ़ती हुई शिवा जी की शक्ति से औरंगजेब अपरिचित न था। जिन दिनों में उसने बीजापुर में आक्रमण किया था, उन्हीं दिनों में उसके पास शाहजहाँ की बीमारी का समाचार आया। प्रत्येक अवस्था में उसको दक्षिण से चला जाना आवश्यक मालूम हुआ। उस समय अली आदिल शाह बीजापुर का शासक था और वह युद्ध में मुगल सेना के सामने परास्त हो चुका था। औरंगजेब ने आक्रमण करते हुए उस पर अपराध यह लगाया कि तुम मोहम्मद आदिलशाह के वीर्य से उत्पन्न नहीं हो, इसलिए उसके मरने के बाद, उसके राज्य बीजापुर के राज सिंहासन पर बैठने का तुम्हें अधिकार नहीं है। इसी पर दोनों ओर से युद्ध हुआ ओर अली आदिलशाह पराजित हुआ। शाहजहाँ की बीमारी के समाचार सुनकर औंरंगजेब ने शिवा जी की सहायता माँगी और उसने चाहा कि वह आकर मुगल बादशाह की ओर से बीजापुर की रक्षा का काम करे। स्वाभिमानी शिवा जी ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। विवश होकर औरंगजेब ने अली आदिल शाह के साथ सन्धि की और उसके बाद वह दक्षिण से लौट गया। सिंहगढ़ का युद्ध वर्णन जारी है…

 

 

सिंहगढ़ युद्ध से पहले शिवाजी के आक्रमण

 

औरंगजेब के आगरा पहुँचने पर दाराशिकोह के साथ राज्याधिकार का उसने संघर्ष पैदा किया। पूना में बैठा हुआ शिवा जी मुगल साम्राज्य की इन परिस्थितियों को सावधानी के साथ देख रहा था। दारा शिकोह के साथ औरंगजेब का जो संघर्ष पैदा हुआ, उसके फल-स्वरूप दोनों में युद्ध हुआ ओर सामूगढ के मैदान में औरंगजेब ने दारा को पराजित किया। दक्षिण से औरंगजेब के चले जाने पर शिवाजी ने मुगलों के दक्षिणी राज्य पर आक्रमण करने का विचार किया। सन्‌ 1657 ईसवीं में वह अपनी सेना के साथ रवाना हुआ और मुग़ल राज्य के कई सम्पन्न स्थानों को विजय करके उसने लूट-मार की। इन हमलों में शिवाजी को बहुत से घोड़ों, हाथियों के साथ बहुत-सा धन प्राप्त हुआ। उसके बाद वह पूना लौट गया और अपनी सेना को शक्तिशाली बनाने का कार्य उसने आरम्भ किया। सन्‌ 1658 ईसवी में औरंगजेब मुग़ल साम्राज्य के सिंहासन पर बैठा। बीजापुर के साथ उसकी सन्धि हो चुकी थी। शिवाजी ने मुग़ल सम्राट के विरुद्ध आक्रमण करके लुट-मार की थी। इसलिए उसने औरंगजेब के पास एक पत्र भेजा और सन्धि का प्रस्ताव किया। औरंगजेब शिवा जी से प्रसन्न न था। लेकिन उत्तरी भारत की अवस्था विद्रोहात्मक चल थी। इसलिए उसने दक्षिण में शिवाजी के साथ इस समय वैमनस्य पैदा करना उचित नहीं समझा।नतीजा यह हुआ कि शिवाजी और औरंगजेब में सन्धि हो गयी। बीजापुर की अवस्था दिन पर दिन खराब होती जा रही थी। प्रजा में असंतोष भी बढ़ रहा था। और राज्य के प्रमुख अधिकारियों के ईर्षाभाव भी राज्य के साथ चल रहे थे। जब राजा निर्बल और अकमंडय होता है, उस समय राज्य में चारों और से विपदाओं का आक्रमण होते हैं। बीजापुर की अशान्ति के इन दिनों में शिवाजी ने अनेक लाभ उठाये और उसके कुछ अन्य दुर्गों पर भी उसने अधिकार कर लिया। सिंहगढ़ का युद्ध वर्णन जारी है…

 

 

सिंहगढ़ के युद्ध से पहले अफ़ज़ल खां का आक्रमण

 

शिवाजी के लगातार आक्रमण और विद्रोह के कारण बीजापुर के
सुलतान ने उसके साथ युद्ध करने का निश्चय किया। उसके दरबार में अफ़ज़ल खाँ एक अत्यन्त युद्ध कुशल, राजनीतिज्ञ और बहादुर था। उसका शरीर विशाल था और उसके चेहरे से क्ररता का स्पष्ट आभास होता था। उसकी अवस्था यौवन को पार कर चुकी थी।फिर भी उसके शारीरिक बल में किसी प्रकार का अन्तर नहीं पड़ा था। सन्‌ 1659 ईसवी के अगस्त महीने में अपने साथ एक बड़ी सेना लेकर अफ़ज़ल खाँ, शिवाजी पर श्राक्रमण करने के लिए बीजापुर से रवाना हुआ। प्रतापगढ़ की तरफ न जाकर उसने पुरंदर का रास्ता पकड़ा। इसके पहले वह यहां का सूबेदार रह चुका था। इसलिए वह यहां की कठिनाइयों की भली भाँति जानता था। रास्ते में उसने हिन्दुओं के मन्दिरों और देवस्थानों का विध्वंस किया। हिन्दुओं पर उसकी सेना ने भयानक अत्याचार किये। शिवा जी पर आक्रमण करने के पहले अफ़ज़ल खाँ ने राजनीति की चालों के काम लिया। उसने सन्धि का प्रश्न उठाकर शिवा जी के साथ भेंट करने का निश्चय किया। उसने गम्भीरता के साथ अपने दृष्टि कोण पर विचार किया और सन्धि का जाल तैयार करना आरम्भ कर दिया। सिंहगढ़ का युद्ध वर्णन जारी है….

 

 

अफ़ज़ल खां की सन्धि

 

अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए अफ़जल खाँ ने कृष्णा जी भास्कर को अपना प्रतिनिधि बनाया और कुछ समय तक उसके साथ बातें करके उसने भास्कर को शिवा जी के पास भेज दिया। शिवा जी ने भास्कर के मुंह से अफ़जल खाँ की सन्धि का प्रस्ताव सुना और सन्धि पर बातचीत करने के लिए उसने अपना प्रतिनिधि गोपीनाथ पंत को अफ़जल खाँ के पास रवाना किया। दोनों ओर से ईमानदारी के आश्वासन दिये गये और सन्धि के प्रस्ताव को स्वीकार करके निश्चय हुआ कि शिवाजी और अफजल खाँ मिलकर सन्धि की शर्तों का निर्णय करेंगे। गोपीनाथ पंत लौट कर शिवाजी के पास आ गया। मिलने के लिए प्रतापगढ़ के नीचे का स्थान मान लिया गया। मिलने के स्थान पर खेमे लगे हुए थे और बड़ी सुन्दरता के साथ उसके भीतर लगे हुए शामियाने को सजाया गया था। शिवाजी को मालुम था कि अफ़ज़ल खाँ के साथ उसकी सेना है। यद्यपि उसका शिविर मिलने के स्थान से कुछ दूरी पर था। उसने अपनी सेना को तैयार कर के और करीब ले जा कर एक जंगली स्थान पर छोड़ दिया। भेंट का दिन पहले से निश्चित था। यह भी निश्चित था कि दोनों ही भेंट के समय अपने-अपने साथ, दो-दो अंग-रक्षक रख सकेंगे। इस निश्चय के अनुसार जीव महल और शम्भू जी कावजी नामक दो शूरवीर योद्धा शिवाजी के साथ अंग-रक्षक हो कर चले और अफ़जल खाँ भी दो विश्वस्त वीरों को अपने साथ ले कर भेंट के लिये रवाना हुआ। दोनों ओर के अंग-रक्षक खेमे के बाहर छोड़ दिये गये और अफ़॒जल खाँ
से भेंट करने के लिए शिवाजी ने खेमे के भीतर प्रवेश किया। एकाएक शामियाने के नीचे से चीत्कार सुनायी पड़ी दोनों ओर के अंग-रक्षक दौड़ पड़े। भीतर जाकर देखा तो अफ़जल खाँ का घायल शरीर जमीन पर पड़ा हुआ था। इस समय दोनों ओर की सेनायें दौड़ पड़ीं और युद्ध आरम्भ हो गया। अफ़ज़ल खाँ मारा गया था, इसलिए युद्ध में उसकी सेना ठहर न सकी। उसके भागते ही शिवा जी की सेना ने उस पर भयानक आक्रमण किया ओर उसके पैंसठ हाथियों, चार हजार घोड़ों और बारह हजार ऊँटों के साथ-साथ उसके बहुत-से अस्त्र-शत्रो पर अधिकार कर लिया। सिंहगढ़ का युद्ध वर्णन जारी है….

 

 

सुलतान के साथ सन्धि

 

अफ़जल खाँ के मारे जाने के बाद बीजापुर-राज्य की ओर से और
भी कई आक्रमण शिवाजी को परास्त करने के लिए किये गये। लेकिन सभी में बीजापुर की पराजय हुई। इसके बाद सन्‌ 1661 ईसवी में बीजापुर के सुलतान ने स्वयं अपनी एक विशाल सेना लेकर शिवाजी पर चढाई की और अन्त में बुरी तरह से उसकी हार हुईं। जब कोई उपाय सुलतान का बाकी न रहा ता उसने शिवा जो के साथ सन्धि कर ली। उस सन्धि से कल्याण से गोआ तक का कोंकण प्रदेश शिवा जी के अधिकार में आ गया। सब मिलाकर एक बड़ा इलाका शिवाजी अधिकार में हो जाने के कारण उसकी शक्तियां अब पहले से बहुत बड़ीहो गयी थीं। सिंहगढ़ का युद्ध वर्णन जारी है….

 

 

सिंहगढ़ युद्ध से पहले सूरत में शिवाजी का आक्रमण

 

पहले यह लिखा जा चुका है कि शिवाजी ओर औरंगजेब के बीच
सन्धि हो चुकी थी। मुगलों की और से उस सन्धि का पालन उस समय तक हुआ, जब तक कि औरंगजेब घर से लेकर बाहर तक, विरोधी परिस्थितियों में जकड़ा रहा उसके कुछ बदलते ही और मुग़ल साम्राज्य के सिंहासन पर बैठते ही उसने शिवाजी के साथ सन्धि को ठुकरा दिया और सन्‌ 1661 ईसवी में मुग़ल-सेना ने कल्याण पर अधिकार कर लिया। कल्याण इन दिनों में शिवाजी के अधिकार में था। औरंगजेब के साथ शिवा जी की शत्रुता का यहीं से सूत्रपात हुआ, दोनों तरफ तनातनी बढ़ने लगी। मराठों में युद्ध की तैयारियां होने लगीं और मुग़लों ने पूना में एकत्रित होने की कोशिश की। यशवंतसिंह भी मुग़लों की सहायता के लिए पूना में पहुँच गया। पूना के निकट दोनों ओर की सेनायें एकत्रित हुई। कुछ घटनाओं के बाद शिवा जी ने अवसर पाकर सूरत पर आक्रमण किया उन दिनों में सूरत व्यापार का एक प्रसिद्ध केन्द्र था। युरोप और एशिया के व्यापार का यह एक बड़ा बाजार था।यहीं पर पहले-पहल अंग्रेजों ने आकर अपनी कोठियाँ खोली थीं। मक्का जाने के लिए यहाँ का बन्दरगाह मुख्य समझा जाता था।हालैंड और पुर्तगाल के लोगों ने भी यहाँ पर अपनी कोठियाँ खोल रखी थीं। इस होने वाले व्यवसाय ने इस नगर को सम्पत्तिशाली बना दिया था। सन्‌ 1664 ईसवी में शिवाजी ने सूरत पर आक्रमण किया। चार हजार मराठा सवारों के कारण सूरत में हाहाकार मच गया। अंग्रेजी कम्पनी के अधिकारियों ने मराठा सवारों का सामना किया और उन्होंने अपनी कोठियों की रक्षा की। सूरत को लूटकर मराठा सेना लौट गयी और उसके कुछ दिनों के बाद मराठों का फिर सूरत में आक्रमण हुआ। उन्हीं दिनों में शिवाजी के पिता शाह जी की मृत्यु हुई थी और उसकी सम्पत्ति तथा जागीर पर शिवाजी का अधिकार हो गया था। सिंहगढ़ का युद्ध वर्णन जारी है…

 

 

मुग़लों के साथ फिर सन्धि

 

सन् 1664 ईंसवी में औरंगजेब ने अपने पृत्र॒ मुअज्जम को दक्षिण
का सूुबेदार बनाकर भेजा। उसकी सहायता के लिए यशवंतसिंह वहीं पर मौजूद था। अपनी शक्ति को अटूट बनाने के लिए मुगल सम्राट ने राजा जयसिंह की एक बड़ी सेना के साथ दक्षिण के लिए रावाना किया। पूना में मुगलों की एक विशाल सेना एकत्रित हो गयी। जयसिंह ने सिंहगढ़ के किले पर आक्रमण किया और रायगढ़ तक उसकी सेना फैल गयी। इसके साथ ही सरदार दिलेर खाँ एक मुगल सेना लेकर पुरंदर की ओर रवाना हुआ। मुगलों के इन भयानक आक्रमणों से शिवाजी के सामने बड़ी कठिनाई पैदा हो गयी। वह जयसिंह के साथ युद्ध नहीं करता चाहता था। इसलिए सन्धि का प्रस्ताव हुआ और दोनों ने आदर के साथ सन्धि स्वीकार किया। शिवाजी ने मुग़लो के दुर्गों को वापस दे दिया और दूसरे जिन 32 दुर्गों पर शिवाजी का अधिकार हो गया था, उनमें से भी 20 दुर्ग औरंगजेब को दिये गये। औरंगजेब की ओर से बीजपुर राज्य के कुछ प्रदेश शिवा जी को मिले और उसका लड़का शम्भा जी मुगल साम्राज्य में पंच हजारी मनसबदार बनाया गया। इस सन्धि के बाद जयसिंह और शिवाजी ने मिलकर बीजापुर में आक्रमण किया और उसके अनेक दुर्गों के साथ-साथ उसका दुर्गम पहाड़ी दुर्ग मण्डल किला भी छीन कर अधिकार में कर लिया गया। सिंहगढ़ का युद्ध वर्णन जारी है…

 

 

सिंहगढ़ का युद्ध और औरंगजेब का विश्वासघात

 

शिवाजी ने जयसिंह के साथ सन्धि की थी, लेकिन वह संधि
जयसिंह तक ही उस समय सीमित थी। उसके बाद दोनों ने मिलकर बीजापुर पर आक्रमण किया था। सन्धि की वे शर्ते जब औरंगजेब के पास पहुँची तो वह चुप हो गया। अपने विचारों को बिना प्रकट किये हुए उसने शिवाजी को अपने यहां आमंत्रित किया। शिवाजी ने बिना किसी सन्देह के उस निमंत्रण को स्वीकार कर लिया। इसके पहले ही शिवाजी ने जयसिंह के मुंह से सुना था कि सम्राट ने दक्षिण का सम्पूर्ण अधिकार देने के लिए उसे आमंत्रित किया है। उसे बताया गया था कि सैनिक और आंशिक शक्तियों के साथ उसे आगरा से दक्षिण वापस किया जायेगा और मुगल साम्राज्य की ओर से दक्षिण का शासक माना जायगा। सन्‌ 166 ईस्वी में अपनी एक छोटो सी सेना के साथ शिवाजी आगरा के लिए रवाना हुआ। बसन्‍त के दिन थे।उसके साथ उसका पुत्र शम्भा जी भी था। शिवा जी की मराठा सेना आगरा पहुँच कर रुक गयी और सम्राट से भेंट करने के लिए उसने दरबार ए आम में प्रवेश किया। दरबार समाप्त होने के बाद शिवा जी को वहां पर कैद कर लिया गया। औरंगजेब के इस विश्वाघात से शिवाजी को एक भीषण आधात पहुँचा। उसने
सहज ही में अनुभव किया कि शत्रु का विश्वास करने का यह परिणाम है। कुछ दिनों तक बंदी रहकर शिवाजी ने वहाँ अधिकारियों को धोखा दिया और चालाकी से वह बन्दी घर से निकल कर चला गया। कैद से छूट कर शिवा जी ने दक्षिण में मुगलों के विरुद्ध युद्ध करने की तैयारी की। उसने समझ लिया कि औरंगजेब के शासन-काल में मुगलों और मराठों की सन्धि कभी नहीं हो सकती।

 

 

सन्‌ 1667 ईसवी की 2 जूलाई को जयसिंह की मृत्यु हो गयी
थी। वह एक शूरबीर राजपुत था और मुगलों की ओर से दक्षिण में
युद्ध के लिए भेजा गया था। उसके साथ सन्धि करके जो दुर्ग और प्रदेश शिवा जी ने मुगल-सम्राट को दिये थे, एक साथ उसने सब पर अधिकार कर लिया। उनकी रक्षा के लिए यशवंतसिंह के साथ, मुअज्ज़म दक्षिण में था और उसके अधिकार में एक विशाल मुग़ल सेना थी।

 

 

लेकिन शिवाजी को वह रोक न सका। सन्धि के बाद सिंहगढ़
का किला भी मुग़लों के अधिकार में चला गया था। शिवाजी ने उस पर कब्ज़ा करने की चेष्टा की, यशवंतसिंह और मुअज्जम के अधिकार में जितनी सेना थी, सब ने मिलकर सिंहगढ़ को बचाने की कोंशिश की। शिवाजी को कैद करके औरंगजेब सदा के लिए दक्षिण से छुटकारा पा गया था। लेकिन उसके कैद से छूटकर चले जाने पर औरंगजेब को बहुत रंज हुआ। शिवा जी का फिर युद्ध आरम्भ कर देना उसे असह्म हो गया। उसने अपनी पूरी शक्ति लगा कर शिवाजी के विनाश का का प्रयत्न किया। 11 दिसम्बर सन्‌ 1669 ईसवी को उसे समाचार मिला कि शिवाजी सिंहगढ़ पर आक्रमण करके उस पर अधिकार करना चाहता है। यह समाचार पाकर सम्राट ने सेनापति दिलेर खाँ और दाऊद खाँ को आदेश भेजे कि वे अपनी शक्तिशाली सेनाओं को लिकर सिंहगढ़ में शाहजादा मुअज्जम और यशवंतसिंह की सहायता करें और किसी भी प्रकार वे शिवा जी का विध्वंस करें। सिंहगढ़ का युद्ध वर्णन जारी है….

 

 

सिंहगढ़ का युद्ध और सिंहगढ़ किले पर अधिकार

दोनों ओर की सेनाओं का सिंहगढ़ में सामना हुआ। सन्‌ 1670
ईसवी में औरंगजेब की सेना साथ शिवा जी ने सिंहगढ़ का भयानक युद्ध श्रारम्भ किया। मुअज्ज़म के साथ कई एक बहादुर सेनापति थे और शक्तिशाली विशाल मुगल सेना थी। शिवा जी और उसकी सेना का प्रत्येक सैनिक, सवार और सरदार, औरंगजेब के विश्वासघात के कारण रक्त का प्यासा हो रहा था। दोनों ओर से भयानक नर-संहार आरम्भ हुआ। मारे गये सैनिकों का रक्त प्रवाहित हो उठा। मराठा और मावली सैनिकों ने मुग़ल सेना के छक्के छूटा दिये। कई बार मुगल सेना घबराकर पीछे की ओर हट गयी। परन्तु फिर साहस करके उसने युद्ध किया। उस विकराल युद्ध में दोनों ओर की सेनायें बहुत समय तक आगे बढ़ने की कोशिश करती रहीं। लेकिन कोई सफलता न मिली। दोनों सेनायें बढ़कर एक दूसरे के निकट आ गयी थीं और उन्होंने वाणों की मार बन्द करके तलवारों की मार आरम्भ कर दी थी। कई घन्टे तक दोनों और की सेनाओं ने भयंकर मार-काट की। एक बार मराठा सेना पीछे की ओर हटी। उस समय मुगल सेना कुछ दूर तक मराठों को दबाकर पीछे ले गयी। लेकिन उसके बाद हो मराठों और मावलियों ने अपनी। तलवारों की मार से प्रलय का दृश्य उपस्थित कर दिया। बहुत-से मुगल सैनिक मारे गये। मुअज्जम और यशवंत की सेनायें पीछे की ओर हटने लगीं।बाकी मुग़ल सैनिकों ने भी साहस तोड़ दिया और युद्ध के मैदान में उन्होंने हथियार डाल दिये। उसी समय शिवाजी की सेना ने युद्ध बन्द कर दिया और सिंह॒गढ़ के किले पर अधिकार कर लिया। दक्षिण में मुग़ल सेना का यह युद्ध उसकी पराजय का एक ऐसा कारण बन गया कि फिर उसके बाद उसने साहस नहीं किया। युद्ध बन्द होने के बाद मुग़ल सेना का कोई भी सैनिक मारा नहीं गया। युद्ध के बाद सिंहगढ़ के दुर्ग पर शिवाजी का फहराता हुआ झंडा दिखायी देने लगा।

 

 

 

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