सरदार चूड़ावत की वीरता और बलिदान की कहानी

सरदार चूड़ावत

मेवाड़ के महाराणा राजसिंह के वीर सेनापति सरदार चूड़ावत की वीरता से कौन परिचित नहीं। उनका त्याग, बलिदान और वीरता भरी कहानी राजस्थान में विख्यात है। उन्होंने अपने जीवन में दूसरों की सेवा, सहायता व बलिदान को अपने सुखों की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण समझा । वे हमेशा कांटों के मार्गे पर चलने को तत्पर रहते थे। दु:खों से आलिंगन करने में आनन्द समझते थे।

 

 

इस समय दिल्‍ली का बादशाह आलमगीर औरंगजेब था।वह अपनी शक्ति के नशे में उचित या अनुचित कार्य का कभी चिन्तन नहीं करता था। परन्तु उसके घमण्ड को चूर राजपूत वीर ही अपनी तलवार के बल पर किया करते थे। जब बादशाह ने रूपनगर की राजकुमारी के सौन्दर्य के बारें में सुना तो उससे विवाह करने का निश्चय किया। इसके लिये उसने एक विशाल सेना लेकर रूपनगर की ओर चल दिया।

 

 

सरदार चूड़ावत के वीरता और साहस की कहानी

 

 

इधर रूपनगर में साधारण सोलंकी राजा राज करते थे। उनके पास इतनी शक्ति नहीं थी कि वे बादशाह का मुकाबला कर पाते। राजा ने राज-दरबारियों से परामर्श किया। सभी के विचारानुसार मेवाड़ के महाराणा राजसिंह से सहायता प्राप्त करने का तथा उनसे ही अपनी राजकुमारी चंचल के विवाह के प्रस्ताव का सुझाव भी दिया। सोलंकी राजा ने इस विषय में अपनी पुत्री की भी स्वीकृति ले ली। राजकुमारी अपने प्राणों की बलि देना अच्छा समझती थी चूंकि वह मुगल बादशाह के स्पर्श को घोर पाप का प्रतीक व अपनी प्रतिष्ठा के विपरीत समझती थी। इसके साथ ही साथ राणाजी से विवाह करने में अपना गौरव भी समझती थी।

 

 

सुन्दर राजकुमारी का जीवन बहुत पावन था। वह अपना नियमित धार्मिक जीवन व्यतीत करती थी। उसकी नियमित प्रार्थना व धार्मिक पुस्तकों के पठन ने प्रबल आत्मबल पैदा कर दिया था। उसने राणाजी की सेवा में एक विनम्र प्रार्थना-पत्र रक्षा व विवाह हेतु प्रेषित किया।

 

 

मेवाड़ के राणा केसरी अपने वीर दरबारियों के साथ बैठे हुए थे। उन्हें उसी समय रूपनगर के एक दूत ने आकर कुछ पत्र संभलाये । राणा ने उन पत्रों को पढ़ा तत्पश्चात राणाजी ने सरदार चूड़ावत के हाथों वे पत्र दिये और सबके सम्मुख पढ़ने का भी आदेश दिया। सरदार चूड़ावत ने पत्रों को पढ़ कर सुनाया। इन पत्रों को पढ़कर सरदार चूड़ावत बोले कि “महाराणा साहब इसमें विचार करना क्या है ? इन पत्रों को पढ़ कर आप किस चिंता में डूब गये ?’ एक राजपूत बाला आपको हृदयेश्वर बना चुकी है, क्या आप उनसे विवाह न करेंगे और उसे मलेच्छ के हाथों पकड़वा देगे ? क्या संसार में क्षत्रिय धर्म का विनाश होने वाला हैं? क्‍या शरणागत वीर राजपूत स्त्री को आत्माघात का अवसर देंगे.?. क्‍या मेवाड़ की पावन परम्परा को ठुकरा देंगें?”

 

सरदार चूड़ावत
सरदार चूड़ावत

 

तब महाराणा ने कहा–“वीर चूडावत ! तुम सत्य कह रहे हो,परन्तु इस कदम से बादशाह औरंगजेब से दुश्मनी हों जायेगी । हमें राज्य का विस्तार करना है..इसे… खोना नहीं । परन्तु जब सभी राज दरबारियों से इस विषय में परामर्श लिया गया तो सभी का उत्तर सरदार चूड़ावत के पक्ष में था।

 

 

अन्त में राणा ने सेना का सशक्त संगठन किया। रूपनगर की “राजकुमारी से विवाह करने हेतु प्रस्थान कर दिया। इधर वीर सरदार चूड़ावत का विवाह अमी अभी हुआ था। उसके हाथों में मेंहदी की लालिमा हाथों की शोभा बढ़ा रही थी, उसे अब अपनी नवोढ़ा पत्नी की-गोरी गोरी कलाइयों के स्थान पर तलवार पकड़नी होगी, मुगलों से डंट कर लोहा लेना होगा। राजमहल के विलास और आनन्द को त्यागना होगा। वह अपने महलों में नवोढा पत्नी हांड़ा रानी के पास गया। इन्हीं विचारों के उतार चढ़ाव में उसका (चूड़ावत) मुख-मण्डल कुछ उदास-सा था। रानी मन के भावों को पहचान गई, उसने अपने पतिदेव से उदास होने का कारण पूछा। वीर सरदार चूड़ावत ने बताया कि कल ही उसे औरंगजेब की सेना से मुकाबला करना है और महाराणा रूपनगर की राजकुमारी की रक्षा के लिए उधर ही प्रस्थांन कर चुके हैं। युद्ध भीषण होगा। अब मिलना होगा या नहीं, कुछ कहा नहीं जा सकता। वीर पत्नी हाड़ा रानी ने बहुत ही विवेक से वीरता पूर्ण जवाब दिया, “प्राणनाथ, आपका ओर मेरा सम्बन्ध जन्म-जन्म का है। हम कभी अलग नहीं हो सकते। आप अपने कर्तव्य का पालन कर क्षत्रिय धर्म का गौरव बढ़ाइये। मैं आपके विजय की मंगल कामना करती हूं ।”

 

 

वीर सरदार चूड़ावत अपने चुने हुए वीरों के साथ औरंगजेब का दर्ष दमन करने के लिए आगे बढ़े, परन्तु अपनी रानी की याद ने
उन्हें फिर विह्लल कर दिया। उन्होंने अपने एक सरदार को रानी
से अन्तिम निशानी लेने को कहा। रानी सब समझ गई और उसने
अपना सिर काटकर सरदार के हाथों में रख दिया। चूड़ावत इस
भेंट को पाकर उनन्‍मत हो उठा और औरंगजेब की सेना को गाजर मूली की तरह काटने लगा। यवनों के छक्के छूट गए। यवन सेना
पराजित होने लगी ।

 

 

उधर राणा राजसिंह रूपनगर की राजकुमारी को ब्याह लाये उधर विजय की बधाइयां बजने लगी। मुगल सेना पराजित होकर लौट पड़ी। इधर वधुओं ने मंगल कलश सजाए, आरतियां भी उतारी। चारों ओर खुशी की लहर दौड़ पड़ी। विवाह और विजय का पावन संगम हुआ।

 

 

सरदार चूड़ावत के हृदय में अपनी नवोढ़ा पत्नी का अनुपम बलिदान उसे आनन्दित एवं गौरवान्वित कर रहा था। अब यह रहस्य सबके सामने प्रकट हुआ तो सभी ने एक स्वर से सरदार चूड़ावत के त्याग की प्रशंसा की तथा धन्य हाड़ा रानी, धन्य हाड़ा रानी” से वातावरण गूंज उठा-मंगलमय हो गया राणा ने वीर सरदार चूड़ावत की पीठ थपथपाई और वीरता की बहुत प्रशंसा की। उन्हें बधाई दी कि सौभाग्य का विषय है कि तुम्हें देवीय वीर पत्नी मिली।

 

 

हमारे यह लेख भी जरूर पढ़े:—-

 

 

चौरासी गुंबद कालपी
चौरासी गुंबद यह नाम एक ऐतिहासिक इमारत का है। यह भव्य भवन उत्तर प्रदेश राज्य के जालौन जिले में यमुना नदी
श्री दरवाजा कालपी
भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के जालौन जिले में कालपी एक ऐतिहासिक नगर है, कालपी स्थित बड़े बाजार की पूर्वी सीमा
रंग महल कालपी
उत्तर प्रदेश राज्य के जालौन जिले के कालपी नगर के मिर्जामण्डी स्थित मुहल्ले में यह रंग महल बना हुआ है। जो
गोपालपुरा का किला जालौन
गोपालपुरा जागीर की अतुलनीय पुरातात्विक धरोहर गोपालपुरा का किला अपने तमाम गौरवमयी अतीत को अपने आंचल में संजोये, वर्तमान जालौन जनपद
रामपुरा का किला
जालौन  जिला मुख्यालय से रामपुरा का किला 36 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। 46 गांवों की जागीर का मुख्य
जगम्मनपुर का किला
उत्तर प्रदेश राज्य के जालौन जिले में यमुना के दक्षिणी किनारे से लगभग 4 किलोमीटर दूर बसे जगम्मनपुर ग्राम में यह
तालबहेट का किला
तालबहेट का किला ललितपुर जनपद मे है। यह स्थान झाँसी – सागर मार्ग पर स्थित है तथा झांसी से 34 मील
कुलपहाड़ का किला
कुलपहाड़ भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के महोबा ज़िले में स्थित एक शहर है। यह बुंदेलखंड क्षेत्र का एक ऐतिहासिक
पथरीगढ़ का किला
पथरीगढ़ का किला चन्देलकालीन दुर्ग है यह दुर्ग फतहगंज से कुछ दूरी पर सतना जनपद में स्थित है इस दुर्ग के
धमौनी का किला
विशाल धमौनी का किला मध्य प्रदेश के सागर जिले में स्थित है। यह 52 गढ़ों में से 29वां था। इस क्षेत्र
बिजावर का किला
बिजावर भारत के मध्यप्रदेश राज्य के छतरपुर जिले में स्थित एक गांव है। यह गांव एक ऐतिहासिक गांव है। बिजावर का
बटियागढ़ का किला
बटियागढ़ का किला तुर्कों के युग में महत्वपूर्ण स्थान रखता था। यह किला छतरपुर से दमोह और जबलपुर जाने वाले मार्ग
राजनगर का किला
राजनगर मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में खुजराहों के विश्व धरोहर स्थल से केवल 3 किमी उत्तर में एक छोटा सा
पन्ना के दर्शनीय स्थल
पन्ना का किला भी भारतीय मध्यकालीन किलों की श्रेणी में आता है। महाराजा छत्रसाल ने विक्रमी संवत् 1738 में पन्‍ना
सिंगौरगढ़ का किला
मध्य भारत में मध्य प्रदेश राज्य के दमोह जिले में सिंगौरगढ़ का किला स्थित हैं, यह किला गढ़ा साम्राज्य का
छतरपुर का किला
छतरपुर का किला मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में अठारहवीं शताब्दी का किला है। यह किला पहाड़ी की चोटी पर
चंदेरी का किला
भारत के मध्य प्रदेश राज्य के अशोकनगर जिले के चंदेरी में स्थित चंदेरी का किला शिवपुरी से 127 किमी और ललितपुर
ग्वालियर का किला
ग्वालियर का किला उत्तर प्रदेश के ग्वालियर में स्थित है। इस किले का अस्तित्व गुप्त साम्राज्य में भी था। दुर्ग
बड़ौनी का किला
बड़ौनी का किला,यह स्थान छोटी बड़ौनी के नाम जाना जाता है जो दतिया से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर है।
दतिया महल या दतिया का किला
दतिया जनपद मध्य प्रदेश का एक सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक जिला है इसकी सीमाए उत्तर प्रदेश के झांसी जनपद से मिलती है। यहां
कालपी का किला
कालपी का किला ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अति प्राचीन स्थल है। यह झाँसी कानपुर मार्ग पर स्थित है उरई
उरई का किला और माहिल तालाब
उत्तर प्रदेश के जालौन जनपद मे स्थित उरई नगर अति प्राचीन, धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व का स्थल है। यह झाँसी कानपुर
एरच का किला
उत्तर प्रदेश के झांसी जनपद में एरच एक छोटा सा कस्बा है। जो बेतवा नदी के तट पर बसा है, या
चिरगाँव का किला
चिरगाँव झाँसी जनपद का एक छोटा से कस्बा है। यह झाँसी से 48 मील दूर तथा मोड से 44 मील
गढ़कुंडार का किला
गढ़कुण्डार का किला मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ जिले में गढ़कुंडार नामक एक छोटे से गांव मे स्थित है। गढ़कुंडार का किला बीच
बरूआ सागर का किला
बरूआ सागर झाँसी जनपद का एक छोटा से कस्बा है। यह मानिकपुर झांसी मार्ग पर है। तथा दक्षिण पूर्व दिशा पर
मनियागढ़ का किला
मनियागढ़ का किला मध्यप्रदेश के छतरपुर जनपद मे स्थित है। सामरिक दृष्टि से इस दुर्ग का विशेष महत्व है। सुप्रसिद्ध ग्रन्थ
मंगलगढ़ का किला
मंगलगढ़ का किला चरखारी के एक पहाड़ी पर बना हुआ है। तथा इसके के आसपास अनेक ऐतिहासिक इमारते है। यह हमीरपुर
जैतपुर का किला या बेलाताल का किला
जैतपुर का किला उत्तर प्रदेश के महोबा हरपालपुर मार्ग पर कुलपहाड से 11 किलोमीटर दूर तथा महोबा से 32 किलोमीटर दूर
सिरसागढ़ का किला
सिरसागढ़ का किला कहाँ है? सिरसागढ़ का किला महोबा राठ मार्ग पर उरई के पास स्थित है। तथा किसी युग में
महोबा का किला
महोबा का किला महोबा जनपद में एक सुप्रसिद्ध दुर्ग है। यह दुर्ग चन्देल कालीन है इस दुर्ग में कई अभिलेख भी
कल्याणगढ़ का किला मंदिर व बावली
कल्याणगढ़ का किला, बुंदेलखंड में अनगिनत ऐसे ऐतिहासिक स्थल है। जिन्हें सहेजकर उन्हें पर्यटन की मुख्य धारा से जोडा जा
भूरागढ़ का किला
भूरागढ़ का किला बांदा शहर के केन नदी के तट पर स्थित है। पहले यह किला महत्वपूर्ण प्रशासनिक स्थल था। वर्तमान
रनगढ़ दुर्ग या जल दुर्ग
रनगढ़ दुर्ग ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रतीत होता है। यद्यपि किसी भी ऐतिहासिक ग्रन्थ में इस दुर्ग
खत्री पहाड़ का दुर्ग व मंदिर
उत्तर प्रदेश राज्य के बांदा जिले में शेरपुर सेवड़ा नामक एक गांव है। यह गांव खत्री पहाड़ के नाम से विख्यात
मड़फा दुर्ग
मड़फा दुर्ग भी एक चन्देल कालीन किला है यह दुर्ग चित्रकूट के समीप चित्रकूट से 30 किलोमीटर की दूरी पर
रसिन का किला
रसिन का किला उत्तर प्रदेश के बांदा जिले मे अतर्रा तहसील के रसिन गांव में स्थित है। यह जिला मुख्यालय बांदा
अजयगढ़ का किला
अजयगढ़ का किला महोबा के दक्षिण पूर्व में कालिंजर के दक्षिण पश्चिम में और खुजराहों के उत्तर पूर्व में मध्यप्रदेश
कालिंजर का किला
कालिंजर का किला या कालिंजर दुर्ग कहा स्थित है?:— यह दुर्ग बांदा जिला उत्तर प्रदेश मुख्यालय से 55 किलोमीटर दूर बांदा-सतना
ओरछा दर्शनीय स्थल के सुंदर दृश्य
शक्तिशाली बुंदेला राजपूत राजाओं की राजधानी ओरछा शहर के हर हिस्से में लगभग इतिहास का जादू फैला हुआ है। ओरछा

write a comment

%d bloggers like this: