श्री दरवाजा कालपी – श्री दरवाजे का इतिहास

भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के जालौन जिले में कालपी एक ऐतिहासिक नगर है, कालपी स्थित बड़े बाजार की पूर्वी सीमा पर यह श्री दरवाजा स्थित है। यह दरवाजा अपना एक ऐतिहासिक महत्व रखता है। राजा श्रीचन्द्र की शहादत में बना यह श्री दरवाजा दर्शनार्थियों को बरबस अपनी ओर खींच लेता है।

 

 

श्री दरवाजा का इतिहास

 

 

श्री दरवाजा का इतिहास स्पष्ट तो दिखाई नहीं पड़ता है। प्रसिद्ध पत्रकार अखिलेश विद्यार्थी के अनुसार सन 1196 ई० में कालपी के राजा श्रीचन्द्र के कुछ आदमी अपने राजा के साथ विश्वासघात करके यवन सेनापतियों से मिल गये और परिणाम स्वरूप युद्ध के मैदान में राजा श्रीचन्द्र की हार हुई और वह युद्ध में शहीद हुए। विजयी यवन सरदार ने राजा श्रीचन्द्र के सिर को जमीन में गड़वा कर उसके ऊपर एक विशाल द्वार का निर्माण कराया जो श्री दरवाजे के नाम से जाना जाता है। एक अन्य परम्परा अनुसार यह कहा जाता है कि कालपी के अन्तिम हिन्दू राजा श्री चन्द्र मुसलमानों द्वारा पराजित हुए एवं उनकी मृत्यु कालपी में हुई और उनका सिर इस दरवाजे के नीचे गाड़ दिया गया।

 

हिजरी 791 में कालपी के राजा लहरिया उर्फ श्री चन्द्र जब मुसलमानों से हुए युद्ध में शहीद हुए तब उनके नाम पर इस श्री दरवाजे का निर्माण हुआ। कहा जाता है कि युद्ध में वीरगति को प्राप्त राजा लहरिया श्रीचन्द्र की पटरानी लोढ़ा से राजा श्रीचन्द्र का सिर माँग कर नगर के पश्चिमी भाग में उसे दफनाया तथा उस पर एक शानदार दरवाजा बनवाया।

 

 

डा० राजेन्द्र कुमार के अनुसार राजा श्रीचन्द्र सोलहवीं शताब्दी के आरंभ में महमूद लोधी द्वारा मारा गया था। बाद में श्रीचन्द्र के नाम से ही महमूद लोधी ने नगर में एक दरवाजा बनवाया था जो श्री दरवाजा के नाम से आज भी विख्यात है। श्री रूप किशोर टण्डन के अनुसार यह श्री दरवाजा बारहवीं शताब्दी के यवन काल के प्रारंभ में बना हुआ बतलाया जाता है।

 

 

मुंशी ख्वाजा इनायत उल्ला के अनुसार 791 हिजरी में सुल्तान मुहम्मद उर्फ महमूद शाह लोधी ने कालपी शहर में इस आलीशान दरवाजे की नींव डाली। इस दरवाजे के निर्माण के सन्दर्भ में यह कारण लिखा है कि महमूद शाह लोधी ने जब राजा श्रीचन्द्र
को हरा दिया तब उसका सिर काटकर इस दरवाजे की नींव में रखा और यह श्री दरवाजा बनवाया।

 

 

एक अन्य जनश्रुति के अनुसार युद्ध में वीरगति को प्राप्त राजा श्रीचन्द्र का सिर उनकी पत्नी लोढ़ारानी से जबरदस्ती लेकर कालपी शहर की पूर्वी सीमा पर गाड़ कर उस पर इस दरवाजे का निर्माण महमूद लोधी द्वारा इस कारण किया गया कि जितने भी लोग कालपी शहर की सीमा में प्रवेश करें अथवा कालपी से बाहर जायें उन सबके पैरों तले राजा श्रीचन्द्र का सिर रौंदा जाये।

 

श्री दरवाजा कालपी
श्री दरवाजा कालपी

 

 

अस्तु कालपी के अन्तिम हिन्दू राजा श्रीचन्द्र का युद्ध सन 1196 ई० में महमूद शाह लोधी के साथ हुआ जिसमें राजा श्रीचन्द्र वीरगति को प्राप्त हुए। हिन्दू मान्यताओं के आधार पर अन्तिम संस्कार पूर्ण होने के पूर्व ही राजा श्रीचन्द्र की विधवा पत्नी रानी लोढ़ा की उपस्थिति में महमूद शाह लोधी ने अपनी बर्बता के अन्तर्गत राजा श्रीचन्द्र की लाश से सिर काटकर उसे नगर की पूर्वी सीमा पर श्री दरवाजे के नीचे गड़वा दिया ताकि राजा श्रीचन्द्र का सिर कालपी आने जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति के पैरों तले कुचला जा सके और लोगों को महमूद लोधी की बर्बता का अहसास रहे ताकि कोई उसके शासन में सिर न उठा सके। रानी लोढ़ा द्वारा अपने पति की सिर विहीन लाश का ही दाह संस्कार किया गया।

 

 

श्री दरवाजा कालपी

यह श्री दरवाजा कालपी शहर की पूर्वी सीमा पर मेहराबयुक्त दुखी आकृति दर्शाता हुआ बना है। यह विशाल श्री दरवाजा 36 फुट ऊँचा व 12 फुट चौड़ा है। इसकी दीवारें 14 फुट चौड़ी हैं। तथा यह नीचे से ऊपर की ओर क्रमशः पतला होता गया है। इस दरवाजे के ऊपर तीन पूरे कंगूरे व दो पौने कंगूरे अंकित है। इनमें कोई दरवाजा नहीं है।

 

 

राजा श्रीचन्द्र का स्वामि भक्त अनुचर जिसका नाम पूरन कहार था , भी फाटक के बायीं ओर आले में चुनवा दिया गया था। इस दरवाजे के बगल में ही शाही मस्जिद है। जिसका मुआज़िन दरवाजे की दीवार से अभी भी अजान देता है।

 

 

इस दरवाजे के ऊपर स्थित कंगूरों में प्रत्येक में एक एक चौकोर छिद्र बना हुआ है जिससे आर पार देखा जा सकता है। कंगूरों के नीचे एक बाहर निकली हुई पट्टिका अंकित है, जिसके नीचे पुनः आर पार देखने वाला एक एक छिद्र ऊपरी छिद्रों के ठीक नीचे अंकित है। इसके नीचे आयताकार आकृति अंकित है जिसके अन्दर एक विशाल मेहराब बना हुआ है। इस विशाल मेहराब के नीचे विशाल मेहरायुक्त दरवाजा बना है। दोनों मेहराबों के बीच एक बड़ी आयताकार आर पार देखने वाली खिड़की बनी है। जिसके नीचे दोनों ओर पानी निकलने के छिद्र अंकित हैं। इसके नीचे छोटे छोटे तोड़ो पर आधारित एक छज्जा भी अंकित है। श्री दरवाजा में लकड़ी के दो विशाल फाटक भी लगे हुए थे। दरवाजे के दोनों ओर विशाल लकड़ी के फाटकों को साधने हेतु ऊपर तथा नीचे की ओर पत्थर के गोल हुक भी लगे हैं। यह श्री दरवाजा कालपी में हिन्दुओं पर मुगलों की बर्बरता की मूक कहानी आज भी बुलन्दी के साथ कह रहा है। यह सम्पूर्ण श्री दरवाजा पत्थर तथा चूने के संयोग से निर्मित है तथा इस पर चूने का ही प्लास्टर है।

 

 

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