वेदव्यास क्षेत्र – वेदव्यास का जीवन परिचय

जालौन  जनपद के कालपी परगना में स्थित है यह वेदव्यास क्षेत्र यह कालपी में यमुना नदी दक्षिणी किनारे पर स्थित है। वेदव्यास ऋषि का सम्बन्ध इस क्षेत्र से होना प्रमाणित करता है कि आर्य सभ्यता के प्रारंभ काल से ही यह स्थान आर्यों के रहने का एक स्थान था कालपी नगर के पश्चिम उत्तर में वेदव्यास क्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध क्षेत्र महर्षि वेदव्यास का जन्म स्थान माना जाता है।

 

 

महर्षि वेदव्यास की जन्मस्थली होने के कारण ही यह क्षेत्र वेदव्यास क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। इसी क्षेत्र में वेदव्यास जी द्वारा पुराणों की रचना की गई थी। इसी कारण श्रीनारायण चतुर्वेदी का कथन है कि

पाथतीं जहाँ हों देवि गोबर के कन्डे आज।
व्यास ने वहाँ ही तो पुराणों को बनाया था।।

 

वेदव्यास क्षेत्र का इतिहास

 

 

जालौन जिले में यमुना नदी के तट पर बसी कालपी नगरी में एक स्थान व्यास क्षेत्र है जहाँ पर बैठकर महर्षि वेदव्यास ने अपने अमर ग्रन्थों की रचना की थी। कालपी में यमुना नदी में जोंधर नाम की नदी जिस स्थान पर मिलती है, वह स्थान व्यास क्षेत्र कहलाता है। इस व्यास क्षेत्र से लेकर दक्षिण पूर्व गुलौली ग्राम तक किसी समय कालपी की बस्ती बसी हुई थी। कालपी में पहले 52 मुहल्ले थे जिनमें से एक मुहल्ला व्यास क्षेत्र भी था। कालपी एक ऐतिहाससिक प्राचीन नगर है जहाँ वेदव्यास जैसे महापुरूष ने जन्म लिया था तथा वेद पुराण दर्शन आदि की रचना कीं थी।

 

 

भगवान व्यास की जन्मभूमि कालपी में आकार मैं भाव विहवल हो गया। भगवान वेदव्यास आर्यत्व की मूर्ति थे। आर्यत्व के एक आदि संस्थापक के पौत्र माटी मात्र के दौहिज, वे भारतीय जातियों के मिश्रण के प्रतीक थे। छिन्न भिन्न हुए वेदों को उन्होंने एकत्र किया, संस्कृति के अव्यक्त मूल्यों को व्यक्त किया और अपनी संस्कृति को सातत्य दिया। पांडव कौरवों के वे पितामह थे।महाभारत युद्ध का काल जिसमें ही भारतीय जीवन पललवित हुआ उस समय वे पूज्य और प्रेरक थे। भगवान श्रीकृष्ण की महत्ता उन्होंने देखी। उनका प्रचंड व्यक्तित्व शब्दों द्वारा मूर्तिमान किया। उनके संदेश को शब्द देह देकर मानव उद्धार के लिए अमर कर दिया। जो सनातन थे उनको अपनी शब्द संजीवनी के द्वारा फिर से सनातनत्य दिया।

 

वेदव्यास जी
महर्षि वेदव्यास जी

 

भारत का सामुदायिक मानस व्यास जी ने बुना है। तीन हजार वर्ष पूर्व उनकी साहित्य शक्ति से रचे हुए जीवन और आदर्श ने ताने बाने दिये हैं। भगवान वेदव्यास ही भारत के गढ़ने वाले उसके अधिध्यता और प्रणेता है। भगवान व्यास जगत के आब हो गये है। उन्होंने अनुभव किया सिखलाया कि मनुष्य मात्र में देवी अंश है। भगवान श्री वेदव्यास जी के जन्म स्थान की रज अपने सिर पर चढ़ाकर मैं कृतार्थ होता हूं। यह अधिकार प्राप्त होने पर मेरे सौभाग्य की सीमा नहीं है और फिर मैं अपनी अंजलि देता हूं।

 

 

अचतुर्वदनो ब्रहमा द्विबाहु परोहरि :।

अभाल लोचन : शर्म्भुभगवान्‌ बादरायण :. ॥

व्यासाय विष्णु रूपाय व्यासरूपाय विष्णवे ।

नमो वै ब्रहमहदये वसिष्याय नमोनमः ॥

 

यह अत्यन्त प्राचीन जनश्रुति है कि महर्षि वेदव्यास का सम्बन्ध कालपी से था। वर्तमान कालपी नगर के समीप ही यमुना तट पर स्थित वेदव्यास क्षेत्र अब भी इसकी स्मृति को जाग्रत किये हुए है । कालपी के उत्तर पश्चिम में मदारपुर (प्राचीन मत्स्य, गंधापुर ) व्यास क्षेत्र है। यहाँ यमुना में जोंधर नामक एक नाला मिलता है , इस नाले का पुराना नाम व्यास गंगा बताया जाता है। बरसात के दिनों में इसका वेग और विस्तार काफी बढ़ जाता है। इसके कारण व्यास क्षेत्र की ऊँची भूमि का एक बड़ा भाग कट कर कर गिर गया है। व्यास क्षेत्र पर पहले व्यासजी का एक मंदिर बताया जाता था जों कुछ वर्ष पूर्व गिरकर नष्ट हो गया है। इस मंदिर के कुछ अवशेष अब भी व्यास टीले पर देखे जा सकते हैं।

 

 

व्यास जी पुराणों तथा महाभारत के रचियता के रूप में ख्याति प्राप्त है। वेदव्यास के पिता का नाम पाराशर व माता का नाम सत्यवती था। कालपी से कुछ दूर पर परासन का गाँव अब भी व्यास पिता की स्मृति जाग्रत किये हैं

 

 

वैदिक ग्रन्थों व महाभारत के अनुसार महर्षि वेदव्यास का जन्म यमुना के संगम तट पर हुआ था। बसंत पंचमी को यमुना नदी व व्यास नदी के संगम स्थान पर प्रतिवर्ष मेले का आयोजन श्रद्धालुओं के महान आकर्षण का केन्द्र हैं। पुराणों के वर्णन से यह ज्ञात होता है कि कालपी का अस्तित्व अति प्राचीन है। महर्षि वेदव्यास की जन्मभूमि कालपी अपना एक गौरवपूर्ण इतिहास रखती है।

 

 

वेदों के रचयिता वेदव्यास जी का जन्म कालपी में हुआ था आज भी बड़े स्थान के पास व्यास टीला बना हुआ है। यहीं पर यमुना में समर्पण करने वाली एक नदी भी दिखाई देती है जिसे व्यास नदी कहते हैं। कालपी में जोंधर नाला के पास व्यास टीला है। कालपी के लोगों की मान्यता है कि व्यास टीला भगवान व्यास का आश्रम स्थान है। यहाँ के लोगों की यह भी मान्यता है कि प्रलयकाल के समय इसी जोंधर नाले के पास से एक मोटी जलधारा निकलेगी जोकि समूचे विश्व को जल मग्न कर देगी। महर्षि वेद व्यास की जन्मस्थली हमीरपुर है।

 

 

उपर्युक्त को दृष्टिगत रखते हुए यह कहा जा सकता है कि भगवान वेदव्यास की जन्मस्थली यह व्यास क्षेत्र है जहाँ पर उन्होंने पुराणों की रचना की है। कवि कथन है

ब्रहम वशिष्ठ पितामह ने रघुराम से है थनुधारी बनाये ।
देवी अरून्धती के संग, तारक पुन्ज के मन्जु निकुन्ज में छाये ॥
वेत्रवती तट पितृ – पराशर ने स्मृति – ज्ञान के गान बहाये ।
जन्म भू कालपी कालिन्दी कूल पै , व्यासजी पंचम वेद लै आये ॥

 

 

कवि द्वारा प्रस्तुत तथ्यानुसार भगवान वेदव्यास का जन्म भी कालपी में हुआ था तथा चारों वेदों के अलावा पाँचवे वेद की मान्यता प्राप्त ‘महाभारत” का सृजन भी कालिन्दी (यमुना) के तट पर ही हुआ। हमीरपुर पहले कालपी के मुहाल में ही सम्मिलित था
और कालपी हमीरपुर के मध्य यमुना नदी के आधार पर मात्र 30 मील का ही अन्तर है। अतः भगवान वेदव्यास का जन्म कालपी में ही मानना तर्कसंगत होगा।

 

 

वेदव्यास का जीवन परिचय

 

भगवान वेदव्यास महर्षि पाराशर व योजनगंधा के पुत्र थे। उनके जन्म के विषय में यह उल्लेख मिलता है कि एक बार धीवर कन्या मत्स्यगंधा जिसे सत्यवती कहते थे को देखकर पाराशर मुनि आसक्त हो गये। दिन में बिहार करना निषिद्ध होने के कारण उन्होंने कुहटा खड़ा कर दिया और मत्स्यगन्धा के शरीर से मत्स्य की दुर्गन्ध को दूर करके सुगन्धित कर दिया जिससे मत्स्यगन्धा योजनगन्धा, कहलाने लगी। व्यासजी, इसी योजनगन्धा सत्यवती के गर्भ से उत्पन्न पुत्र हैं। नदी के बीच एक टापू पर जन्म होने के कारण इन्हें “द्वैपायन” तथा काला रंग (वर्ण) होने के कारण “कृष्ण ” कहते हैं। स्वय भगवान विष्णु पराशर ऋषि के पुत्र रूप में द्वैपायन नाम से उत्पन्न हुए अतः “यस्य द्वैपायनः पुद्रः स्वयं विष्णु रजायत ।

 

 

वेदव्यास जी के जन्म के समय एवं स्थिति का यह भी विवरण मिलता है कि ऋषि पाराशर ने कोहरे के मध्य सत्यवती की अनुकूलता पाकर यमुना में स्नान किया एवं वहां से तुरन्त पधार गये सत्यवती भी अपने पिता के घर लौट गयी। उसी क्षण उसे गर्भ
रह गया। समयानुसार सत्यवती ने यमुना के द्वीप में ही पुत्र उत्पन्न किया।

 

 

एक अन्य कथानुसार मत्स्यगन्धा ने ऋषि पाराशर से सुगन्ध का वर पाकर हर्षोल्लास से भरकर ऋषि पराशर का संयोग प्राप्त किया और तत्काल ही एक पुत्र को जन्म दिया। यमुना के द्वीप में अत्यन्त शक्तिशाली पाराशर नन्दन व्यास प्रकट हुए। वे बाल्यावस्था में ही यमुना के द्वीप में छोड़ दिये गये थे इसलिए ‘द्वैपायन’ नाम से प्रसिद्ध हुए। अतः

 

इति सत्यवती हृष्टा लब्धवा वरमनुत्तमम्‌
पराशरेण संयुक्ता सद्यो गर्भ सुषाव सा
जज्ने च यमुना द्वीपे पराशर्यः स वीर्यवान ॥
स॒मातरमनुज्ञाप्प तपस्येय मनो दथे ।
स्पृतोड हं दर्शयिष्यामि कृत्योष्षिति च सोउब्रबीत्‌ ॥
एवं द्वैपायनों जज्ञे सत्यवत्यां पराशरातू ।
न्यस्तो द्वीप स यद्‌ बालस्तस्माद्‌ दैपायन स्मृत
ततः सत्यवती हृष्ण जग़ाम स्व॑ निवेशनम ।
महर्षि वेद व्यास का जन्म यमुना के संगम तट पर हुआ था। महर्षि वेदव्यास जी का जन्म यमुना जोंधर नदी व्यास गंगा व यमुना नदी के संगम पर हुआ था अतः
व्यास जन्म सरित्कृष्ण बल्लभासंड्र में तुय।।
दीपाच्ज्यालयेत भक्तया बहमलतोक भवषुयाता।।

 

कालपी में अष्टांगयोग, सांख्य तथा पुरश्चरणादि की सिद्धि क्षणमात्र में हो जाती है। यहीं पर वासवी (सत्यवती) ने पाराशर से ब्रहमसूत्र के रचने वाले तथा भारतादि पुराणों के बनाने वाले वेदव्यास जी को पुत्र रूप से पाया था। जो कि निम्नानुसार है –

 

अष्टाडस्य च साख्यस्य पुरश्चर्यादे सत्कृते:।
क्षणेनेकेन संसिद्धिः कालप्यां जायते ध्रुवम ॥
ब्रहमसूत्रप्रणतार कर्तारम्‌ भारतादिकान ।
वेदव्यासं सुतं लेभे बासत्यत्न पराशरात्‌ |

शिवपुराण में भी वेदव्यास के जन्म के विषय का कथानक वर्णित है।

 

 

हमारे यह लेख भी जरूर पढ़े:—-

 

चौरासी गुंबद कालपी
चौरासी गुंबद यह नाम एक ऐतिहासिक इमारत का है। यह भव्य भवन उत्तर प्रदेश राज्य के जालौन जिले में यमुना नदी
श्री दरवाजा कालपी
भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के जालौन जिले में कालपी एक ऐतिहासिक नगर है, कालपी स्थित बड़े बाजार की पूर्वी सीमा
रंग महल कालपी
उत्तर प्रदेश राज्य के जालौन जिले के कालपी नगर के मिर्जामण्डी स्थित मुहल्ले में यह रंग महल बना हुआ है। जो
गोपालपुरा का किला जालौन
गोपालपुरा जागीर की अतुलनीय पुरातात्विक धरोहर गोपालपुरा का किला अपने तमाम गौरवमयी अतीत को अपने आंचल में संजोये, वर्तमान जालौन जनपद
रामपुरा का किला
जालौन  जिला मुख्यालय से रामपुरा का किला 36 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। 46 गांवों की जागीर का मुख्य
जगम्मनपुर का किला
उत्तर प्रदेश राज्य के जालौन जिले में यमुना के दक्षिणी किनारे से लगभग 4 किलोमीटर दूर बसे जगम्मनपुर ग्राम में यह
तालबहेट का किला
तालबहेट का किला ललितपुर जनपद मे है। यह स्थान झाँसी - सागर मार्ग पर स्थित है तथा झांसी से 34 मील
कुलपहाड़ का किला
कुलपहाड़ भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के महोबा ज़िले में स्थित एक शहर है। यह बुंदेलखंड क्षेत्र का एक ऐतिहासिक
पथरीगढ़ का किला
पथरीगढ़ का किला चन्देलकालीन दुर्ग है यह दुर्ग फतहगंज से कुछ दूरी पर सतना जनपद में स्थित है इस दुर्ग के
धमौनी का किला
विशाल धमौनी का किला मध्य प्रदेश के सागर जिले में स्थित है। यह 52 गढ़ों में से 29वां था। इस क्षेत्र
बिजावर का किला
बिजावर भारत के मध्यप्रदेश राज्य के छतरपुर जिले में स्थित एक गांव है। यह गांव एक ऐतिहासिक गांव है। बिजावर का
बटियागढ़ का किला
बटियागढ़ का किला तुर्कों के युग में महत्वपूर्ण स्थान रखता था। यह किला छतरपुर से दमोह और जबलपुर जाने वाले मार्ग
राजनगर का किला
राजनगर मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में खुजराहों के विश्व धरोहर स्थल से केवल 3 किमी उत्तर में एक छोटा सा
पन्ना के दर्शनीय स्थल
पन्ना का किला भी भारतीय मध्यकालीन किलों की श्रेणी में आता है। महाराजा छत्रसाल ने विक्रमी संवत् 1738 में पन्‍ना
सिंगौरगढ़ का किला
मध्य भारत में मध्य प्रदेश राज्य के दमोह जिले में सिंगौरगढ़ का किला स्थित हैं, यह किला गढ़ा साम्राज्य का
छतरपुर का किला
छतरपुर का किला मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में अठारहवीं शताब्दी का किला है। यह किला पहाड़ी की चोटी पर
चंदेरी का किला
भारत के मध्य प्रदेश राज्य के अशोकनगर जिले के चंदेरी में स्थित चंदेरी का किला शिवपुरी से 127 किमी और ललितपुर
ग्वालियर का किला
ग्वालियर का किला उत्तर प्रदेश के ग्वालियर में स्थित है। इस किले का अस्तित्व गुप्त साम्राज्य में भी था। दुर्ग
बड़ौनी का किला
बड़ौनी का किला,यह स्थान छोटी बड़ौनी के नाम जाना जाता है जो दतिया से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर है।
दतिया महल या दतिया का किला
दतिया जनपद मध्य प्रदेश का एक सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक जिला है इसकी सीमाए उत्तर प्रदेश के झांसी जनपद से मिलती है। यहां
कालपी का किला
कालपी का किला ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अति प्राचीन स्थल है। यह झाँसी कानपुर मार्ग पर स्थित है उरई
उरई का किला और माहिल तालाब
उत्तर प्रदेश के जालौन जनपद मे स्थित उरई नगर अति प्राचीन, धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व का स्थल है। यह झाँसी कानपुर
एरच का किला
उत्तर प्रदेश के झांसी जनपद में एरच एक छोटा सा कस्बा है। जो बेतवा नदी के तट पर बसा है, या
चिरगाँव का किला
चिरगाँव झाँसी जनपद का एक छोटा से कस्बा है। यह झाँसी से 48 मील दूर तथा मोड से 44 मील
गढ़कुंडार का किला
गढ़कुण्डार का किला मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ जिले में गढ़कुंडार नामक एक छोटे से गांव मे स्थित है। गढ़कुंडार का किला बीच
बरूआ सागर का किला
बरूआ सागर झाँसी जनपद का एक छोटा से कस्बा है। यह मानिकपुर झांसी मार्ग पर है। तथा दक्षिण पूर्व दिशा पर
मनियागढ़ का किला
मनियागढ़ का किला मध्यप्रदेश के छतरपुर जनपद मे स्थित है। सामरिक दृष्टि से इस दुर्ग का विशेष महत्व है। सुप्रसिद्ध ग्रन्थ
मंगलगढ़ का किला
मंगलगढ़ का किला चरखारी के एक पहाड़ी पर बना हुआ है। तथा इसके के आसपास अनेक ऐतिहासिक इमारते है। यह हमीरपुर
जैतपुर का किला या बेलाताल का किला
जैतपुर का किला उत्तर प्रदेश के महोबा हरपालपुर मार्ग पर कुलपहाड से 11 किलोमीटर दूर तथा महोबा से 32 किलोमीटर दूर
सिरसागढ़ का किला
सिरसागढ़ का किला कहाँ है? सिरसागढ़ का किला महोबा राठ मार्ग पर उरई के पास स्थित है। तथा किसी युग में
महोबा का किला
महोबा का किला महोबा जनपद में एक सुप्रसिद्ध दुर्ग है। यह दुर्ग चन्देल कालीन है इस दुर्ग में कई अभिलेख भी
कल्याणगढ़ का किला मंदिर व बावली
कल्याणगढ़ का किला, बुंदेलखंड में अनगिनत ऐसे ऐतिहासिक स्थल है। जिन्हें सहेजकर उन्हें पर्यटन की मुख्य धारा से जोडा जा
भूरागढ़ का किला
भूरागढ़ का किला बांदा शहर के केन नदी के तट पर स्थित है। पहले यह किला महत्वपूर्ण प्रशासनिक स्थल था। वर्तमान
रनगढ़ दुर्ग या जल दुर्ग
रनगढ़ दुर्ग ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रतीत होता है। यद्यपि किसी भी ऐतिहासिक ग्रन्थ में इस दुर्ग
खत्री पहाड़ का दुर्ग व मंदिर
उत्तर प्रदेश राज्य के बांदा जिले में शेरपुर सेवड़ा नामक एक गांव है। यह गांव खत्री पहाड़ के नाम से विख्यात
मड़फा दुर्ग
मड़फा दुर्ग भी एक चन्देल कालीन किला है यह दुर्ग चित्रकूट के समीप चित्रकूट से 30 किलोमीटर की दूरी पर
रसिन का किला
रसिन का किला उत्तर प्रदेश के बांदा जिले मे अतर्रा तहसील के रसिन गांव में स्थित है। यह जिला मुख्यालय बांदा
अजयगढ़ का किला
अजयगढ़ का किला महोबा के दक्षिण पूर्व में कालिंजर के दक्षिण पश्चिम में और खुजराहों के उत्तर पूर्व में मध्यप्रदेश
कालिंजर का किला
कालिंजर का किला या कालिंजर दुर्ग कहा स्थित है?:--- यह दुर्ग बांदा जिला उत्तर प्रदेश मुख्यालय से 55 किलोमीटर दूर बांदा-सतना
ओरछा दर्शनीय स्थल के सुंदर दृश्य
शक्तिशाली बुंदेला राजपूत राजाओं की राजधानी ओरछा शहर के हर हिस्से में लगभग इतिहास का जादू फैला हुआ है। ओरछा

write a comment