लाल किला किसने बनवाया – लाल किले का इतिहास और तथ्य

यमुना नदी के तट पर भारत की प्राचीन वैभवशाली नगरी दिल्ली में मुगल बादशाद शाहजहां ने अपने राजमहल के रूप में दिल्ली के लाल किले का निर्माण कराया था। इससे पूर्व आगरे का प्रसिद्ध किला मुगल वंशीय बादशाहों द्वारा निर्मित हो चुका था परन्तु शाहजहां ने दिल्‍ली नगरी में मुख्य रूप से निवास करने की दृष्टि से सन 1638 में लाल किले के निर्माण का कार्य प्रारम्भ कराया। लाल किले के निर्माण का कार्य लगभग 10 वर्षों तक चलता रहा। राज्य भवनों के वैभव और सौंदर्य की दृष्टि से यह किला भारत में विशेष ख्याति पाता है। जिस समय मुगल साम्राज्य अपने यौवन के उभार में था उस समय शहंशाह जैसे भव्य भवनों के निर्माता ने इस दुर्ग में सुन्दर से सुन्दर भवन बनवाने में अपने शक्ति लगाई।

लाल किला के सुंदर दृश्य
लाल किले के सुंदर दृश्य

 

कहा जाता है कि जब मुगल सम्राट शाहजहां का मन आगरा में
न लगा उस समय उसने यमुना तट दिल्ली में शाहजहांनाबाद
नाम से एक नगरी बसाई ओर वहीं पर लाल किला नाम से एक विशाल राजमहल का निर्माण कराया। उस राज महल को सुरक्षित
करने के लिये उसके चारों ओर लाल पत्थर की सुदृढ़ प्राचीर बनवाई गई और इस प्रकार इस राज महल ने भारत की राजधानी दिल्ली में एक विशाल किले का रूप धारण कर लिया।

 

दिल्ली लाल किला में स्थित भवन

 

लाल किला नक्कारखाना

लाहौर गेट से चट्टा चौक तक आने वाली सडक से लगे खुले मैदान के पूर्वी ओर नक्कारखाना है । यह संगीतज्ञों हेतु बने महल का मुख्य द्वार है । जहाँ संगीत कला का आयोजन होता था।

दीवान-ए-आम लाल किला

इस गेट के पार एक और खुला मैदान है जो कि मूलतः दीवान-ए-आम का प्रागंण हुआ करता था । यहाँ बादशाह के लिए भव्य सिंहासन बना है।यहाँ बादशाह जनसाधारण की शिकायतों का निवारण करते थे। इसकी सुंदर कलाकृति अद्भुत है।

नहर-ए-बहिश्त लाल किला

राजगद्दी के पीछे की ओर शाही नीजि कक्ष स्थापित है । इस क्षेत्र में पूर्वी छोर पर ऊचे चबूतरे पर बने गुम्बद्दार इमारतों की कतार है । जिनसे यमुना नदी का किनारा दिखाई पड़ता है। यह मण्डप एक छोटी नहर से जुड़े है । जिसे नहर-ए-बहिश्त कहते है। जो सभी कक्षों के मध्य से जाती है । किले के पूर्वोत्तर छोर पर बने शाह बुर्ज पर यमुना से पानी चढाया जाता है जहाँ से इस नहर को जल आपूर्ति होती है।

जनाना

महल के दो दक्षिणवर्ती कक्ष महिलाओं हेतु बने है । जिन्हें जनाना कहते है।

मुमताज महल

जिस भवन में इस समय संग्रहालय ( म्यूजियम ) है वह मुमताज बेगम का महल कहलाता था। इस संग्रहालय में मुगल बादशाहों के बहुत से शस्त्र, उनकी अनेक पोशाकें, विविध चित्र तथा अन्य प्रकार को बहुत सी सामग्री सुरक्षित है।

रंग महल लाल किला

 

इसके निकट ही शाहजहां ने ‘रंग महल’ बनवाया था। शाहजहां ने इसकी छतों को सोने चांदी के फूलो से सुसज्जित कराया था। इसी में उसने कमल फव्वारा भी निर्मित कराया था जिसमें यमुना का पवित्र शीतल जल बेगमों और शाही परिवार के साथ किसी समय उछल उछल कर क्रीड़ा किया करता था। इस फब्बारे का निर्माण संगमरमर द्वारा कराया गया था। रंग महल में बेगमों के स्नान के लिये एक सुन्दर हमाम ( स्नानागार ) भी बनवाया गया था जिसमें सुगंधित इत्र और सुगंधित जल की सुगंधि महका करती थी। इस रंग महल में बेगमों के साज सिंगार की प्रत्येक सामग्री विद्यमान रहती थी। रंग महल में बेगमों को मनोविनोद की सभी वस्तुएं प्राप्त थी। रंग महल के दूसरी ओर के मैदान में मुगल काल में हाथियों का युद्ध हुआ करता था। बादशाह और उसकी बेगमें उसे देखने के लिये यहां बैठा करती थी।

 

खास महल

शाहजहां की बेगमों के रानीवास को अंग्रेजों ने तोड़फोड़ कर सैनिकों के लिये प्रयुक्त किया। सबसे पहले इन रानीवासो को नादिरशाह बादशाह ने लुटवाया। इसके पश्चात्‌ अंग्रेजों ने रही सही सम्पत्ति की लूट कराई। अंग्रेज़ सेनापतियों ने इस किले को सेना का सुरक्षित स्थान बनाकर इसका प्रयोग किया।

दीवान-ए-खास

महल खास के पीछे दीवाने खास बनाया गया था। लाल किले के समस्त भवनों में यह भवन अपनी कला का अनोखा नमूना समझा जाता हैं। इसे ऊंचे स्थान पर संगमरमर से बनवाया गया है। इसमें दूसरे मूल्यवान पत्थरों की भी अधिकता है। इसके मध्य में बत्तीस स्तम्भ हैं जिन पर सुन्दर पिचचकारी का काम किया गया है। इसकी सुन्दरता पर मुग्ध होकर एक फारसी कवि ने लिखा है- पृथ्वी पर यदि कहीं स्वर्ग है तो यही पर है।

दीवाने खास में स्फटिक पत्थर की एक बड़ी शिला है। इस शिला पर बादशाह का प्रसिद्ध म्यूर सिंहासन रखा रहता था जिसे सन्‌ 1739 में नादिरशाह दिल्ली की लूट के माल के साथ फारस ले गया। दीवाने खास में ही दोपहर के समय बादशाह विश्राम किया करते थे ओर यहीं पर थे अपने सलाहकारो के साथ मंत्रणा भी करते थे। इस मंत्रणा में केवल वे ही व्यक्ति भाग लेते थे जिन पर बादशाह का पूरा विश्वास होता था। सायंकाल के समय इसी स्थान पर अदालत भी बैठती थी।

जामा मस्जिद दिल्ली का इतिहास

हमाम

अगला कक्ष हमाम के नाम से जाना जाता है जोकि राजसी स्नानागार था । यह कक्ष तूर्की शैली में बना है । इसमें संगमरमर मे मुग़ल अलंकरण एवं रंगीन पाषाण भी जड़ें है।

मोती मस्जिद

हमाम के पश्चिम में मोती मस्जिद बनी है । यह सन 1659 में औरंगजेब ने बनवाई थी । यह औरंगजेब की नीजि मस्जिद थी । यह एक छोटी सी तीन गुम्बद वाली मस्जिद है जिसे संगमरमर से तराशा गया है । इसका मुख्य फलक तीन महराबों से युक्त है । जोकि आंगन में उतरता है जहाँ फूलों का बागीचा है।

हयात बख्श बाग़

मस्जिद के उत्तर में औपचारिक उध्धान है जिसे हयात बख्श बाग़ कहते है। इसका अर्थ है जीवनदायी उध्धान। यह दो शासन काल में बनाया गया है एवं एक तीसरा बाद में अंतिम मुग़ल सम्राट बहादुरशाह जफ़र द्वारा 1842 में बनवाया था।

तोपों की व्यवस्था

 

लाल किले की बाहरी चारदीवारी में तोपों के लगाये जाने की
व्यवस्था थी। जिस मुगलकाल में लाल किले का निर्माण किया गया उस समय भारत में तलवार और तोप के गोले ही सबसे बड़े शस्त्र समझे जाते थे। अतः तोपों की व्यव॒स्था उस समय सबसे बड़ी सुरक्षा समझी जाती थी। लाल किसे में तोपों के चलाये जाने के लिये जो बड़े बड़े छेद बनाये गये थे, वे अभी तक सुरक्षित दिखाई पड़ते हैं। दुर्ग की सुरक्षा के लिये उसमें चारो ओर खाई की भी व्यवस्था की गई थी। मुख्य द्वार पर दुर्ग रक्षक रहा करते थे और शेष भाग में गहरी खाई में जल भरा रहता था परन्तु समय के परिवर्तन से अब इसकी सुरक्षा का स्वरूप ही वदल गया। इस परमाणु बम के युग में तोपों की कौन गणना करता है।

 

 

लाल किला की निर्माण कला

 

मुगल सम्राट शाहजहां ने लाल किले का निर्माण कराया था। उसके समय के भवनों में मुगल-कला का प्रचलन हो चुका था। आगरा के दुर्ग के समान लाल किले के दीवाने आम ओर दीवाने खास में भी मुस्लिम कला का पूर्ण प्रभात प्रकट हो रहा है। परंतु फिर भी इन दुर्गों में भारतीय कला का पुट काफी मात्रा में देखा गया है। बाहरी रूप रेखा से ये दुर्ग इस्लामी कला के प्रतीक होते हैं परन्तु आन्तरिकि रूप में इनके निर्माण में भारतीय कला की झलक दिखाई पड़ती है। कमल फब्बारें का निर्माण भारतीय कला का एक उत्कृष्ट नमूना है।

 

लाल किला के ऐतिहासिक तथ्य

 

 

शाहजहां के जीवन काल में ही मुगल सम्राट औरंगजेब ने लाल किले पर अपना अधिकार कर लिया था। जबकि उसने अपने पिता शाहजहां को आगरा दुर्ग मे बंदी कर दिया था। और सन्‌ 1658 में दिल्ली आकर विधिवत अपना रज्याभिषेक किया। औरंगजेब ने राज्याभिषेक के अवसर पर अबुल मुज्जफर मुईन उद्दीन मौहम्मद औरंगजेब बादशाह गाजी की उपाधि धारण की। औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात कई मुगल वंशीय बादशाह ने दिल्ली पर अपना अधिकार रखा परन्तु वे बहुत थोड़े ही समय तक शासन कर पाये।

सन्‌ 1719 में मोहम्मद शाह दिल्‍ली का सम्राट बनाया गया। उसमें शासन चलाने की कोई विशेष योग्यता न थी। वह एक प्रकार से विवेकहीन शासक था। उसकी सेना में किसी प्रकार का नियंत्रण न था और वह किसी बाहरी आक्रमण की रोकथाम करने की समता भी नहीं रखती थी। ऐसी स्थिति मे ईरान के शासक नादिरशाह ने सन्‌ 1739 में भारत पर आक्रमण कर दिया।नादिरशाह ने यद्यपि अपना आधिपत्य एक साधारण लुटेरे के रूप में स्थापित किया था परन्तु उधर भारत में एकता का अभाव हो चला था अतः उसे भारत में बढ़ने का समुचित अवसर प्राप्त हो गया। उस समय मुगल शासक ने अपनी सीमा की सुरक्षा का समुचित प्रबन्ध नहीं किया हुआ था। अतः नादिरशाह पेशावर तथा लाहौर पर आसानी से विजयी हो गया।

मौहम्मद शाह ने अपने मंत्री निजामुल मुल्क को नादिरशाह का सामना करने के लिए भेजा परन्तु उसकी अस्तवयस्त सेना पराजित हो गई और इस प्रकार नादिरशाह दिल्ली नगर में घुस आया। उसने अपना निवास दीवाने खास में बनाया। इसके पश्चात उसने दिल्ली में लगातार पांच घंटे तक कत्लेआम करवाया। इतिहासकारों का कहना है कि वह यहां से 15 करोड़ रुपया असंख्य हीरे जवाहरात, कोहेनूर हीरे सहित, शहंशाह का तख्ते ताऊस (म्यूर सिंहासन) 10 हजार घोड़े, 10 हजार ऊंट तथा 300 हाथी लेकर ईरान वापिस चला गया। इस आक्रमण से मुगल साम्राज्य को आर्थिक स्थिति बिगड़ गई। राजकोष रिक्त हो गया और सैनिक शक्ति भी घट गई। उसी समय लाल किले का वैभव उसकी राज्यश्री भी क्षीण हो गई।

उस अराजकता और शक्तिहीनता के समय में अफगानिस्तान के शासक अहमदशाह अब्दाली ने भी भारत पर आक्रमण किये।
उसने सन 1748 और 1761 के बीच में भारत पर सात बार
आक्रमण किये। इन आक्रमण का परिणाम यह हुआ कि मुगलों
की रही सही शक्ति का भी विनाश हो गया। ऐसी दशा में दिल्ली
पर केवल मुग़ल शासकों का ही अधिकार न रह गया था। कभी मराठे और कभी रोहेले, अफगान इस पर अपना अधिकार कर लेते थे। इस प्रकार इस काल में लाल किले का गौरव भी स्थिर न रह सका। दशा यहां तक बिगडी कि मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय ने सन्‌ 1764 में अंग्रेजों का प्रभुत्व स्वीकार कर लिया ओर वह उनकी शरण में आ गया। उस काल में लाल किला और पुराना दुर्ग दोनों ही सैनिक गतिविधि के केन्द्र बने रहे।

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ मे 1806 में अग्रेजों ने लाल किले पर अपना अधिकार कर लिया। उस समय शाहआलम द्वितीय की मृत्यु हो चुकी थी और अकबर द्वितीय मुगल शासक बन गया था। इसके पश्चात्‌ बहादुर शाह ने मुगल गद्दी को संभाला ओर वह लाल किले में रहने लगा। परन्तु वह एक प्रकार से अंग्रेजों के आधीन था। जिस समय 1857 का विद्रोह प्रारम्भ हुआ ते बहादुर शाह सम्राट घोषित किया गया और उसकी बेगम जीनत महल को भारत की साम्राज्ञी कहलाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। परन्तु अंग्रेजों की सेनाओं ने धीरे धीरे दिल्ली के विद्रोह को दबा दिया, बहादुरशाह अवसर पाकर हुमायूं के मकबरे में जा छिपा। इलाही बख्स मिर्जा ने जो उस समय अग्रेजों से मिला हुआ था, बहादुर शाह को प्रेरणा की कि वह अग्रेजों के सम्मुख आत्मसमर्पण करदे । उसने इलाही बख्स मिर्जा की बात को स्वीकार कर के कैप्टन हडसन के सम्मुख आत्मसमर्पण कर दिया। हडसन ने बहादुरशाह के पुत्र बख्तखां तथा अन्य दो पुत्रों को नंगा करके गोली से भून दिया। कहा जाता है कि उसने अपनी इस विजय पर मस्त होकर उनका रक्त-पात किया।

 

 

मुगलों की इस पराजय के पश्चात्‌ अब यह किला अंग्रेंजों के पूर्ण आधिपत्य में आ गया। उन्होने इसे अपनी सेना का मुख्य केन्द्र बना दिया। इंग्लैंड में 1857 के विद्रोह का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व ईस्ट इंडिया कम्पनी पर रखा गया। अतः कम्पनी का अन्त कर दिया गया। शासन का सम्पूर्ण अधिकार इंग्लेंड की महारानी विक्टोरिया ने अपने हाथ मे ले लिया। इसके पश्चात्‌ 1858 में एक दरबार किया गया और उसमे लार्ड केनिंग ने महारानी विक्टोरिया का घोषणा पत्र पढ़ा। इसके पश्चात्‌ भारत में सर्वत्र शांति स्थापित हो गई। 1911 ई० में इस लाल किले के भाग्य फिर जागे जब भारत मे ब्रिटिश साम्राज्य की पूर्ण छाप लगाने के लिये इंग्लैंड के सम्राट जार्ज पंचम का दिल्‍ली में राज्याभिषेक हुआ। उस समय बादशाह जार्ज पंचम ने अपनी रानी मेरी के साथ किले के एक सुन्दर सुसज्जित स्थान पर खड़े होकर जनता को दर्शन दिये।

 

 

लाल किला ऐतिहासिक मुकदमों का गवाह

 

इतिहास इस बात का साक्षी है कि लाल किले में अन्तिम मुगल बादशाह बहादुर शाह के अभियोग की सुनवाई हुई थी। जिस समय मई 1857 की महान क्रान्ति (विद्रोह) प्रारम्भ हुई उस समय मेरठ से कुछ सेनाएं बहादुर शाह की सेनाओं के साथ मिलकर अग्रेज़ों को भारत से बाहर निकालने के लिये दिल्‍ली आई थीं। इस विद्रोह के शान्त हो जाने पर जब अंग्रेजों ने दिल्‍ली पर अपना पूर्ण प्रभुत्व स्थापित कर लिया उस समय बहादुर शाह को उन्होने नजर बंद कर दिया। जनवरी सन्‌ 1858 में बहादुर शाह के विरुद्ध ईस्ट इंडिया कम्पनी ने निम्न आशय का अभियोग लगाया:–.

 

  1. कि उसने भारत में अंग्रेजी सरकार से पेंशन प्राप्त करते हुये भी दिल्‍ली में 10 मई से 1 अक्तूबर 1857 तक विभिन्न अवसरों पर पैदल सेना के सूबेदार मुहम्मद बख्त खाँ व अन्य अधिकारियों तथा सैनिकों को अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध विद्रोह करने के लिये प्रोत्साहित किया व सहायता दी।
  2.  कि उसने दिल्ली में 10 मई से 1 अक्तूबर 1857 के बीच विभिन्न अवसरों पर अपने दी पुत्र मिर्जा मुगल तथा दिल्‍ली व उत्तर पश्चिमी सीमा प्रान्त के अन्य निवासियों को सरकार के विरुद्ध युद्ध करने के लिये भड़काया और सहायता दी।
  3. कि उसने, भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की प्रजा होते हुए तथा अपने कर्तव्य को न निभाते हुए, 11 मई सन्‌ 1857 व इसके आसपास, शासन के विरुद्ध गद्दार के रूप में अपने को भारत का बादशाह घोषित किया तथा उसी समय दिल्‍ली पर अपना अधिकार जमा लिया। साथ ही 10 मई से 1 अक्टूबर 1857 के बीच में अपने पुत्र मिर्जा मुगल व सूबेदार मुहम्मद बख्त खाँ के साथ शासन के विरुद्ध लडाई व विद्रोह करने की मंत्रणा की तथा चौथ (लगान) वसूल किया और अंग्रेजी साम्राज्य को उलट फेकने के लिये दिल्‍ली में हथियार बन्द फौजें इकट्ठा की तथा उनको सरकार के विरुद्ध लड़ने के लिये भेजा।
  4. कि दिल्ली में 16 मई 1857 और उसके आसपास राज महल की सीमा में 49 अंग्रेज स्त्री बच्चों का जो कत्ल हुआ उसमें उसका हाथ रहा उसने 10 मई ओर 1 अक्टूबर के बीच समय समय पर ऐसी आज्ञाये जारी की कि जिनके द्वारा भारत से जहा कहीं भी अंग्रेज स्त्री बच्चे तथा ईसाई रहते थे उन्हें अमानुषिक रुप से वध कर दिया जाय और इस अवधि स ऐसे कार्यो को उसकी आज्ञाओं से प्रोत्साहन मिला। इस प्रकार के जुर्म भारत की विधान परिषद्‌ के 1857 के एक्ट 16 के अधीन लगाये गये थे।

 

 

बहादुर शाह की ओर से इन सब आरोप का विस्तृत उत्तर
दिया गया जिसका सारांश इस प्रकार है—-

मुझ इस विद्रोह का उस समय तक कोई ज्ञान नहीं था जब तक कि मेरठ से कुछ सैनिकों ने आकर यह न कहा कि हमने मेरठ
में वहां के समस्त अग्रेंजों का वध कर दिया है। यह बात उन सैनिकों ने उसके महल के समीप आकर कही और उन्होंने यह भी कहा कि यह विद्रोह उन्होने इसलिए किया है कि जो कारतूस उन्हें चलाने के लिये दिये गये उनमें गाय की चर्बी का प्रयोग किया गया था ओर चलाते समय कारतूस दांतों से काटने पडते थे। मैंने यह शोर सुनने पर महल के सभी द्वार बन्द करा दिये और राज महल की सेना के उच्चाधिकारी को तत्काल बुलाया। उस समय मैने इन विद्रोही सैनिको को प्रेरणा की कि वे वापिस चले जाये ओर मेरे
सेनापति ने शान्ति स्थापित करने का प्रयत्न किया। इसी समय दो
अंग्रेंज महिलायें आई जिन्हें महल में शरण दी गई। मेरे सैनिकों के
व्यवस्था स्थापित करने से पूर्व कुछ अंग्रेज महिलाओं का वध कर
दिया गया। इसी समय महल के दीवाने खास में विद्रोही एक बडी
संख्या में एकत्रित हो गये और मैंने उनसे उनका उद्देश्य पूछा और
वहां से चुपचाप चले जाने की प्रेरणा की। उन्होंने मुझसे कहा कि आप चुपचाप रहें और हमारे कार्य को ऐसे ही चलने दें क्योकि
हमने अपने जीवन को देश पर समर्पित कर दिया है। जब मैंने यह
देखा कि मेरे जीवन के लिये भी खतरा देखा तो में वहां से अपने निजी महल को चला गया। कुछ समय पश्चात्‌ विद्रोही कुछ अंग्रेजों को बंदी करके लाये जिनका वे वध करना चाहते थे परन्तु मैंने रोका। एक दो बार मेरे कहने पर वे ऐसा करने से रुक गये परन्तु उसके पश्चात्‌ उन्होंने उन को मार डाला। इस वध से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं था।

 

 

मिर्जा मुगल, मिर्जा खैर सुल्तान, मिर्जा अबुलबकर तथा बसन्त, इन चारों ने मेरे नाम का उपयोग किया होगा परन्तु मुझे इसका कोई ज्ञान नहीं। मैंने मि० फ्रेजा व सेनापति के वध किए जाने की न कोई आज्ञा दी और न मुझे उस वध का कोई पता चला। आगे उन्होंने अपने बयान में कहा है कि जब मिर्जा मुगल, उसके साथी तथा कुछ विद्रोही क्रोध में भरे हुए उसके पास आये तो उन्होंने कह कि हम मिर्जा मुगल को सेनापति बना देना चाहते हैं। मैंने इसे स्वीकार नहीं किया, मिर्जा मुगल अपनी मां के पास महल में पहुँच गया ओर वहाँ भी उसने वहीं जिद की कि वह विद्रोहियों का सेनापति बनकर लड़ेगा। जहां तक मेरी शाही मोहरी के प्रयोग का प्रश्न है मैं इतना कह सकता हूं कि जब विद्रोहियों ने अपना आतंक स्थापित कर लिया तो उन्होंने मुझे अपने अधिकार में लेकर मेरी शाही मोहरों का प्रयोग किया और मुझ से अपनी इच्छानुसार बहुत से कागजों पर हस्ताक्षर कराये। विद्रोही समय समय पर मेरे पास ऐसे कामजात लाते रहे जिन परे हस्ताक्षर करने के लिये मुझे विवश किया गया। कभी कभी उन्होंने मुझ से ही कुछ आज्ञापत्र लिखाये। मुझ से यह भी कहा गया कि यदि तुम ऐसा न करोगे तो हम मिर्जा मुगल को दी अपना बादशाह बना देंगे। इन विद्रोहियों ने अपनी अदालत भी स्थापित कर ली थी जिसमें स्वयं ही ये लोग बहुत से निर्णय करते थे। विद्रोही कत्ल,‌‌ लूट मार तथा लोगों को बंदी बनाने का जो मनमाना कार्य करते रहे उसमे मेरा कोई हाथ नहीं था, में उनके हाथ में एक प्रकार से बंदी बन गया था और मैंने यह इच्छा प्रकट की थी कि मैं राजकाज से हटकर एक गरीब का सा जीवन व्यतीत करू’, मेरा विचार अजमेर शरीफ जाने का हुआ और वहां से मैं मक्का जाना चाहता था। परन्तु विद्रोहियों ने मुझे ऐसा न करने दिया। मैं उनकी लूट में कभी सम्मिलित नहीं हुआ। एक दिन उन्होंने जीनत महल को भी लूटने का प्रयत्न किया परन्तु महल के द्वारो को न खोल सकने के कारण वे सफल न हो सके।

इस मुकदमें में जो मिलिट्री कोर्ट बैठा था उसमें लेफ्टीनेंट कर्नल ढास प्रधान, मेजर पामर, मेजर रेटमंड, मेज़र साय तथा कैप्टन राथने थे। जेम्स मरफी ने दुभाषिया का कार्य किया तथा मेजर हैरियट प्रासीक्यूटर था। मोहम्मद बहादुर शाह जफर ने अपनी पेरवी स्वयं की थी। अदालत ने निर्णय दिया कि बहादुरशाह के विरुद्ध जो आरोप लगाये गये हैं थे सब सत्य हैं और वह उनका दोषी है। बहादुर शाह जफर को अन्त में काले पानी की सजा देकर रंगून भेज दिया गया जहां उसकी सन्‌ 1868 मे मृत्यु हुईं। इस प्रकार अंग्रेजों ने अपनी चालाकी से मुगल साम्राज्य की एक प्रकार से सदैव के लिये समाप्ति कर दी।

इस लाल किले के अन्दर दूसरा ऐतिहासिक अभियोग आजाद
हिन्द सेना के प्रमुख सेनापतियो के विरुद्ध चलाया गया। इसमें
अंग्रेजी सरकार ने कैप्टन शाहनवाज खान, कैप्टन पी० के० सहगल व लेफ्टीनेंट गुरबक्स सिंह ढिल्लन के विरुद्ध अभियोग चलाया गया था। जिसमें इनकी तरफ से पैरवी श्री भूला भाई देसाई के साथ साथ निम्न व्यक्ति भी सफाई पक्ष की ओर से पैरवी पर रहे थे।

1. पंडित जवाहर लाल नेहरू
2. सर तेज बहादुर सप्रू
3. डा० कैलाश नाथ काटजू
4. रायबहादुर बद्री दास
5. स्वर्गीय आसफ अली
6. कुवर सर दलीप सिंह
7. बक्शी सर टेक चन्द
8. श्री पी० एन० सेन
9. श्री इन्द्र देव दुआ
10.श्री राजेन्द्र नारायन
11. श्री नारायण आंदले
12. श्री गोविन्द सरन सिंह
13. श्री जुगल किशोर खन्ना
14. श्री मानक लाल एस वकील
15. श्री सुल्तान यार खां
16. शिव कुमार शास्त्री

 

कैप्टन शाहनवाज ने इस अभियोग में अपना लंबा बयान देते हुए अपने वंश की सैनिक सेनाओ का उल्लेख किया तथा बताया कि 15 फरवरी 1942 की रात्रि को जब हमें सिंगापुर युद्ध में जापानियों के आगे हथियार डालने के लिये अधिकारियों आदेश से विवश किया गया की मुझे घोर निराशा हुई। इसी के साथ साथ युद्ध के सामान्य नियमों के विपरीत भारतीय सैनिकों और अफसरों को ब्रिटिश सैनिको और अफसरों से अलग कर दिया गया जिससे मेरे मन में यह भाव दृढ़ हो गया कि हम भारतीयों को घोर अंधकार में छोड़ दिया जायगा। इसके पश्चात्‌ इस भारतीयों को जापानियों के हाथ में दे दिया गया। वहां से में आजाद हिन्द फौज मे चला गया। मैं यह नहीं कहता कि मैंने सम्राट के विरुद्ध युद्ध नहीं किया परन्‍तु मैंने ऐसा स्वतंत्र भारत की अन्तरिम सरकार की सेना, जिसने मातृभूमि की स्वाधीनता के लिये युद्ध किया, के एक सैनिक होने के नाते किया और इसलिये मैंने ऐसा कोई अपराध नहीं किया जिसके लिये कोर्ट मार्शल या किसी और न्यायालय द्वारा मुकदमा हो। जहां तक दूसरे अभियोग हत्या में सहायता देने का सम्बन्ध है, यदि वह सत्य भी हो तो भी उसके लिये मैं जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

 

कप्टेन पी० के० सहगल ने कहा कि मेरे विरुद्ध जो अभियोग लाये गये हैं मैंने उनमे से कोई भी अपराध नहीं किया है और मेरे विरुद्ध इस न्यायालय द्वारा मुकदमे की सुनवाई अवैधानिक है । 17 फरवरी 1942 को सिंगापुर के फरार पार्क में लेफ्टिनेंट कर्नल हेड ने भारतीय सैनिकों और अधिकारियों को जापानियों के हाथ में सौंप दिया। भारतीय सेना बराबर बहादुरी के साथ युद्ध करती रही थी और उसका हमे यह फल मिलता था। हमने अनुभव किया और सोचा कि ब्रिटिश सरकार ने उन सब वादों को तोड़ दिया है जिनके द्वारा हम ब्रिटेन के सम्राट के साथ गये हुये थे। तथा हमको समस्त जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया है। हम यह सोचते थे कि चू कि ब्रिटिश सरकार हमारी रक्षा करने मे असमर्थ है, इसलिये हम से यह किसी प्रकार के उत्तरदायित्व की आशा नहीं कर सकती।

लेफीनेंट गुरबख्श सिंह ढिल्लन ने अपनी सफाई पेश करते हुए कहा कि मेने जो कुछ किया वह स्वाधीन भारत की अन्तरिम सरकार की नियमानुकूल बनी सेना के एक सैनिक के नाते किया ओर इस कारण मुझ पर किसी भी प्रकार का अभियोग नहीं लगाया जा सकता और न मेरा मुकदमा इडियन आर्मी एक्ट या भारत के क्रिमिनल लॉ के अंतर्गत हो सकता है। इसके अतिरिक्त कोर्ट मार्शल द्वारा मेरा मुकदमा किया जाना अवैधानिक है।

इस मुकदमें में जनरल कोर्ट मार्शल ने निम्न निर्णय दिया तीनों अभियुक्तों के विरुद्ध युद्ध करने का अभियोग साबित हुआ है
जिसके लिये तीनो को काले पानी की सज़ा दी जाय तथा तीनो के
अब तक की सेना के वेतन व भत्ते जप्त किये जाय। कोर्ट मार्शल का निर्णय तब तक मान्य नहीं माना जाता जब तक कि उसकी सम्पुप्टि (कम्फर्मेशन ) न हो जाये। इस मुकदमें में सम्पुष्ठि अधिकारी ( कन्फर्सशन आफिसर ) भारत के प्रधान सेनापति सर आन्चिलेकथे। उन्होने भारतीय लोकमत का आदर करते हुए तीनो अभियुक्तो को प्रथम सजा अर्थात काले पानी की सज़ा से मुक्त कर दिया, परन्तु दूसरी वेतन आदि जप्त किए जाने की सजा बहाल रही।

 

 

लाल किले में तीसरा ऐतिहासिक अभियोग राष्ट्र पिता महात्मा गांधी जी की हत्या का 1948 में सुना गया। महात्मा गांधी जी की हत्या 30 जनवरी 1948 वो सांयकाल 5 बजे बिडला भवन में हुईं थी। गाँधी जी की हत्या के मुख्य अपराधी नाथूराम गोडसे, नारायण आप्टे, विष्णु करकरे, गोपाल गोडसे, दत्तात्रय परचुरे, मदन लाल पहवा, शंकर किसतैया थे। सब मिलकर 12 व्यक्तियों के विरुद्ध यह हत्या अभियोग चलाया गया। इस अभियोग की सुनवाई न्यायाधीश श्री आत्मा चरण के सम्मुख हुई।

 

 

10 फरवरी 1949 को प्रातः 11 बजे न्यायाधीश श्री आत्मा चरण ने अपना निर्णय देंते हुये श्री नाथूराम गोडसे तथा नारायण आप्टे को मृत्यु दण्ड दिया। विष्णु करकरे, गोपाल गोडसे, दत्तातेय परचुरे, मदद लाल पहवा चारों को आजीवन कारावास का दंड दिया। शंकर किसतैया को 7 वर्ष दंड की सिफारिश की।

 

अभियोग की सुनयाई के समय एस दुंडपते, गंगाधर यादव तथा सूर्यदेव शर्मा तीन व्यक्ति फरार थे। श्री विनायक दामोदर सावरकर को मुक्त कर दिया गया | बाडग इकबाली गवाह बन जाने से मुक्त, हो गया। विद्वान न्यायधीश ने अपने निर्णय में प्रगट किया है नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या जान बूझकर और सोच समझकर की। सब अभियुक्त जिन्हें उपरोक्त दंड दिया गया, अपना निर्णय सुनने के लिए क्रमशः खड़े होते रहे। कटघरे से बाहर ले जाने से पूर्व सब ने “हिन्दू धर्म की जय” तोड़ के रहेगें पाकिस्तान” हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान” के नारे भी लगाए। जिससे यह प्रकट होता था कि यह लोग अपनी दूसरी ही विचार धारा रखते थे। न्यायाधीश ने इन सब को अपील करने के लिये पंद्रह दिवस की अवधि दी। इनकी ओर से पंजाब हाईकोर्ट में अपील की गई।

 

 

लाल किला में सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यक्रमों का गवाह भी रहा।

 

दिल्ली के लाल किले मे समय समय पर अनेक सांस्कृतिक तथा सामाजिक समारोह भी होते रहते हैं। देखा जाय तो इस समय लाल किला सैनिक केन्द्र के स्थान में भारत सरकार की अन्य गति विधिया का एक केंद्र सा बन गया है। 26 जनवरी को प्रति वर्ष लाल किले ले में गणराज्य दिवस मनाया जाता है जहां लाखों नर नारी राष्ट्रध्यजारोहण समारोह में सम्मिलित होते हैं। 15 अगस्त को प्रति वर्ष लाखों नर नारी भारतीय स्वतंत्रता की वर्षगांठ मनाने के लिये लाल किले के मैदान में एकत्रित होते हैं। इस अवसर पर स्वतन्त्र भारत के प्रधानमंत्री लाल किले ऐतिहासिक प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हैं। इसके अलावा लाल किला प्रतिदिन देशी विदेशी हजारों पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। आज भी लाल किले पर सम्मान के साथ भारतीय तिरंगा झंडा फहरा रहता है। यदि हम यह कह कि आज लाल किले ने विश्व के ऐतिहासिक भवनों में एक प्रमुख स्थान प्राप्त कर लिया है अत्युक्ति न होगी।

 

 

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