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लाई हरोबा महोत्सव

लाई हरोबा महोत्सव कब, कैसे और क्यों मनाते हैं

लाइ हराओबा या लाई हरोबामणिपुर का प्रमुख जातीय और स्थानीय त्योहार है। मणिपुर की घाटी में बसने वाले मैतेई लोग इस त्यौहार को बहुत धूमधाम से मनाते हैं। लाई हरोबा त्यौहार का प्रारम्भ चैत्र मास से होता है और फाल्गुन मास तक चलता है। किन्तु आषाढ़ सावन अगहन और पौष महीनों में नहीं मनाया जाता। आठ महीने तक मनाया जाने वाला यह संसार का सबसे लम्बा त्योहार है। इसके अनेक भेद भी किए जाते हैं। इस त्यौहार मे स्थान देवता वंश और मनाने के ढंग में और समय में अंतर होने के कारण ही इसके विभिन्न भेद किए जाते हैं। लाइ हराओबा त्यौहार का प्रचलन मणिपुर मे ईसा पूर्व चतुर्थ शताब्दी से माना जाता है। वास्तव में यह अत्यन्त प्राचीन त्यौहार है जो अनंतकाल से मनाया जा रहा है। इसके शाब्दिक अर्थ का तात्पर्य है- लाइ का अर्थ है देवता और हराओबा एक त्यौहार होने के साथ लोकनृत्य लोक नाटय अनुष्ठान और उत्सव भी है। इसमें अनेक तत्वों का समावेश हो गया है।

लाई हरोबा महोत्सव कब और क्यों मनाया जाता है

लाई हरोबा को लाइ हराओबा जगोई (नृत्य) भी कहा जाता है। इसके उद्गभव से जुडी एक लोक कथा प्रचलित है। नी देवता जिन्हें लाइपुड थौ कहा जाता है को स्वर्ग से पृथ्वी पर भेजा गया था। सात लाइनुरा (देविया) जो पानी पर नृत्य कर रही थी ने पृथ्वी को पकड़ा और उसको पानी में फेंक दिया। इस प्रकार सृष्टि हुई। पृथ्वी के निर्माण के बाद अतिया गुरु सिदवा (शिवजी) और देवी लैमरेन (पार्वती) एक घाटी को खोज करते हुए एक पर्वतों से घिरे स्थान पर पहुँचे किंतु उन्होने देखा कि घाटी जल से परिपूर्ण है अतः गुरु सिदबा ने अपने त्रिशूल से पहाडो में तीन छेद किए जिससे घाटी में भरा हुआ जल बह निकला और भूमि निकल आई। इस भूमि पर गुरु सिदबा और देवी लैमारेन ने सात लाइनुरा अर्थात देवियों और उनके सात लाइपुंडथौ अर्थात देवताओं के साथ नृत्य किया था। यह देवताओ की प्रसन्नता का नृत्य था। प्रथम बार देवताओ ने हर्षोंमाद में यह नृत्य किया किंतु उसके बाद लाइ हराओबा जगोइ प्रतिवर्ष एक उत्सव या त्यौहार के रूप में मनाया जाता है और इसका अर्थ देवताओं को प्रसन्न करने हेतु किया जाने वाला नृत्य हो गया है इस प्रकार इसके मूल अर्थ में परिवर्तन हुआ है। यह मणिपुर की सांस्कृतिक धरोहर और प्रतिनिधि नृत्य है।

लाई हरोबा महोत्सव
लाई हरोबा महोत्सव

वास्तव में लाई हरोबा एक मिश्रित नृत्य है, जिसमें विभिन्‍न घटनाओं का सम्मिश्रण हो गया है। इसको पूर्वजों से सम्बन्धित अनुष्ठान भी कहा जा सकता है, क्योंकि पुर्वजो को सम्मान देने के लिए इसका आयोजन किया जाता है। उदाहरणार्थ पाखंगम्बा, थांडर्जि आदि देवताओ की पूजा एवं प्रसन्‍तता के लिए यह उत्सव मनाया जाता है। उम लाइ या वन-देवी देवताओ की प्रसन्नता या येक (वंश), सागे लाइ (वंश-देवी देवता) के लिए भी इसका आयोजन होता है। तात्पर्य यह है कि इसमें पौराणिक देवताओं के साथ वंशों के आदि पुरुषों को भी देवता मानकर यह अनुष्ठान उत्सव मनाया जाता है।

“लाइ-हराओबा” नृत्य अनुष्ठान में मुख्य भूमिका मैतेई पुजारी (माइबा), और पुजारिन (माइबी) की होती है, इन्हें स्त्री-पुरुष के भेद को भुलाकर केवल माइबी भी कहा जाता है। अनुष्ठान का प्रारंभ एक जलूस से होता है जिसके आगे माइबी नृत्य होता है और उनके पीछे बस्ती के लोग चलते हैं और किसी तालाब या नदी के किनारे जाकर रुकते हैं। माइबी जल में सोने या चांदी का चूर्ण डालते हैं और फूल भी। इसके पीछे मान्यता यह है कि वे देवी या देवता की आत्मा को बुलाते हैं। इसके बाद माइबी पर वह आत्मा आती है और माइबी के मुख से स्पष्ट-अस्पष्ट शब्द निकलते हैं, इन शब्दों का अर्थ निकलना जरूरी नहीं है।

जिस समय माइबी इस अचेतन अवस्था में होती है, भविष्य बाणी भी करती है। इस नृत्याभिनय में ब्रह्माण्ड रचना का भाव रहता है। अंगुलियो में विशेष घास (जिसे लाड थ्रै कहते हैं) लेकर माइबी सृष्टि प्रक्रिया को प्रकट करती है। उस समय आँखो और पाँवो की गति भी प्रतीकात्मक होती है। नौडपोक निडथौ और पान्थोइबी (शिव-पार्वती) का अभिनय भी किया जाता है, जिसमें प्रतीकात्मक ढंग से नारी पुरुष मिलन, गर्भ धारण, जन्म आदि की अभिव्यक्ति होती है। कपास बोने चूनने से लेकर वस्त्र बनाने तक की क्रिया प्रकट की जाती है। उसके पश्चात मछली पकडने, कृषि तथा घर बनाने आदि का भी प्रतीकात्मक अभिनव-नृत्य किया जाता है। नृत्य के समय पाँवों की गति मंद होती है और इसमे लय-ताल आदि की ओर उतना ध्यान नहीं दिया जाता है। नृत्य में भाग लेन वाले नर्तक बच्चे से लेकर बूढें तक होते हैं, जो एक वृत्त या अर्ध वृत्त बना लेते हैं।

लाई हरोबा सृष्टि काल से प्रचलित नृत्य है जिसमें सृष्टि की सम्पूर्ण प्रक्रिया प्रतिकात्मक ढंग से दिखाई जाती हैं। यह नृत्य मणिपुरी संस्कृति का सच्चा प्रतिनिधि है। प्रोफेतर एलाडबम नीलकांत सिंह ने इसको मैतेई जाति का वेद और पुराण कहा है। वास्तव में है भी। विशेष उल्लेखनीय बात यह है कि प्रत्येक नर्तक के अंग विशेष वस्त्रों से ढके रहते हैं, जिससे किसी दर्शक या नर्तक के मन में वासनात्मक भावना जागृत न हो। पुरुष धोती और साफा बांधे तथा कुर्ता पहने हुए होते हैं जबकि स्त्रियां “इनफि” नामक पारदर्शक चादर ओढती है तथा कमर में फनेक बाँधती है। विवाहित स्त्रियां सिर ढकती है किन्तु अविवाहित लड़कियां/महिलाएं एक प्रकार का मुकुट धारण करती हैं। इस नृत्य में लास्य मुद्रा में स्त्रियां नाचती हैं जबकि पुरुष ताण्डव में। इस नृत्य अनुष्ठान के अन्त में विभिन्‍न स्थानीय खेल खेलने की परम्परा भी है। लाई हरोबा के अन्तिम दिन ‘ सरोय-खाडबा” नामक पूजा की जाती है। अर्धरात्रि के पश्चात गाँव की स्त्रियां सिर पर टोकरी में चावल फल, फूल और सब्जियां आदि लेकर माइबी के साथ चौराहे पर जाते है, जो गाँव से दूर होता है। माइबी वहां पूजा करती है और यह सारी खाद्य सामग्री भूत प्रेतों को अर्पित करके ये लोग लौट आते हैं। यह विश्वास किया जाता है कि इस पूजा
के परिणाम स्वरूप भूत-प्रेत नही सतायेंगे।

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Naeem Ahmad

CEO & founder alvi travels agency tour organiser planners and consultant and Indian Hindi blogger

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