लखनऊ का दशहरी आम क्या आप जानते है दशहरी आम क्यों प्रसिद्ध है

लखनऊ का दशहरी आम

आम पकने का एक जमाना एक समय होता है और जिसका
सबकों बड़ा इन्तजार रहता है। आम फल ही ऐसा है और आम का
नाम ही बड़ा जायकेदार है। किसी उत्तम फल के तीन गुण होते हैं
स्वाद, सुगन्ध और सद्गुण उस पर वो सुन्दर भी हो तो फिर कहना ही क्या। आम इस कसौटी पर खरा उतरता है। प्रकृति की ये सबसे मधुर भेंट है। लोक कथाओं में कहा जाता है कि जानकी जी अपने मायके मधुवन से ये श्रेष्ठ उपहार लायी थीं और दोनों बातों का अर्थ एक ही है। संस्कृत का सारा साहित्य आम्रकुंज, आम्रमजरियों के मनमोहक सौरभ से सुरभित हैं। यहीं नहीं हमारे लोक रंग में भी अमवा की डाव पर ही भारतीय मन की कोयल कूकती है। आम फलों का राजा भी कहलाता है, लखनऊ का दशहरी आम अपने स्वाद और साइज के लिए बहुत प्रसिद्ध है। यूं तो हिन्दुस्तान में आम की हजारों किसमें है। आज आम की दो किस्मों की बड़ी महिमा है बीजू या कलमी। कहावत है कि वो कौन सा मेवा अर्थात स्वादिष्ट फल है जिसे आदमी उगल-उगल के चाटता रहता है और वो सिर्फ आम है।

 

 

लखनऊ का दशहरी आम जो पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है

 

दशहरी आम का नाम लेते ही मुंह एक स्वर्गिक स्वाद और सुन्दर
सुगंध से भर जाता है। ये दशहरी जो आज संसार का सबसे
लोकप्रिय आम है लखनऊ की ईजाद है या यूं कहें कि लखनऊ का दशहरी आम जनपद के दशहरी गांव की देन है। लखनऊ के पश्चिम में हरदोई मार्ग पर नगर से तेरह किलोमीटर दूर बांयी ओर अंधे की चौकी पड़ती है उसी ओर कुछ दूर पर काकोरी शहीद स्मारक है जो स्वतंत्रता संग्राम के क्रान्तिकारी अभियान का पुनीत ऐतिहासिक स्थल है। यहीं उत्तर रेलवे की हावड़ा अमृतसर लाइन के उस पार डेढ़ किलों मीटर दूर बायीं तरफ दशहरी गांव बसा हुआ है। इस दशहरी गांव में ही वो सदियों पुराना पेड़ है जो दुनिया में दशहरी आम का पहला पेड़ माना जाता है। इस पेड़ के करीब ही महंगा का शाही पुल बना हुआ है। जिसकी उतराई में आम के व्यापारियों को 5-5 आम अपनी टोकरी से देने होते थे। गांव के एक जानकार वयों वृद्ध स्वर्गीय कालिका लोध के अनुसार एक बार झगड़ा हो जाने पर सारे सौदागरों ने अपने-अपने आमों की टोकरियां उलट दी थी और उन से ही एक आम के बीज से ये दरख्त तैयार हो गया था।

 

लखनऊ का दशहरी आम का सबसे प्राचीन पेड़

दशहरी आम का ये पेड़ न बहुत छोटा है और न बहुत बड़ा है
लेकिन खूबसूरत और छतनार है। अब इसका फल पहले की तुलना में कुछ छोटा हो गया है फिर भी गुणों में वैसा ही है। दशहरी के लिए अलग-अलग दास्ताने हैं। लखनऊ के लोगों का कहना है कि नवाब आसफुद्दौला के शासन काल में बड़ें-बड़ें बागबानों की बराबर कोशिशों से कलम लगा कर ये आम इस इलाके में पैदा किया गया जिसमें कई आमों की खूबियों और खुशबू एक साथ गूंध दी गई थी इस काम के लिये फर्रूखाबाद, सहारनपुर और बिहार से आम के काश्तकार बुलाये गये थे कहा जाता है उनमें ही दशरथ नाम के एक किसान ने इस पेड़ को तैयार किया था और उसके ही नाम से ये पेड़ दशरथी कहा जाने लगा जो बाद में दशरही और फिर दशहरी हो गया।

 

लखनऊ का दशहरी आम
लखनऊ का दशहरी आम

 

नवाबों ने ही आम पहले पहल पंजतने पाक की नज़र में रखा।आम की सौगात जब कहीं भेजी जाती थी तो झाबे के ऊपर एक आम नज़र का रखा जाता था और सुनहरे रूपहले वरक में लिपटा होता था। आम बड़ी-बड़ी महफिलों में खास दावतों में बड़ी नफासत के साथ पेश किया जाता था। पहले आम की गर्मी निकाल देने के लिये ये फल चादर में बांधकर कुंए में लटका दिये जाते थे फिर मिट्टी के नांद में पानी में डाले जाते थे अब नये-नये तरीकों से आम ठंडें किये जाते हैं।

 

 

आम मीठे फल के अलावा कच्चे आम, कली खटाई, अमचूर,
अचार और अमरस की सूरत में सालों साल इस्तेमाल होता है अवध के आम लोगों में कहावत है। दाल अरहर की, खटाई आम की तोले भर घी, रसोई राम की। आमों की तारीफ में खूब कसीदें पढ़ें गये है और शेर कहे गये है जैसे जरीफ लखनवी का एक शेर है – तैमूर ने कस्दन कभी लंगड़ा न मंगाया लंगड़ें के सामने, कभी लंगड़ा नहीं आया।

 

 

लखनऊ में दशहरी के ताल्लुकदारों की दशहरी कोठी है जो
झाऊलाल पुल और कचहरी रोड के बीच है और दशहरी हाउस के
नाम से मशहूर है। दशहरी हाउस के नवाब सैयद मुहम्मद असर जैदी साहब बताते थे कि दशहरी गांव और आस-पास का इलाका पहले भरों की सम्पत्ति था मारशिवों का प्रभाव अवध क्षेत्र में सदियों बना रहा है उन्हीं भरों से नवाब साहब के पूर्वजों ने ये गांव खरीदा था। उनके ननिहाल के बुजुर्गों द्वारा नवाब सआदत अली खां के दरबार में और रेजीडेंसी की दावतों में भी ये आम, तोहफें के तौर पर भेजे जाते थे।

 

 

कुद्र काकोरवी ने काकोरी के आम के बागों की रौनक को कुछ
इस तरह कलम बन्द किया है-
आम के बागों में वह, पीना पिलाना याद है
मुद्दतें गुजरी हैं लेकिन, वो जमाना याद है,

काकोरी के इस पेड़ के रखरखाव और बचाव की बातों को
लेकर बहुत सी कहानियां कही जाती हैं जैसे कि फसल के दिनों में
पेड़ पर इतना कड़ा पहरा रखा जाता था कि आदमी क्या कोई तोता भी इसकी गुठली इधर से उधर न ले जा सके। जो भी आम कहीं किसी को भेजे जाते थे सब बर्मा कर दिये जाते थे ताकि उसका बीज कहीं उगा न लिया जाये।

 

 

इस पेड़ की पहली कलम मुहम्मद इमदाद अली खां ने तैयार
की और दशहरी के नवाब ने कुछ कलमें मलिहाबाद अपने दोस्तों के यहां भेजी और और कहना न होगा कि वो कलमें वहां ऐसा पनपी की काकोरी किनारे रह गया और मलिहाबाद दशहरी आमों का डेरा हो गया। मलिहाबाद क्षेत्र में दशहरी खासुलखास के अलावा हुस्न आरा, पुखराज, रामकेला, श्यामसुन्दर, जाफरानी, द्वारिकादास, सीपिया, आम्रपाली से फजली, सफेदा, जौहरी, लखनउवा सफेदा और चौसा जैसे नामी निगरामी आम पैदा किये गये। चौसा जिसकी फलत जरा देर से होती है मलिहाबाद में समर बहिश्त कहा जाता है।

 

 

आमों के नाम रखने का रिवाज भी बहुत पुराना है। औरंगजेब
ने शाहजादा आजम के भेजे हुए दक्षिण के दो प्रकार के आम का नाम उसकी प्रार्थना पर “सुधारस” और “रसना विलास” रखा था। शहद जैसे मीठे रसीले लखनउवा सफेदा की प्रशंसा में तो
प्रसिद्ध कवि पुष्पेन्दु जी का एक सुप्रसिद्ध छन्द है –

लखनऊ का सफेदा और लंगड़ा बनारस का
यही दो आम जग में उत्तम कहाये है
लखनऊ के बादशाह दूध से सिंचायों वाको
वही के वंशज सफेदा नाम पायो है
या से लड़न को बनारस से धायो एक
बीच में ही टूटी टांग ‘लंगड़ा’ कहायो है
कहें पुष्पेन्दु’ वा ने जतन अनेक कीने
तबहुं सफेदे की नज़ाकत न पायो है,

 

 

तो ये है लखनऊ का दशहरी आम की हिस्ट्री। यह लखनऊ का दशहरी आम आज पूरी दुनिया में बहुत प्रसिद्ध है, मलिहाबाद आज इसकी सबसे बड़ी मंडी है। जहां से भारत के कौने कौने और विदेशों तक लखनऊ के दशहरी का का स्वाद पहुंचाया जाता है।

 

 

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लक्ष्मण टीले वाली मस्जिद लखनऊ की प्रसिद्ध मस्जिदों में से एक है। बड़े इमामबाड़े के सामने मौजूद ऊंचा टीला लक्ष्मण
लखनऊ का कैसरबाग अपनी तमाम खूबियों और बेमिसाल खूबसूरती के लिए बड़ा मशहूर रहा है। अब न तो वह खूबियां रहीं
लक्ष्मण टीले के करीब ही एक ऊँचे टीले पर शेख अब्दुर्रहीम ने एक किला बनवाया। शेखों का यह किला आस-पास
गोल दरवाजे और अकबरी दरवाजे के लगभग मध्य में फिरंगी महल की मशहूर इमारतें थीं। इनका इतिहास तकरीबन चार सौ
सतखंडा पैलेस हुसैनाबाद घंटाघर लखनऊ के दाहिने तरफ बनी इस बद किस्मत इमारत का निर्माण नवाब मोहम्मद अली शाह ने 1842
सतखंडा पैलेस और हुसैनाबाद घंटाघर के बीच एक बारादरी मौजूद है। जब नवाब मुहम्मद अली शाह का इंतकाल हुआ तब इसका
अवध के नवाबों द्वारा निर्मित सभी भव्य स्मारकों में, लखनऊ में छतर मंजिल सुंदर नवाबी-युग की वास्तुकला का एक प्रमुख
मुबारिक मंजिल और शाह मंजिल के नाम से मशहूर इमारतों के बीच ‘मोती महल’ का निर्माण नवाब सआदत अली खां ने
खुर्शीद मंजिल:- किसी शहर के ऐतिहासिक स्मारक उसके पिछले शासकों और उनके पसंदीदा स्थापत्य पैटर्न के बारे में बहुत कुछ
बीबीयापुर कोठी ऐतिहासिक लखनऊ की कोठियां में प्रसिद्ध स्थान रखती है। नवाब आसफुद्दौला जब फैजाबाद छोड़कर लखनऊ तशरीफ लाये तो इस
नवाबों के शहर के मध्य में ख़ामोशी से खडी ब्रिटिश रेजीडेंसी लखनऊ में एक लोकप्रिय ऐतिहासिक स्थल है। यहां शांत
ऐतिहासिक इमारतें और स्मारक किसी शहर के समृद्ध अतीत की कल्पना विकसित करते हैं। लखनऊ में बड़ा इमामबाड़ा उन शानदार स्मारकों
शाही नवाबों की भूमि लखनऊ अपने मनोरम अवधी व्यंजनों, तहज़ीब (परिष्कृत संस्कृति), जरदोज़ी (कढ़ाई), तारीख (प्राचीन प्राचीन अतीत), और चेहल-पहल
लखनऊ पिछले वर्षों में मान्यता से परे बदल गया है लेकिन जो नहीं बदला है वह शहर की समृद्ध स्थापत्य
लखनऊ शहर के निरालानगर में राम कृष्ण मठ, श्री रामकृष्ण और स्वामी विवेकानंद को समर्पित एक प्रसिद्ध मंदिर है। लखनऊ में
चंद्रिका देवी मंदिर– लखनऊ को नवाबों के शहर के रूप में जाना जाता है और यह शहर अपनी धर्मनिरपेक्ष संस्कृति के
1857 में भारतीय स्वतंत्रता के पहले युद्ध के बाद लखनऊ का दौरा करने वाले द न्यूयॉर्क टाइम्स के एक रिपोर्टर श्री
इस बात की प्रबल संभावना है कि जिसने एक बार भी लखनऊ की यात्रा नहीं की है, उसने शहर के
उत्तर प्रदेश राज्य की राजधानी लखनऊ बहुत ही मनोरम और प्रदेश में दूसरा सबसे अधिक मांग वाला पर्यटन स्थल, गोमती नदी
लखनऊ वासियों के लिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है यदि वे कहते हैं कि कैसरबाग में किसी स्थान पर
इस निहायत खूबसूरत लाल बारादरी का निर्माण सआदत अली खांने करवाया था। इसका असली नाम करत्न-उल सुल्तान अर्थात- नवाबों का
लखनऊ में हमेशा कुछ खूबसूरत सार्वजनिक पार्क रहे हैं। जिन्होंने नागरिकों को उनके बचपन और कॉलेज के दिनों से लेकर उस
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