रूस में अर्जुन का बनाया शिव मंदिर हो सकता है? आखिर क्या है मंदिर का रहस्य

रूस

संसार के हर हिस्से मे वहां की प्राचीन कला-कृतियों की कोई न
कोई निशानी देखने को मिलती है। उन्हे देखकर हम सहज ही यह अनुमान लगा सकते है, कि प्राचीन कालीन में संसार में रहने वाले लोग आजकल के लोगों से कई बातों में बहुत आगे बढे-चढे हुए थे। पिछले लेखों मे हमें लोगों के जिस ढंग से निर्मित मानव निर्माणों का चित्रण देखने को मिला है, उन्हें देखकर आज के वैज्ञानिक युग के बडे-बडे विज्ञान पंडितों का मस्तिष्क भी चक्कर खाने लग जाता है। प्राचीन रूसी गणतंत्र के कुछ हिस्सों में आज भी उसकी प्राचीनतम कला-कृतियों के अनेक नमूने देखने को मिलते है। उनमें रूस में स्थित रेसट नगर का देव मन्दिर संसार मे आश्चर्य जनक मानवी निर्माणों मे अपना प्रमुख स्थान रखता है। जो रूस का आश्चर्य जनक और वैभव पूर्ण है।

 

रूस में कहा है यह देव मन्दिर

 

प्राचीन रूसी गणराज्य में केस्पियन नाम का एक प्रान्‍न्तर भाग है।
इसी प्रान्तर भाग मे रेसट का प्राचीन नगर बसा हुआ है यही वह प्राचीन देव मन्दिर है, जिसका उल्लेख हम यहां पर कर रहे है।बनावट, सौंदर्य एवं अद्भुत मानवी कला का यह मन्दिर जीवंत उदाहरण है। यह मन्दिर अत्यन्त ही प्राचीन है, परन्तु दुर्भाग्यवश उसमें प्राचीनता के चिन्ह अब वर्तमान नहीं रहे हैं। समय-समय पर इस मन्दिर की मरम्मत होती रही है जिसके कारण धीरे-धीरे प्राचीनता का इसमें से लोप होता गया है। कहते हैं कि काफी समय पूर्व जब रूस में जारशाही की हुकूमत थी उस समय इस मन्दिर के भीतरी भाग को खुदवाने को चेष्टा की गई थी, परन्तु खुदाई करने वालो को सफलता नही मिली। इस कार्य से मन्दिर के आन्तरिक सौंन्दर्य मे कुछ खराबी आ गई, उसके बाद भी कई बार इसकी मरम्मत आदि करवायी गयी जिसके फलस्वरूप इसकी प्राचीनता धीरे धीरे कम होती गई।

 

पश्चिम के राष्ट्रो ने इस मन्दिर को देखकर जो जिज्ञासा प्रकट की
थी, उससे यह स्पष्ट हैं कि वास्तव मे यह मन्दिर बनावट आदि को लेकर विश्व में अपना विशिष्ट स्थान एवं उदाहरण रखता है। उन्होंने कहा है, “ऐसे स्थान पर पर्वत के शिखर पर इतना, विशाल भव्य, सुन्दर तथा शक्तिशाली इमारत का खडा किया जाना, जो सैकड़ों हजारों वर्षो पश्चात्‌ भी उसी शान में खडी है, साधारण मनुष्य के मस्तिष्क का कार्य नहीं है। निश्चय ही किसी अद्वितीय मस्तिष्क के कारीगर की ही यह कृति है!”

 

रेस्‌ट नगर के इस देव मन्दिर की ऊंचाई 40 फीट है। मंदिर के
सभा मंडप मे बीस फीट की ऊंचाई पर मोटे-मोटे लोहे की छड़ों में एक बड़ा सा घंटा लटक रहा है। उसी घंटे पर एक तरफ पाँच पक्तियों में एक लेख खुदा हुआ है। लेख की प्रत्येक पंक्ति मे उन्‍नीस अक्षर है। पर उन अक्षरों की लिखावट का ठीक-ठीक पता नही चल सका है। मन्दिर के चारों तरफ एक चारदीवारी बनी हुई है। चारदीवारी मन्दिर का पुराना हिस्सा है। कहते है कि आज उस मन्दिर के द्वार के किवाड की लकड़ी ऐसी हो गई है कि जरा सा
हाथ में लेकर मसल देने से मैंदे की तरह चिकनी महीन हो जाती है।

 

 

इस देव मन्दिर के बहुत से हिस्सों की पिछले वर्षों मे मरम्मत हुई
है, और इसीलिए इसका बहुत थोडा हिस्सा ही प्राचीन निर्माण कला की याद में बचा हुआ है। परन्तु जो कुछ भी बचा हुआ भाग वर्तमान में है, वह इस बात का पक्‍का सबूत है कि जब यह मन्दिर बना होगा, तो निश्चय ही अपने ढंग का अकेला और अनूठा रहा होगा। वैसे तो आज भी संसार के विभिन्‍न हिस्सों मे कई आश्चर्यजनक देव मन्दिर हैं, और उनके निर्माण में भी अद्वितीय कलाकारी का उद्घोष किया गया है, परन्तु रेसट का यह देव मन्दिर कई बातों में अद्धितीय है। इसकी विचित्रता और महानता की सबसे बडी बात यह हैं कि यह मन्दिर एक ज्वालामुखी पर्वत पर बना हुआ है।

 

 

ज्वालामुखी पर्वत पर एक मन्दिर का निर्माण, वह भी कोई मामूली
साधारण नहीं एक भव्य विशाल इमारत का निर्माण कितने आश्चर्य की बात है, आप इसका अनुमान लगा सकते हैं। रात्रि के अंधकार में उस आग उगलने वाले पहाड से निकलती चिंगारियों से इस मन्दिर मे दिव्य प्रकाश फेल जाता है। रात में इस मन्दिर की शोभा अपूर्व हो जाती है। उस समय के दृश्य को देखकर हृदय मे उल्लास हिलोरे लेने लगता है।

 

रूस का यह देव मन्दिर क्या शिव मंदिर है?

इस मन्दिर के निर्माण काल के सम्बन्ध में कई प्रकार के भ्रम फैले
हुए है. इस मन्दिर मे जो देवताओं की प्रतिमाएं प्रतिष्ठित की गई है वे आर्यो की देव-प्रतिमाओ की भांति ही हैं। मन्दिर के भीतरी तथा बाहरी दीवारों पर अनेक भिन्‍न-भिन्‍न भाव-अभिव्यजनों में देवताओं की मूर्तियों बनी हुई हैं। उन मूर्तियों की बनावट तथा आकृति आर्यो की देव-मूर्तियों के समान ही है। मन्दिर के मध्य भाग में एक पिण्ड है। लोगों का कहना है कि भारतवासियों के शिव-पिण्ड की भांति ही यह पिण्ड है। बनावट आदि बहुत कुछ हिन्दुओं के शिव-पिण्ड से मिलती जुलती है।

 

 

रूस
शिव लिंग

 

इनके अतिरिक्त मन्दिर में विष्णु के चौबीसों अवतारों- कच्छप, मत्स्य आदि की मूर्तियां भी वहां दीवारों पर चित्रित हैं। साथ ही गणपति, भैरव तथा दस-महा-देवियों का भी चित्रण स्पष्ट है। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि किसी जमाने में आर्यों ने ही इस मन्दिर का प्रतिष्ठान किया था। मन्दिर के सिंह द्वार पर एक पत्थर जडा हुआ है। उस पत्थर पर भी घंटे जैसी लिखावट से कुछ पंक्तियों में कोई लेख खुदा हुआ है। उस पत्थर में निर्माण वर्ष सूचक संख्या भी खुदी हुईं है। परन्तु इन लिखावटों का भारत की किसी भी भाषा से मेल नही खाता है। कुछ विद्वानों का तो यहां तक मत है कि महाभारत प्रसिद्ध गाण्डीव धारी अर्जुन ने इस मन्दिर का निर्माण करवाया था। परन्तु ऐतिहासिक तथ्यों के अभाव मे एवं इन अभिलेखों के नहीं पढ़े जा सकने के कारण अभी तक इस बात का पूर्ण रूप से निर्णय नहीं हो पाया है कि वास्तवमें यह मन्दिर कब बना और इसका निर्माण कराने वाला कौन था। इसमें संदेह नहीं कि मन्दिर अत्यन्त ही प्राचीन समय का बना हुआ है।

 

 

एक बार अमरीका निवासी एक पुरातत्त्ववेत्ता ने इस मन्दिर को
देखने के लिये अपनी यात्रा की थी। इसे देखकर वे बहुत ही प्रभावित हुए। उन्होंने अपना विचार व्यक्त करते हुए लिखा कि-‘इस मन्दिर की बनावट अत्यन्त ही प्राचीन है। समय और साधन का ख्याल करके हमे यह कहने के लिए बाध्य होना पडता है कि हजारों-हजारों वर्ष पूर्व भी जिस रचना कौशल का परिचय इसके बनाने वालों ने दिया है, वह आज कल के बडे से बड़े कारीगर के लिए भी संभव नही है। इस मन्दिर में भारतवर्ष के ब्राह्मण द्वारा पूजा कराई जाती है। पूजा की विधियां भी भारत की पूजा-विधियों से बहुत कुछ मिलती ज़ुलती हैं। मन्दिर मे गृहस्थ ब्राह्मण पुजारी नही रह पाता। केवल ब्रह्मचारी ही उस मन्दिर में रहते है और पूजा करते हैं। इस मन्दिर का सारा खर्च इसी इलाके के धनी मानी व्यक्ति वहने करते है । लगातार यहां के लोगों को इसमें पूजा करने के लिये भारतवर्ष से ब्राह्मण को बुलाना पड़ता है।

 

 

अमेरीकी पुरातत्वज्ञानी का यह कथन उन दिनों का है जब कि
रूस मे राजवर्ग का शासन था, जारशाही का बोलबाला था। परन्तु रूस में वोलशेविक क्रान्ति के पश्चात्‌ वहां गणतंत्र राज्य पद्धति कायम हुई, इसके पश्चात सरकार की तरफ से इस मन्दिर के खर्च अथवा पूजा आदि की कोई व्यवस्था नहीं रही। संभवतः मन्दिर के पुजारी रेसट के समीप के निवासियों पर इसके लिये निर्भर करते रहे है, परन्तु इस हेर-फेर से इस मन्दिर की महनता में कोई विशेष अन्तर नही पडा है। उसे देखने के लिए आज भी सैकडो की सख्या में लोग पहुंचते रहते हैं। उसे देखते हैं और उसकी मुक्त कंठ से प्रशसा करते है।

 

 

मंदिर मे प्रतिष्ठित मूर्तियों एवं स्वयं मंदिर के निर्माण से इस बात
की पुष्टि होती है कि अवश्य ही भारतीयों के द्वारा ही विश्व के इस
आश्चर्यजनक भवन का निर्माण हुआ है। प्राचीन काल मे सभ्यता, कला एव संस्कृति मे भारत ने संसार का नेतृत्व किया था, उसी के प्रतीक स्वरूप विभिन्‍न स्थानों पर भारतीय सम्राटों और नरेशों ने संसार के भिन्‍न-भिन्न हिस्सों मे भारतीय देवी-देवताओं के मन्दिर आदि बनवाये होगें। आज भी अर्जेंटीना के सूर्य मन्दिर को देखकर इसी बात की पुष्टि होती है कि वह भी भारतीयो द्वारा ही बनाया गया था। किसी जमाने में उन हिस्सो पर आर्यो का शासन था। कुछ विद्धान तो उस मन्दिर को भी अर्जुन का बनाया गया हुआ ही बताते है।

 

 

मलाया द्वीप के कई हिस्सों मे भी कई विचित्र मन्दिर बने हुए हैं,
जिनमें आर्यों के देवताओं की मूर्तियां स्थापित है। जावा द्वीप में चाडीसेजआ नामक एक जगह है। कहते है कि उस स्थान पर प्राचीन काल मे एक हजार देव मन्दिर थे। समयान्तर में कितने ही ध्वस्त हो गये। अब भी उस स्थान पर 296 देव मंदिरों के चिन्ह पाये जाते है। पेड़ों और जंगलो से मन्दिर के सब अवशेष ढके हुए है। उन अवशेषों को देखकर ही बडे-बडे कारीगरो का सिर चकराने लगता है। उनके निर्माण में इस कुशलता का परिचय दिया गया है कि उन्हे देखने पर प्राचीन काल के कारीगरों की बुद्धि और रचना कौशल पर बडा ही आश्चर्य होता है।

 

विदेशी और भी हो सकते हैं मंदिर?

 

इसी प्रकार बर्मा (म्यांमार आदि में भी कई आश्चर्यजनक प्राचीन
मन्दिर है जिनको कारीगरी को देखकर आश्चर्य होता है। अन्य देशो में भी ऐसे अनेक आश्चर्यजनक प्राचीन मंदिर हैं, जिनमे आर्यो के देवी-देवताओं की मूर्तिया प्रतिष्ठित है। परन्तु इन सभी मन्दिरों में रेसट का देव मन्दिर जिसे हम अपनी धारणा के अनुसार ‘शिव मन्दिर भी कह सकते हैं, संसार के आश्चर्यजनक निर्माणों में से एक है। इस मन्दिर के बनाने में खर्च का अनुमान लगाते हुए एक जर्मन विद्वान कारीगर ने कहा था, “आजकल के उपलब्ध साधनों के होते हुए यदि कही किसी समतल भूमि पर ऐसे मन्दिर का निर्माण हो, तो लगभग तीन करोड रूपये व्यय होंगे। इस पर यह मंदिर तो ज्वालामुखी पर्वत पर बना हुआ है। आजकल के वैज्ञानिक यंत्रों के होते हुए भी उस ज्वालामुखी पहाड़ पर कोई इमारत खड़ी करना सरल कार्य नहीं है।

 

 

रेसट की भूमि मे इस मन्दिर के सम्बन्ध में कई तरह की कथाएं
प्रचलित हैं। परन्तु कहीं भी इस बात का पता नहीं चलता कि इस मन्दिर का निर्माण किसने करवाया था। इस खोज के अभाव में हम इसके प्रारम्भिक वैभव की जानकारी से वंचित रह जाते हैं और हमें इतने ही से सन्‍तोष कर लेना पड़ता है कि यह मन्दिर रचना-कौशल का अद्वितीय जीवित उदाहरण है

 

 

रेसट के इस देव मन्दिर के अतिरिक्‍त रूस में एक और भी
आश्चर्यजनक मानवी-निर्माण की वस्तु है जो आधुनिक संसार में अनोखी है। वह है ‘क्रेमलिन’ का राज भवन। यदि इस समय आधुनिक रचना कौशल को श्रेणीबद्ध किया जाये तो निःसंदेह ही मास्को स्थिति क्रिेमलिन गर्वोन्नत राज-भवन’ विश्व में सर्वप्रथम स्थान ग्रहण करेगा। इस युग में भी संसार मे अनेक अद्भुत विशाल वितृत इमारतों का निर्माण हुआ है, परन्तु कोई भी इमारत क्रेमलिन की विशालता और भव्यता की बराबरी नही कर सकती। अमेरिका जो ऊंची-ऊंची अट्टालिकाओं वाला नगर कहा जाता है और जहां संसार प्रसिद्ध एक से एक सुन्दर, विशाल और ऊचे भवन हैं, वह भी ‘क्रेमलिन’ की इमारत की श्रेणी में नहीं पहुंच पाया।

 

 

‘क्रेमलिन’ की यह इमारत रचना कौशल के लिये तो प्रमिद्ध है ही
साथ ही इसकी दीवार के हर पत्थर में रूसी क्रांति का इतिहास लिखा हुआ है। इस कारण से यह इमारत अपनी बराबरी नहीं रखती। रूस में वोलशेविक क्रांति के पूर्व वहाँ साम्राज्यवाद का विस्तार था। ज़ारशाही की हुकूमत थी, जिस हुकूमत में प्रजा की भलाई के लिये कोई भी साधन नहीं थे। शाही घराने के लोग-जार, जरीना, ड्यूक, और डची सब इसी क्रेमलिन की इमारत में रहते थे क्रांति की शुरुआत के पश्चात क्रेमलिन के इसी भवन मे राज घराने के सैकड़ों लोगों का, जिनमे रूस के बादशाह जार तथा अन्य लोग शामिल थे,कत्लेआम हुआ था।

 

 

उसके पश्चात्‌ तो बराबर ही पश्चिमी राष्ट्रों की आँखें क्रेमलिन की
भयानक इमारत पर लगी रहती है। विश्व में साम्यवाद के प्रसार की दृष्टि से पश्चिम के राष्ट्र इसे अत्यन्त ही शक्तिशाली स्थान समझते रहे थे। कुछ समय पूर्व तक इस इमारत में सोवियत सम्यवादी सरकार का निवास था। उस समय की रूस की एक मात्र राजनीतिक पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी की बैठक भी इसी इमारत में होती थी। रूस के अन्य भागों में और भी कितनी ही प्राचीन एवं अर्वाचीन भव्य इमारतें है, परन्तु उनमें पौराणिकता तथा रचना-कौशल के ख्याल से रिस॒ट का देव मन्दिर सर्वोत्तम हैं और संसार की आश्चर्यजनक मानवी-कृतियों में इसकी गणना है। आज इस इमारत की देख-रेख इसमे पूजा-उपासना आदि सभी कार्य वहीं से समीप के लोग करते है।

 

 

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