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राजा बदन सिंह का इतिहास भरतपुर राज्य

राजा बदन सिंह

ठाकुर बदन सिंह चूडामन जाट के भतीजे थे। ये आमेर जयपुर के सवाई राजा जयसिंहजी के पास बतौर ( Feudatory cheif) रहे
थे। सवाई महाराजा जयसिंहजी ने इन्हें सम्राट महम्मदशाह के जमाने में चुड़ामन जाट की जमीन और उपाधियाँ प्रदान की थीं। ये बड़े सत्य और शान्ति-प्रिय थे। लुटेरे सरीखा जीवन व्यतीत करना इनके स्वभाव के विरुद्ध था। इन्होंने एक नियमबद्ध शासक की तरह राज्य किया। इन्होंने बड़े सुसंगठिन रूप से अपने राज्य का विस्तार और दृढ़ीकरण किया। ये जाट जाति की उच्छ खल प्रकृति को बदल कर उसे नियम बद्ध बनाने में बहुत कुछ सफल हुए। इन्होंने नियम बद्ध शासन का आरंभ किया।

 

राजा बदन सिंह का इतिहास और परिचय

 

विधायक कार्यक्रम के द्वारा इन्होंने अपनी सत्ता को मजबूत किया और अपने आपको आमेर की अधीनता से स्वतन्त्र कर दिया। इनकी बढ़ती हुई ताकत को देखकर आमेर के तत्कालीन महाराजा ने 18 लाख रुपया प्रति साल आमदनी की जमीन देकर इन्हें प्रसन्न किया। सब से बड़ा और उल्लेखनीय कार्य आपने यह किया कि प्रायः सारे आगरा और मथुरा के जिलों में अपनी राज्यसत्ता स्थापित की। आपने उक्त जिलों के शक्तिशाली जाट कुटम्बों के साथ अपना विवाह सम्बन्ध प्रस्थापित किया। इससे भी आपकी राजनेतिक सत्ता को बड़ी सहायता मिली। आपकी बढ़ती हुई शक्ति को देखकर भारत के कई राजा आपको राजा के नाम से संबोधित करते थे। महाराजा सवाई जयसिंह जी ने आपको अपने इतिहास प्रसिद्ध अश्वमेध यज्ञ में निमंत्रित किया।

 

 

राजा बदन सिंह
राजा बदन सिंह

 

राजा बदन सिंह का दरबार बड़ा आलिशान था। आपकों कला कौशल का बड़ा शौक था। सौंदर्य परिक्षण की भावना आपमें बहुत जागृत थी। भव्य इमारतें बनवाने का आपको बड़ा शौक था। आपने की भव्य महल और बगीचे बनवाएं। आपने की भव्य महलों द्वारा डींग के किले को सुशोभित किया। बयाना जिले के शायर गांव के किले में आपने एक महान उद्यान बनाकर उसके मध्य में एक बड़ा ही सुन्दर सरोवर बनवाया। राजा बदन सिंह अपनी वृद्धावस्था में राजकार्य से अवसर ग्रहण कर ईश्वर भजन करने लगे। उनके वीर सुयोग्य और प्रतिभाशाली पुत्र सूरजमल जी राज्य सिंहासन देखने लगे। सन् 1756 की 7 जून को बदन सिंह का देहान्त हो गया।

 

 

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