रजिया सुल्तान किसकी पुत्री थी – रजिया सुल्तान का इतिहास – रजिया सुल्तान की प्रेम कहानी

रजिया सुल्तान भारतीय इतिहास की वह वीरांगना है,
जिन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी भाग में दिल्ली सल्तनत पर शासन किया था। वह उपमहाद्वीप की पहली महिला मुस्लिम शासक और दिल्ली की एकमात्र महिला मुस्लिम शासक थीं। रजिया सुल्तान का जन्म 1205 ई० में बदायूं में हुआ था। आज के अपने इस लेख में हम रजिया सुल्तान का इतिहास, रजिया सुल्तान की प्रेम कहानी, रजिया सुल्तान किसकी पुत्री थी, रजिया सुल्तान की जीवनी आदि के बारे में विस्तार से जानेंगे।

 

 

रजिया सुल्तान का इतिहास – रजिया सुल्तान किसकी पुत्री थी

आधी रात हो चुकी थी। शाही महल में सन्‍नाटा छाया हुआ था। बूढ़ा अलतमश अपनी चारपाई पर पड़ा हुआ करवटे बदल रहा था। वह सोने की कोशिश करता था, परन्तु उसे नींद नहीं आती थी। वह कुछ चिन्तित था, कुछ दुखी था। अपने लिए नहीं, अपने पुत्र के लिए नहीं, अपने परिवार के लिए नहीं, वरन्‌ उस विस्तृत साम्राज्य के लिए जिसे बनाने में उसने अपना खून, अपने सिपाहियों का खून, अपने साथियों और मित्रों का खून पानी की तरह बहाया था। वह बूढ़ा था। मौत उसके सर पर नाच रही थी। एक-एक क्षण उसके लिए भारी हो रहा था। इस समय उसका सारा साम्राज्य उसकी आंखों के सामने नाच रहा था। वह सोच रहा था–इतना बड़ा साम्राज्य किसे दूँ। पुत्र नालायक़ हैं, आराम-तलब हैं । उनके हाथों मे पड़ कर इतनी बड़ी सलतनत एक दिन में तबाह हो जायगी, सारा खज़ाना एक दिन में खुशामदियों की नज़र हो जायगा, सारा किया-धरा मिट्टी मे मिल जायगा। सोचते-सोचते सुबह हो गयी ओर वह अपने प्रश्न का उचित उत्तर न पा सका। सहसा वह उठा। उसके उठते ही एक युवती ने उसके शयनागार में प्रवेश किया। बादशाह सल्लामत ने ऊपर की ओर देखा। सामने रजिया सुल्तान खड़ी मुस्कुरा रही थी। रजिया सुल्तान उसे बहुत प्रिय थी उसे देखते ही अलतमश ने कहा–तुम्हीं मेरा सवाल हल कर सकती हो रज़िया !

 

“कैसा सवाल?
इतनी बड़ी सलतनत किसे दूँ ! मुझे किसी पर यक़ीन नहीं है, रज़िया ?
“मैं क्या बताऊँ, अब्बा जान। आप बादशाह हैं। आपकी सलतनत है। आप जिसे चाहें दे सकते हैं। इसमें राय देने की मैं कोई ज़रूरत नहीं समझती।
नहीं जरूत है।तुम्हें बताना होगा, रजिया ! तुम मेरे सब लड़कों से ज्यादा काबिल हो। तुममे अक्ल है, ताक़त है। में समझता हूँ कि तुम इतनी बडी सलतनत का इन्तज़ाम अच्छी तरह कर सकती हो। बोलो, रजिया सुल्तान, क्या में गलत कह रहा हूँ?

आप सच कहते हैं, लेकिन?!

लेकिन क्या?

मैं औरत हूँ। यही मेरी कमजोरी है। इसके अलावा, इतनी बड़ी सतननत की जिम्मेदारी एक औरत के कमजोर हाथों में देकर आप दुनिया की तारीख में एक नई बात करने जा रहे हैं।

 

 

नहीं बेटी रजिया सुल्तान, तुम्हारा ख्याल गलत है। औरत कमजोर नहीं ताकतवर होती है। इसके अलावा तुम्हें सलतनत का मालिक बनाकर में कोई नई बात नहीं कर रहा हूं। ऐसी बहुत-सी मिसाले मौजूद है, जब औरतों ने मर्दों के मुकाबिले मे अच्छा और काबिले तारीफ काम किया है। रजिया सुल्तान खामोश हो गयी ओर सुपचाप कमरें से बाहर निकल गयी। इस समय उसके ह्रदय मे द्रंद युद्ध हो रहा था।

 

 

अलतमस कौन था?

इसमे सन्देह नही कि अलतमश ने अपने बाहु बल से इतनी बड़ी सलतनत तैयार की थी। वह समझता था उसके मूल्य को, उसकी हकीकत को। इसलिए उसे मोह था। वह एक गुलाम से सुलतान बना था। भारत मे आने से पहले वह अलबारी के एक तुर्क का पुत्र था।कहा जाता है कि जब वह बच्चा था, तब उसके गाँव में भीषण अकाल पड़ा। इसलिए उसके माता-पिता ने अपनी स्थिति को देखते हुए उसे कुतुबुद्दीन के हाथ, कुछ चाँदी के सिक्को पर बेच दिया। जब कुतुबुद्दीन भारत में आया तब उसे भी अपने साथ लेता आया। अनुपम सौंदर्य के साथ ही साथ परमात्मा ने अलतमस को बुद्ध भी दी थी। इसलिए थोड़े ही दिनों उसने अपने स्वामी के ह्रदय पर अधिकार जमा लिया। ओर धीरे धीरे उन्नति करके बदायूं का हाकिम हो गया।इस पद पर कुछ दिनों तक रहकर उसने राजनीति की सभी कूटनीतियां भलीभाँति समझ ली। और अपने प्रान्त का इतना अच्छा प्रबंध किया कि कुतुबुद्दीन ने प्रसन्न होकर अपनी पुत्री का विवाह उसके साथ कर दिया।

 

 

अलतमश में बुद्धि थी, और बल भी था। कुतुबुद्दीन के पुत्र विलासी,चरित्रहीन तथा आलसी थे। उनमे शासन करने की योग्यता नहीं थी। इसलिए सन्‌ 1210 ई० मे कुतुबुद्दीन की मृत्यु के पश्चात्‌ अलतमश ने दिल्‍ली की बादशाहत के लिए जोर मारा। फलस्वरूप अपने स्वामी-पुत्र, आरामशाह को हटाकर वह स्वयं बादशाह बन गया। उसने बड़ी बड़ी कठिनाइयों का सामना करके अपने राज्य का सुविस्तार किया और अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त की। रजिया सुल्तान ऐसे ही पिता की पुत्री थी। वह बड़ी सुन्दर और भावुक थी। इसलिए अलतमश का उस पर विशेष रूप से स्नेह था। वह उसे ही इतनी बड़ी सल्लतनत देना चाहता था।

 

 

बाल्यावस्था और शिक्षा

रजिया सुल्तान ज्यादा की माता पढ़ी-लिखी नहीं थी। उसका स्वभाव भी बड़ा रूखा ओर चिड़चिड़ा था। इसलिए अधिकतर वह अपने पिता ही के साथ रहा करती थी, ओर उससे ही पढ़ना-लिखना सीखती थी। प्रतिभा सम्पन्न होने के कारण कुछ ही दिनों में उसने अपने धार्मिक ग्रंथ पढ़ लिए थे, और शासन-प्रबंध तथा राजनीति की बातें भी सीख ली थीं। विद्या अध्ययन के साथ ही साथ, उसने घोड़े पर सवारी करने और तीर तथा तलवार चलाने में भी अच्छा अभ्यास प्राप्त कर लिया था। वह शिकार खेलना भी जानती थी। वह अपने पिता के साथ शिकार खेलने जाया करती थी। एक बार शेर के शिकार में उसने अपने पिता की जान भी बचाई थी। तब से वह अन्य संतानों की अपेक्षा अलतमश की विशेष रूप से स्नेह-पात्र बन गई थी। वह हरम में रहती थी, परन्तु हरम की चालबाज़ियों का उसके जीवन पर लेशमात्र भी प्रभाव न पड़ा था। उसका जीवन सादा और धार्मिक था। वह बाल्यावस्था से ही गम्भीर और उच्च विचार की थी। वह बड़ी विदुषी थी। इतिहासकारों का कहना है कि कुतुबमीनार का शिला-लेख उसी की रचना है। इतनी विदुषी और इतने बड़े बादशाह की पुत्री होने पर भी उसमे घमंड नहीं था। गुणों के साथ सुन्दरता सोने में सुहागा का काम करती थी। उसे परदा से हार्दिक घृणा थी। वह दरबार में स्वतंत्रता पूर्वक जाती थी, और वहाँ की बातें सुना करती थी। इन बातों का उसके जीवन पर बढ़ा गहरा प्रभाव पड़ा था। यही कारण था कि अलतमश जब भी कभी बाहर जाता था, तो रजिया सुल्तान को ही शासन का भार सौंप जाता था।

 

 

अलतमश की मृत्यु

अलतमश ने उत्तरी भारत पर 15 वर्ष सफलतापूर्वक शासन किया। इतनी अवधि में उसने भारत में मुसलमानी शासन की नींव दीर्घ काल के लिए रख दी। ऐसे दृढ साम्राज्य के लिए उसकी समझ में रज़िया ही उपयुक्त थी। इसलिए सन्‌ 1236 ई. में मरते समय उसने अपने पुत्रो की अयोग्यता और राज्य का विम्तार देखकर रजिया सुल्तान को ही अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। वह बहुत कहा करता था कि मेरे पुत्र युवावस्था के दुव्यसनों में पड़े हुए हैं। उनमे से किसी में भी इतनी योग्यता नहीं है कि वह भारत के इतने बढ़े साम्राज्य का समुचित प्रबन्ध कर सके। रज़िया ही इस कार्य को भलीताँति प्रतिपादन कर सकती है। सच तो यह है कि अलतमश ने रजिया के गुणों पर ही मुग्ध होकर उसे अपना उत्तराधिकारी बनाया था, और दरबार के प्रधान मंत्री, मुशरिकूल, मुमालिक, ने राजपत्र लिखकर इस बात को पक्का कर दिया था।

 

 

अलतमश की यह योजना न तो भारत के लिए नवीन थी, और न यवन-इतिहास के लिए। पुरुषों की भाँति स्त्रियाँ भी राज-सिहासन पर बैठकर शासन कर सकती है। इस बात का भारत के हिंदुओं की भाँति, मुसलमानो को भी पूरा ज्ञान था। ख्वारीजम की राजकुमारी, मलका तुर्कान खातून, रज़िया ही की तरह शासन कर रही थी। तेरहवीं शताब्दी मे मिश्र और फारस पर यवन-महिलाओं का ही शासन था। परन्तु उस समय के भारतीय मुसलमान एक स्त्री के शासनान्तर्गत रहने में अपना बडा अपमान सममते थे। इसका परिणाम यह हुआ कि अलतमश के आंख बन्द करते ही रजिया सुल्तान बन्दी गृह में डाल दी गयीं। और दरबार के मंत्रियों तथा सरदारों ने राजपत्र की अवहेलना करके रूक्‍नुद्दीन को शासन का भार सौंप दिया। उसकी माता शांह तुर्कान संरक्षिका बना दी गयी।

 

 

रजिया सुल्तान
रजिया सुल्तान

 

 

शाह तुर्कान का षड्यंत्र

शाह तुर्कान को अलतमश की अन्य पत्नियों से बड़ी शत्रुता थी। रज़िया की तो वह जानी दुश्मन थी। अलतमश के जीवन-काल मे उसे अपने बैर- भाव को क्रियात्मक रूप देने का अवसर नहीं मिला। परन्तु उसके मरते ही उसने रज़िया के विरुद्ध षडयंत्र रचना आरंभ कर दिया। रूकनुद्दीन उसके हाथों का खिलौना था। वह जिस तरह चाहती थी उसे खिलाती थी ओर उसे विलासी-जीवन व्यतीत करने के लिए प्रोत्साहित करती थी। रूकनुद्दीन चाहता भी यही था। उसने राज्य-कार्य छोड़कर विलासी जीवन व्यत्तीत करना प्रारंभ क्रिया और कौष का रुपया पानी की तरह बहाने लगा। चाटुकारों ओर बैठकबाज़ों ने अपने हाथ फैलाये। राज्य का प्रबन्ध बिगड़ने लगा। इधर राजमाता ने अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए उचित और अनुचित सभी उपायों से काम लेना प्रारम्भ कर दिया। दरबार षड॒यंत्रों का क्रिड़ा-स्थल बन गया। राज्य-गर्व के आवेश मे आकर उसने अलतमश के द्वितीय पुत्र ( जो दूसरी माता से था) कुत्बुद्दीन को मरवा डाला। राजमाता का यह निन्दनीय कार्य किसी अमीर को अच्छा नहीं लगा। राजमाता ने यह देखकर रज़िया सुल्तान को इन समस्त उपद्रवों की जड़ समक्ता और उसे मरवा डालने का षड़्यत्र रचा, परन्तु भेद खुल गया। अमीर बिगड़ गये, ओर वह बन्दी बना ली गयी। सात महीने के भीतर ही भीतर विलासिता और षड़यंत्र का यह नंगा नाच समाप्त हो गया।

 

 

रजिया सुल्तान का राज्याभिषेक

रज़िया इन षड़यत्रो ओर षड़यंत्रकारियो से बहुत सावधान रहती थी। इब्ने बतूता ने लिखा है कि आये दिन दिल्‍ली-दरबार के षड़यत्रों से भयभीत होकर रज़िया ने कुतुब महल मे जाकर शरण ली थी। वहाँ वह संयासिनी के वेष में रहती थी, क्योंकि उसको सदैव अपनी जान का भय लगा रहता था। जिस समय राजमाता के बन्दी होने का समाचार रज़िया को मिला, वह उसी वेष मे महल के झरोखे पर आयी। महल के नीचे दिल्ली की जनता यह अपूर्व दृश्य देखने के लिए उमड़ पड़ी। उस समय रजिया की आँखों से प्रेमाश्नु प्रवाहित हो रहे थे। वह हाथ फैलाये हुए बड़ी नम्रतापूर्वक दिल्‍ली की जनता से सिंहासन की भीख माँग रही थी। उसकी मनोमुग्धकारिणी छवि प्रजा के प्रति प्रेम तथा अपूर्व नम्रता ने चुम्बक की तरह सबके हृदय को अपनी ओर खींच लिया। उसकी दीनता पर सभी पिघल गये। कट्टर यवनों तक की कट्टरता जाती रही। इस प्रकार भारत की एक यवन-राजकुमारी ने अपने गुणों के जादू से सब को वश में कर लिया। अन्त में सरदारों ने उसे सुलताना की पदवी देकर दिल्‍ला के राज-सिहासन पर बिठाया। उसका भाई यह विचित्र लीला देखकर पास की एक मस्जिद में डर के मारे छिपा रहा, परन्तु वह वहाँ से घसीट कर लाया गया, और रज़िया सुल्ताना के सामने पेश किया गया। रजिया ने उसका गला उतार लेने की श्राज्ञा देते हुए कहा–“कातिल को ज़रूर कत्ल करना चाहिए? इस प्रकार रजिया ने श्रपनी बुद्धि, वीरता और कूट-नीति से काम लेकर दिल्ली के सिहासन पर अपना अधिकार जमा लिया।

 

 

गद्दी पर बैठने के पश्चात रजिया सुल्ताना ने अपने पिता अलतमश की स्मृति में एफ विशाल भवन निर्माण कराया। इस भवन के भीतर अलतमश का मक़बरा बनवाया गया। यह मक़बरा दिल्‍ली मे अब तक मौजूद है। रज़िया को चित्रकारी का इतना शौक था कि उसने इस भवन के बाहरी तथा भीतरी भाग को सजाने में कोई कोर-क्सर नहीं रखी थी।

 

 

 

राजगद्दी पर बैठने पर प्रारंभिक कठनाईयां

रजिया सुल्तान का शासन-काल दुःख के काले बादलों से घिरा हुआ था। यद्यपि प्रजा की अनुमति ही से वह मलिका बनी थी तथापि उस समय कुछ ऐसे सकुचित विचार के यवन-सरदार थे जो दरबार में एक स्त्री की प्रधानता देखकर मन दी मन कुढा करते थे। इन सरदारो को भड़काने में रजिया के भाईयों का भी हाथ था। यह लोग राज-दरबार में ऐसी बातों का प्रचार किया करते थे जिन्हें सुनकर लोगों का मन उबल पड़ता था। रजिया यह जानते हुए भी अपने भाइयों को क्षति पहुंचाने की कभी कल्पना भी नहीं करती थी। वह आवश्यकता से अधिक उदार थी। उसके भाई उसकी इस प्रकार की उदारता से पूरा लाभ उठा रहे थे।

 

 

हमने ऊपर की पक्तियों मे रज़िया की जिन दो कठिनाइयों का उल्लेख किया है उनके अतिरिक्त उसकी एक कठिनाई और थी ओर वह थी उसकी सुन्दरता। रजिया सुल्तान का अद्वितीय सौंदर्य वास्तव में उसका शत्रु था। जो देखता था वही मजनू हो जाता था। वह खुले मुँह दरबार में आती थी, मर्दो’ के कपड़े पहनती थी, बड़े-बड़े सरदारों से बात-चीत करती थी, परन्तु अपने हृदय को वह हाथ से न जाने देती थी। उसे पाने के लिए सरदार छटपठाया करते थे, परन्तु वह किसी के हाथ में नहीं आती थी। इससे लोग उसके खून के प्यासे हो गये थे। ऐसे लोगों को बड़े-बड़े मुल्‍लाओं को भड़काने का अच्छा सुअवसर मिल गया था। एक प्रकार से रज़िया को सभ्य समाज में बदनाम करना ही उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया था। परन्तु उन मुल्लाओं तथा सरदारों की इन काली करतूतों का उसके हृदय पर तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ता था। वह उदार थी, सीमा से अधिक उदार थी। कहते हैं कि एक दिन किसी स्त्री ने उससे कहा–आप के भाई ने मंत्री से यह कहा है कि आप याकूत हब्शी पर आसक्त हैं। इससे हमारे वंश पर धब्बा लगता है। रज़िया ने इन शब्दों को सुनकर केवल इतना ही कहा– यदि मेरे पिता का समय होता तो वह मेरे भाईयों पर शरई हद जारी करते। इस्लाम धर्म मे शरई का अर्थ यह है कि यदि कोई किसी पर झूठा दोष लगाये तो उसको कोड़े मारे जायें। वह मलिका थी, सब कुछ कर सकती थी, परन्तु उसने उन सरदारों को कभी क्षति पहुँचाने की चेष्टा नहीं की। यही उसकी कमज़ोरी थी। इसी कमज़ोरी से लाभ उठाकर सरदार बराबर उपद्रव करते रहते थे।

 

 

जुनैदी उस समय रज़िया का कट्टर विरोधी था। वह अन्य सरदारो को मिला कर उसके विरुद्ध खड़ा हो गया। यह देखकर बदायूं, मुलतान, हाँसी तथा लाहौर के हाकिमों ने भी विद्रोह का झंडा ऊँचा किया। ऐसे कुसमय में अवध के सरदार नुसरतुद्दीन ने रज़िया की बड़ी सहायता की। रज़िया ने विद्रोहियों में फूट उत्पन्न करने के पश्चात्‌ सब को मार भगाया। विद्रोह का दमन होते ही समस्त सरदार उसकी अधीनता में आ गये। चारों ओर शान्ति हो गयी। इसी बीच मुसलमानों के विरुद्ध एक नया दल उठ खड़ा हुआ।

 

 

नुरूद्दीन नामी एक तुर्क के भड़काने पर काफिरों के किरामिता और मुदाहिदा नाम के दो फिरको ने गुजरात, सिंध तथा यमुना के किनारे बसे हुए सूबों के बहुत से आदमियों को जमा करके दिल्‍ली के निकट इस्लाम धर्म को नष्ट करने का बीड़ा उठाया। नूरुद्दीन बड़ा योग्य पुरुष था। उसने जोशीली वक्तनाओ द्वारा इस्लाम धर्म को झूठा सिद्ध करना शुरू किया। देश में तहलका मच गया। लगभग एक हजार षडयंत्रकारी तलवार लेकर जामा मसजिद में घुम गये। उन लोगों ने बड़ी फुर्ती से चारों ओर मुमलमानों को घेर लिया। परन्तु यह उपद्रव पानी के बुलबुले के समान था। शाही सेना के सामने यह जरा देर भी न टिक सका। इसी प्रकार कुछ समय के पश्चात्‌ ग्वालियर के हाकिम, रणथंभौर के राजा तथा लाहौर के गवर्नर ने विद्रोह का झंडा ऊँचा किया, परन्तु उसने अपनी दूरदर्शिता एवं युद्ध-नीति से सब को नीचा दिखाया।

 

 

योग्यता

13वीं शताब्दी में एक कोमल ह्रदय यवन-राजकुमारी महारानी बनकर अपने विरोधियों पर इस प्रकार विजय पा सकती है, इसका किसी को नाममात्र भी अनुमान न था। रज़िया ने जिस वीरता योग्यता के साथ विद्रोही सरदारों और पडयत्रंकारियों का दमन किया उसे देखकर लोगों की आंख खुल गयीं। उसकी बुद्धिमत्ता, न्यायप्रियता, निर्भिकता, विद्या-प्रेम तथा राजनीति-पटुता को देख कर बड़े-बड़े सरदार, जो अपने बराबर किसी को नहीं समझते थे, दाँतों तले अंगुली दबाने लगे। जिस समय रजिया वीरों की पोशाक पहन कर, मर्दों की भाँति, घोड़े पर बैठती थी, उस समय बड़े-बड़े वीरों का दिल दहल जाता था। वह सदैव मर्दाने लिबास में रहती थी। वह चोग़ा पहनती थी, और सिर पर टोपी रहती थी। स्त्री होकर उसने पुरुषों का ह्रदय पाया था। दरबार में उसे परदे की आवश्यकता नहीं थी। वह खुले आम शासन का सारा काम देखती थी। वह स्वंय विद्रोहियों का सामना करने जाती थी। यद्यपि उसका जीवन अधिकतर विद्रोहियों का दमन करने मे ही व्यतीत हुआ था। तथापि प्रजा की भलाई के लिए उसने कई काम किये। उसने तत्कालीन कतिपय भयानक रीति-रवाजों में सुधार किया, शासन-विधान में परिवर्तन किया और निर्धन किसानों के लिए सुविधाएँ उपस्थित कीं। वह स्वयं प्रार्थियों की प्राथनाएँ सुनती थी ओर न्याय करती थी। वह युद्ध-कला में भी बड़ी प्रवीण थी। एक सफल शासक के लिए जिन गुणों की आवश्यकता हो सकती है, उन सब का रज़िया में पूर्ण रूप से समावेश हुआ था।

 

 

 

गौरवशाली रजिया सुल्तान

रज़िया अपने समय की अद्धितीय सुन्दरी थी। राजकुर हरदेव अहमद अयाज़ ख्वाजा ने “चहल रोज़ा? नाम की एक पुस्तक फ़ारसी भाषा में लिखी है। लेखक ने इस पुस्तक में रज़िया के सौंदर्य के विषय में गर्विता रजिया लिखा है कि वह इतनी सुन्दर थी कि किसी को उसके मुख की ओर देखने का साहस नही होता था। उसका चेहरा सूर्य की भाँति चमकता रहता था। उसकी आंखों में लाल लाल डोरे थे। उसकी आँखों से नशा था। उसकी पलके लम्बी तथा नोकदार थीं। उसकी भृकुटियों के मध्य में एक लाल चिन्ह था। उसके होंठ पतले और गुलाबी थे। वह स्वय अपने सौंदर्य पर मुग्ध थी और अपने रूप की प्रशंसा सुनकर बहुत प्रसन्न होती थी। वह सुन्दर स्त्री व पुरुषों का आदर भी करती थी। किसी सुन्दर स्त्री अथवा पुरुष का अपमान तो वह कभी सह नहीं सकती थी। कहते हैं एक सुन्दर दासी का मुकदमा उसके दरबार में पेश हुआ। उसने एक मौलवी को शैतान की सूरत वाला कहा था। रजिया ने दासी का बयान लिया। दासी ने कहा– हाँ, मैंने मौलवी के गन्दे वस्त्र तथा उनकी सूरत देखकर उनको शैतान कहा था।

 

 

दासी का यह उत्तर सुनकर रजिया सुल्तान ने कहा–अच्छा यदि तुझसे कोई यह पूछे कि स्वर्ग की अप्सरा कैसी होती है तो तू किस से उपमा देगी?।

दासी ने कहा– मैं स्वर्ग की अप्सरा आपको कह सकती थी, परन्तु सात स्वर्गों मे कोई अप्सरा आप के समान सुन्दर न होगी। इसलिए यह कहूँगी कि जिसको स्वर्ग की अप्सरा देखनी हो वह मुझे देख ले।

 

 

 

चरित्र

रजिया सुल्तान बहुत कम हंसती थी मगर दासी की इस बात से उसे हँसी आ गयी, उसने हंसी रोककर कहा — तूने दीन के आलम की तौहीन की है। में तेरी जबान काटने की आज्ञा देती, परन्तु रसूले खुदा ने ऐसी सज़ा देने से मना किया है। इसलिए में यह सज़ा देती हूँ कि तू सात दिन तक मौन धारण कर। रजिया सुल्तान बड़ी धार्मिक थी। वह नमाज़ रोज़ा की बहुत पाबन्द थी। बह बहुत कम खाना खाती थी। वह मंत्रियों तथा अमीरों से देश के समाचार सुनती थी और अंत में अपनी आज्ञा सुना देती थी। बीच में बोलना वह असभ्य समझती थी।

 

 

एक दिन रजिया के सामने एक अभियुक्त पेश किया गया और यह कहा गया कि इसने अमुक व्यक्ति के सामने कहा है कि में मलिका पर आशिक हूँ और उसके वियोग में रात-दिन जागता रहता हूँ। यह सुनकर रज़िया ने आशा दी कि भविष्य मे ऐसी बातें मेरे सामने न लाई जायें। अभियुक्त पागल है। उसके तथा उसको लानेवालों के मस्तिष्क में नश्तर लगाया जाय।

 

 

एक दिन रजिया ने अपने बावर्ची ख़ाने में अपनी बावरचिन को देखा कि जब उसकी नाक बहने लगी तब उसने तुरन्त अपनी आस्तीन से उसे पोंछ लिया। रजिया बेगम ने तुरन्त आज्ञा दी कि उसकी नाक काट ली जाय। इसी प्रकार एक दिन उसके सामने एक ऐसा मनुष्य पेश हुआ जिसने अपनी स्त्री को ढाल से मारा था। जब बेगम रजिया सुल्ताना ने उसका बयान लिया तब उसने कहा उसने खाने में नमक तेज़ कर दिया था। रज़िया को स्त्री की इस असावधानी पर बड़ा रोष आया। उसने श्राज्ञा दी कि पुरुष को छोड़ दिया जाय और उसकी स्त्री के मुंह में नमक भर दिया जाय। एक स्त्री ने इस कठोर दण्ड का प्रतिवाद दिया। रजिया ने कहा कि स्त्रियों को सभ्य बनाने के लिए इससे कोमल दण्ड और कोई नहीं हो सकता।

 

 

रजिया सुल्तान को प्रेम की कहानियों से बड़ी घृणा थी। एक दिन किसी स्त्री ने उसे हजरत यूसूफ और जुलेखा की प्रेम कहानी सुनानी आरंभ किया। रजिया ने कहा– जब स्त्री को घर में कोई काम नहीं होता तब उसे प्रेम सूझता है। भविष्य में मेरे सामने किसी के प्रेम की चर्चा न की जाय। मैं निकम्मी नहीं हूँ। और न निकम्मी बनना चाहती हूँ।

रज़िया की इन बातों से उसके चरित्र-बल का यथेष्ट परिचय मिल सकता है, परन्तु वह युग ही उसके अनुकूल नहीं था।

 

 

चरित्र पर संदेह

अरब तक रजिया सुल्तान अविवाहित थी। विवाह करने पर उसे कैसी-कैसी आपत्तियों का सामना करना पड़ेगा, यह वह भली भाँति जानती थी। इस लिए उसने अपना विवाह ही नहीं किया। राज्य की भलाई चरित्र पर संदेह के लिए उसका यह महान त्याग था, परन्तु उस समय इसका मुल्य ही क्या था। यदि उस समय की यवन सभ्यता ने रज़िया के इस त्याग का आदर किया होता, तो ग़ुलाम वंश का वह युग नारी-जगत के इतिहात में सवश्रेष्ठ स्थान पाता, परन्तु यह विचार उस समय के लोगों से कोसों दूर था। उस समय स्त्रियों का अविवाहित रहना सन्देह की दृष्टि से देखा जाता था। रज़िया भी इसी सन्देह का शिकार बनी।

 

 

रजिया के सम्बन्ध में यह कहा जाता है कि अबीसीनिया के एक हब्शी जमालुद्दीन याक़ूत से उसका अनुचित सम्बन्ध था। इस संदेह में कहाँ तक सत्यता है, इसके बारे में इतिहासकार चुप हैं। इब्नबतूता के लेखों से कोई सत्य बात नहीं प्रकट होती। तबक़ाते नासिरी का कहना है कि सुलताना के साथ रहने से वह मुंहलगू हो गया था, और रज़िया की उस पर दया दृष्टि भी थी। फ़रिश्ता लिखता है कि जिस समय रजिया घोड़े पर चढ़ा करती थी उस समय वह ( दास ) उसको ऊपर उठाकर घोड़े पर बिठा देता था। यह काम उसके अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं करता था। तबक़ाते अकबरी का कहना है कि जिस समय रज़िया घोड़े पर सवार होती थी, उस समय याकूत उसकी भुजाओं के नीचे हाथ डाल कर उसे उठा लेता था ओर घोड़े पर बिठा देता था। बदायूंनी का भी यही कहना है।

 

 

रजिया सुल्तान पर जो सन्देह किया जाता है वह इन्हीं बातो पर आश्रित है। परन्तु इनमें कहां तक सत्यता हैं, यह नहीं कहा जा सकता। हाँ, यह बात अवश्य है कि एक अविवाहित स्त्री के लिए ये बातें संदेह का कारण बन सकती है। पाश्चात्य सम्यता चाहे इसे संदेह की दृष्टि से न देखे, परन्तु मुसलमानी सभ्यता में पले हुए उस समय के सरदार इसे सन्देह की दृष्टि से अवश्य देखते थे। उच्च घराने के बड़े-बड़े सरदारों के रहते हुए भी रज़िया उस दास ही से यह काम क्‍यों लेती थीं, यही सन्देह की बात थी।

 

 

इस संदेह को दूर करने के लिए दो बातों पर विचार करना अत्यन्त आवश्यक है। स्त्रियों का जिन पुरुषों पर विश्वास होता है, उन्हीं से वह इस प्रकार का काम ले सकती हैं। रज़िया को उस समय के दरबारियों का हाल मालूम था। वह कितने विश्वासहीन, विलासप्रिय तथा आमोद-प्रमोद में लिप्त रहने वाले थे, यह बात रजिया से छिपी नहीं थी। यही कारण था कि वह किसी सरदार का इस काम में विश्वास नहीं करती थी। केवल याकूत पर ही उसका विश्वास था। और वही यह काम कर सकता था। यदि हम इसे भी न मानें, तो इस सन्देह को दूर करने के लिए यह कहा जा सकता है कि यदि उस दास के अतिरिक्त कोई दूसरा इस काम को करता होता तो उसका भी रजिया के साथ अनुचित सम्बन्ध बताया जाता।

 

 

अब हम यदि उस समय की स्थिति पर विचार करें तो हमको पता चलेगा कि यह उन अमीरों और सरदारों के मस्तिष्क की अनोखी सूझ थी जो एक स्त्री की अधीनता में रहना अपनी मर्यादा के विरुद्ध समझते थे। यह उन लोगों का ऐसा हथियार था जिससे नारी-हृदय हमेशा के लिए कुचला जा सकता था और शांत प्रजा में विद्रोह की आग भड़कायी जा सकती थी। यह एक ऐसा नुसख़ा था जो रोग पर तुरन्त अपना असर दिखाने वाला था। इसे एक मनुष्य ने सोचकर अपने दिमाग़ से नहीं निकाला था। यह काम उन चालीस दासों की एक मंडली का था जिसने इस प्रकार सन्देह करते हुए यह कहकर लोगों को भड़काना शुरू कर दिया था कि स्त्री का इस प्रकार तलवार लेकर समररण में जाना और दरबार में हर एक से बाते करना यवन सभ्यता के खिलाफ और पवित्र कुरान की शिक्षा के विरुद्ध है। इसी विचार से प्रभावित होकर धर्म के नाम पर अंधविश्वास करने और मरने वाले उस समय के फ़सादी मुसलमानों ने विद्रोह कर दिया।

 

 

सबसे पहले तबरहिन्द के जागीरदार अखत्यारुद्दीन अलतूनियाँ ने विद्रोह किया। अत: वह उसे दंड देने के लिए दिल्‍ली से रवाना हुई। परन्तु तबरहिन्द पहुँचते ही तुर्क अमीरों ने उसके दास याकूत, सरदारों का विद्रोह की हत्या करके उसे बन्दी कर लिया। और अलतूनियां की देख-रेख में छोड़ दिया।

 

 

रज़िया बड़े सकट में पड़ गयी। तबरद्दिन्द में उसका कोई सहायक नहीं था। एक ऐसी स्त्री कोई और उपाय न रहने पर जिस तरह कामी पुरुषों के पंजे से छुटकारा पा सकती है, रज़िया उसे जानती थी। अपने बचने का उपाय न देख कर उसने अलतूनियाँ पर प्रेम जा जाल फेका। शिकार फंस गया। दोनों राजभोग की अभिलाषा से दिल्‍ली की और बढ़े।

 

 

 

पराजय और मृत्यु

इधर अमीरों ने रज़िया की अनुपस्थिति में उसके भाई, मुइजुद्दीन बहराम शाह को गद्दी पर बिठा दिया।अलतूनियाँ के आने का समाचार पाते ही नये बादशाह ने उन दोनों का सामना किया। 12 अक्टूबर सन्‌ 1239 ई० को दोनों ओर से युद्ध होने लगा। रजिया सुल्तान और अलतूनियाँ के पैर उखड़ गये। दोनो कैथल की ओर भागे। शाही सेना ने उनका पीछा किया ओर फिर युद्ध छिड़ गया, परन्तु अलतूनियाँ की सेना के विश्वासघात के कारण दोनों हार गये। अन्त में दोनों पकड़े गये और उनकी गर्दने उड़ा दी गयीं।

 

रजिया सुल्तान का मृतक शरीर दिल्‍ली मे कलाँ मस्जिद के निकट उत्तर की ओर दफना दिया गया। इस प्रकार एक यवन-कुमारी ने समाज के पापाचारियों का शिकार बनकर अपने जीवन की बलि दी। भारतीय इतिहास के उज्ज्वल प्रष्ठों पर यह घटना एक ऐसी कलंक कालिमा है जिसे आज भी प्रत्येक स्त्री-परुष घुणा की दृष्टि से देखता है ।

 

 

 

हमारे यह लेख भी जरूर पढ़े:—–

 

 

अनन्य देशभक्ता, वीर रानी दुर्गावती ने अपने देश की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अंतिम सांस तक युद्ध किया। रण के मैदान
लक्ष्मीबाई का जन्म वाराणसी जिले के भदैनी नामक नगर में 19 नवम्बर 1828 को हुआ था। उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका
नबेगम हजरत महल का अंग्रेजो के खिलाफ युद्ध का काल्पिनिक चित्र
बेगम हजरत महल लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह की शरीक-ए-हयात (पत्नी) थी। उनके शौहर वाजिद अली शाह विलासिता और
रानी भवानी की जीवनी
रानी भवानी अहिंसा मानवता और शांति की प्रतिमूर्ति थी। वे स्वर्ग के वैभवका परित्याग करने के लिए हमेशा तैयार रहती
कित्तूर की रानी चेन्नमा की वीर गाथा
रानी चेन्नमा का जन्म सन् 1778 में काकतीय राजवंश में हुआ था। चेन्नमा के पिता का नाम घुलप्पा देसाई और
भीमाबाई होल्कर का काल्पनिक चित्र
भीमाबाई महान देशभक्ता और वीरह्रदया थी। सन् 1857 के लगभग उन्होने अंग्रेजो से युद्ध करके अद्भुत वीरता और साहस का
मैडम कामा का काल्पनिक चित्र
मैडम कामा कौन कौन थी? अपने देश से प्रेम होने के कारण ही मैडम कामा अपने देश से दूर थी।
रानी पद्मावती जौहर का काल्पनिक चित्र
महाराणा लक्ष्मण सिंह अपने पिता की गद्दी पर सन् 1275 मैं बैठे। महाराणा के नाबालिग होने के कारण, राज्य का
श्रीमती इंदिरा गांधी का फाइल चित्र
इंदिरा गांधी का जन्म 19 नवंबर सन् 1917 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद मे हुआ था। जहां इंदिरा गांधी के
सरोजिनी नायडू का फाईल चित्र
सरोजिनी नायडू महान देशभक्त थी। गांधी जी के बताए मार्ग पर चलकर स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वालो में उनका
कस्तूरबा गांधी के चित्र
भारत को गुलामी की जंजीरों से आजाद कराने वाले, भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी को प्ररेणा देने वाली और
कमला नेहरू
कमला नेहरू गांव गांव घूमकर स्वदेशी का प्रचार करती थी। वे गांवों में घर घर जाती थी। स्त्रियों से मिलती
वीरबाला कालीबाई की प्रतिमाएं
आज के अफने इस लेख मे हम एक ऐसी गुरू भक्ता के बारे मे जाने। जिसने अपने प्राणो की आहुति
रानी कर्णावती हिस्ट्री इन हिन्दी
रानी कर्णावती कौन थी? अक्सर यह प्रश्न रानी कर्णावती की जीवनी, और रानी कर्णावती का इतिहास के बारे मे रूची
हाड़ी रानी के बलिदान को दर्शाती मूर्ति कला
सलुम्बर उदयपुर की राज्य की एक छोटी सी रियासत थी। जिसके राजा राव रतन सिंह चूड़ावत थे। हाड़ी रानी सलुम्बर के
राजबाला के प्रेम, साहस, त्याग की रोमांचक कहानी
राजबाला वैशालपुर के ठाकुर प्रतापसिंह की पुत्री थी, वह केवल सुंदरता ही में अद्वितीय न थी, बल्कि धैर्य और चातुर्यादि
कर्पूरी देवी की कहानी
राजस्थान में एक शहर अजमेर है। अजमेर के इतिहास को देखा जाएं तो, अजमेर शुरू से ही पारिवारिक रंजिशों का
रानी जवाहर बाई की वीरता की कहानी
सन् 1533 की बात है। गुजरात के बादशाह बहादुरशाह जफर ने एक बहुत बड़ी सेना के साथ चित्तौड़ पर आक्रमण
सती स्त्री रानी प्रभावती
रानी प्रभावती वीर सती स्त्री गन्नौर के राजा की रानी थी, और अपने रूप, लावण्य व गुणों के कारण अत्यंत
मदर टेरेसा के चित्र
मदर टेरेसा कौन थी? यह नाम सुनते ही सबसे पहले आपके जहन में यही सवाल आता होगा। मदर टेरेसा यह
अच्छन कुमारी और पृथ्वीराज चौहान के मिलन का काल्पनिक चित्र
अच्छन कुमारी चंद्रावती के राजा जयतसी परमार की पुत्री थी। ऐसा कोई गुण नहीं था, जो अच्छन में न हो।
रामप्यारी दासी
भारत के आजाद होने से पहले की बात है। राजस्थान कई छोटे बडे राज्यों में विभाजित था। उन्हीं में एक
सती उर्मिला
सती उर्मिला अजमेर के राजा धर्मगज देव की धर्मपत्नी थी। वह बड़ी चतुर और सुशील स्त्री थी। वह राज्य कार्य
श्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित
"आज तक हमारा काम परदेशी नीवं के भवन को गिराना रहा है, परंतु अब हमें अपना भवन बनाना है, जिसकी
अमृता शेरगिल
चित्रकला चित्रकार के गूढ़ भावों की अभिव्यंजना है। अंतर्जगत की सजीव झांकी है। वह असत्य वस्तु नहीं कल्पना की वायु
राजकुमारी अमृत कौर
श्री राजकुमारी अमृत कौर वर्तमान युग की उन श्रेष्ठ नारी विभूतियों में से एक है। जिन्होंने राजनीतिक क्षेत्र में भाग
कमला देवी चट्टोपाध्याय
श्रीमती कमला देवी चट्टोपाध्याय आज के युग में एक क्रियाशील आशावादी और विद्रोहिणी नारी थी। इनके आदर्शों की व्यापकता जीवनपथ
चाँद बीबी
सुल्ताना चाँद बीबी कौन थी? उसका नाम था चाँद था। वह हरम का चाँद थी। दक्षिण भारत का चाँद थी।
नूरजहाँ बेगम
नूरजहाँ भारतीय इतिहास और मुगल सम्राज्य की सबसे ताकतवर महिला थी। यह मुगल सम्राट जहांगीर की पत्नी थी। अपने इस
राजमाता अहल्याबाई होल्कर
होल्कर साम्राज्य की महारानी अहिल्याबाई होल्कर भारतीय इतिहास की कुशल महिला शासकों में से एक रही हैं। अपने इस लेख

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *