यशवन्तराव होलकर का जीवन परिचय

यशवन्तराव होलकर

सन् 1797 की 15 अगस्त को यह महान राजनीतिज्ञ और वीर तुकोजीराव होलकर की मृत्यु हो गई। तुकोजीराव के चार पुत्र थे। इनमें से दो औरस (Legitimate) और दो अनऔरस थे। अर्थात्‌ दो असली रानी से थे और दो रखैल से। औरस पुत्रों का नाम काशीराव ओर मल्हाराव था। अनौरस पुत्रों का नाम यशवन्तराव और बिठोजी था। तुकोजीराव की इच्छानुसार पेशवा ने काशीराव का उत्तराधिकारित्व स्वीकार कर लिया। इसके अतिरिक्त मृत्यु के पहले तुकोजीराव ने बड़ी बुद्धिमानी के साथ काशीराव ओर मल्हारराव के बीच का मतभेद भी मिटा दिया था। पर इसका कोई फल नहीं हुआ। काशीराव में शासन करने की क्षमता नहीं थी। बुद्धि से भी थे बड़े कमज़ोर थे। इसके विपरीत मल्हारराव में वे सब गुण थे जो एक योग्य शासक और सैनिक नेता में होने चाहियें। इस वक्त तक सिन्धिया और होल्कर का मतभेद ज्यों का त्यों बना हुआ था। होल्कर घराने के कई लोग जैसे यशवन्तराव, बिठोजी, हरीबा आदि मल्हार॒राव को गद्दी पर बिठाना चाहते थे। सिन्धिया ने काशीराव का पक्ष इस शर्त पर ग्रहण किया कि उन्हें सिन्धिया पर का वह कर्ज छोड़ना होगा जो वे ( होल्कर ) अहल्याबाई के समय से उनसे (सिन्धिया से) मांगते हैं। यह कर्ज 16 लाख रुपया था। मल्हारराव को, पेशवा और नाना फड़नवीस की सहायता थी। पर इस समय सिन्धिया ही सर्व- सत्ताधारी थे। उनकी ताकत बहुत बढ़ी हुईं थी। सन् 1797 के सितम्बर मास की 14 तारीख को सिन्धिया ने मल्हारराव को पकड़ने के लिये अपनी फौज रवाना की। इस सेना ने होल्कर राज्य के कुछ गावों पर अधिकार कर लिया। आखिर मल्हारराव के आदमियों और सिन्धिया की फौज का मुकाबला हो गया। छोटी सी लड़ाई हुईं। इसमें मल्हारराव और उनके कुछ साथी मारे गये। इस समय यशवन्तराव, हरीबा और बिठोजी किसी तरह वहां से निकल भागे। मल्हारराव की विधवा पत्नी और यशवन्तराव की भीसाबाई नामक पुत्री सिन्धिया की हिरासत में आ गई। यंशवन्तराव ओर हरीबा नागपुर चले गये। वहाँ के भोंसला राजा ने उन्हें गिरफ्तार कर कैद कर लिया। यहाँ यह कहने की आवश्यकता नहीं कि यह सब कार्यवाई सिन्धिया के इशारे पर की गई थी। बिठोजी ने पेशवा के राज्य में गड़बड़ मचाना शुरू किया था आखिर वें भी सिन्धिया के द्वारा गिरफ्तार कर लिये गये। बिठोजी को पेशवा ने मृत्युदंड दिया। पेशवा का उद्देश चाहे जो कुछ हो पर यह कहना पड़ेगा कि वे सिन्धिया के इशारे पर ही नाच रहे थे। वे उनके हाथ की कठपुतली बने हुए थे। सिन्धिया का बड़ा जोर था। यहाँ तक कि सन् 1797 के दिसम्बर मास में नाना फड़नवीस तक को सिन्धिया ने कैद कर लिया था। सन् 1797 में तो सिन्धिया ने पेशवा के भाई अमृत राव का डेरा तक लूट लिया था।

 

 

यशवन्तराव होलकर का जीवन परिचय

 

 

यशवन्तराव एक अर्से तक नागपुर में केद रहे। आखिर वे किसी
तरह वहाँ से खानदेश ओर मालवा की तरफ भाग गये। कुछ समय तक सालवा सें वे इधर उधर घूमते रहे। घूमते घूमते ये धार पहुँचे। यहाँ ये क्या देखते हैं कि धार के तत्कालीन महाराज अनन्दराव पर वहाँ का दीवान रंगराव उदेकर पिंडारियों की सहायता से चढ़ाई करने की तैयारी कर रहा है। वह खुद महाराज को हटाकर वहाँ का राजा बनना चाहता है। यशवन्तराव ने महाराज का पक्ष ग्रहण किया। महाराजा और उनके दीवान की सेना में जो युद्ध हुआ उसमें यशवन्तराव की वीरता और बुद्धिमत्ता के कारण महाराज की सेना ही विजयी हुईं। दूसरे शब्दों में यों कहिये कि महाराज की डूबती हुईं नाव वीरवर यशवन्तराव ने बचा ली। पर वीर यशवन्तराव शीघ्र ही धार छोड़ने के लिये मजबूर हुए कारण कि सिन्धिया ने धार के राजा को इस सम्बन्ध में बहुत डराया धमकाया था। इसके बाद यशवन्तराव देपालपुर को ओर रवाना हुए। वहाँ उन्होंने काशीराव की फौज को हराकर उसपर अधिकार कर लिया। इस विजय से यशवन्तराव की कीर्ति बहुत फैल गई। यशवन्तराव ने यह देख कर कि सिन्धिया काशीराव को हाथ की कठपुतली बना कर होल्कर राज्य को हडप करते जा रहे हैं और वे काशीराव के प्रति बड़ी दुश्मनी के भाव रखते हैं–सिन्धिया के मुल्क को बरबाद करना शुरू किया। उन्होंने मल्हारराव के पुत्र खण्डेराव के नाम पर अपना बहुत कुछ मुल्क भी सिन्धिया से छीन लिया। यशवन्तराव की अपूर्व वीरता और असाधारण बुद्धिमत्ता तथा समय सूचकता को देख कर लोग मोहित होने लगे। सैकड़ों इनके अनुयायी होने लगे। इतना ही नहीं, प्रत्युत्‌ प्र्यात्‌ पिंडारी नेता अमीर खाँ आदि ने भी उनकी मातह॒ती में काम करना स्वीकार किया।

 

 

यशवंतराव के पास धन नहीं था। अतएव उन्होंने सिन्धिया के मुल्क की लूटना शुरू किया। कसरावद मुकाम पर उन्होंने काशीराव की सेना पर फिर विजय प्राप्त की। सतवास मुकाम पर फिर तीसरी विजय हुईं। सन् 1801 में उज्जैन और नर्मदा के आस पास यशवन्तराव और सिन्धिया की फौजों में कई मुठभेड़ें हुई। इनमें प्रायः यशवन्तराव ही की विजय हुई। सन् 1801 में उज्जैन मुकाम पर यशवन्तराव ने सिन्धिया की विशाल फौजों पर भारी विजय प्राप्त की। इस समय सिन्धिया की फ़ौजों का संचालन यूरोप के सैनिक विद्या विशारद कर रहे थे। उनके पास नये यूरोपियन ढाँचे का बढ़िया तोपखाना भी था। यशवन्तराव ने सिन्धिया की फौज से इस तोपखाने की बहुत सी तोपें भी छीन लीं। उज्जैन की प्राचीनता और पवित्रता का खयाल कर यशवन्तराव ने जान बूझ कर इसे बर्बाद नहीं किया। सिन्धिया ने जब यह खबर सुनी तो उन्हें बड़ा गुस्सा आया। बदला लेने के विचार उनकी रगरग में दौड़ने लगे। उन्होंने इन्दौर राज्य की ओर एक बड़ी सुसज्जित सेना भेजी। यशवन्तराव भी मुकाबले पर आ डटे। दोनों सेनाओं में भीषण युद्ध हुआ। आखिर इस युद्ध में यशवन्तराव हार गये। फिर क्या था। महाराज सिन्धिया के आदमियों ने इन्दौर को बर्बाद करना शुरू किया। इन्दौर का राजमहल ज़मींदोज़ कर दिया गया। इन्दौर बुरी तरह लूटा गया। इससे यशवन्तराव को फिर संभलने में कुछ समय लगा। पर थोड़े से संभल जाने के बाद ही यशवन्तराव ने सिन्धिया का मुल्क बर्बाद करना और लूटना शुरू किया। सिन्धिया तंग आ गये। उन्होंने यशवन्तराव को कहलवाया कि अगर आप मेरे राज्य में लूटमार और बर्बादी का काम छोड़ दें तो आपका लिया हुआ मुल्क और मल्हारराव के लड़के को हम मुक्त कर देंगे। पर यशवन्तराव उन अधिकारों के लिये ज़ोर देते रहे जो उन्हें प्रथम मल्हारराव होल्कर के समय में प्राप्त थे। सिन्धिया ने यह बात स्वीकार नहीं की। इससे यशवन्तराव होल्कर अपना काम दूने उत्साह से करने लगे। यशवन्तराव पेशवा से भी मन ही मन बुरा मानते थे क्योंकि पेशवा ने अन्याय पूर्वक उनके भाई विठोजी को मृत्यु-दण्ड दिया था। इसके अतिरिक्त होलकर की खानदेश स्थित जागीर को जब्त करने के लिये भी उन्होंने ( पेशवा ने ) सेना भेजी थी। यशवन्तराव ने पहले तो पेशवा से मेलजोल करने का प्रयत्न किया पर इसमें सफलता न होती देख उन्होंने अन्त में तलवार से
काम लेने का निश्चय किया। सन् 1802 में उन्होंने पेशवा की सेना को कई शिक्स्ते दीं। इसी साल उन्होंने सिन्धिया और पेशवा के राज्य में प्रवेश कर लोगों से धन और वस्तुएं लीं। यशवन्तराव ने पेशवा को लिखा कि अगर निम्नलिखित शर्तें स्वीकार की जावें तो बर्बादी दी का यह सब काम बन्द कर दिया जा सकता है। शर्तें यों हैं:–

  •  सिन्धिया मल्हारराव के पुत्र को मुक्त कर दें।
  •  मल्हारराव का पुत्र खण्डेराव इन्दौर राज्य का राजा घोषित
    किया जाये।
  •  सिन्धिया ने होल्कर के जो मुल्क ले लिये हैं उन्हें ने वापस
    लौटा दें।
  •  महादजी सिन्धिया के समय में उत्तर भारतवर्ष का मुल्क
    बाटने के लिये जो इकरारनामा हुआ था, सिन्धिया उसका पालन करें।

हम ऊपर कह चुके हैं कि बेचारे पेशवा शक्तिहीन थे। सारी सत्ता
एक तरह से महादजी सिन्धिया के हाथ में थी। वे बिना सिन्धिया की स्वीकृति के इन शर्तों को मंजूर नहीं कर सकते थे। सिन्धिया ने पहले ही ये शर्तें नामंजूर कर दी थीं। अतएव समझौते की कोई आशा न देख यशवन्तराव ने इन सब बातों का फैसला तलवार से करना चाहा। उन्होंने सेना सहित दक्षिण की ओर कूच किया। सन् 1802 में भयंकर युद्ध हुआ। इसमें एक ओर तो अकेले यशवन्तराव और उनकी सेना थी और दूसरी ओर सिन्धिया और पेशवा की संयुक्त सेनाएं। इसमें यशवन्तराव को भारी और निश्चयात्मक विजय प्राप्त हुई। पेशवा अपनी राजधानी छोड़ कर भागे। उन्होंने अंग्रेजों का आश्रय ग्रहण किया। अब पूने के कर्ता धर्ता यशवन्तराव बन गये। यशवन्तराव ने पेशवा को लौट आने के लिये लिखा, पर उन्होंने यशवन्तराव की प्रामाणिकता में विश्वास नहीं किया। फिर यशवन्तराव ने अमृृतराव को पेशवा की गद्दी पर बैठाने का विचार किया पर अमृतराव ने यह बात स्वीकार करने में हिचकिचाहट प्रकट की। इसी बीच पेशवा अंग्रेजों से मेलजोल करने के लिये लिखा पढ़ी कर रहे थे। आखिर सन्‌ 1802 के दिसम्बर सास में पेशवा और अंग्रेजों के बीच सन्धि हो गई। यह सन्धि “बेसीन की सन्धि” के नाम से मशहूर है। इस सन्धि के कारण पेशवा को अंग्रेजों की सैनिक सहायता मिल गई। इस सेना की सहायता से बाजीराव पूने में प्रवेश करने में समर्थ हुए।

 

 

यशवन्तराव होलकर
यशवन्तराव होलकर

 

बाजीराव पेशवा की यह कार्यवाई यशवन्तराव को तो क्या, पर उनके खास हिमायती सिन्धिया और भोंसला को भी पसन्द न आई; क्योंकि इसमें उन्होंने मराठा साम्राज्य के नाश का दृश्य देखा । वे नाराज़ होकर पेशवा से अलग हो गये। इसके बाद सिन्धिया और भोंसला ने मिल कर अंग्रेजों के खिलाफ़ अपना गुट बनाना शुरू किया। यशवन्तराव को भी उन्होंने अपने में सम्मिलित होने के लिये निमन्त्रित किया। उन्हें ( यशवन्तराव को ) यह भी वचन दिया गया कि आपका मुल्क, जिसके लिये आप दावा कर रहे हैं आप को लौटा दिया जायगा और आपकी पुत्री भीमाबाईं भी आपके सिपुर्द कर दी जायगी। भोंसला ने होल्कर को ये उपरोक्त शर्तें पूरी करने के लिये वचन दिया और साथ ही में उनका कुछ मुल्क भी लौटा दिया। पर उत्तर भारत के मुल्क का हिस्सा उन्हें वास्तविक रूप से अब तक नहीं दिया गया था। इससे होल्कर को पूर्ण संतोष नहीं हुआ। आखिर अंग्रेज ओर सिन्धिया-भोंसले में युद्ध हो गया। इसमें यशवन्तराव निरपेक्ष रहे।इस युद्ध में सन्धियां और भोंसले की पराजय हुई। आखिर इन्हें अपना बहुत सा मुल्क देकर अंग्रेजों से सन्धि करनी पड़ी।

 

 

इन घटनाओं से मराठा साम्राज्य का तो अन्तिम दृश्य उपस्थित हो गया, पर सिन्धिया और भोंसले से यशवन्तराव की स्थिति ऊँची हो गई। अब महाराष्ट्र में यशवन्वराव की तूती जोर से बजने लगी।अंग्रेज लोग इन्हें ही अपना प्रधान प्रतिद्वंद्वी समझने लगे। दिल्ली के नामधारी मुग़ल सम्राट ने भी इन्हें “राजराजेश्वर अलीजा बहादुर की उपाधि प्रदान की।भारतीय राजाओं में ये विशेष सम्मानित समझे जाने लगे। ब्रिटिश सरकार ने पहले तो इनसे छेडछाड करना मुनासिब न समझा, पर आखिर में कुछ ऐसे सवाल आ पड़े जिनसे इनके साथ अनबन हो जाना अनिवार्य था। क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने राजपूत राजाओं से सन्धि कर उनसे मैत्री का सम्बन्ध स्थापित कर लिया था। यहाँ यह कहने की आवश्यकता नहीं कि उनमें से कई राजा यशवन्तराव को चौथ देते थे ।यशवन्तराव होल्कर अपने अधिकारों का उपयोग करने के लिये चौथ वसूल करने के लिये राजपूताना गये। ब्रिटिश अफसरों ने उन्हें ऐसा करने से मना किया। उन्हें ( यशवन्तराव को )
कहा गया कि इन सब राजपूत राजाओं की हमारे साथ मैत्री हो गई है। आप इनसे छेड़छाड़ न कीजिये। इसके अलावा उन्होंने यह भी सूचित किया कि इन्दौर के राजा काशीराव हैं, इसमें आपका कोई सम्बन्ध नहीं। फिर भी इनमें और ब्रिटिश अधिकारियों में लिखा-पढ़ी चली। होल्कर ने निम्नलिखित शर्तें उपस्थित कीं—

 

  •  पहले की तरह होल्कर खिराज वसूल करते रहेंगे।
  •  दुआब परगना और बुन्देलखण्ड के एक परगने के विषय में
    होल्कर का जो दावा चला आया है, वह स्वीकृत किया जावे।
  •  हुराणिया का देश जो पहले होल्कर की अधीनता में था, वह
    वापस लौटाया जावे।
  • इस समय होलकर के अधिकार में जो मुल्क है उसकी
    सुरक्षितता का वचन दिया जावे।

ये सब शर्तें ब्रिटिश सरकार ने स्वीकार नहीं की। मेलजोल के लिये
जो लिखा-पढ़ी हो रही थी उसका कोई फल नहीं हुआ।यशवन्तराव से कहा गया कि वे अपने राज्य में लौट जायें। इस समय यशवन्तराव ब्रिटिश के खिलाफ गुट बनाने के लिये सिक्ख और बुन्देलखण्ड के राजाओं से लिखा पढ़ी कर रहे थे। उन्होंने इसी सम्बन्ध में काबुल, भरतपुर और सिन्धिया महाराज को भी लिखा था। सन् 1804 में अंग्रेजों ने होल्कर के खिलाफ लड़ाई छेड़ने का निश्चय किया। इस समय वीरवर यशवन्तराव होलकर जयपुर राज्य में थे। यहाँ अंग्रेजों ने एक बड़ी कूट-नीति की चाल चली। उन्होंने यह आश्वासन देकर सिन्धिया को अपनी ओर मिला लिया कि अगर होलकर आत्म-समर्पण कर देगा तो उसे और काशीराव को ब्रिटिश के आश्रय में कुछ जागीर देकर उसका सारा मुल्क आपको दे दिया जायगा। इस प्रलोभन से सिन्धिया न बच सके। वे यशवन्तराव को छोड़ कर अंग्रेजों की ओर जा मिले।

 

 

सन्‌ 1804-5 में यशवन्तराव और अंग्रेजों के बीच कई लड़ाईयाँ हुईं। सेनापति लुकॉन की अधीनस्थ ब्रिटिश सेना का पराजय हुआ । मुकन्दरा के पास कर्नल मानसून की फौजें-जिनमें जयपुर, कोटा और सिन्धिया की फौजें भी शामिल थीं-बुरी तरह हारी। ये होल्कर के सामने से बेहोश भागी। हिंगलाजगढ़ का किला होल्कर ने वापस ले लिया। मानसून की फौजों का होलकर की फौजों ने पीछा किया और उनकी बुरी दशा कर डाली। मानसून के सैकड़ों आदमी मारे गये और साथ ही उनका सब असबाब भी छीन लिया गया। बनास नदी और सीकरी के पास भी ब्रिटिश और होलकर की फौजों का मुकाबला हुआ। इसमें किसी की हार जीत प्रकट नहीं हुईं। यशवन्तराव ने मानसून की फौजों पर जो अपूर्व विजय प्राप्त की उससे उनकी सैनिक कीर्ति और भी बढ़ गई थी। उनका भारतीय राजा महाराजाओं पर बहुत दबदबा छा गया था। पश्चात्‌ यशवन्तराव ने मथुरा की ओर कूच किया। वहां भी ब्रिटिश फौजों के साथ इनकी लड़ाई हुईं, पर कोई फल प्रकट नहीं हुआ। फिर उन्होंने वृन्दावन की ओर कूच किया। इसी समय अंग्रेज सेनापति लॉड लेक मथुरा आ पहुँचे। फिर दोनों सेनाओं में मुठभेड़ हो गई और यह कई दिन तक चलती रही। बेचारे लॉर्ड लेक दिल्ली की ओर पीछे हटने लगे। होल्कर की फौजों ने उन्हें इतना तंग किया कि उनको पीछे हटना भी मुश्किल हो गया। बे ज्यों त्यों कर बड़ी मुश्किल से दिल्ली पहुँचे। इसके बाद होल्कर की फौज ने दिल्ली के किले पर आक्रमण किया पर अंग्रेजों ने उसे विफल कर दिया। इसके बाद यशवन्तराव शामली और फ़रुखाबाद पहुँच यहां से उन्होंने भरतपुर के राजा से लिखा-पढ़ी शुरू की और उनसे उन्हें अच्छी सहायता भी मिल गई। ब्रिटिश फौज भी डिग आ पहुंची। यहां पर युद्ध हुआ और उसमें अंग्रेजों को सफलता मिली। उन्होंने डिग के किले पर अधिकार कर लिया। होल्कर पीछे हटकर भरतपुर चले गये। ब्रिटिश फौज भी वहां आ धमकी। उसने भरतपुर के किले पर सात हमले किये पर उसे सफलता न मिली । इस ओर से प्रख्यात पिंडारी नेता अमीर खां ब्रिटिश मुल्क को बर्बाद करने के लिये भेजा गया। सन्‌ 1805 के मार्च में सिन्धिया ने होल्कर और अंग्रेजों के बीच समझौता करवाने का प्रयत्न किया, पर इसमें उन्हें सफलता न मिली। अंग्रेजों के साथ तो होलकर का मेल हुआ ही नहीं पर इसी साल मई में सिन्धिया के साथ इनका मेल हो गया। ये दोनों अपनी फौजों सहित सबलगढ़ में आ मिले। यशवन्तराव ने पेशवा, महाराजा रणजीत सिंह, भोंसला और अन्य कई राजा महाराजाओं को अंग्रेजों के ख़िलाफ़ खड़े होने के लिये लिखा। जयपुर के राजा, भोंसला और महाराजा रणजीत सिंह ने यशवन्तराव के अनुरोध को स्वीकार किया। पर इसी समय अंग्रेज एक राजनेतिक पेंतरा चले। उन्होंने सिन्धिया को अपनी ओर मिलाने के लिये उन्हें ग्वालियर और गोहद के किले, दस लाख रुपया नकद और होल्कर राज्य का कुछ अंश देने का प्रलोभन दिया। पहले तो सिन्धिया ने इस प्रलोभन से मुँह मोड़ लिया पर वे आखिर में होलकर से अलग हो गये। सन् 1805 की सन्धि के अनुसार उन्हें पुस्कार भी मिल गया। सन् 1805 में भरतपुर के राजा को भी अंग्रेजों से मिल जाने के लिये प्रलोभन दिया गया। सन्‌ 1805 के सितम्बर में यशवन्तराव जयपुर राज्य में और अक्टूबर में नारनोल और जिंद होते हुए पटियाला पहुँचे। पहले तो कई सिक्ख राजाओं ने यशवन्तराव को सहायता देने का वचन दिया था पर ठीक समय पर सब मुकर गये। इसका कारण यह था कि ब्रिटिश अधिकारियों ने कई प्रकार के प्रलोभन देकर इन्हें अपनी ओर मिला लिया था। जब यशवन्तराव ने देखा कि ब्रिटिश सेना उन्हें घेरना चाहती है तो वे बड़ी बुद्धिमानी के साथ ऐसे स्थान पर हट गये जहाँ से अंग्रेजों का मुकाबला सुगमता से किया जा सके और उन्हें सिक्ख राजाओं की भी सहायता मिल जाये। कहने की आवश्यकता नहीं कि अंग्रेजों के और यशवन्तराव के बीच छोटी मोटी कई लड़ाईयाँ हुई, पर इस वक्त दोनों दल थक गये थे। दोनों की आर्थिक स्थिति अत्यन्त शोचनीय हो गई थी। आखिर सन्‌ 1805 के दिसम्बर में दोनों के बीच सन्धि हो गई। इसके दो मास बाद उक्त सन्धि में कुछ ऐसे सुधार किये गये जिनसे यशवन्तराव को कुछ अधिक संतोष हो सके।

 

 

सन् 1802 और 1805 की लड़ाइयों में वीरवर यशवन्तराव होल्कर बिलकुल स्वतंन्त्र सत्ताधारी हो गये। उन्होंने तुकोजीराव महाराज के समय में, होल्कर राज्य को जो हक प्राप्त थे वे सब फिर से प्राप्त कर लिये। जयपुर, उदयपुर, कोटा, बूंदी और अन्य राजपूत रियासतों पर भी उनके पूर्वोपार्जित अधिकार फिर से कायम हो गये। भारतवर्ष के अन्य राजाओं में भी इनका दबदबा छा गया। यशवन्तराव धीरे धीरे कूच करते हुए पंजाब से लौट गये । अब भी वे अंग्रेजों को दुआब के लिये लिखते रहे। पर उन्हें इस कार्य में सफलता न हुई। राजपूताने में लौट कर उन्होंने उदयपुर और जयपुर से खिराज वसूल किया। फिर उन्होंने जोधपुर को सहायता देकर उस अहसान का बदला चुकाया जो जोधपुर राज्य ने एक युद्ध के समय उनके कुटुम्ब को आश्रय देकर किया था। निरन्तर युद्ध में लगे रहने के कारण-जैसा हम ऊपर कह चुके हैं-उनकी आर्थिक दशा अत्यन्त शोचनीय हो गईं थी। फौजों को वक्त पर तनख्वाह न मिलने से उनमें बगावत फैल गई थी। एक वक्त तो ( 1806) उन्हें अपनी बागी फौज को उसकी तनख्वाह की जमानत के बतौर अपने भतीजे खण्डेराव को सुपुर्द करना पड़ा था। खण्डेराव का शाहपुरा मुकाम पर हैजे के कारण देहान्त हो गया। इसके बाद यशवन्तराव होल्कर-राज्य के भानपुर ग्राम में आ गये। भानपुर आकर ये अपनी सेना और तोपखाने का यूरोपीय पद्धति के अनुसार संगठन करने लगे। वे तोंपे भी ढलवाने लगे। उसी समय उन्हें उन्माद रोग ने आ घेरा और उसी से सन्‌ 1811 में भानपुर मुकाम पर यशवन्तराव का देहान्त हो गया। आपके शव- दहन-स्थान पर भानपुर में एक विशाल छत्री बनी हुईं है।

 

 

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