मोहम्मद गौरी की मृत्यु कब हुई थी – मोहम्मद गौरी को किसने मारा था

मोहम्मद गौरी का जन्म सन् 1149 ईसवीं को ग़ोर अफगानिस्तान में हुआ था। मोहम्मद गौरी का पूरा नाम शहाबुद्दीन मोहम्मद गौरी था। मोहम्मद गौरी सन् 1173 में ग़ोर का शासक बना। मोहम्मद गौरी ने अपने जीवनकाल में कई बार भारत पर आक्रमण किये। मोहम्मद गौरी के भारत में किए गए आक्रमणों में सबसे प्रसिद्ध तराइन का प्रथम युद्ध और तराइन का दूसरा युद्ध है जिसमें पृथ्वीराज चौहान के साथ भीषण संग्राम हुआ, और अंत में पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु हुई। इनका जिक्र हम अपने पिछले लेखों में कर चुके हैं। मोहम्मद गौरी एक शूरवीर था। उसने अपना सम्पूर्ण जीवन युद्ध में वीरता दिखाते हुए काट दिया। अंत में उसे लौटे से मौत के घाट उतार दिया गया। अपने इस लेख में हम यही जानेंगे की मोहम्मद गौरी की मृत्यु कब हुई थी, मोहम्मद गौरी को किसने मारा था? मोहम्मद गौरी की मृत्यु किसने की, मोहम्मद गौरी की मृत्यु कब और कैसे हुई? मोहम्मद गौरी की मृत्यु कहां हुई।

 

 

 

तराइन के दूसरे युद्ध के बाद मोहम्मद गौरी का अजमेर पर आक्रमण

 

 

तराइन के दूसरे युद्ध में पृथ्वीराज चौहान को पराजित करके मोहम्मद गौरी की सेना ने अपने शिविर में लौटकर विश्राम किया और अपनी इस विजय की खुशी में उसने अनेक प्रकार की खुशियाँ मनायीं। उसके कई दिनों के बाद तुर्क सेना ने अजमेर में जाकर हमला किया। अब उसे किसी भारतीय राजा से आशंका न रह गयी थी। पृथ्वीराज चौहान की तरह दूसरा कोई राजा शक्तिशाली और स्वाभिमानवी था भी नहीं।

 

 

 

अजमेर को जीतने में मोहम्मद गोरी को अधिक देरी नहीं लगी।
उसके पतन के बाद ही तुर्क सेना वहाँ के वैभवशाली और सम्पन्न नगर को लूटना आरम्भ किया और बड़ी निर्दयता के साथ लुट-मार करने के बाद, तुर्क सेना ने अजमेर नगर में आग लगा दी और होली की तरह वह कितने ही दिनों तक जलता रहा।

 

 

 

अजमेर का विध्वंस और विनाश करने के बाद तुर्क सेना पुष्कर
की और रवाना हुईं और वहाँ पहुँच कर उसने वहाँ के प्रसिद्ध और
पवित्र मन्दिरों को लूटा। सोना, चाँदी और बहुमूल्य जावहारातो के रुप में वहाँ की सम्पति को लुटकर बाकी बचे हुये मन्दिरों को गिरा कर मिटी में मिला दिया गया।

 

 

 

पुष्कर से लौटकर गौरी की सेना ने झांसी, कोहराम, थानेश्वर
और दूसरे किलों पर अपना कब्जा कर लिया। उन किलों पर उसने अपनी सेनायें रखीं और गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक को मोहम्मद गौरी ने दिल्‍ली के शासन का अधिकार सौंपा। कुछ दिनों तक वहाँ पर उसकी सेना ने विश्राम किया और इसके बाद, इस बार की यात्रा में लूटी हुई सम्पूर्ण सम्पति अपने साथ सुरक्षित लेकर वह ग़जनी लौट गया।

 

 

 

गज़नी में जाकर मोहम्मद गौरी ने करीब-करीब दो वर्ष तक
अपनी सेना के साथ विश्वाम किया और भारत में होने वाली अपनी
विजय की खुशियाँ मनाई। इसके बाद उसने फिर इस देश में चढ़ाई करने का इरादा किया और जिस कन्नौज के राजा जयचन्द ने भारत में आकर पृथ्वीराज पर आक्रमण करने का उसे परामर्श दिया था, उस पर हमला करने, उसके राज्य को लूटने और अपने अधिकार में कर लेने का निर्णय किया। इस आधार पर उसने फिर अपनी सेना को तैयार किया और गज़नी से रवाना होकर वह भारत में आया। सन्‌ 1194 ईसवीं में उसने अपनी शक्तिशाली सेना को लेकर कन्नौज पर श्राक्रमण किया। जयचन्द ने अपनी सेना को लेकर उसका मुकाबिला किया। अपनी निर्बलता को वह स्वयं जानता था और उसकी सहायता करने वाला भी कोई न था जो मोहम्मद गौरी की इस विशाल सेना का मुकाबला कर सकता था, और अब वह पृथ्वीराज चौहान भी नहीं था, जिसने एक बार मोहम्मद गौरी को तराइन के पहले युद्ध में भीषण पराजय देकर मरणासन्न अवस्था में भारत से भागने के लिये विवश किया था, वह वीर पृथ्वीराज चौहान, जयचन्द के देशद्रोह के ही कारण आज संसार में न था। आज जयचन्द की सहायया कौन करता। जिन छोटे-छोटे राजाओं और नरेशों से जयचन्द का कन्नौज राज्य घिरा हुआ था, वे स्वयं तुर्के सेना के हमलों से घबरा रहे थे और अपनी सुरक्षा के लिए भगवान से प्रार्थना कर रहे थे। जयचन्द की सहायता कौन करता।

 

 

 

कन्नौज के राजा जयचन्द को पराजित करके महोम्मद गौरी की तुर्क सेना ने कन्नौज राज्य और उसके नगर को भली प्रकारों से लूटा। राज्य का खजाना और उसकी बहूमुल्य सम्पत्ति अपने कब्जे में कर के उसने राज्य का विध्वंस किया। इसके बाद उसने वहाँ की लूटी हुई सम्पत्ति को दस हजार ऊँटों पर लाद कर फिर गज़नी चला गया।

 

मोहम्मद गौरी की मृत्यु
मोहम्मद गौरी की मृत्यु

 

 

 

मोहम्मद गौरी की मृत्यु कब और कैसे हुई थी

 

 

पृथ्वीराज को परास्त करने के बाद, भारत के आक्रमणों में मोहम्मद गौरी को भयभीत होने का कोई कारण न रह गया था। इस देश के कितने ही किलों में मुस्लिम सेनायें पड़ी थीं और दिल्ली के एक विस्तृत राज्य का शासन गौरी ने कुतुबुद्दीन ऐबक के अधिकार में दे दिया था। अब तो मोहम्मद गौरी का एक सीधा-सा काम यह था कि वह अपनी एक सेना के साथ गजनी से रवाना होता और भारत में पहुंच कर लूट धन एकत्रित करता और उसे लाद कर वह अपने साथ गज़नी ले जाता। उसने एक बार नहीं अनेक बार ऐसा ही किया और प्रत्येक बार वह जितना धन भारत से अपने साथ गजनी ले जा सकता, ले जाता।

 

 

 

इन्हीं दिनों में मुस्लिम शासन के विरुद्ध भारत के गक्कर लोगों ने
विप्लव किया। भारत में फैलने वाले मुस्लिम शासन के अत्याचारों से ऊब कर उन लोगों ने संगठित होकर तुर्कों के साथ युद्ध करने का निश्चय किया। उन दिनों में मुलतान और उसके आस पास गक्कर लोगों की घनी आबादी थीं। तुर्को के विरुद्ध क्रान्ति और युद्ध करने के लिए स्थान स्थान पर उन लोगों की सलाहें होने लगीं। साहस और सावाधानी के साथ उन लोगों ने स्वतंत्रता की आवाजें उठायी।

 

 

 

थोड़े दिनों में ही स्वतंत्रता की लहरे मुलतान और उसके आस पास
दूर तक गक्करों में फैल गई गयी। प्रत्येक गक्कर स्वतंत्रता के इस युद्ध के लिए अपनी तैयारी करने लगा और यह विप्लव उन दिलों में गक्कर विप्लव के नाम से प्रकट हुआ। संगठित होकर गक्करों ने अपने बीच में राजा का निर्वाचन किया और निर्वाचित नरेशों के नेतृत्व में उन्होंने कार्य करना आरम्भ किया।

 

 

 

इन दिनों में मोहम्मद गौरी की शक्तियां मध्य एशिया के विरोधी
देशों की ओर लग रही थीं। यह अवसर देख कर तेजी के साथ गक्‍कर लोग संगठित हुए और एक बड़ी संख्या में शत्रों से सुसज्जित होकर वे लाहौर की तरफ रवाना हुए। वहाँ के मुसलमानों पर जा कर उन्होंने हमला किया। एक तरफ से वहाँ के मुसलमानों का कत्ल किया गया और लाहौर के किले में तेजी के साथ गक्कर सेना ने पहुँच कर तुर्क सेना को घेर लिया। कुछ समय तक उस किले में तुर्की सेना ने युद्ध किया अन्त में उसकी पराजय हुई और गक्कर सेना ने तुर्के सेना को काटकर खत्म कर दिया। इसके बाद, गक्कर सेना के सैनिकों ने स्वतंत्रत रूप से घूमना शुरू कर दिया और जहाँ कहीं कोई मुसलमान मिलता, उसको वे जान से मार डालते। कुछ ही समय के बाद, सिन्ध और सतलुज नदियों के बीच मुसलमानों का नाम मिट गया।

 

 

 

 

गक्‍कर के इस विप्लत का समाचार मध्य एशिया के किसी स्थान में मोहम्मद गौरी को मिला और सुना कि मुलतान में गक्कर जाति के लोगों ने संगठित होकर सतलुज से ले कर सिन्धु नदी तक मुसलमानों का नाश किया है। मोहम्मद गौरी अपनी सेना ले कर वहाँ से लौट पड़ा और भारत की तरफ रवाना हुआ। कुतुबुद्दीन ऐबक ने भी यह समाचार पाते ही अपनी सेना के साथ रवाना होकर गक्करों पर हमला किया और उसी मौके पर गौरी भी अपनी सेना ले कर वहाँ आ गया।

 

 

 

एक और गक्करों की संगठित सेना थी दूसरी ओर मोहम्मद गौरी की विशाल और शक्तिशाली सेना के साथ कुतुबुद्दीन ऐबक की सेना भी थी। इस अपार मुस्लिम सेनाओं के सामने गक्कर सैनिकों की संख्या कुछ भी न थी। फिर भी बहादुर गक्करों ने स्थान-स्थान पर जमकर युद्ध किया। तुर्क सवारों की तलवारों से हजारों गक्‍कर जान से मारे गये और उनके खून की स्थान-स्थान पर नालियाँ बहीं। लेकिन गक्करों ने पराजय स्वीकार नहीं की। उन लोगों ने निश्चय कर लिया कि जब तक गक्‍कर जाति का एक आदमी भी बाकी रहेगा, युद्ध बराबर जारी रहेगा।

 

 

 

स्वाधीनता के लिए बलिदान होने वाले गक्करों का युद्ध उस विशाल तुर्क सेना के साथ आखिरकार कब तक चल सकता था। गक्करों की संख्या लगातार कम होती गयी और युद्ध में गक्‍कर कमजोर पड़ते गये। बहुत थोड़ी संख्या में रह जाने के बाद गक्कर युद्ध से भागे और मोहम्मद गौरी की विजय हुई। गक्करों को चारों तरफ पराजित कर के और उन्हें भगा कर मोहम्मद गौरी ने अपनी सेना के साथ लौट कर सिन्धु नदी को पार किया और दूसरी तरफ जाकर, नदी के किनारे से कुछ ही फासले पर सन्‌ 1206 ईसवीं के गर्मी के दिनों में उसने मुकाम किया। बहुत दिनों की लगातार यात्रा और युद्ध के कारण तुर्क सेना थक गयी थी।

 

 

 

गर्मी की रात थी, महीनों की यात्रा और युद्ध की थकावट थी।
रात को ठंडी हवा के चलते ही गौरी की सेना गहरी नीद में आ गयी। ठीक आधी रात को एक गक्करों का लम्बा गिरोह सिन्धु नदी के पानी में उतरा और उसके गहरे जल को पार कर दूसरी तरफ निकल गया। बाहर एक ऊँचाई पर खड़े होकर उस गिरोह के लोगों ने तुर्क सेना के मुकाम की ओर देखा। रात को तेज और शीतल वायु में उन्हें तुर्क सेना गहरी नींद में सोती हुई मालुम हुईं।

 

 

 

उस गिरोह के आदमियों ने अपने स्थान पर क्षण-भर खड़े रह कर
कुछ सोचा। वे नंगे बदन थे और अपने हाथों में तेज भाले और तलवारों को लिए हुए थे। उन आदमियों ने अपने स्थान से धीरे धीरे चलता शुरू किया। वे बड़ी सावधानी के साथ तुर्क सेना की ओर रवाना हुए। उन सभी आदमियों के सामने कुछ फासलें पर एक मजबूत और ऊंचा आदमी चल रहा था। जो तुर्क सैनिक पहरे पर थे, वे भी शिथिल और निद्रिंत हो रहे थे । निद्राभिभूत तुर्क सेना पर एक साथ वे सभी लोग बिजली की तरह टूट पड़े और सब से पहले पहरे पर जो तुर्क मिले, उनको काट कर फेंक दिया। सोये हुए तुर्क सैनिकों के बीच में लेटे हुए मोहम्मद गौरी के निकट पाँच गक्कर पहुँच गये, मोहम्मद गौरी के ऊपर दो तातारी पंखा कर रहे थे और अधनिद्रिंत अवस्था में कूल रहे थे। पाँचों गक्करों ने एक साथ मोहम्मद गौरी पर आक्रमण किया और उसके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर डाले। और इस तरह मोहम्मद गौरी की मृत्यु हो गई। बात की बात में बहुत से तुर्क सवार लेटे हुए मारे गये।

 

 

उसके बाद जागते ही जो तुर्क उठ कर अपनी तलवार को इधर-उधर देखना शुरू करता, उसी समय वह तलवार के घाट उतार दिया जाता। तुर्क सैनिकों के सम्हलते-सम्हलते गक्करों ने उनको एक बड़ी संख्या में काट कर फेंक दिया। इसके बाद आक्रमणकारी वहाँ से तेजी के साथ भागे और रात के अन्धकार में बड़ी सावधानी के साथ नदी के पानी में उतर कर, तेजी से तैराते हुए वे दूसरी तरफ निकल गये।

 

 

 

कुछ तुर्क सवारों ने मोहम्मद गौरी के निकट जा कर देखा। उसके
शरीर के बहुत से टुकड़े हो गये थे और इस प्रकार 15 मार्च सन् 1206 में मोहम्मद गौरी की मृत्यु हो चुके थी। आक्रमणकारी और कोई न थे, स्वतन्त्रता पर बलिदान होने वाले गक्करों का एक गिरोह था, जिसने इस प्रकार साहस करके मोहम्मद गौरी को मृत्युलोक में भेज दिया, जहाँ से लौटकर वह फिर कभी न आये।

 

 

 

सन्‌ 1206 ईसवी में मोहम्मद गौरी अपने अन्यायों और अत्याचारों का अत्यन्त भारी बोझ सिर पर लाद कर संसार से बिदा हो गया। दिल्ली के राज्य का अधिकारी गौरी का अत्यन्त विश्वास पात्र कुतुबुद्दीन ऐबक भी अधिक दिनों तक जीवित न रहा। मोहम्मद गौरी की मृत्यु के चार वर्ष बाद, सन्‌ 1210 ईसवी में उसकी भी मृत्यु हो गयी। बहुत छोटी अवस्था में वह तुर्किस्तान के गुलामों के बाजार से खरीद कर खुरासान लाया गया था। वहीं पर उसका पालन-पोषण हुआ और कुछ शिक्षा भी दी गयी। इसके बाद जब वह बड़ा हुआ तो बेचने के उद्देश्य से वह व्यापारियों के एक काफिले के साथ गज़नी भेजा गया था। मोहम्मद गौरी ने वहां के बाजार में उसे खरीद कर अपने यहाँ रख लिया और अपनी सेना में उसे भर्ती कर लिया। इसके बाद एक अत्यन्त शूरवीर सैनिक की हैसियत से उसने गौरी की सेना में काम किया। थोड़े ही दिनों में अपनी वीरता के कारण वह गौरी की सेना का एक प्रसिद्ध सेनापति हुआ और अन्त में दिल्‍ली के प्रसिद्ध राज्य का वह शासक बनाया गया।

 

 

 

मोहम्मद गौरी और कुतुबुद्दीन ऐबक दोनों के जीवन का गहरा
सम्पर्क रहा । गौरी के हमलों में उसकी सफलता का श्रेय कुतुबुद्दीन ऐबक को था और कुतुबुद्दीन को गुलामी से उठाकर सेनापति और शासक बनाने का श्रेय यह मोहम्मद गौरी को मिला। दोनों के जीवन का एक साथ उत्थान हुआ और एक साथ अन्त हुआ।

 

 

 

हमारे यह लेख भी जरूर पढ़े:—–

 

 

झेलम का युद्ध
झेलम का युद्ध भारतीय इतिहास का बड़ा ही भीषण युद्ध रहा है। झेलम की यह लडा़ई इतिहास के महान सम्राट Read more
चंद्रगुप्त मौर्य और सिकंदर का युद्ध
चंद्रगुप्त मौर्य और सिकंदर का युद्ध ईसा से 303 वर्ष पूर्व हुआ था। दरासल यह युद्ध सिकंदर की मृत्यु के Read more
शकों का आक्रमण
शकों का आक्रमण भारत में प्रथम शताब्दी के आरंभ में हुआ था। शकों के भारत पर आक्रमण से भारत में Read more
हूणों का आक्रमण
देश की शक्ति निर्बल और छिन्न भिन्न होने पर ही बाहरी आक्रमण होते है। आपस की फूट और द्वेष से भारत Read more
खैबर की जंग
खैबर दर्रा नामक स्थान उत्तर पश्चिमी पाकिस्तान की सीमा और अफ़ग़ानिस्तान के काबुलिस्तान मैदान के बीच हिन्दुकुश के सफ़ेद कोह Read more
अयोध्या का युद्ध
हमनें अपने पिछले लेख चंद्रगुप्त मौर्य और सेल्यूकस का युद्ध मे चंद्रगुप्त मौर्य की अनेक बातों का उल्लेख किया था। Read more
तराईन का प्रथम युद्ध
भारत के इतिहास में अनेक भीषण लड़ाईयां लड़ी गई है। ऐसी ही एक भीषण लड़ाई तरावड़ी के मैदान में लड़ी Read more
तराइन का दूसरा युद्ध
तराइन का दूसरा युद्ध मोहम्मद गौरी और पृथ्वीराज चौहान बीच उसी तरावड़ी के मैदान में ही हुआ था। जहां तराइन Read more
चित्तौड़ पर आक्रमण
तराइन के दूसरे युद्ध में पृथ्वीराज चौहान के साथ, चित्तौड़ के राजा समरसिंह की भी मृत्यु हुई थी। समरसिंह के तीन Read more
मेवाड़ का युद्ध
मेवाड़ का युद्ध सन् 1440 में महाराणा कुम्भा और महमूद खिलजी तथा कुतबशाह की संयुक्त सेना के बीच हुआ था। Read more
पानीपत का प्रथम युद्ध
पानीपत का प्रथम युद्ध भारत के युद्धों में बहुत प्रसिद्ध माना जाता है। उन दिनों में इब्राहीम लोदी दिल्ली का शासक Read more
बयाना का युद्ध
बयाना का युद्ध सन् 1527 ईसवीं को हुआ था, बयाना का युद्ध भारतीय इतिहास के दो महान राजाओं चित्तौड़ सम्राज्य Read more
कन्नौज का युद्ध
कन्नौज का युद्ध कब हुआ था? कन्नौज का युद्ध 1540 ईसवीं में हुआ था। कन्नौज का युद्ध किसके बीच हुआ Read more
पानीपत का द्वितीय युद्ध
पानीपत का प्रथम युद्ध इसके बारे में हम अपने पिछले लेख में जान चुके है। अपने इस लेख में हम पानीपत Read more
पंडोली का युद्ध
बादशाह अकबर का चित्तौड़ पर आक्रमण पर आक्रमण सन् 1567 ईसवीं में हुआ था। चित्तौड़ पर अकबर का आक्रमण चित्तौड़ Read more
हल्दीघाटी का युद्ध
हल्दीघाटी का युद्ध भारतीय इतिहास का सबसे प्रसिद्ध युद्ध माना जाता है। यह हल्दीघाटी का संग्राम मेवाड़ के महाराणा और Read more
सिंहगढ़ का युद्ध
सिंहगढ़ का युद्ध 4 फरवरी सन् 1670 ईस्वी को हुआ था। यह सिंहगढ़ का संग्राम मुग़ल साम्राज्य और मराठा साम्राज्य Read more
दिवेर का युद्ध
दिवेर का युद्ध भारतीय इतिहास का एक प्रमुख युद्ध है। दिवेर की लड़ाई मुग़ल साम्राज्य और मेवाड़ सम्राज्य के मध्य में Read more
करनाल का युद्ध
करनाल का युद्ध सन् 1739 में हुआ था, करनाल की लड़ाई भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। करनाल का Read more
प्लासी का युद्ध
प्लासी का युद्ध 23 जून सन् 1757 ईस्वी को हुआ था। प्लासी की यह लड़ाई अंग्रेजों सेनापति रॉबर्ट क्लाइव और Read more
पानीपत का तृतीय युद्ध
पानीपत का तृतीय युद्ध मराठा सरदार सदाशिव राव और अहमद शाह अब्दाली के मध्य हुआ था। पानीपत का तृतीय युद्ध Read more
ऊदवानाला का युद्ध
ऊदवानाला का युद्ध सन् 1763 इस्वी में हुआ था, ऊदवानाला का यह युद्ध ईस्ट इंडिया कंपनी यानी अंग्रेजों और नवाब Read more
बक्सर का युद्ध
भारतीय इतिहास में अनेक युद्ध हुए हैं उनमें से कुछ प्रसिद्ध युद्ध हुए हैं जिन्हें आज भी याद किया जाता Read more
आंग्ल मैसूर युद्ध
भारतीय इतिहास में मैसूर राज्य का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है। मैसूर का इतिहास हैदर अली और टीपू सुल्तान Read more
आंग्ल मराठा युद्ध
आंग्ल मराठा युद्ध भारतीय इतिहास में बहुत प्रसिद्ध युद्ध है। ये युद्ध मराठाओं और अंग्रेजों के मध्य लड़े गए है। Read more
1857 की क्रांति
भारत में अंग्रेजों को भगाने के लिए विद्रोह की शुरुआत बहुत पहले से हो चुकी थी। धीरे धीरे वह चिंगारी Read more
1971 भारत पाकिस्तान युद्ध
भारत 1947 में ब्रिटिश उपनिषेशवादी दासता से मुक्त हुआ किन्तु इसके पूर्वी तथा पश्चिमी सीमांत प्रदेशों में मुस्लिम बहुमत वाले क्षेत्रों Read more

 

 

ईरान इराक का युद्ध
1979 में ईरान के शाह रजा पहलवी के गद्दी छोड़कर भागने तथा धार्मिक नेता अयातुल्लाह खुमैनी के आगमन से आंतरिक Read more
फॉकलैंड द्वीपसमूह
भोगौलिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से फॉकलैंड ब्रिटेन की अपेक्षा अर्जेण्टीना के काफी निकट है किन्तु ब्रिटेन उसे अपना उपनिवेश मानता Read more
वियतनाम का युद्ध
भारत के दक्षिण-पूर्व में एक छोटा-सा देश है वियतनाम सोशलिस्ट रिपब्लिक। 69 वर्षों तक फ्रांसीसी उपनिवेश रहने के बाद 1954 Read more
प्रथम विश्व युद्ध
यूं तो प्रथम विश्व युद्ध का आरंभ सर्ब्रियनवासी राष्ट्रवादी (Serbian Nationalist) द्वारा आस्ट्रिया के राजकुमार आर्कडयूक फ्रैंज फर्डिनैंड (Archduke Franz Ferdinand) Read more
अरब इजरायल युद्ध
द्वितीय विश्य युद्ध की समाप्ति के बाद 14 मई, 1948 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने ब्रिटिश आधिपत्य के फिलिस्तीनी भू-क्षेत्र Read more
बाल्कन युद्ध
दक्षिण पूर्वी यूरोप के बाल्कन प्रायद्वीप (Balkan Peninsula) के देश तुर्क साम्राज्य की यातनापूर्ण पराधीनता से मुक्त होना चाहते थे। Read more
रूस जापान युद्ध
20वीं सदी के प्रारम्भ में ज़ारशाही रूस ने सुदूर पूर्व एशिया (For East Asia) के दो देशों, मंचूरिया और कोरिया पर Read more
फ्रांस प्रशिया युद्ध
प्रिंस ओट्टो वॉन बिस्मार्क (Prince Otto Van Bismarck) को इसी युद्ध ने जर्मन साम्राज्य का संस्थापक और प्रथम चांसलर बना Read more
क्रीमिया का युद्ध
तुर्क साम्राज्य के ईसाइयों को सुरक्षा प्रदान करने के बहाने रूस अपने भू-क्षेत्र का विस्तार कॉस्टेंटिनोपल (Constantinople) तक करके भूमध्य सागर Read more
वाटरलू का युद्ध
वाटरलू का युद्ध 1815 में लड़ा गया था। यह युद्ध बेल्जियम में लडा़ गया था। नेपोलियन का ये अन्तिम युद्ध Read more
Battle of Salamanca
स्पेन फ्रांस का मित्र देश था किंतु नेपोलियन नहीं चाहता था कि यूरोप में कोई भी ऐसा देश बचा रह Read more
Austerlitz war
जुलाई, 1805 में ब्रिटेन, आस्ट्रिया, रूस और प्रशिया ने मिलकर नेपोलियन से टककर लेने का निर्णय किया। जवाब में नेपोलियन ने Read more
सप्तवर्षीय युद्ध
सात वर्षों तक चलने वाले इस युद्ध मे एक ओर ऑस्टिया, फ्रांस, रूस, सैक्सोनी, स्वीडन तथा स्पेन और दूसरी तरफ Read more
तीस वर्षीय युद्ध
यूरोप मे धार्मिक मतभेदों विशेष रुप से कैथोलिक (Catholic) तथा प्रोस्टेंटस (Protestents) के बीच मतभेदों के कारण हुए युद्धों में Read more
गुलाब युद्ध
पंद्रहवीं शताब्दी में ब्रिटेन मे भयानक गृहयुद्ध हुए। इनकी शुरुआत तब हुई जब ब्रिटेन का, तत्कालीन शासक हेनरी छठम (Henri Read more
सौ वर्षीय युद्ध
लगभग 135 वर्षों तक फ्रांस और ब्रिटेन के बीच चलने वाले इस सौ वर्षीय युद्ध का आरम्भ तब हुआ जब ब्रिटेन Read more
धर्मयुद्ध
येरूशलम (वर्तमान मे इसरायल की राजधानी) तीन धर्मों की पवित्र भूमि हैं। ये धर्म हैं- यहूदी, ईसाई और मुस्लिम। समय-समय Read more
रोमन ब्रिटेन युद्ध
महान रोमन सेनानायक जूलियस सीजर (Julius Caesar) ने दो बार ब्रिटेन पर चढ़ाई की। 55 ई.पू. और 54 ई.पू. में। Read more
प्यूनिक युद्ध
813 ई.पू. में स्थापित उत्तरी अफ्रीका का कार्थेज राज्य धीरे-धीरे इतना शक्तिशाली हो गया कि ई.पू तीसरी-दूसरी शताब्दी में भूमध्यसागरीय Read more
एथेंस स्पार्टा युद्ध
प्राचीन यूनान के दो राज्य-प्रदेशो एथेंस और स्पार्टा में क्षेत्रीय श्रेष्ठता तथा शक्ति की सर्वोच्चता के लिए प्रतिदंद्धिता चलती रहती थी। Read more
थर्मापायली का युद्ध
पूर्व-मध्य यूनान में एक बड़ा ही सेकरा दर्रा है- थर्मापायली। यह दर्रा उत्तरी मार्ग से यूनान में आने-जाने का मुख्य Read more
मैराथन का युद्ध
ई.पू. पांचवीं-छठी शताब्दी में फारस के बादशाहों का बड़ा बोलबाला था। एजियन सागर (Aegean sea) के निकट के लगभग सभी Read more
ट्रॉय का युद्ध
1870 में जर्मन पुरातत्ववेत्ता (Archaeology) हेनरिक श्लिमैन (Henrich Schliemann) ने पहली बार सिद्ध किया कि टॉय का युद्ध यूनानी कवि होमर Read more
1971 भारत पाकिस्तान युद्ध
भारत 1947 में ब्रिटिश उपनिषेशवादी दासता से मुक्त हुआ किन्तु इसके पूर्वी तथा पश्चिमी सीमांत प्रदेशों में मुस्लिम बहुमत वाले क्षेत्रों Read more

write a comment