मालखेड़ा का इतिहास – मालखेड़ा का किला

मालखेड़ा का किला

मालखेड़ा भारत केकर्नाटक राज्य के गुलबर्ग ज़िले में स्थित एक ऐतिहासिक गाँव है। पहले इसका नाम मान्यखेट था। इसका आधुनिक नाम मालखेड़ा है। आठवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में मान्यखेड़ में चालुक्यों का शासन था। इस शताब्दी के उत्तरार्ध में यहाँ राष्ट्रकूट शासकों ने अपना आधिपत्य कर लिया था। राष्ट्रकूट शासक पहले चालुक्य शासकों के सामंत थे। राष्ट्रकूट वंश के शासन की स्थापना करने वाला दंतिदुर्ग अपने अधिपति विक्रमादित्य द्वितीय की ओर से अवनिजनाश्रय पुलकेसिन के साथ अरबों के साथ युद्ध करने गया और उन्हें बुरी तरह हराया।

मालखेड़ा का इतिहास – मान्यखेड़ का इतिहास

743 ईस्वी में उसने विक्रमादित्य द्वितीय के साथ पल्‍लवों को हराया। 744 में विक्रमादित्य द्वितीय की मृत्यु हो गई। इसके बाद उसने नंदीपुरी के गुर्जर राज्य, मालवा और मध्य प्रदेश को जीता। 753 ई० में उसने चालुक्य राजा कीर्तिवर्मन को हराकर महाराष्ट्र पर भी अधिकार कर लिया। इस प्रकार 753 में एक स्वतंत्र राष्ट्रकूट राज्य का उदय हुआ।

दंतिदुर्ग ने अपनी राजधानी मान्यखेट ( मालखेड़ा ) बनाई। उसके बाद शासन की बागडौर संभालने वाले कृष्ण प्रथम (758-73) ने तो चालुक्य राज्य को पूरी तरह ही समाप्त कर दिया। उसने मैसूर के गंग राजा पर आक्रमण किया। उसके पुत्र गोविंदराज ने वेंगी के चालुक्य राजा विष्णुवर्धन चतुर्थ को हराकर समस्त हैदराबाद राज्य को राष्ट्रकूट राज्य में मिला लिया। उसने राहप्प नामक राजा को हराकर दक्षिणी कोंकण पर भी आधिपत्य जमाया। एलोरा का प्रसिद्ध कैलाश मंदिर उसी ने बनवाया था।

उसके बाद गोविंद द्वितीय राजा बना। वह एक निर्बल शासक था। 780 में उसके छोटे भाई ध्रुव ने उसे गद्दी से उतार दिया। ध्रुव ने 3 वर्ष तक राज्य किया। वह अपनी विजयों के लिए प्रसिद्ध हुआ। उसने गंग राजा श्री पुरुषमुत्तरस और वेंगी के चालुक्य राजा विष्णुवर्धन चतुर्थ को हराया। पल्‍लव राजा दंतिवर्मन ने उसे कुछ हाथी भेंट किए। उसने दोआब में प्रतिहार राजा वत्सराज को हराया। वत्सराज द्वारा मगध और बंगाल के राजा धर्मपाल से छीने गए दो सफेद छत्र और बंगाल की लूट भी ध्रुव के हाथ लगी। उसने धर्मपाल को भी हराया।

मालखेड़ा का किला
मालखेड़ा का किला

उसके बाद गोविंद तृतीय शासक हुआ। गोविंद तृतीय ने सबसे पहले अपने भाई स्तंभ के विद्रोह को दबाया और पल्‍लव राजा दंतिग को बहुत से हाथी देने को विवश किया। ध्रुव के दक्षिण चले जाने के बाद गौड़ राजा धर्मपाल ने उसके समर्थक इंद्रायुद्ध को हराकर चक्रायुद्ध को कन्नौज का राजा बना दिया था। प्रतिहार राजा वत्सराज के पुत्र नागभट्ट द्वितीय ने भी उसके कई जनपदों पर अधिकार कर लिया था। उसने चक्रायुद्ध को हटाकर इंद्रायुद्ध को पुनः राजा बनाया और 802 में नागभट्ट द्वितीय को हराया। परंतु नागभट्ट द्वितीय ने धीरे-धीरे अपनी शक्ति बढ़ाकर 810 में कन्नौज को जीतकर उसे अपनी राजधानी बना लिया।

गोविंद ने वेंगी के चालुक्य राजा विजयादित्य द्वितीय के विरुद्ध उसके छोटे भाई भीम सालुकी की सहायता की और वहाँ भी अपना आधिपत्य स्थापित किया। उसने पल्‍लव, पांड्य, केरल और गंग राजाओं द्वारा उसके विरुद्ध बनाए गए संगठन को
तोड़ा। लंका के राजा ने उससे मैत्री संबंध कायम किया। उसके उत्तराधिकारी अमोघवर्ष या शर्व ने 814 से 878 तक राज्य किया। उसके काल में वेंगी के चालुक्य राजा विजयादित्य द्वितीय ने विद्रोह कर दिया। उसने उसे 830 में हराकर वेंगी को अपने साम्राज्य में मिला लिया। उसके काल में गंग वंश के राजा स्वतंत्र हो गए।

850 ई० में उसने चालुक्य राजा विजयादित्य तृतीय को हराकर उसे अपना आधिपत्य मानने को विवश कर दिया, परंतु विजयादित्य तृतीय कुछ समय बाद उसके आधिपत्य से मुक्त हो गया। अमोघवर्ष के बाद कृष्ण द्वितीय (878-914) को भी उसने हराया। कृष्ण ने चालुक्य राजा भीम को हराकर बंदी बना लिया। बाद में उसने उसे वेंगी का सामंत बना दिया। बाद में भीम ने विद्रोह किया, परंतु हार गया। कृष्ण द्वितीय के काल में प्रतिहार राजा भोज ने 888 में मालवा और काठियावाड़ पर अधिकार कर लिया।

कृष्ण द्वितीय के उत्तराधिकारी इंद्र तृतीय (914-22) ने प्रतिहार राजा महीपाल को हराकर कन्नौज पर अधिकार कर लिया। उसके बाद गोविंद चतुर्थ (अपने बड़े भाई द्वितीय को हराकर), अमोघवर्ष तृतीय (936-39) और कृष्ण तृतीय राजा बने। कृष्ण तृतीय ने अपने जीजा गंग राजा बूतुग की सहायता से 943 में काँची और तंजौर पर अधिकार कर लिया। 949 में टक्कोल के युद्ध में उसने चोल राजा परांतक को फिर हराया। अपनी इस विजय के बाद उसने रामेश्वर में एक स्तंभ बनवाया। उसने तोंडैमंडल पर भी अधिकार किया। 963 के बाद उसने परमार राजा सीयक को हराकर उज्ज्यीनी पर अधिकार कर लिया। उसने वेंगी पर भी अपना आधिपत्य स्थापित किया। कृष्ण तृतीय के बाद कृष्ण चतुर्थ (965-67), खोटिटग 967 ई० में) और कर्क्क द्वितीय सिंहासन पर बैठे। खोट्टिग के काल में परमार राजा सीयक नें मालखेड़ा पर आक्रमण करके उसे खूब लूटा। उसके समय में बीजापुर जिले का चालुक्य वंशीय तैल द्वितीय 975 में दक्षिण भारत में स्वतंत्र हो गया।

मालखेड़ा का किला

मालखेड़ा का किला भीमा नदी की एक सहायक नदी कगीना नदी के बाएं किनारे पर गुलबर्गा से लगभग 40 किमी दक्षिण-पूर्व में स्थित ऐतिहासिक महत्व का स्थान है। इसे पहले मान्यखेड के नाम से जाना जाता था, मालखेड़ा किला राष्ट्रकूट राजाओं की राजधानी भी माना जाता है। मालखेड़ा में आज एक किले के अवशेष हैं जिसमें चार प्रवेश द्वार और 52 गढ़ हैं। और गाँव में एक प्राचीन मल्लीनाथ बसदी है, जिसमें एक गर्भगृह, एक नवरंग और एक हजारा शामिल हैं। इस बसदी में प्राकृत, संस्कृत और कन्नड़ भाषाओं की लगभग 59 पांडुलिपियाँ मिली हैं। इश्वर मंदिर और हनुमंता मंदिर नाम के दो मंदिर भी यहाँ स्थित हैं। किले में, एक जुम्मा मस्जिद और कुछ दरगाहें भी पाई जाती हैं।

मालखेड़ा किले के अंदर के आकर्षण

मोटी बाहरी दीवारें 20 फुट ऊंची चूना पत्थर के ब्लॉक (जिन्हें शाहबाद के पत्थरों के रूप में जाना जाता है) से निर्मित है। लकड़ी के दरवाजों के अवशेष के साथ मुख्य प्रवेश द्वार वॉचटावर तक पहुँचने के लिए संकरी और घुमावदार सीढ़ियाँ और पुराना हनुमान मंदिर मालखेड़ा किले के अंदर ऊंचे स्थानों से काबिनी नदी का दृश्य। काला दरगा या काली मस्जिद, जैन मंदिर, एक महल के खंडहर, तोपों का हिस्सा

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