महाराणा कुम्भा का इतिहास और जीवन परिचय

महाराणा कुम्भा

राणा मोकल के बाद उनके पुत्र महाराणा कुम्भा ने मेवाड़ के गौरवशाली राज्य-सिंहासन को सुशोभित किया। मेवाड़ के जिन महापराक्रमी राणाओं ने अपने अपूर्व वीरत्व, अद्वितीय स्वार्थत्याग आदि दिव्यगुणों से भारतवर्ष के इतिहास को उज्ज्वल किया है, उनमें महाराणा कुम्भाका आसन सर्वोपरि है। उन्होंने जो जो महान विजय प्राप्त की हैं, उनका न केवल मेवाड़ के इतिहास में, वरन भारतवर्ष के इतिहास में बड़ा महत्व है। इन प्रतापी महाराणा कुम्भा का पूर्ण परिचय देने के प्रथम यह आवश्यक है कि तत्कालीन भारतवर्ष की परिस्थिति पर कुछ प्रकाश डाला जावे। जिस समय मेवाड़ में परम तेजस्वी, परम पराक्रमी और परम राजनीतिज्ञ महाराणा कुम्भा का उदय हो रहा था, उस समय दुर्दांत तैमूरलंग ने भारतवर्ष पर आक्रमण कर दिल्ली को बर्बाद कर दिल्ली के तत्कालीन मुसलमान तुगलक बादशाह की ताकत को तोड़ डाला था। यद्यपि तैमूरलंग के लौट जाने पर मुहम्मद तुगलक दिल्‍ली को वापस लौट आया था, पर इस वक्त वह अपनी सारी प्रतिष्ठा, प्रभाव और तेज को खो चुका था। इस वक्त वह केवल नाम मात्र का बादशाह रह गया था। इससे मालवा, गुजरात , और नागौर के सल्तानों ने इसकी अधीनता से निकल कर स्वतन्त्रता की घोषण कर दी थी। इस वक्त इनकी शक्ति का सूर्य खूब तेजी से चमकने लगा था। कहना न होगा, पंद्रहवीं सदी के मध्य में इन्हीं बढ़ती हुई शक्तियों से महाराणा कुम्भा को मुकाबला करना पड़ा था।

 

महाराणा कुम्भा का इतिहास व जीवन परिचय हिन्दी में

 

सन्‌ 1297 तक गुजरात, सुप्रख्यात चालुक्य वंश की बघेला शाखा के अधीन था। उक्त साल में सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने उलूगखां को उस पर विजय करने के लिये भेजा था। चालुक्य वंश के पहले गुजरात पर चावड़ा राजपूतों का अधिकार था। चालुक्य वंशीय सिद्धराज, जयसिंह और कुमारपाल के समय में गुजरात का राज्य शक्ति और समृद्धि के सर्वोपरि आसन पर विराजमान था। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि गुजरात के उक्त प्रताप शील नृपति ने मालवा पर विजय प्राप्त की थी। चित्तौड़ को फतह कर लिया था एवं अजमेर के चौहानों को भारी शिकस्त दी थी। ये सब महत्वपूर्ण घटनाएं सन्‌ 1094 और 1175 के बीच हुई।

 

 

सन्‌ 1297 से लगातर 1407 तक गुजरात दिल्ली के बादशाह के मातहत रहा। सन्‌ 1407 में गुजरात के बादशाही प्रतिनिधि ( Viceroy ) जाफर खां ने स्वाधीनता की घोषणा कर वीरपुर में
गुजरात के राज्य-सिंहासन पर आरूढ़ हुआ। इस वक्त उसने मुजफ्फरशाह की उपाधि धारण की। जाफर खाँ असल में हिन्दू था। मुसलमानी धर्म स्वीकार कर लेने पर वह सुल्तान फिरोजशाह तुगलक का खास बावर्ची हो गया था। धीरे धीरे वह सुल्तान का कृपा पात्र बन गया और वह गुजरात का शासक बना दिया गया। मुजफ्फर शाह ने अपने भाई शम्सखाँ को नागौर का शासक नियुक्त किया, जहां कि उसने ओर उसके बेटे पोतों ने कई वर्ष तक राज्य किया। शम्सखाँ के बाद उसका पुत्र फिरोज खां नागौर का शासक हुआ। इसने अपनी वीरता के लिये अच्छी ख्याति प्राप्त की थी। उसने महाराणा कुम्भा के पिता मोकल से दो दो तलवार के हाथ लिये थे। उसने मेवाड़ पर आक्रमण कर बांदणवाड़ा के पास राणा की फौज को शिकस्त दी थी। इस विजय से उसकी आँखे फिर गई थीं। अभिमान में चूर होकर वह मेवाड़ की ओर फिर आगे बढ़ा, पर उदयपुर राज्य से 20 मील के अन्तर पर जावर नामक गाँव में उसे बुरी तरह परास्त होना पड़ा। मन मसोसते हुए उसे वापस नागौर लौटने को मजबूर होना पड़ा।

 

 

सन् 1455 में महाराणा कुम्भा ने नागौर पर अधिकार कर लिया। इससे अहमदाबाद के सुलतान को बहुत बुरा लगा और उन्होंने
महाराणा के खिलाफ तलवार उठाई। यहां यह कहना आवश्यक है कि इसके पहले एक समय महाराणा को मालवा के सुल्तान के खिलाफ लड़ना पड़ा था। उस समय भारतवर्ष में मालवा और गुजरात के राज्य, शक्ति के ऊँचे आसन पर चढ़े हुए थे। ये दोनों राजा एक एक करके जब महाराणा से हार गये थे, तब इन दोनों ने मिलकर पश्चिम और दक्षिण की ओर मेवाड़ पर आक्रमण किया। वीरवर महाराणा कुम्भा भी तैयार थे। पवित्र क्षत्रिय वंश का खून उनकी रगो में दौड़ रहा था। मेवाड़ की स्वाधीनता उन्हें अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय थी। स्वाधीनता और स्वदेश-रक्षा की पवित्र भावनाओं से उत्साहित होकर वीरवर महाराणा कुम्भा इन प्रबल शत्रुओं की बलशाली सेना के सामने आ डटे। भीषण युद्ध हुआ। महाराणा को अपूर्व विजय प्राप्त हुई। शत्रुओं ने बुरी तरह उलटे मुँह की खाई। इस विजय से महाराणा कुम्भा की शक्ति का प्रकाश सारे भारत में आलोकित होने लगा।

 

 

यहाँ तत्कालीन मालवा पर भी कुछ प्रकाश डालना आवश्यक है।
सन्‌ 1310 तक मालवे पर हिन्दुओं का राज्य था। इसके बाद उसे
मुसलमानों ने विजय किया। दूसरे सुलतान मुहम्मद के राज्य तक वह दिल्‍ली के सुलतानों के अधीन रहा। इसके बाद वह स्वतंत्र राज्य हो गया। दिलावर खाँ गोरी, जिसका असली नाम हसन था, फिरोज तुगलक के समय में, मालवे का शासक नियुक्त किया गया । सन्‌ 1398 की 18 दिसंबर को अमीर तैमूर ने दिल्‍ली पर अधिकार कर उसको तहस नहस कर डाला। फिरोजशाह तुगलक का लड़का सुलतान मुहम्मद तुगलक गुजरात की ओर भागा, पर उसका रास्ता महाराणा ने रोका। रायपुर मुकाम पर युद्ध हुआ, जिसमे सुलतान बुरी तरह से हारा। इसके बाद वह मालवे की ओर मुड़ा। वह मालवा पहुँचा, जहाँ दिलावर खाँ ने उसका स्वागत कर अपनी राज-भक्ति प्रकट की। सन्‌ 1401 में उसने स्वाधीनता की घोषणा कर दिल्ली से अपना सम्बन्ध तोड़ लिया।

 

 

महाराणा कुम्भा
महाराणा कुम्भा

 

सन्‌ 1571 तक मालवा स्वतंत्र राज्य रहा। अर्थात इसका दिल्ली के सम्राट के साथ कोई सम्बन्ध न रहा। सन्‌ 1571 में महान सम्राट अकबर ने इसे अपने साम्राज्य का एक प्रान्त बनाया। दिल्लावर खाँ अपने महत्वाकाँक्षी और दुश्चरित्र लड़के अलप खाँ द्वारा कत्ल कर दिया गया। अलप खाँ सुलतान होशंगगोरी का खिताब धारण कर मसनद पर बैठा। सुलतान होशंगगोरी का लड़का मोहम्मद खाँ द्वारा मार डाला गया। मोहम्मद खाँ, सुलतान मोहम्मद खिलजी का खिताब धारण कर मालवे की मसनद पर बैठा। इसके समय में राज्य की शक्ति खूब बढ़ी। महाराणा कुम्भा ने इसी शक्तिशाली सुलतान को रण-मैदान में आने के लिये ललकारा।

 

 

मालव-विजय

 

हमने ऊपर महाराणा कुम्भा के पिता राणा मोकल की हत्या का
वृत्तान्त लिखा है। इन हत्यारों में से एक को, जिसका नाम माहप्पा पँवार था, मालवा के सुलतान महमूद खिलजी ने, पनाह दी थी। महाराणा ने सुलतान से उक्त हत्यारे को माँगा। सुल्तान ने उसे देने से इन्कार कर दिया। इस पर महाराणा ने एक लाख घुड़सवार और 1400 हाथियों की प्रबल सेना से मालवा की ओर कूच किया ।सन्‌ 1440 में चित्तौड़ और मन्दोसर के बीच में दोनों सेनाओं की मुठभेड़ हो गई। भीषण लड़ाई हुईं। इसमें सुलतान पूर्ण रूप से परास्त हुआ। वह और उसकी सेना हताश होकर भागी। राणा की फौज ने उसका पीछा किया और तत्कालीन मालव राजधानी माँडू पर घेरा डाल दिया। जब सुलतान ने विजय की सब आशा खो दी और वह चारों ओर से तंग हो गया तब उसने हत्यारे माहप्प से कहा कि “अब में तुम्हें नहीं रख सकता। तुम यहाँ से चले जाओ।” माहप्प घोड़े पर बैठ कर किले से निकल कर भागने लगा इसमें उसका घोड़ा मारा गया, पर वह सुरक्षित रूप से गुजरात की ओर भाग गया। इसके बाद महाराणा ने माँडू के किले पर हमला कर उस पर अधिकार कर लिया। सुलतान महमूद खिलजी गिरफ्तार कर लिया गया। उसकी सेना भयभीत होकर बेतहाशा इधर उधर भागने लगी। कैदी सुलतान सहित महाराणा कुम्भा चित्तौड़ को लौट आये। सुलतान छः मास तक चित्तौड़ में केद रहा। बाद में उदार ओर सहृदय महाराणा ने बिना किसी प्रकार का हर्जाना लिये उसे मुक्त कर दिया। इसके बाद कृतध्न सुलतान ने गुजरात के सुलतान की सहायता से बदला लेने के लिये कई प्रयत्न किये, पर वे सब निष्फल हुए। इस विजय के उपलक्ष्य में महाराणा ने चित्तौड़ में एक कीर्ति-स्तम्भ बनवाया है। इसके बाद महाराणा कुम्भा ने और भी कई युद्धों में भाग लिया। आप का जोधपुर राज्य के मूल संस्थापक रावजोधा जी के साथ भी युद्ध हुआ और आपने मंडूर आदि पर अधिकार कर लिया। आखिर में फिर मंडूर राव जोधाजी के हाथ पड़ गया।

 

 

महाराणा कुम्भा का मालवा ओर गुजरात के सुल्तान के साथ युद्ध

 

 

महाराणा कुम्भा ने मालवा और गुजरात के मुसलमानों की संयुक्त सेना के दाँत बुरी तरह से खट्टे किये थे, तथा उन्होंने मालवा के सुलतान को भारी शिकस्त देकर किस प्रकार चित्तोड़ में छः मास तक कैद रखा था, इसका जिक्र हम ऊपर कर चुके है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस पराजय से मालवा के सुलतान के हृदय में बदला लेने की आग जोर से धधकने लगी थी। वह इसके लिये मौका ताक रहा था। सन्‌ 1439 में महाराणा हाड़ौती पर चढ़ाई करने के लिये चित्तौड़ से रवाना हुए। जब मालवा के सुलतान ने देखा कि महाराणा हाड़ौती पर हमला करने गये हुए हैं और मेवाड़ अरक्षित है, तो उसने तुरन्त मेवाड़ पर हमला करने का निश्चय किया। ह० सन्‌ १४४० में उसने मेवाड़ पर कूच कर दिया। जब वह कुम्भलमेर पहुँचा तो उसने वहाँ के बानमाता के मंदिर को तोड़ने का निश्चय किया। इस समय दीपसिंह नामक एक राजपूत सरदार ने कुछ वीर योद्धाओं को इकट्ठा कर सुलतान का मुक़ाबला किया।

 

 

बराबर सात दिन तक दीपसिंह ने अतुलनीय पराक्रम के साथ सुल्तान की विशाल सेना के हमलों को निष्फल किया। आखिर में दीपसिंह वीरगति को प्राप्त हुआ। उक्त संदिर पर सुल्तान का अधिकार हो गया। सुल्तान ने उसे नष्टश्रष्ट कर जमींदस्त कर दिया। उसने माता की मूर्ति को भी तोड़ मरोड़ डाला। इस विजय से सुल्तान का उत्साह बहुत बढ़ गया। वह मन्दोन्मत्त होकर चित्तौड़ पर हमला करने के लिए रवाना हुआ, और उक्त किले पर अधिकार करने की इच्छा से अपनी कुछ सेना वहाँ छोड़ कर वह महाराणा कुम्भा से मुकाबला करने के लिये रवाना हुआ। महाराणा के मुल्कों को नष्टभ्रष्ट करने के लिये उसने अपने पिता आजम हुमायूँ को मन्दसोर की ओर भेज दिया। जब महाराणा ने यह सुना कि सुल्तान ने मेवाड़ पर चढ़ाई की है, तो वे तुरन्त हाड़ौती से रवाना हो गये। मांडलगढ़ में दोनों सेनाओं का
मुकाबला हुआ। भीषण युद्ध हुआ। पर इसमें कोई अन्तिम फल प्रकट नहीं हुआ। कछु दिनों के बाद महाराणा ने रात के समय सुलतान की फौज पर अकस्मात् आक्रमण कर दिया। बस फिर क्या था, सुलतान की फौज तितर बितर हो गईं। घोर पराजय का अपमान सह कर सुलतान को मांडू लौटना पड़ा। फिर इस हार का बदला चुकाने के लिये चार वर्ष बाद अर्थात्‌ सन्‌ 1446 में सुलतान ने बहुत बड़ी सेना के साथ मांडलगढ़ की ओर फिर कूच कर दिया। ज्यों ही शत्रु की सेना बनास नदी उतरने लगी कि महाराणा कुम्भा की सेना ने उस पर आक्रमण कर दिया। सुल्तान की सेना बेतहाशा भागी और उसने मांडू में जाकर विश्राम किया। इस हार का यह फल हुआ कि इसके आगे दस वर्ष तक मेवाड़ पर हमला करने की सुलतान की हिम्मत न हुई।

 

 

सन्‌ 1455 में खिलजी के पास अजमेर के मुसलमानों की ओर से यह दरख्वास्त गई कि अजमेर के हिन्दू शासक ने मुसलमान धर्म
के सब व्यवहारों को बन्द कर दिया है। अगर आप अजमेर पर चढ़ाई करेंगे तो यहाँ के मुसलमान दिल से आप की मदद करेंगे। इस पर सुल्तान ने अपनी फौज की एक टुकड़ी को तो महाराणा की फौज से मुकाबला करने के लिये मन्दसौर की ओर भेजा और खुद सुलतान अजमेर पर आक्रमण करने के लिये आगे बढ़ा। अजमेर के तत्कालीन शासक गजाधरसिंह ने बड़ी वीरता के साथ चार दिन तक अजमेर की रक्षा की। आखिर में वह शत्रु-सेना पर टूट पड़ा और सैकड़ों शत्रु सैनिकों को यमलोक पहुँचा कर आप भी वीरगति को प्राप्त हुआ। यह कहना न होगा कि अजमेर पर सुल्तान का अधिकार हो गया और वह नियामतउल्ला को अजमेर का शासक नियुक्त कर मांडलगढ़ की ओर लौटा। ज्यों ही सुल्तान की सेना बनाख नदी के पास पहुँची त्योंही महाराणा कुम्भा की सेना उस पर टूट पड़ी। सुलतान की सेना पराजित होकर मांडू की ओर भाग गई। सुलतान की इस पराजय को सुप्रख्यात मुसलमान इतिहास-वेत्ता फरिश्ता’ ने भी स्वीकार किया है।

 

 

इसी साल अर्थात सन्‌ 1455 में नागौर का सुलतान फिरोज़ खाँ इस दुनियां से कूच कर गया। पाठक जानते हैं कि यह गुजरात के
राजाओं का वंशज होकर दिल्ली के सम्राट के अधीन था। पीछे जाकर वह स्वतन्‍त्र हो गया था। इसकी मृत्यु के बाद इसका शम्सखाँ नामक लड़का नागौर का सुलतान हुआ। पर शम्सखाँ का लड़का मुजाइदखाँ इसे राज्यच्युत कर इसके मारने की फ़िक्र करने लगा। शस्सखाँ भाग कर महाराणा कुम्भा की शरण में गया । राणा कुंभा ने कुछ शर्तो पर उसे मदद देना स्वीकार किया। महाराणा ने बड़ी सेना के साथ नागौर पर चढ़ाई की और मुज़ाइद को परास्त कर शम्सखाँ को गद्दी पर बैठा दिया। पर थोड़े ही दिनों के बाद महाराणा ने देखा कि शम्सखाँ अपने वचन से च्युत हुआ चाहता है। वह महाराणा के साथ की गई शर्तों का पालन करने के लिये तैयार नहीं है। इतना ही नहीं, वह उनका मुकाबला करने के लिये नागौर के किले की मजबूती कर रहा है। इससे महाराणा कुम्भा को बड़ा क्रोध आया। वे विशाल सेना के साथ नागौर पर चढ़ आये। शम्सखाँ नागौर से भाग गया। नागौर का किला महाराणा के हाथ पड़ा। उन्हें शम्सखाँ के खजाने से हीरे,रत्न आदि कई बहुमूल्य पदार्थ मिले। राणा कुम्भा के समय में बने हुए एकलिंग महात्म्य में लिखा है:— “राणा कुंभ ने शकों ( मुसलमानों ) को परास्त किया। उन्होंने मुजाहिद को भगाया और नागपुर ( नागौर ) के योद्धाओं को मारा। उन्होंने सुलतान के हाथियों को ले लिया; और शकों ( मुसलमानों ) की औरतों को कैद कर लिया; असंख्य मुसलसानों को सज़ा दी; गुजरात के राजा पर विजय प्राप्त की; नागोर शहर की तमाम मस्जिदें जला दी बारह लाख गोओं को मुसलमानों से मुक्त किया। गौओं को चरने के लिये गोचर भूमि को व्यवस्था की और कुछ समय के लिये नागौर ब्राह्मणों को दे दिया।

 

 

चित्तौड़-गढ़ के कीर्ति-स्तंभ पर जो लेख है उसमें लिखा है–“ उन्होंने सुल्तान फिरोज द्वारा बनाई हुईं विशाल मस्ज़िद को ज़मीदस्त कर दिया। उन्होंने नागौर से मुसलमानों को जड़ से उड़ा दिया, ओर तमाम मस्ज़िदों को जमींद्स्त कर दिया।” महाराणा कुम्भा नागौर के किले के दरवाजे और हनुमान की मूर्ति भी ले आये और उसे उन्होंने कुम्भलगढ़ के किले के खास दरवाजे के पास प्रतिष्ठित किया। यह दरवाज़ा हनुमान पोल के नाम से मशहूर है। शम्सखाँ अपनी पुत्री सहित अहमदाबाद की ओर भाग गया। उसने अपनी उक्त पुत्री सुल्तान कुतबुद्दीन को ब्याह दी इससे सुल्तान, शम्सखां के पक्ष में हो गया और उसने एक बड़ी सेना महाराणा के मुकाबले पर भेजी। ज्योंही यह सेना नागौर के पास पहुँची कि महाराणा की सेना ने विद्युत वेग से इस पर आक्रमण कर दिया। यह पूर्ण रूप से परास्त हुईं। इसकी बड़ी दुर्दशा हुई। इस सेना का अधिकांश भाग ककड़ी की तरह काट डाला गया। थोड़े से आदमी इस दुर्दशा का समाचार लेकर सुल्तान के पास वापस पहुँच सके। अब सुल्तान नागौर पर अधिकार करने के लिये खुद रण के मैदान में उतरा। महाराणा कुम्भा भी इसके मुकाबले के लिये रवाना हो गये और वे आबू आ पहुँचे।

 

 

सन्‌ 1456 में गुजरात का सुलतान आबू के निकट पहुँचा और
उसने अपने सेनापति इम्माद-उल-मुल्क को एक बहुत बड़ी सेना के साथ आबू का किला फतह करने के लिये भेजा और आप खुद कुम्भलगढ़़ की ओर रवाना हुआ। महाराणा कुम्भा को सुलतान के इस व्यूह का पता चल गया था। उन्होंने तुरन्त सेनापति की फौज़ पर आक्रमण कर उसे छिन्न भिन्न कर दिया, और इस के बाद वे बड़ी तेज गति से कुम्भलगढ़़ की ओर रवाना हुए। वे सुलतान के पहले ही कुम्भलगढ़़ आ पहुँचे थे। इम्माद-उल-मुल्क भी आबू से निराश होकर सुल्तान के पास आ पहुँचा और दोनों ने मिलकर कुम्भलगढ़़ के किले पर हमला करने का निश्चय किया। महाराणा भी तैयार थे। उन्होंने तुरन्त किले से निकल कर सुल्तान की फौज पर हमला कर उसे पूर्ण रूप से परास्त कर दिया। सुलतान को भीषण हानि उठानी पड़ी। निराश होकर वह अपने राज्य को लौट गया। इसके बाद सन्‌ 1457 में गुजरात के सुल्तान ने मालवा के सुल्तान से मिलकर फिर मेवाड़ पर आक्रमण किया। महाराणा ने अपूर्व वीरत्व के साथ इनका मुकाबला किया। शुरू शुरू में किसी के भाग्य का फैसला नहीं हुआ। कभी विजय की माला महाराणा के गले में पड़ती तो कभी सुलतान के, पर आखिर में गहरी हानि सहने के बाद महाराणा ने दोनों के दाँत खट्ट कर दिये। गुजरात का सुल्तान वापस लौट गया। यही दशा मालवे के सुल्तान की भी हुईं। वह अपनी खोई हुई भूमि को भरी वापस न ले सका। उसने विजय की सारी आशा खो दी। उसकी आँखों के सामने घोर निराशा के काले बादल मंडराने लगे। इसके बाद वह दस वर्ष तक जीवित रहा, पर फिर कभी मेवाड़ पर हमला करने का उसने साहस नहीं किया। सुल्तान कुतुबुद्दीन इस हार के बाद अधिक दिन तक जीता न रहा। सन्‌ 1459 की 25 मई को वह दुनिया से कूच कर गया और उसके बाद दाऊदशाह उसका उत्तराधिकारी हुआ। इसी समय बूंदी के हाड़ाओं ने मौका पाकर अमरगढ़ पर अधिकार कर लिया और उन्‍होंने मांडलगढ़ के राजपू्तों को बहुत कुछ तकलीफ दी। इस पर महाराणा ने अमरगढ़ पर हमला किया, जिससें बहुत से हाड़ा मारे गये। इसके बाद महाराणा ने बूँदी पर घेरा डाला। बूंदी के हाड़ाओं के माफ़ी मांग लेने पर सहृदय महाराणा ने घेरा उठा लिया और फौज, खर्च, नज़राना इत्यादि लेकर चित्तौड़ को वापस लौट गये। इस विषय में कुछ मतभेद है, क्योंकि कुम्भलगढ़़ के शिलालेख में लिखा है कि महाराणा ने हाड़ाओं को परशास्त कर उनसे खिराज वसूल किया।

 

 

सन्‌ 1524 में महाराणा कुम्भा के पास यह समाचार पहुँचा कि नागौर में मुसलमानों ने गायें मारना शुरू किया है। बस, फिर क्‍या था ? आप तुरन्त 25 हज़ार सवारों के साथ नागौर पर हमला करने के लिये रवाना हो गये। उन्होंने हजारों शत्रुओं को तलवार के घाट उतार दिया। नागौर के किले पर अधिकार कर शत्रुओं को लूट लिया। महाराणा कुम्भा के हाथ लाखों रुपयों का सामान लगा। नागौर का मुसलमान शासक अहमदाबाद के सुल्तान के पास भाग गया। अहमदाबाद का सुल्तान बहुत बड़ी सेना लेकर सिरोही के रास्ते से कुम्मलगढ़़ के निकट पहुँचा। उधर महाराणा भी तैयार थे। वे भी बहादुर राजपूतों के साथ उसके मुकाबले के लिये आगे बढ़े। दोनों का मुकाबला हुआ और घमासान युद्ध हुआ। सुलतान ने ऑंधे मुँह की खाई। पहले की तरह इस बार सी वह खूब पिटा और सीधा मुंह करके उसने गुजरात का रास्ता पकड़ा।

 

 

महाराणा कुम्भा की मृत्यु

दुःख की बात है कि इ० सन्‌ 1468 में परम पराक्रमी परम राज-
नीतिज्ञ महाराणा कुम्भा अपने पुत्र उदयकरण के द्वारा विशवासघात से मार डाले गये। इस हत्या के मूल उद्देश के विषय में तरह तरह के अनुमान लगाये जाते हैं। किसी किसी का मत है कि महाराणा कुम्भ के शत्रुओं ने उदयकरण को सिंहासन का लोभ देकर यह कर कृत्य करवाया था। कोई कोई इसके दूसरे ही कारण बतलाते हैं। कुछ भी हो, इसमें सन्देह नहीं कि हत्यारे उदयकरण ने इस अमानुषिक कुकृत्य से भारतवर्ष के इतिहास में अपना काला मुँह कर लिया है। उस दुष्ट पितृहन्ता के नाम से आज हृदय में अपने आप घृणा और तिरस्कार के भाव पैदा होते हैं। “उदो तू हत्यारो इन शब्दों से भाट लोग उसके पाप कृत्य का प्रकाशन करते हैं।

 

 

महाराणा कुम्भा की महानता

35 वर्ष के गौरवमय राज्य के बाद कुम्भा इस संसार को छोड़ स्वर्गधाम को सिधार गये। भारत के इतिहास में महाराणा कुम्भा का नाम बड़े गौरव और आदर के साथ लिया जायगा। जिन महान नृपतियों ने भारत के इतिहास को अभिमान करने योग्य वस्तु बनाया है, उनमें महाराणा कुम्भा का आसन बहुत ऊँचा है। जिन महान पुरुषों से इतिहास बनता है, उनमें से महाराणा कुम्भा एक थे। कुम्भलगढ़़ के शिलालेख में इनकी कीर्ति-कलाए के विषय में जो कुछ लिखा है, उसका सारांश यह है–“’वे धर्म और पवित्रता
के अवतार थे। उनका दान राजा भोज और राजा कर्ण से भी बढ़ चढ़ कर था।

 

 

सैनिक दृष्टि से महाराणा कुम्भा

 

 

सैनिक दृष्टि से महाराणा कुम्भा का आसन बहुत ऊँचा है। वे एक
सैनिक होते हुए भी सहृदय थे । मनुष्यता की अत्युष भावनाओ के वे प्रत्यक्ष अवतार थे, यही कारण है कि उन्होंने असीम पराक्रमी होते हुए भी तैमूरलंग ओर अलाउद्दीन खिलजी जैसे पार्श्विक कृत्य नहीं किये। उन्होंने व्यर्थ में खून की नदियाँ बहाना–निर्दोष मनुष्यों को कत्ल करना–उच्च श्रेणी के क्षात्रधर्म के विरुद्ध समझा। वे बड़े भाग्यशाली थे। विजय हमेशा हाथ जोड़े हुए उनके सामने खड़ी रहती थी। वे युद्ध में हमेशा विजय-लाभ करते थे,चित्तौड़, कुम्भलगढ़़, रानपुर, आबू आदि के शिलालेखों से पता चलता है कि उन्होंने अपने सब दुश्मनों को अच्छी तरह चने चबवाये थे। उनकी विजयी तलवार की धाक सारे भारत में थी। उन्होंने कई राजाओं को अपना मातहत सरदार बनाया था। उन्होंने बूंदी, वामोद पर अधिकार कर हाडौती को जीता था। उन्होंने मेवाड़, मांडलगढ़ सिंहपुर, खाडु, चाटसु, टोड़ा और अजमेर का परगना अपने राज्य में सम्मिलित कर लिया था। उन्होंने साम्भर के राजा को अपना मातहत बनाकर वहाँ की झील के नमक पर कर बैठाया था। उन्होंने नरवर, जहाजपुर, मालपुरा, जावर और गंगधार को फतह किया था। मंडोर पर अपना विजयी झंडा उड़ाया था। आमेर पर अधिकार कर कोटरा की लड़ाई में फतह पायी थी। उन्‍होंने सारंगपुर को विजय कर वहाँ के मुसलमान शासक मोहम्मद का गर्व चूर्ण किया था। उन्होंने हमीरपुर पर विजय-डंका बजाकर वहाँ के राजा रणबीर की कन्या के साथ विवाह किया था। उन्होंने मालवा के सुलतान से जंकाचल घाटी विजय कर उस पर किला बनाया था। उन्होंने दिल्ली के सुलतान का बहुत सा मुल्क फतह किया था। उन्होंने गोकर्ण पर्वत पर अधिकार कर आबू राज्य को अपने अधीन किया था। उन्होंने गागरोन ( कोढा स्टेट ) और बिसलपुर को जीतकर धन्यनगर और खंडेल को जमींदरत किया था। रणथम्भौर के इतिहास प्रसिद्ध किले पर उन्होंने अपनी विजय पताका फहराई थी। उन्होंने मुजफ्फर के गर्व को बेतरह पद दलित कर नागौर पर विजय-डंका बजाया था। उन्होंने जांगल देश ( अजमेर का पश्चिमीय भाग ) को लूटा तथा गौंडवार को अपने राज्य में मिलाया था। उन्होंने मालवा और गुजरात जैसे शक्तिशाली सुलतानों की सम्मिलित फौज को बुरी तरह पछाड़ा था। इन महान सफलताओं के उपलक्ष्य में दिल्ली और गुजरात के सुलतान ने आपको छ॒त्री नजर कर आपका सम्मान किया था। संसार में उन्हें राजगुरु, दानगुरु, चापशुरू ओर परमगुरु के सम्मान सूचक नामों से जानता था।

 

 

महाराणा कुम्भा की विद्वता

महाराणा कुम्भा न केवल महान नृपति, वीर और चतुर सेना नायक
ही थे, वरन्‌ वे बड़े भारी विद्वान और कवि भी थे। कुम्भलगढ़ के शिलालेख में लिखा है कि उनके लिये काव्य सृष्टि करना उतना ही सरल था, जितना रण मैदान में जाना। आप अपने समय के अद्वितीय कवि माने जाते थे। संगीत विद्या में आप परम निष्णात थे। नाटय-शास्त्र के तो आप अपने समय के अद्वितीय विद्वान थे ओर इसके लिये आप “अभिनव भारताचार्य” की उच्च उपाधि से भी विभूषित थे। आपने संगीत राज, संगीत मीमांसा आदि ग्रंथों की रचना की। आपने गीतगोविंद पर रसिकप्रिया नामक टीका लिखी।आपने संगीत रत्नाकर भाष्य भी लिखा इससे आपके नाटक विज्ञान के ज्ञान का पता लगता है। इनके अतिरिक्त आपने चार नाटक और चंडीशतक पर टीका लिखी। चित्तौड़ के शिलालेख से मालूम होता है कि राणा कुम्भ ने अपने उक्त चार नाटकों में कर्नाटकी, मैदापटी और महाराष्ट्रीय भाषाओं का भी उपयोग किया था। उस समय के बने हुए एक माहात्म्य से पता चलता है कि महाराणा कुम्भा वेद, स्मृति, मीमांसा, नाटय-शास्त्र, राजनीति, गणित, व्याकरण, उपनिषद और तर्क-शास्त्र के भी बढ़े पंडित थे। आपने गीतगोविंद पर रसिकप्रिया नामक जो टीका लिखी है, उससे यह प्रतीत होता है कि आप संस्कृत के भी बडे पंडित थे । आप संस्कृत का गद्य और पद्म बड़ी आसानी से लिख सकते थे। एकलिंग महात्य का पिछला हिस्सा आपही ने लिखा है । उससे प्रकट होता है कि आप मधुर और सुन्दर कविता करने में भी बढ़े सिंद्धहस्त थे। आप चौहान सम्राट बिसलदेव की तरह प्राकृत भाषा के भी बड़े विद्यान थे। महाराणा कुम्भा केवल विद्वान्‌ ही न थे वरन विद्वानों के कद्रदान भी थे। आप निर्माण शास्त्र में भी बड़ी दिलचस्पी रखते थे। आपने जो विविध भव्य इमारतें बनवाई है वे आपके निर्माण विद्या प्रेम को प्रकट करती है। आपने इस विद्या पर निम्नलिखित आठ पुस्तकें भी लिखवाई थी ( 1 ) देवता मूर्ति प्रकण। (2 ) प्रासाद मंडन। (3 ) राजवल्लम (4) रूप मंडन । ( 5 ) वास्तुमंडन । ( 6 ) वास्तुशात्र (7 ) वास्तु सार (8) रूपावतार । कहने का मतलब यह हैं कि महाराणा कुम्भा ने केवल एक ही क्षेत्र में नहीं, वरन्‌ विविध क्षेत्रों में गपनी महानता का परिचय दिया था।

 

 

महाराणा कुम्भा के बाद

 

महाराणा कुम्भा के बाद पितृघाती राणा ऊदा राज्यासन पर बैठा जैसा कि हम ऊपर कह चुके हैं। इस हत्यारे के नाम ने मेवाड़ के गौरवशाली इतिहास को कलंकित किया है। यह केवल चार वर्ष राज कर सका। इस अल्पस्थायी राज्यकाल में इसने आप ‘ कीर्ति को धूल में मिला दी। आखिर सब सरदारों ने मिलकर इसे पद्भ्रष्ट कर दिया तथा इसे देश से भी निकाल दिया। इसके बाद वह सहायता पाने की आशा से तत्कालीन दिल्ली सम्राट बहलोल लोदी से मिलने के लिये रवाना हुआ, पर बीच ही में बिजली गिरने से इस पापी को अपने पापों के प्रायश्वित रूप में प्रकृति की ओर से प्राणदंड मिला। इसके बाद राणा रायमल राजसिंहासन पर विराजे। ये योग्य पिता के योग्य पुत्र थे। इन्होंने गद्दी पर बेठते ही तत्कालीन मुगल सम्राट पर विजय प्राप्त की। आपने मालवे के सुलतान को भी युद्ध में पछाड़ा। आपके संग्राम सिंह प्रथ्वीराज और जयमल नामक तीन पुत्र थे। सन्‌ 1509 में आपका देहान्त हो गया। आपके बाद आपके पुत्र सांगा या संग्राम सिंह राज्यासन पर विराजे। ये अपने स्वर्गीय पितामह महाराणा कुम्भा की तरह महा पराक्रमी थे।

 

 

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