महाराणा उदय सिंह द्वितीय का इतिहास

महाराणा उदय सिंह द्वितीय

महाराणा उदय सिंह जी ईस्वी सन्‌ 1440 में मेवाड़ के राज्य सिंहासन पर बिराजे। यहाँ यह बात स्मरण रखना चाहिये कि जिस साल महाराणा उदय सिंह जी मेवाड़ के राज्य-सिंहासन पर बेठे, उसी साल सुप्रख्यात महान मुग़ल सम्राट अकबर ने अमरकोट में जन्म लिया था। इतिहास के पाठक जानते हैं कि अकबर का पिता हुमायूं दिल्‍ली छोड़कर भागा था, और पीछे उपयुक्त अवसर देखकर दिल्‍ली लौट आया। वह अपने प्रतिभा सम्पन्न पुत्र अकबर की सहायता से राज्य-सिंहासन प्राप्त करने में सर्मथ हुआ। उसने 10 वर्ष की अल्पावस्था में जो वीरता और साहस दिखलाया, उसे देखकर हुमायूं बड़ा खुश हुआ। अकबर की बाल्यावस्था में कुछ दिन तक बहरामखाँ ने राज्य-शासन-सूत्र का संचालन किया।

 

 

महाराणा उदय सिंह जी का इतिहास

 

इसके बाद अकबर ने सारी जिम्मेदारी अपने हाथों में ली। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि सम्राट अकबर बड़े राजनीतिज्ञ, बुद्धिमान और चतुर थे। दूरदर्शिता राजनीति का प्रधान अंग है। अकबर बड़े दूरदर्शी थे। उन्होंने सोचा कि भारतीय राजा महाराजाओं के सहयोग बिना राज्य की स्थिति अधिक दिनों तक नहीं रह सकती, अतएव उन्होंने कुछ ऐसा कार्य करना उचित समझा, जिससे राजपुताने के बलशाली राजाओं का स्थायी सहयोग प्राप्त हो। उन्होंने राजपुताने के राजाओं के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थिर करने का निश्चय किया।

 

 

कहना न होगा कि सम्राट अकबर को इसमें बहुत कुछ सफलता हुईं और जयपुर, जोधपुर के राजाओं के साथ उनका इस प्रकार का सम्बन्ध स्थापित भी हो गया। यह बात इतिहास के पाठक भली प्रकार जानते हैं। कहना न होगा कि मेवाड़ के कुलाभिमानी राणा ने अकबर के इस प्रकार के प्रस्तावों की ठोकर मारी। इस पर अकबर ने मेवाड़ पर चढ़ाई कर दी। महाराणा उदय सिंह चित्तौड़ छोड़कर चले गये। इस बात को लेकर कई इतिहास-वेत्ताओं ने इन्हें बहुत कुछ भला बुरा कहा है। पर सुप्रख्यात इतिहास-वेत्ता मुन्शी देवी प्रसाद जी ने इनके उक्त कार्य का समर्थन इस प्रकार किया है। “केवल चित्तौड़गढ़ में बैठकर लड़ने से उन्होंने यह अच्छा समझा कि बाहर रहकर मेवाड़ के दूसरे गढ़ों को सुदृढ़ किया जावे। जब एक बड़ी सेना से किला घिर जाता है तो लड़कर मारे जाने या अधीनता स्वीकार करने के सिवा दूसरा चारा ही नहीं रह जाता है।” कुछ भी हो, इसमें सन्देह नहीं कि महाराणा उदय सिंह जी में अपने पूज्य पिताजी महाराणा सांगा की तरह अलौकिक वीरत्व नहीं था।

 

महाराणा उदय सिंह द्वितीय
महाराणा उदय सिंह द्वितीय

 

मुसलमान इतिहास लेखक लिखते है कि अकबर ने एक बार की
चढ़ाई ही में चित्तौड़ को जीत लिया था, परन्तु राजपूत वंशावलियों से अकबर की चढ़ाई का पता लगता है। कहा जाता है कि पहली बार की चढ़ाई में अकबर हार गया। यह हराने वाली महाराणा उदय सिंह की उपपत्नी वीरा थी। इसने कुछ बहादुर सरदारों की सहायता से बादशाही सेना के पैर उखाड़ दिये। इस वीर रमणी की प्रशंसा स्वयं महाराणा उदय सिंह जी ने की थी। वे कहा करते थे कि वीरा की बहादुरी से मेरा छुटकारा हुआ।सरदारों को महाराणा की यह प्रशंसा अच्छी मालूम न हुई। उन्होंने षड़यन्त्र रचकर वीरा को मरवा डाला। इस हत्या से चित्तौड़ में बड़ी अशान्ति फैली।

 

 

घरेलू झगड़ों ने फिर ज़ोर पकड़ा। अकबर ने इस झगड़े की खबर
पाकर चित्तौड़ पर फिर जबरदस्त चढ़ाई कर दी। इस समय मुसलमानी सेना इतनी विशाल थी कि दस दस मील तक उसकी छावनी पड़ी हुई थी। ज्योही अकबर ने घेरा डाला कि उदय सिंहजी गढ़ से निकल कर चले गये, पर फिर भी चित्तौड़ में वीरों की कमी न थी। इस समय गढ़ में आठ हजार क्षत्रिय थे। जिन्होंने चार मास तक बड़ी वीरता से अकबर का सामना कर अपना जातीय गौरव स्थिर रखा था। चूड़ाजी के वंशधर सुलुम्बर के राव साईदास इस दल के प्रधान थे। वे बड़ी योग्यता और वीरता से चित्तौड़ की रक्षा करने लगे।

 

 

जब मुख्यद्वार के ऊपर मुसलमानों ने धावा किया तब उसकी रक्षा करते हुए ये मारे गये। इनके अतिरिक्त महाराजा पृथ्वीराज वंशज बेदला और कोठारिया के राव, बिजोलिया के परमार और सादड़ी के झाला आदि सरदारों ने भी इस समय अपूर्व वीरत्व का प्रकाश किया। सादड़ी के राजा राणा सुल्तान सिंह बड़ी वीरता से लड़े। वे यवनों के साथ युद्ध करते करते वीर गति को प्राप्त हुए। बदनौर के राठौर जयमल जी ने जिस अलौकिक वीरता का प्रकाश किया था, उसकी प्रशंसा अबुल फज़ल ने “आईने अकबरी” में की है। हम ऊपर कह चुके हैं कि सूरजद्वार की रक्षा करते करते सलुम्बर के राव मारे गये। इनके बाद राजपूत सेना का संचालन केलवा के सरदार फत्ता जी को सौंपा गया।

 

 

यद्यपि इस समय इनकी अवस्था केवल 16 वर्ष की थी पर साहस पराक्रम और क्षमता में ये बड़े बड़े वीरों से भी बढ़कर थे। ये अपनी माता के इकलौते पुत्र थे। पर माता ने इन्हें वीर-कर्तव्य पालन करने का आदेश किया, उनकी प्रिय पत्नी ने भी उन्हें युद्ध में जाने के लिये उत्साहित किया। उनकी बहिन कर्णवती ने उन्हें जन्मभूमि की रक्षा करने के लिये उत्तेजित किया । फिर क्या था ? यह एक 16 वष का बालक सच्चे वीर की तरह सबसे विदा होकर जन्मभूमि की रक्षा के लिये रण-स्थल में पहुँचा। मुगल सेना दो भागों में विभक्त थी। पहला भाग स्वयं सम्राट अकबर के सेनापतित्व में और दुसरा किसी दूसरे की संरक्षितता में था।

 

 

दूसरी सेना और फत्ता जी में घमासान लड़ाई छिड़ गई। सम्राट अकबर फत्ता जी पर शस्त्र प्रहार करने के लिये दूसरी ओर से बढ़े। वे आगे बढ़ते हुए क्या देखते हैं कि सामने पर्वत पर से उनकी सेना पर गोलियाँ बरस रही हैं। सेना की गति रुक गई। पाठक यह जानने के लिये, अवश्य ही उत्सुक होंगे कि यह गोलियाँ कौन बरसा रहा था। फत्ता जी की वृद्ध माता तथा नवयौवना पत्नी और बहन तीनों सैनिक वेष में घोड़े पर सवार होकर जन्मभूमि की रक्षा के लिये निकल पड़ी थीं, और वे ही शत्रु सेना के संहार में कटिबद्ध हुई थीं। इन्होंने असंख्य मुग़ल सेना को यमलोक में पहुँचा दिया। इन वीर महिलाओं की अपूर्व वीरता देखकर अकबर स्वयं स्तम्भित हो गया।

 

 

वीरवर फत्ता और उक्त क्षत्रिय रसशियों ने वीरत्व की पराकाष्ठा का परिचय दिया। पर सम्राद्‌ अकबर की सेना असंख्य थी। आखिर वीरश्रेष्ठ फत्ता, उनकी वृद्ध माता, नवयोवना पत्नी और बहन चारों वीर गति को प्राप्त हुए। अन्ततः चित्तौड़ पर सम्राट अकबर का अधिकार हो गया। उन्होंने वहां खूब विजयोत्सव मनाया। वहां से वे अपनी राजधानी को बहुत सा कीमती सामान ले गये। महाराणा उदय सिंह जी ने चितौड़ से लौटकर पहाड़ों की तराई में एक गांव बसाया और उसका नाम उदयपुर रखा। इस युद्ध के चार वर्ष बाद 49 वर्ष की अवस्था में सन् 1572 महाराणा उदय सिंह जी का देहान्त हो गया।

 

 

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