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महाराजा रायसिंह बीकानेर का परिचय

महाराजा रायसिंह बीकानेर

स्वर्गीय कल्याणमल जी के पश्चात उनके ज्येष्ठ पुत्र महाराजा रायसिंह जी बीकानेर राज्य के राज सिंहासन पर बैठे। आपके शासन-काल से बीकानेर राज्य के गौरव की सीमा बढ़ने लगी। आपके राजपद पर अभिषिक्त होने के पहले बीकानेर राज्य एक छोटा सा राज्य गिना जाता था। यद्यपि एक के बाद एक वीर एवं साहसी राजाओं ने इस राज्य की सीमा को दूर दूर तक फेलाया था, तथापि मान मर्यादा में बीकानेर राज्य एक सामान्य राज्य की श्रेणी में गिना जाता था। आपने सिंहासनारूढ़ होकर राजनेतिक रंणभूमि में पर्दापण किया। आपकी राजनीतिकता एवं दूरदर्शिता ने बीकानेर राज्य को गौरव के इतने ऊँचे शिखर पर पहुँचा दिया कि थोड़े ही समय में उसकी गणना एक महान शक्तिशाली राज्य में की जाने लगी। आपके शासन-समय में दिल्‍ली के सिंहासन पर सम्राट अकबर विद्यमान थे। अधिकांश राजपूत राजा दिल्ली के मुगल बादशाह की अधीनता स्वीकार कर अपने राज्यों की सीमा वृद्धि कर रहे थे। आपने निश्चय किया कि केवल बीकानेर के शासन कार्य से ही संतुष्ट होकर समय बिताना उचित नहीं है, वरन ऐसे स्वर्ण अवसर पर र उचित लाभ उठाकर अपनी बराबरी वाले अन्यान्य राजाों की तरह नाम और यश पाने की चेष्टा करना योग्य है। आप इस बात को भली भाँति जानते थे कि अवश्य ही एक दिन ऐसा आवेगा जब कि दिल्‍ली के बादशाह बीकानेर पर अधिकार करके हमें अधीन करने का प्रयत्न करेंगा। जब एक के बाद एक अनेक राजपूत राजा अकबर की अधीनता स्वीकार करने लगे तब विवश होकर, आपने भी उसे स्वीकार कर लिया।

 

महाराजा रायसिंह बीकानेर का परिचय

 

अपने पिता के परलोकवासी होने पर आप खुद उनकी भस्म डालने के लिये गंगाजी को गये। पिता की भस्म और अस्थियों को गंगा जी में डाल कर आप अपने ध्येय की पूर्ति के लिये बादशाह की राजधानी को चले गये। आमेर के महाराजा मानसिंह जी ने ( जिनकी उस समय अकबर की सभा में विशेष ख्याति थी ) आपका परिचय सम्राट अकबर से करा दिया। सम्राट ने आपको अपने एक हिन्दू आत्मीय समझ कर बड़े आदर के साथ आपका स्वागत किया तथा चार हजार अश्वारोही सैन्य के नेता के पद पर आपको नियुक्त किया। आपको महाराज की उपाधि तथा हिसार देश के शासन का भार भी इसी समय अर्पण किया गया। जिस प्रकार वीर बीकाजी ने एक सामान्य राव की उपाधि धारण कर एक नवीन राज्य की प्रतिष्ठा की थी, उसी प्रकार ‘आप भी सबसे पहले महाराजा की उपाधि प्राप्त कर बीकानेर राज्य का गौरव बढ़ाने को अग्रसर हुए। इसी समय सम्राट ने मारवाड़ के नागोर प्रदेश को जीत कर उसका श्री अधिकार आपको दे दिया। बीकानेर वापिस लौट आने पर आपने अपने छोटे भाई रामसिंह को एक सेना सहित भेज कर भाटियों के प्रधान स्थान भटनेर पर बड़ी सरलता से अपना अधिकार कर लिया।

 

महाराजा रायसिंह बीकानेर
महाराजा रायसिंह बीकानेर

 

यद्यपि वीर बीका जी ने भाटिया जाटों को परास्त कर उन्हें अपने
अधीन कर लिया था, तथापि वे बड़े स्वाधीनता प्रिय थे और अपनी हरण की हुई स्वाधीनता को फिर प्राप्त कर लेने का प्रयत्न कर रहे थे। अतएव आपने अपने भाई रामसिंह के संचालन में एक प्रबल राठोर सेना, उनका दमन करने के लिये भेजी। इस सेना ने वही पहुँच कर भयंकर कांड उपस्थित कर दिया। प्रबल समराग्नि प्रज्वलित हो गई, हजारों जोहिया जाट गण स्वाधीनता के लिये संग्राम भूमि में प्राण विसर्जन करने लगे। वीर राठौड़ भी अपने ध्येय से न हटे। उन्होंने इस देश को यथार्थ मरुभूमि के समान कर दिया। इस प्रकार जोहिया लोगों को सब भाँति दमन कर रायसिंह जी अपनी विजयी सेना के साथ पूर्णिया जाट जाति को परास्त करने के लिये अग्रसर हुए। घमासान युद्ध होने पर यह जाति भी आपके अधीन हो गई।

 

 

विजेता रायसिंह जी ने इस नवीन अधिकृत देश में राज्य स्थापित कर वहीं निवास करने का विचार किया। परन्तु दुःख है कि वीर श्रेष्ठ रायसिंह जी कुछ ही दिनों में पूर्णिया जाटों द्वारा मारे गये। यद्यपि पूर्णिया जाटों ने आपके प्राण हर लिये, तथापि वीर राठौड़ों की सेना ने उन पर अपना अधिपत्य कायम रखा। इस प्रकार पूर्णिया जाति की स्वाधीनता हरण कर वीर रायसिंह जी ने समस्त जाट जाति को अपने अधीन कर लिया था।

 

 

यद्यपि वीर बीका जी के वंशधर रायसिंह जी ने यवन सम्राट की अधीनता स्वीकार कर समयानुसार राजनेतिक क्षेत्र में विचरण करना शुरू किया था तथापि वे बल और विक्रम में बीकाजी से किसी प्रकार कम न थे। आपके शासन-काल में वीरतामय कायक्षेत्र जितना ही विस्तरित होता था, उतना ही आपका कार्य क्षेत्र भी बढ़ता गया। आप भारत के अनेक प्रान्तों में समय समय पर अपने तथा अपने वीर राठौरों की सेना के बाहुबल का परिचय देन लगे। आपने अहमदाबाद के शासन कर्ता मिर्जाहुसेन के साथ युद्ध करके उसे परास्त कर दिया और अहमदाबाद पर शीघ्रता से अपना अधिकार कर लिया। सम्राट अकबर ने आपके शासन समय में जिस जिस प्रान्त में युद्ध उपस्थित किया उसी उसी युद्ध- क्षेत्र में पहुँच कर आपने असीम साहस के साथ अपने बाहुबल की पराकाष्ठा दिखलाई। आप बादशाह के सम्मुख बड़े वीर गिने जाते थे तथा आपका सम्मान भी सब से अधिक होता था। आपकी वीरता पर बादशाह अकबर बढ़े मुग्ध थे। सन् 1612 में महाराजा रायसिंह ने इस मायामय शरीर को त्याग दिया।

 

 

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