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महाराजा जसवंत सिंह का इतिहास और जीवन परिचय

महाराजा जसवंत सिंह राठौड़ मारवाड़

सन् 1638 में महाराजा जसवंत सिंह जी मारवाड की गददी पर
विराजे। आपका जन्म सन् 1626 में बुरहानपुर नामक नगर में हुआ था। राज्य-गद्दी पर बैठने के समय आपकी उम्र 12 वर्ष की थी। सम्राट आप पर बड़ा अनुग्रह करते थे। गद्दी पर बैठ जाने के बाद पांच हजारी मनसबदार की इज्जत आपको मिली। काबुल के युद्ध में सम्राट आपको साथ ले गये थे। महाराजा जसवंत सिंह जी की अनुपस्थिति में सम्राट ने राजसिंह नामक कुमावत सरदार को मारवाड़ का राज्य-प्रबंध चलाने के लिये भेज दिया था। राजसिंह जी बड़े बुद्धिमान और स्वामिभक्त थे। उन्‍होंने महाराजा जसवंत सिंह जी को अनुपस्थिति में जोधपुर राज्य का अच्छा प्रबंध किया।

 

 

महाराजा जसवंत सिंह का इतिहास और जीवन परिचय

 

 

सन् 1645 में सम्राट शाहजहाँ ने महाराजा जसवंत सिंह जी को 6 हजारी मनसबदार बना दिया। इतना ही नहीं, सम्राट द्वारा एक भारी रकम पर्सनल अलाउन्स के बतौर आपको मिलने लगी। इसी साल आपको महाराजा का महत्वपूर्ण खिताब भी मिला। इनके पहले किसी भी राजपूत नरेश को यह खिताब प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ था। सन् 1649 में पोकरन के शासक रावल महेशदास जी का स्वर्गवास हो गया। इसलिये पोकरन की जागीर सम्राट ने महाराजा को प्रदान कर दी। जसवन्त सिंह जी ने अपनी सेना भेजकर पोकर पर अपना अधिकार जमा लिया।

 

 

सन् 1657 में सम्राट शाहजहाँ के बीमार हो जाने के कारण उसके पुत्रों में साम्राज्य के लिये झगड़े शुरू हुए। इन झगड़ों में महाराजा
जसवन्त सिंह जी ने सम्राट के ज्येष्ठ पुत्र दारा का पक्ष लिया था क्‍यों कि राज्य का वास्तविक अधिकारी यही था। अपने पिता की बीमारी का हाल सुनकर औरंगज़ेब ओर मुराद-जोकि दक्षिण की सूबेदारी पर नियुक्त थे अपनी सेना सहित दिल्‍ली पर अधिकार करने के लिये रवाना हो गये। ऐसे समय में सम्राट ने महाराजा जसवन्त सिंह जी को कई मुगल सरदारों के साथ उक्त शाहजादों का दमन करने के लिये भेजा। इस अवसर पर सम्राट ने महाराजा को 7000 हजारी मनसबदार बनाकर मालवे का सूबेदार नियुक्त किया। इतना ही नहीं, सम्राट ने आपको एक लाख रुपया इनाम में दिया और मुगल सेना का प्रधान सेनापति भी बनाया। इस समय महाराजा जसवंत सिंह जी के हाथ के नीचे 22 उमराव थे जिनमें से 15 मुसलमान ओर बाकी 7 हिन्दू थे।

 

महाराजा जसवंत सिंह राठौड़ मारवाड़
महाराजा जसवंत सिंह राठौड़ मारवाड़

 

धूर्त औरंगजेब ने मुसलमान सरदारों को चालाकी से अपनी तरफ़ मिला लिया। उज्जैन के समीप फतेहाबाद नामक ग्राम के पास से महाराजा जसवंत सिंह जी और बागी शाहजादों का मुकाबला हुआ। 6 घंटे तक लड़ाई होती रही। अन्त में विजयलक्ष्मी ने औरंगजेब और मुराद को अपनाया। कारण और कुछ नहीं सिर्फ मुगल उमरावों का शाहजादा की तरफ़ मिल जाना था। फिर भी महाराजा जसवन्त सिंह जी अपने राठौड़ सिपाहियों को ही लेकर बड़ी बहादुरी के साथ लड़े। राठौड़ों ने बात की बात में 10000 मुगलों को धराशायी कर दिया। महाराजा साहब अपने प्रिय घोड़े महबूब सहित खून से शराबोर हो गये। वे भूखे बाघ की तांई जिधर जाते थे उधर ही का रास्ता साफ़ हो जाता था। पर कहाँ तो अथाह मुगल सेना ओर कहाँ मुट्ठी भर राजपूत। जब बहुत कम राजपूत बच रहे और महाराजा जसवंत सिंह जी के जीवन के धोखे में पड जाने का भय प्रतीत होने लगा, तब राजपूत सरदारों ने उनसे मारवाड़ लौट जाने का अनुरोध किया।

 

 

महाराजा साहब मारवाड़ की ओर रवाना कर दिये गये। इतना हो जाने पर भी राजपूत समरक्षेत्र त्यागने को तेयार नहीं हुए। उन्होंने रत्नसिंह जी राठौड़ को महाराजा के स्थान पर नियुक्त करके फिर युद्ध शुरू कर दिया। रत्नसिंह जी ने तत्कालीन शाहपुरा-नरेश सुजान सिंहजी की सहायता से शत्रु के तोपखाने पर धावा बोल दिया ओर उसके जनरल मुर्शिदकुली खां तथा उसके सहायकों को कत्ल कर दिया। इस समय यदि औरंगजेब स्वयं उस स्थान पर नहीं पहुँचता तो शत्रुओं के तोपखाने पर रतनसिंहजी का अधिकार हो ही गया होता। इतने ही में मुराद ने जोकि अभी तक दाहिनी बाजू पर नियुक्त था बायी बाजू पर आकर राजपूतों पर ज़ोर का हमला किया। यद्यपि राजपूतों की संख्या मुगलों के सामने कुछ भी नहीं थी तथापि रत्नसिंहजी ओर सुजानसिंह जी मरते दम तक लड़ते रहे। मुगलों के पैर उखड़ गये ओर वे भाग खड़े हुए। कासीसखाँ आदि विश्वास घातक मुगल सेनापति भी आगरे की तरफ़ चले गये।

 

 

इधर महाराजा जसवंत सिंह जी सोजत होते हुए मारवाड़ जा पहुँचे। इस हार से महाराजा को बड़ा सदमा पहुँचा। जब यह खबर आगरे पहुँची तो शाहजहाँ को भी बड़ा दुःख हुआ। उसे यह भी मालूम हो गया कि इस हार का कारण कासीस खाँ आदि मुगल सेनापतियों की विश्वास घातकता है। सम्राट ने तुरन्त एक नया फरमान महाराजा के नाम जारी किया। उसमें लिखा था कि 50 लाख रुपया सांभर के खजाने से ले लो ओर अपनी सेना एकत्रित करके तुरन्त आगरे चले आओ।” शाही फरमान के अनुसार महाराजा जसवंत सिंह जी जोधपुर का शासन मुहणोत नेणसी के सुपुर्द कर आगरे की तरफ रवाना हुए। एक महीने तक आगरे में ठहर कर वे आगरा के पास दारा शिकोह से जा मिले। धौलपुर के पास औरंगजेब से दूसरी लड़ाई हुईं। इसमें सम्राट की सेना हार गई और उसके रुस्तम खां, शत्रूसाल ( बूंदी-राजा ) और रूपसिंह ( रूप नगर के राजा ) आदि सेना-नायक भी वीरगति को प्राप्त हुए। विजय-माला औरंगजेब के गले में पड़ी। जसवन्त सिंह जी मारवाड़ लौट गये। धौलपुर की विजय के बाद औरंगजेब ने अपने पिता सम्राट शाहजहाँ को कैद में डाल दिया और आप तख्त पर बैठ गया। इतना ही नहीं, जिस मुराद की सहायता से वह इतने बढ़े विशाल साम्राज्य का अधिपति हुआ था वह भी उसकी आँखों में खटकने लग गया। मौका पाते ही मुराद को भी जेल में ही नहीं, वरन जुहन्नुम में भिजवा दिया।

 

 

उन तमाम आदमियों में से जो कि औरंगजेब के खिलाफ लड़े थे,
सिर्फ महाराजा जसवंत सिंह जी ही एक ऐसे थे जो बचे हुए थे। पाठक इसका कारण यह न समझ लें कि महाराजा जसवंत सिंह जी पर सम्राट की कृपा थी अथवा उन्हें माफ़ी प्रदान कर दी थी। बात दर असल में यह थी कि औरंगजेब उनकी शक्ति से परिचित था और इसी लिये वह उनसे डरता था। वह शान्तिमय उपायों से जसवन्त सिंह जी को अपनी ओर मिला लेना चाहता था। उसने आमेर के मिर्जा राजा जयसिंह जी को भेज कर सम्मान पूर्वक जसवन्त सिंह जी को दिल्‍ली बुलवा लिये और उनके साथ समझौता कर लिया।

 

 

इसी समय शाहशुजा साम्राज्य प्राप्ति की आशा से या मृत्यु की प्ररेणा से बंगाल से रवाना होकर दिल्ली की तरफ आ रहा था। औरंगजेब ने उसका सामना करने के लिये अपने पुत्र सुल्तान महमद और महाराजा जसवंत सिंह जी को भेजे। औरंगजेब भी स्वयं साथ गया। खजुआ नामक स्थान पर महाराजा जसवंत सिंह जी ओर शुजा का मुकाबला हुआ। इस अवसर पर जसवन्त सिंह राठौड़ जी ने अपने गुप्त दूत द्वारा शुजा से कहलवा भेजा कि मेंने युद्ध में भाग न लेने का निश्चय कर लिया है अतएव महमद के साथ तुम जो चाहो कर सकते हो। रात्रि के समय महाराजा जसवंत सिंह जी ने केम्प को लूट लिया और जो कुछ मिला उसे लेकर वे मारवाड़ की तरफ रवाना हो गये। औरंगजेब ने भी शुजा पर हमला कर दिया। शुजा हार गया।

 

 

अब दारा शिकोह-जो सिन्ध की तरफ भाग गया था- अजमेर पहुँचा। उसका खयाल था कि जसवंत सिंह जी की सहायता से वह फिर औरंगजेब का सामना कर सकेगा। पर औरंगजेब ने पहले ही जसवंत सिंह जी को मिला लिया था। वह बखूबी जानता था कि अगर दारा और महाराजा जसवंत सिंह जी मिल गये तो अपनी स्थिति संकटापन्न हो जायगी। इसी विचार से उसने मिर्जा राजा जयसिंहजी को जसवन्त सिंह जी के पास भेजा और कहला भेजा कि यदि जसवंत सिंह जी दारा को सहयोग न देंगे तो उनको मुगल सेना में फिर से अच्छा पद प्रदान कर दिया जायेगा। जसवंत सिंह जी दारा से मिलने के लिये मेड़ता तक आ गये थे पर आखिर औरंगजेब की कूट-नीति-पूर्ण चाल काम कर गई। जसवन्त सिंह जी का विचार बदल गया। वे औरंगजब द्वारा दिखलाये गये प्रलोभनों में फँस गये। वे उस समय शत्रु, मित्र की पहचान न कर सके। दारा से बिना मिले ही वे वापस जोधपुर चले गये।

 

 

सन् 1659 में औरंगजेब ने जसवंत सिंह जी की फिर से 7000
हज़ारी मनसबदार का खिताब देकर गुजरात के सूबेदार नियुक्त कर दिये। इसके दो वर्ष बाद इन्हें शाईस्तखाँ के साथ प्रसिद्ध महाराष्ट्र वीर छत्रपति शिवाजी के विरुद्ध युद्ध में जाना पड़ा था। औरंगजेब की इच्छा शिवाजी को समूल नष्ट कर डालने की थी पर यह बात महाराजा जसवंत सिंह जी को न रुचती थी। वे नहीं चाहते थे कि शिवाजी का बाल भी बांका हो। उनको मराठों का भविष्य उज्जवल प्रतीत होता था। उन्हें विश्वास था कि मराठों द्वारा फिर से हिन्दुओं का सितारा चमकेगा ओर हिन्दुस्थान में हिन्दुओं का साम्राज्य स्थापित होगा। अतएव महाराजा जसवंत सिंह जी ने रणछोड दास नामक अपने एक विश्वासपात्र नौकर को शिवाजी के पुत्र के पास भेजा। शिवाजी का पुत्र जसवन्त सिंह जी के पास आया तो उन्होंने सम्राट की तमाम कूट-नीति-पूर्ण चालें उसके सामने खोल दीं। यह खबर शाइस्ताखाँ को लग गई। उसने सम्राट को लिख भेजा कि जसवन्त सिंह जी शिवाजी से मिले हुए हैं। इधर शिवाजी भी चुपचाप नहीं बेठे थे। जब उन्हें मालूम हुआ कि जसवंत सिंह जी मेरे पक्ष पर हैं तो उन्होंने एक रात को शाईस्त खाँ पर छापा मारा। शाईस्तखाँ प्राण लेकर बेतहाशा भागा। अन्त में औरंगजेब ने शाइस्तखाँ ओर जसवंत सिंह जी को वापस बुला लिये। वहाँ आमेर के मिर्जा राजा जयसिंह जी और शाहज़ादा मुअज्जम को भेजा।

 

 

महाराजा जसवंत सिंह जी को एक बार और शाहाज़ादा मुअज्जम के साथ दक्षिण में जाना पड़ा था। इस समय आप चार वर्ष तक लगातार यहाँ रहे। इस अर्से में शाहज़ादा मुअज्जम को अपने पिता औरंगजेब के खिलाफ उभारा, पर इस स्क्रीम के कार्यरूप में परिणत होने के पहले ही सम्राट ने मुअज्जम की जगह महावत खाँ को दक्षिण का सूबेदार बनाकर भेज दिया। यह देख जसवन्त सिंह जी वापस मारवाड़ लौट आये। कुछ समय यहाँ रहकर फिर आप अपने पुत्र पृथ्वी सिंह जी के साथ शाही दरबार में जा शामिल हुए। सन् 1670 में महाराजा जसवंत सिंह जी तीसरी बार गुजरात के सूबेदार हुए। यहाँ तीन वर्ष रहने के बाद आप पठानों का दमन करने के लिये काबुल भेजे गये। काबुल जाकर महाराजा ने अपनी रण-कुशलता से पठानों को परास्त कर दिया। आपके हमलों से पठान पीछे हट गये। इस प्रकार अपने कर्तव्य का पालन कर महाराजा सीमान्त प्रदेश के जमरोज नामक स्टेशन पर रहने लगे। अपने जीवन के शेष दिन आपने इसी स्थान पर व्यतीत किये।

 

 

काबुल जान के पहले महाराजा जसवंत सिंह जी अपने राज्य की
तमाम शासन-व्यवस्था अपने पुत्र पृथ्वीसिंह जी को सौंप गये थे। एक दिन सम्राट ने बड़ी क्षुद्गता का बर्ताव किया। उसने भरे दरबार में पृथ्वीसिंह जी के दोनों हाथ पकड़ लिये और उनसे कहा कि “अब तुम क्या कर सकते हो पृथ्वीसिंह जी ने जबाब दिया “ईश्वर आपकी रक्षा करे। जब प्राणि-मात्र का शासक ( ईश्वर ) अपनी गरीब से गरीब प्रजा पर रक्षा का एक हाथ फैला देता है तो उसकी सम्पूर्ण कामनाएँ सफल हो जाती हैं। आपने तो मेरे दोनों हाथ पकड़ लिये हैं। अब मुझे किस बात की चिन्ता है। अब तो मुझे विश्वास होता है कि में समस्त संसार को पराजित कर सकता हूँ।” इस पर सम्राट ने कहा कि “यह दूसरा कुट्टन है” कुट्टन शब्द का प्रयोग बादशाह जसवंत सिंह जी के लिये किया करता था। जो कि हमेशा उसकी (सम्राट की) जाल से छूटकारा करने की कोशीश में लगे रहते थे, और थप्पड़ का बदला घूंसे से देने में तनिक भा नहीं हिंचकते थे। औरंगजेब, पृथ्वीसिंह के उक्त जबाव से प्रसन्न हो गया और उसने उन्हें एक बढ़िया सिरोपाव पहिनने के लिये प्रदान किया। इस घटना के थोड़े ही दिन बाद पृथ्वीसिंह जी का देहान्त हो गया। कहा जाता है कि उनकी मृत्यु का कारण उक्त सिरोपाव था जोकि बादशाह की तरफ से उन्हें मिला था। इसी सरोपाव में जहर मिला हुआ था। पर कुछ इतिहास लेखकों का मत है कि पृथ्वीसिंह जी छोटी माता की बीमारी के कारण परलोकवासी हुए।

 

 

जब पृथ्वी सिंह जी को मृत्यु का समाचार उनके पिता जसवन्त सिंह जी के पास पहुँचा तो उन पर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा। वे दुःख-सागर में गोते मारने लगे। वे इतने अधीर हो उठें कि पृथ्वी सिंह जी की स्वरगस आत्मा को तर्पण देत समय वे कह उठे “हे पुत्र पृथ्वीसिंह यह अंजली तुम्हें ही नहीं, वरन मारवाड़ को भी देता हूँ” इसका अर्थ यह था कि में अब मारवाड़ के राज्य-शासन में हाथ न डालूंगा। काबुल का सूबेदार हमेशा पठानों के साथ युद्ध करने में लगा रहता था। इसका कारण यह था कि मुगलों द्वारा बार बार हराये जाने पर भी पठान लोग लूट-खसोट किया करते थे । इसी प्रकार की एक लड़ाई में एक शाही मनसबदार शत्रुओं द्वारा मार डाला गया। उसकी सेना भाग खड़ी हुईं। जब यह खबर महाराजा को लगी तो वे खुद उस सेना की सहायता पर जा पहुँचे। फिर से युद्ध हुआ और पठान लोग भाग खड़े हुए। इस घटना से पठानों पर इतना आतंक छा गया था कि जसवंत सिंह जी का नाम सुनते ही वे कांपने लग जाते थे। महाराजा जसवंत सिंह जी ने पाँच वर्ष काबुल में रह कर वहाँ पूर्ण शांति स्थापित कर दी।

 

 

सन् 1678 में जमरोज ( काबुल ) नामक स्थान पर महाराजा
जसवंत सिंह जी का स्वर्गवास हो गया। आप दुरदर्शी, बुद्धिमान एवं राजनीतिज्ञ थे। साहित्य के तो आप बड़े प्रेमी थे। वेदान्त में भी आप अपना दखल रखते थे। आपने ‘भाषा-भूषण’ ओर ‘स्वात्यानुभव नामक पुस्तकें भी लिखी थीं। आपके अन्तिम दिन हिन्दुस्थान के उत्तर-पश्चिम सीमान्त प्रदेश में ही बीते। कूटनीतिज्ञ औरंगजब द्वारा महाराजा जसवंत सिंह जी को इतनी दूर भेजे जाने के कई कारण थे। औरंगजेब एक ही गोली में कई शिकार मारना चाहता था। उन दिनों सीमान्त प्रदेश पर पठान लोगों ने वैसा ही ऊधम मचा रखा था जैसा कि आज कल। अतएव जसवन्त सिंह जी के समान शक्तिशाली नरेश का वहां रहना मुगल साम्राज्य की रक्षा के लिये बड़ा आवश्यक था। दुसरे अगर इस कार्य में जसवन्त सिंह जी को अपने प्राणों से हाथ भी धोने पड़ते तो सम्राट को कोई नुकसान न था बल्कि इस बात का फायदा ही था कि वह अपने साम्राज्य के एक शक्तिशाली सरदार से जो कि अवसर पाते ही बगावत शुरू कर सकता है-मुक्त हो जाता। तीसरे इतनी दूर रहने के कारण जसवन्त सिंह जी के लिये बगावत करना नितान्त असंभव हो गया था। यदि वे चाहते तो भी बगावत नहीं कर सकते थे कारण कि अपने राजपूत भाइयों से वे बहुत दूर जा पडे थे।

 

 

महाराजा जसवंत सिंह जी भी औरंगजेब की कूट-नीति से भली भाँति परिचित थे। वे हमेशा अपने आपको औरंगजेब से दूर रखते थे। वे अपने धर्म को हृदय से चाहते थे। एक समय ओरंगजेब ने घमंडी होकर बहुत से मन्दिर तुड़वा डाले थे और उनके स्थान पर मस्ज़िदें बनवा दी थीं। इस समय महाराजा जसवंत सिंह जी पेशावर में थे। जब उन्होंने यह समाचार सुने तो उन से न रहा गया । उन्होंने हिन्दू-मुसलमानों की एक सभा बुलवा कर, घोषणा की कि “यदि सम्राट अपनी नीति से बाज न आयेगा और हिन्दुओं के मन्दिरों को फिर भी नष्ट करेगा तो मजबूर होकर मुझे मस्जिदों को तोड़ने का काम शुरू करना पड़ेगा। इस पर महाराजा के किसी शुभाकामी ने उनसे कहा कि यदि यह बात सम्राट के पास पहुँच गई तो वह आप से बहुत नाखुश होगा। महाराजा ने जबाव दिया “ मेरा आम सभा में यह बात प्रकाशित करने का उद्देश्य ही यह था कि सम्राट तक यह बात पहुँच जाये।

 

 

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