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मणिपुर की भाषा

मणिपुर की भाषा का इतिहास और लिपि

मणिपुर क्षेत्रफल की दृष्टि से बहुत ही छोटा राज्य है। मणिपुर की जनसंख्या 30-32 लाख के आसपास है। परन्तु इसमें अनेक भाषाओं और बोलियों का प्रचलन है। इन भाषाओं में मणिपुरी जिसे स्थानीय भाषा में ‘मैतेलौन” कहा जाता है, प्रमुख एवं सम्पर्क भाषा है। मणिपुरी भाषा-भाषी जन संख्या लगभग 2/3 है और शेष 1/4 लोग भी मणिपुरी भाषा बोलते हैं । वास्तव में मणिपुर की घाटी में बसने वाले मैतेई जनजाति की भाषा मैतेलोन या मणिपुरी है, जब कि पर्वतों में रहने वाले आदिवासियों की लगभग चालीस भाषाएं हैं, जिनकी अनेक उप भाषाएं और बोलियां भी हैं।

मणिपुर की भाषा का इतिहास

पर्वतीय भाषाओं मे प्रमुख है :– आइमोल, अडामी, अण्ड्रो, अताल, कच्चा नागा, कबुई, कौम, कौराओ, कौरेड (लियाड), कूपोमे, खोइराओ, खाओइ, खुरीकुल, डाडते, चाइरेल, चिरू, चौथे, ताखुल, भादौ (घादोइ), पाइसे, पुरुम, फदाड़, मरम, मरिझ, माओ (सोपवोमा), भार, मियाड, मोतासाझ, मोयोन, एलते, लाभडाड, लुशाई, वाईफ, शान, साथे, सिमते सेडमई, सेमा, हिरोइ लाभडाड आदि। इन भाषाओं के अतिरिक्त भारत के विभिन्‍न भागो की भाषाएं व बोलियां भी मणिपुर मे प्रचलित हैं, जिनमें, बंगला, राजस्थानी, मैथिली, भोजपुरी, पंजाबी, असमी, आदि प्रमुख हैं। यों सभी भारतीय भाषा-भाषी लोग मणिपुर में मिलते हैं, जो परस्पर संवाद एवं सम्पर्क हेतु अपनी-अपनी मातृभाषा का प्रयोग करते हैं। अंग्रेजी और नेपाली दो विदेशी भाषाओं का भी यहां प्रचलन है तथा दोनों भाषाएं स्नातक स्तर तक पढाई जाती हैं।

मणिपुर की भाषा
मणिपुर की भाषा

हिन्दी यहां अपनी विभाषाओं मैथिली व ब्रज के रूप में मध्यकाल से धार्मिक कार्यों में प्रयुक्त होती हैं। राजनैतिक कारणो से भी संस्कृत व परवर्ती भाषाओं का यहां प्रचलन रहा है। हिन्दी भाषा का मणिपुर में 1925 ई० से आज तक स्वैच्छिक संस्थाओं द्वारा प्रचार प्रसार हो रहा है। कक्षा तीन से आठ तक यहां पाठशालाओ में हिन्दी अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाई जाती है। अभी पिछले कुछ वर्षों से कक्षा तीन के स्थान पर कक्षा छ: से हिन्दी पढाई जा रही है, परन्तु पुनः कक्षा तीन से पढाई जाने का निर्णय हुआ। हाई स्कूलों व कालेजों मे हिन्दी वैकल्पिक विषय के रूप में पढ़ाने की व्यवस्था है तथा विश्व-विद्यालय में बी ए कोर्स, एम ए एम फिल तथा हिन्दी शौध की सुविधाएं उपलब्ध हैं। यद्यपि मणिपुर की भाषा के सम्बन्ध में विद्वानों का मत है कि ये सभी भाषाएं तिब्बती -बर्मा समूल मे उपकुल कुकीचिन की भाषाएं है, किन्तु वर्षों से आर्य भाषाओं के संपर्क में आने के कारण इनमें आर्य भाषा के शब्द समूह का प्रचलन है, यद्यपि दोनो भाषा परिवारों की प्रवृति में अत्यधिक अन्तर है।

मैतेई भाषा के मूल के सम्बन्ध में विद्वानों के एक वर्ग का मत है कि यह भाषा संस्कृत से निकलो हुई आर्य भाषा है। डाल्टन, डब्लू, यमुजाओं तथा अतोभ बापू शर्मा इस मत को मानने वालो में प्रमुख हैं और उन्होने संस्कृत व्याकरण से मैतेई भाषा के व्याकरण की समानता के उदाहरण दिए हैं, साथ ही शब्दों की व्युत्पत्ति का भी उल्लेख करके मैतेई भाषा के शब्दों की संस्कृत से उत्पत्ति दिखाई है। किंतु डा० उपति प्रियसैन तथा सुनीति कुमार चटर्जी इनके मत से सहमत नही हैं।

सप्रति मणिपुर में अनेक भाषा बोलियां प्रचलित हैं। संविधान की आठवी सूची में दी गई भाषाओं के असमी, बंगाली, गुजराती, हिंदी, कन्नड, कश्मीरी, मलयालम, मराठी तमिल, तेलुगु, उर्दू, उडिया के बोलने वाले भी मणिपुर राज्य मे रहते हैं। इन भाषाओं के अतिरिक्त अन्य भाषाएँ जैसे–विष्णु प्रिया, चीनी, इगलिश, गोरखाली (नेपाली), मणिपुरी, तथा त्रिपुरी भाषा बोलने वाले भी मणिपुर में रहते हैं।

मणिपुर मे जनजातीय भाषाएं

अर्दि, अडामी, बोदो, मार, कबुई, खासी, कुकी, लोया, लुशाई (मिजो), माओ, मिकिर, मिशमि, नागा, पाइटे, सेमा, तांखुल, यादों, वाइफै आदि भाषाएं बोली जाती है। मणिपुर की लगभग 96 प्रतिशत जनसंख्या स्थानीय भाषा बोलती है। यहां एक प्रतिशत हिन्दी भाषी तथा 1/4 प्रतिशत बंगला भाषी हैं। प्रदेश की 8 जनजातीय भाषाओं के अतिरिक्त भी अन्य जनजातीय भाषाएं भी हैं, जिनकी संख्या अभी निर्धारित नही की जा सकी है।

आकार एवं जन संख्या की दृष्टि से यह छोटा सा राज्य है किन्तु इन भाषाई विविधता के होने पर भी सभी लोग भावात्मक एकता में जुड़े हैं। मणिपुरी भाषा अन्तर प्रांतीय भाषा है क्योंकि यह असम में तथा त्रिपुरा राज्यो मे भी बोली जाती है। साथ ही यह अंतराष्ट्रीय भाषा भी हैं क्योंकियह बर्मा व बंगला देश में बोली जाती है।

मणिपुर की भाषा लिपि

जनजातीय भाषाओं की अपनी भाषा लिपि नही है। अंग्रेजों के आने के बाद इन भाषाओं के लिए रोमन लिपि अपनाई गई है। मैतेई भाषा प्राचीन हैं और इसकी लिपि भी रही है जिसको ‘ मैते मयेक’ कहा जाता रहा है। पौराणिक कथा के आधार पर अत्या गुरु सिदवा ने सृष्टि के बाद में अपने पुत्र पाखंबा एवं सतामही को मैते भाषा और लिपि में शिक्षा दी थी। अतः मैतेई भाषा व लिपि सृष्टि के साथ ही जन्मी है। किन्तु कुछ लोगो की मान्यता यह भी है कि मणिपुर में लिपि नहीं थी। लोग ईश्वर की प्रार्थना करते थे और वे प्रार्थनाएं उनको स्मरण थी। प्रार्थनाओं के अतिरिक्त लिखित साहित्य नहीं था।

मैते मयेक (मणिपुरी लिपि) के उद्भव, प्रकृति और वर्ण संख्या के सम्बन्ध में विद्वानों में गहरा मतभेद है। जी. एच, दामन (G.H Damand) इसका उद्भव 1700 ई० तो टी0 सी हडसन 1540 ई० मानते हैं। ‘ चैथारोल” कुम्बाबा के अनुसार खंगेम्बा (1598- 1652) के समय मणिपुर में लिपि का प्रचलन हुआ था। किन्तु कुछ पंडित लोग राजा कियाम्बा के कोइबु के शिलालेख (1467- 1508) के आधार पर इसका उद्गम कियाम्बा के समय में मानते हैं। किन्तु युमजाओ सिंह के फेयेड ताम्रपत्रों को प्रामाणिक मान लिया जाए तो इसका उद्भव खोडतेकचा नामक राजा के शासन काल 773 ई० से मानना होगा। युमजाओ के मनुसार मैते मयेक का प्रचलन पाखंगम्बा के शासनकाल 33 ई० से हुआ। डा० कालिदास नाग इसका उद्भव सम्राट अशोक के शासन काल से पूर्व मानते हैं।

‘मैते मयेक” मे वर्णों की संख्या 18 थी जिसमे ‘अजि वर्ण भी था जिसका न उच्चारण होता था न इसका प्रयोग ही मिलता है। राजा जय सिंह उर्फ भाग्यचन्द्र के शासनकाल 18वी शताब्दी के उतरार्द्ध में यह सख्या 35 हो गई। स्वर एवं मात्राएं तथा ग॒, घ, ज, झ, भ, घ, द, व, र, ण और श वर्ण इसमें बाद में मिलाए गए हैं। “अजि” का प्रयोग ‘ऊ’ ‘श्री’ आदि के स्थान पर मंगल चिह्न के रूप में किया जाता है। स्वर न होते हुए भी मात्राएं थीं जिनका प्रयोग लिखते समय ‘इ’ की मात्रा व्यंजन वे दाहिने और बाकी सभी मात्राएं बाए ऊपर या नीचे लिखी जाती थी। कुछ विद्वान यह भी कहते है वि भ, इ ओर उ स्वर मणिपुरी के 18 वर्णों मे सम्मिलित थे।

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Naeem Ahmad

CEO & founder alvi travels agency tour organiser planners and consultant and Indian Hindi blogger

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