मंगल ग्रह पर जीवन संभव है या नहीं खोज व मंगल ग्रह के रहस्य

मंगल ग्रह के बारे में विगत चार शताब्दियों से खोज-बीन हो रही है। पिछले चार दशकों में तो अनंत अंतरिक्ष की गहराइयों को तय करने के लिए साधन सम्पन्न देशों में जैसे होड़ सी लग गई है लेकिन इससे पूर्व भी खगोलशास्त्री अपनी दूरबीनों से सौर-मंडल के ग्रहों-नक्षत्रों की गतिविधियों पर दृष्टि रखते थे। ऐसे ही इटली के एक खगोलशास्त्री गियोवान्नी शियापेरेल्ली ने सन्‌ 1877 मे जब पहली बार मंगल ग्रह पर अनेक नहरों व नदी – घाटियों की उपस्थिति की घोषणा की तो सारे विश्व में हलचल मच गई। उन्होने इन नहरो को ‘केनाली’ का नाम दिया। बाद में और अधिक दूरबीन अध्ययन के दौरान इन ‘नहरों’ की संख्या बढ़ती गई तो उसने मंगल ग्रह पर एक उन्नत सभ्यता के अस्तित्व की घोषणा कर दी। कुछ वैज्ञानिकों को इस शताब्दी के प्रारंभ मे यह विश्वास था कि आदिकाल में मंगल ग्रह पर एक उन्नत सभ्यता विद्यमान थी,जिसने ग्रह पर वर्षा बिलकुल न होने के कारण ध्रुव क्षेत्रों से पानी लाने के लिए इन विशालकाय नहरों का निर्माण किया था। लेकिन वैज्ञानिक परीक्षणों द्वारा यह विश्वास आधारहीन साबित हो गया है। यह भी पता चल गया कि मंगल पर नहरों का कोई अस्तित्व नहीं है।

 

 

मंगल ग्रह पर सभ्यता की अंतिम निशानी

 

इस विश्वास के समर्थकों का तो यहां तक कहना था कि मंगल ग्रह के दोनों उपग्रह फोबोस (Phobos) व डीमोस (Demos) (जिनका अर्थ ‘भय’ और ‘आतंक’ है तथा जिनका पता सन्‌ 1610 में जे. कैप्लर ने लगाया था) उसी ‘उन्नत सभ्यता ‘ की
अंतिम निशानी है। ये भीतर से बिल्कुल खोखले हैं। अनुमान किया जाता है कि उस सभ्यता ने लाखों वर्ष पूर्व इन उपग्रहों को मंगल की कक्षा (Orbit) में स्थापित किया होगा। इसलिए इन्हें कृत्रिम उपग्रह भी कहा जाता है लेकिन यह वैज्ञानिक तथ्य नहीं है।

 

 

पृथ्वी से लगभग 311 करोड भील दूर स्थित मंगल ग्रह को जीवविज्ञानी एक विशाल कोपागार’ समझते रहे हैं। उनका ख्याल है कि यह ग्रह जीव-विज्ञान और भू-गर्भशास्त्र की दृष्टियों से, सौर-मंडल के उद्गम व विकास पर पर्याप्त प्रकाश डाल सकता है। इतना ही नही, बहुत से वैज्ञानिकों का तो यहां तक कहना है कि मंगल ग्रह के व्यापक अध्ययन से हमारी पृथ्वी के भविष्य के बारे में बहुत कुछ पता चल सकता है और कुछ ‘अप्रत्याशित’ भावी घटनाओं के बारे मे अभी से सतर्क हो सकते हैं।

 

 

 

मंगल ग्रह पर जीवन की खोज

मंगल ग्रह पर जीवन की खोज के बारे मे जो प्रथम प्रयोग किया गया, वह इस धारणा पर आधारित था कि पृथ्वी का प्रत्येक जीवधारी भी व्यर्थ पदार्थ के रूप में गैस निष्कासित करता हैं। वनस्पति व्यर्थ पदार्थ के रूप में ऑक्सीजन छोडती है। जब
कि जन्तु और अधिकतर जीवाणु कार्बन डाई ऑक्साइड। यदि मंगल ग्रह की मिट्टी में वानस्पतिक जीवन है तो थोडी-सी मिट्टी कक्ष में रखने पर ऑक्सीजन पैदा करेगी और यदि कोई जन्तु या जीवाणु हैं, तो कार्बन डाई ऑक्साइड। उक्त प्रयोग में मिट्टी से कार्बन डाई ऑक्साइड निकली, जिससे पता लगता है कि मिट्टी में-जन्तु व जीवाणु हो सकते हैं। साथ ही ऑक्सीजन भी काफी मात्रा में निकली यानि मिटृटी मे वनस्पतिक जीवन भी हो सकता है। कार्बन डाई ऑक्साइड काफी धीरे-धीरे और कई दिनों के अंतराल पर प्रकट हुई, जैसा कि मिट्टी में जीवाणुओं के उपस्थित होने पर होता है। इसके विपरीत ऑक्सीजन कुछ घंटों में ही अचानक बाहर निकली। यह आश्चर्य की बात थी, क्योंकि यदि मिट्टी में वनस्पति की उपस्थिति होती, तब आक्सीजन धीमी गति से कार्बन डाई ऑक्साइड की तरह निकलती।

 

 

मंगल ग्रह
मंगल ग्रह

 

ऑक्सीजन का तेजी से निकलना जीव-वैज्ञानिक क्रिया के बजाय मिट्टी की रासायनिक क्रिया के कारण भी हो सकता है सौर – पराबैंगनी विकिरण, जो मंगल ग्रह की सतह पर निरंतर पड़ता रहता है, हाइड्रोजन पराक्साइड बना सकता है। हाइड्रोजन पराक्साइड मिट्टी में पत्थर के क्रिस्टल के साथ चिपक जाती है। जब इन क्रिस्टलों को नमी मिलती है, तब हाइड्रोजन पराक्साइड के अणु तेजी से जल तथा आक्सीजन में विघटित हो जाते है। सन्‌ 1974 मे अमेरिका द्वारा भेजे गए ये प्रयोग ‘वाइकिंग’ नामक अंतरिक्ष यान के मार्फत किए गए थे। ‘वाइकिंग’ का काम मंगल ग्रह की तस्वीरें पृथ्वी पर भेजना तथा वहां की मिट॒टी को नम करना था, अतः ऑक्सीजन का तेजी से निकलना इस क्रिया द्वारा भी समझाया जा सकता है।

 

 

दूसरा प्रयोग

यह प्रयोग मुख्य रूप से जीवाणुओं की उपस्थिति ज्ञात करने के लिए किया गया। इस प्रयोग में मंगल की चुटकी भर मिट्टी को एक कक्ष मे रखकर उसको एक रस से भिगोया गया। इस रस में एमिनो एसिड तथा अन्य खाद्य सामग्री मिली हुई थी। यह खाद्य सामग्री सभी भोजनों की तरह कार्बन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन तथा अन्य रासायनिक परमाणुओं से मिलकर बनी थी। इस भोजन में कार्बन के कुछ परमाणुओं की जगह कार्बन के रेडियोसक्रिय समस्थानिक C,14 प्रयुक्त किए गए। यदि मंगल ग्रह पर जीवाणु होते तो वे इस भोजन को पचाते तथा रेडियोसक्रिय कार्बन डाई आक्साइड छोड़ते। इस कक्ष के ऊपर वाले कक्ष मे एक बहुत संवेदनशील उपकरण रखा था, जो रेडियो सक्रियता की उपस्थिति में पृथ्वी को संकेत भेजता था। यह कक्ष अपने नीचे वाले कक्ष से एक पतली नली द्वारा जुड़ा हुआ था। जब यह प्रयोग किया गया, तब तो काफी अधिक मात्रा मे रेडियो सक्रियता का पता लगा, जो मंगल ग्रह पर जीवन की पुष्टि करता है।

 

 

इस प्रयोग का विश्लेषण पहले प्रयोग की तरह जीवरहित रासायनिक क्रियाओं द्वारा किया जा सकता हैं। यदि मंगल ग्रह की मिट्टी में हाइड्रोजन पराक्साइड है, तो मिट॒टी को इस से नम करने पर स्वाभाविक रूप से पराक्साइड यौगिक ने रस मे भोजन के कणों को विघटित कर दिया होगा अर्थात्‌ उसे छोटे अणुओं में तोड़ दिया होगा, जिसमे कार्बन डाई आक्साइड के अणु भी थे। इनमें से कछ रेडियो सक्रिय भी थे। इस तरह यह रासायनिक क्रिया पहले प्रयोग की भांति जीवाणुओं की उपस्थिति को गलत करार देती है।

 

 

तीसरा प्रयोग

यह प्रयोग मंगल ग्रह पर वनस्पति सदृश्य जीवन की उपस्थिति का पता लगाने के लिए किया गया था। पृथ्वी पर जो वनस्पति पाई जाती है, उसे अपनी वृद्धि के लिए जल, वायु, कार्बन डाई ऑक्साइड तथा प्रकाश की आवश्यकता होती है। वनस्पति
वातावरण से जल सोखती है तथा वातावरण से ही कार्बन डाई आक्साइड व सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा लेकर इन पदार्थों को कार्बोहाइड्रेट में संगठित कर देती है। इस क्रिया मे ऑक्सीजन निकलती है।

 

 

मंगल की सतह पर कार्बन डाई ऑक्साइड लगभग 95 प्रतिशत पाई जाती है। मंगल ग्रह की मिट॒टी की एक चुटकी ‘वाइकिंग’ के कक्ष मे रखी गई, जिसमें जल वाष्प तथा कार्बन डाई ऑक्साइड पहले से मौजूद थे। इस कक्ष मे मंगल के कृत्रिम वातावरण को उत्पन्न किया गया, तथा सूर्य प्रकाश के बराबर प्रकाश वाले एक
लैम्प से इस कक्ष को प्रकाशित किया गया। अनुमान यह था कि मंगल की वनस्पति इन अवस्थाओं को अपनी वृद्धि के अनुकूल महसूस करेगी।

 

 

इस प्रयोग मे प्रयुक्त कार्बन डाई ऑक्साइड के कुछ अणु रैडियो-सक्रिय कार्बन परमाणुओं C,14 से निर्मित थे। अतः प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) के परिणामस्वरूप बने कार्बोहाइड्रेट को रेडियो सक्रिय होना चाहिए था। प्रयोग ने अनुकूल परिणाम दिए। कई दिनों के अंतराल के बाद मिटटी रेडियो सक्रिय पाई गईं। जिससे पता लगता है कि या तो वहां वनस्पति है या वनस्पति जैसी ही कोई चीज। यह अनुभव इस तथ्य से प्रमाणित था कि जब कृत्रिम, सूर्य प्रकाश को बंद किया गया, तब रेडियो सक्रियता में काफी कमी आई अर्थात्‌ मंगल ग्रह की वनस्पति भी पृथ्वी की वनस्पति की भांति प्रकाश मे तेजी से
बढ़ती है।

 

 

एक अन्य प्रयोग

 

इस बारे में अतिरिक्त सूचनाएं मिली एक अन्य प्रयोग से, जोकि जीवन के लिए नहीं बल्कि मिट्टी के लिए किया गया था। यह मंगल ग्रह की मिट्टी में कार्बोनिक योगिकों की स्थिति ज्ञात करने के लिए किया गया प्रयोग था। कार्बनिक यौगिक पृथ्वी पर सभी प्रकार के जीवन के लिए आवश्यक है। यदि मंगल ग्रह पर जीवन है तो वहां की मिट्टी में इनकी उपस्थिति होनी चाहिए। यह प्रयोग किसी भी कार्बोनिक अणु का पता लगाने में सफल रहा। जिससे यह सोचा जा सकता है कि मंगल पर कोई जीवन नहीं है। और यह प्रयोग बाइकिंग परिणामों की रसायनिक व्याख्या का समर्थन करता है। फिर दूसरे अंतरिक्ष यान द्वारा जो पहले यान से 4600 मील की दूरी पर उतारा गया था, ये प्रयोग दोहराए गए, तो परिणाम रसायनिक व्याख्या के विरुद्ध मिले और जीव वैज्ञानिक प्रक्रियाओं की पुष्टि हुई।

 

 

पहले प्रयोग को फिर से दोहराने पर ऑक्सीजन पहले की अपेक्षा एक तिहाई मिली। हो सकता है कि इस नये स्थान की मिट्टी में पहले स्थान की अपेक्षा पैराक्साइड योगिकों की मात्रा कम हो। इस तरह कहा जा सकता है कि मंगल ग्रह पर जीवन होने की संभावनाएं निर्णय है। वहां की मिट्टी तथा वायुमंडल केवल बिल्कुल प्राथमिक स्तर के आर्गेनिक पदार्थ को जीवित रख सकती है। लेकिन इसके बाद भी चंद्रमा के पश्चात् मंगल ग्रह मानवीय उपयोग के हिसाब से सबसे आकर्षक ग्रह है। जिसकी खोजबीन से लाभकारी परिणाम निकल सकते है।

 

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