बेबीलोन हैंगिंग गार्डन – बेबीलोन की प्रमुख विशेषताएं क्या थी?

बेबीलोन को यदि हम स्वर्ण नगरी की समता मे रखें तो यह कोई
अत्युक्ति नहीं होगी। एक जमाना था कि कृत्रिम एवं प्राकृतिक सौन्दर्यो की इस नगरी में भरमार थी। पर जैसे परमात्मा को अपनी कृति के सम्मुख उतने साज सौन्दर्य में कोई मानवी कृति पसन्द नहीं, इसीलिये इस स्वर्ण नगरी बेबीलोन के कृत्रिम अद्भुत सौन्दर्य अब केवल इतिहास के पृष्ठों ही में समाहित रह गये हैं। बेबीलोन आज भी है, वहां के पर्वत, नदी और झीलें आज भी हैं पर वहां के लोगों ने उस भूमि पर जिन अद्भुत विश्व विमोहिनी सौन्दर्यों की रचना की थी, उनके चिन्ह अब वर्तमान में नहीं है। समय के चक्र में घुलते-पिसते वे सब खत्म हो गये।

 

 

बगदाद से दक्षिण की तरफ पचास मील की दूरी पर यूफतीज नदी
के तट पर बेबीलोन नगर बसा हुआ है। विद्वानों में इस बात को लेकर तगड़ा मतभेद है कि इस सुन्दर नगर बेबीलोन को कब और किसने बसाया था। इतिहास के पृष्ठों में प्राचीन काल के एक बादशाह नेबुकनेजर के राज्यकाल के उल्लेख के मध्य इस बात का पता चलता है कि यह नगर की उस समय काफी उन्नति थी। उस समय यह नगर सब प्रकार से सुखी और सम्पन्न था। स्पष्ट है कि अब से लगभग चार हजार वर्ष पूर्व इस नगर की काफी उन्नति हुई थी। पौराणिक बातों के खोज करने वाले विद्वानों का कहना है कि इस बात का कोई प्रमाण नही मिलता है कि बेबीलोन नगर की नींव कब और किसने डाली थी।

 

 

प्रसिद्ध इतिहास लेखक हेरोडोट्स का जीवन लिखने वाले कुछ विद्वानों ने तो यहां तक लिख दिया है कि ईस्वी सन्‌ से लगभग 445 वर्ष पूर्व जिस इतिहास की रचना हेरोडोट्स ने की थी, उसमे भी बेबीलोन नगर के बसाएं जाने का हाल नहीं मिलता है। पर वास्तव में ऐसी बात नही है। अथवा इससे इस तर्क पर पहुंचना कि हेरोडोट्स के काल तक यह नगर के बसाये जाने का पता ने चला था भ्रांति-मूलक बात है। वास्तव में हेरोडोट्स के इतिहास में बेबीलोन की काफी चर्चा मिलती है और उन्हे पढ़कर हम एक निष्कर्ष पर पहुँच ही जाते हैं, Babylon नगर की जिन अद्भुत मानव-कृतियो का जिक्र हम करने जा रहे है। वह वास्तव में हेरोडोटस का आखों देखा वर्णन है। वैसे तो प्राचीनकाल के कुछ अन्वेषकों द्वारा अपने भ्रमण के लेखों में भी उसका हाल मिलता है, पर हेरोडोटस के इतिहास को ही हम प्रामाणिकता का आधार मानते हैं।

 

 

बेबीलोन नगर के जिस हवाई उपवन (बेबीलोन हैंगिंग गार्डन) का उल्लेख हम करते रहे है, वह संसार में अत्यधिक प्रसिद्ध एव विश्व के महान आश्चर्यो मे से एक महान आश्चर्य है। वैसे तो यह सारा का सारा नगर ही अलकापुरी के सौन्दर्य की जैसी सानी रखता है, पर वह झूलता हुआ उद्यान अपनी बनावट की अद्भूत कला और सजावट आदि के लिये संसार में अकेला ही है। वह उद्यान बेबीलोन की तत्कालीन महारानी का क्रीडा स्थल था। कहते है कि मेहराबी छतों पर एक बहुत ही आलीशान महल बनवाया गया था। उस महल पर और भी कई एक महल बनाये गये थे। उनमें से जब सबसे ऊँचे वाला मकान नगर के परकोटों की ऊंचाई के बराबर पहुंचा तब उस पर एक अत्यन्त ही सुन्दर उपवन (बाग) बनाया गया। यही वह झूला बाग था जो संसार के महान आश्चर्यो मे विशिष्ट स्थान रखता है। उस झूलते बाग की पूरी जानकारी प्राप्त करने से पूर्व यह आवश्यक होगा कि हम बेबीलोन के तत्कालीन इतिहास और नगर की बनावट के सम्बन्ध में भी कुछ जानकारी प्राप्त कर लें।

 

 

बेबीलोन का इतिहास

 

 

हमने पहले ही कहा है कि इस नगर को स्वर्ग नगर, अलकापुरी एवं अमरावती कहने में कोई अतिशयोक्ति नही होगी। इस नगर की सजावट इतनी सुन्दर थी, और आज भी उस सौन्दर्य के ऐसे-ऐसे अवशेष विद्यमान है, कि उन्हे देखते ही बनता है। नगर चौकोर बसाया गया है। चारों तरफ से इसका प्रसार लगभग बारह मील का है। इस प्रकार यदि कोई नगर की परिक्रमा करना चाहे तो उसे सामान्यत पचास मील का चक्कर काटना पडता है। चारो तरफ नहर खोदी गई हैं जिससे बाहरी आक्रमणों से नगर की सुरक्षा हो सके। कहते हैं कि नहर की खुदाई में जो मिट॒टी निकली थी उस मिट॒टी की इंटे बनाई गई और उन ईंटो से शहर के चारों तरफ परकोटे खींचे गये। परकोटे की दीवार लगभग दौ सौ हाथ ऊँची और पचास हाथ चौडी बनाई गई। ईंटो की जुडाई में जिस मसाले का उपयोग किया गया है, वह एक प्रकार का लाल रंग का मसाला था। नगर के चारों तरफ जो नहर खोदी गई है उसकी गहराई का कोई निश्वित माप का तो हमे पता नही है, पर जिसकी मिट॒टी से दो सौ हाथ ऊंची और पचास हाथ चौड़ी दीवारे बनी है, उसकी गहराई कितनी होगी इसका अनुमान हम कर सकते है। निश्चित रूप से वह नहर बहुत ही गहरी होगी।

 

 

बेबीलोन की प्रसिद्ध नदी युफ्रतीज, जिसके तट पर यह नगर बसा
हुआ है, नगर के मध्य में से होकर बहती है। इसलिए नदी की वजह से यह नगर दो भागों में बंट गया है। नगर की रक्षा का बड़ा ही मजबूती से प्रबन्ध किया गया है। चारों तरफ की मजबूत दीवार और गहरी नहर के होने के कारण कोई भी शत्रु चाहे वह कितना ही शक्तिशाली क्‍यों न हो, नगर पर चढाई करने की सहज ही हिम्मत नही कर सकता था। नगर मे प्रवेश करने से पहले शत्रु को नहर, तब उसके बाद परकोटे की मजबूत दीवारों को पार करना होता है। परकोटों पर चारों ओर शक्तिशाली बुर्ज बने हुए हैं। परकोटे की मुंडेर इतनी चौड़ी थी कि उन पर एक साथ ही चार गाड़ियों दौड़ सकती थीं। चारदीवारी में चार लम्बे चौड़े प्रवेश द्वार थे और उनमें पीतल के अत्यन्त ही मजबूत फाटक लगे हुए थे। युफ्रतीज नदी पर कई बांध बांधे गए थे। पीतल के मजबूत फाटकों के अतिरिक्त कई एक पीतल के पल्‍लों की खिड़किया भी थी।

 

 

बेबीलोन की प्रमुख विशेषताएं

 

युफ्रतीज नदी पर आज भी एक ऐसा अद्भुत पुल बना हुआ है, जिसे देखकर बडे-बडे इंजीनियरों का भी सिर चकराये बिना नहीं रह सकता है। कहते हैं इस नदी की सतह में बहुत अधिक बालू है। इसलिये इसमें कोई स्थाई एव मजबूत पुल बनाना सर्वथा असम्भव है। पर बड़े-बड़े वैज्ञानिकों की इस धारणा के बावजूद इस नदी पर जो पौराणिक समय का बना हुआ पुल है वह इतनी मजबूती और इस खूबी से बना हुआ है कि वह आज भी वैसा का वैसा ही खडा है। बहुत दूर-दूर के कारीगर जब उस पुल को देखते हैं तो आश्चर्य में पडे बिना नहीं रहते।

 

 

कहते हैं कि परकोटे में जो प्रवेश द्वार बने हुए है, वह एक दूसरे से
जोड़े गए है, एक दरवाजे से दूसरे दरवाजे तक जाने के लिए पुल को तरह ही ऊंचे-ऊचें चबूतरे बने हुए हैं। इन चबूतरों में से प्रत्येक की ऊंचाई परकोटे की दीवार से दस फीट की बताई जाती है। अन्य भी कई चबूतरे जहां तहां बने हुए थे। कहते हैं कि कुल मिलाकर चबूतरों की संख्या लगभग तीन सौ थी। इस प्रकार चारों तरफ से हर भांति नगर की सुरक्षा का पूरा प्रबन्ध किया गया था। किसी भी शत्रु का चाहे वह कितना ही प्रबल एवं सैन्यबल रखता हो, नगर में घुस जाना एक प्रकार से असम्भव ही था। नगर के भीतर की सड़के भी बडी सुन्दर और साफ सुथरी तथा चौड़ी बनी हुई थीं। कोई-कोई सड़क की लम्बाई पूरे नगर में फैली हुई थी। इसी प्रकार कोई-कोई सडक 150 फीट चौड़ाई की भी थी। सड़कों के दोनों तरफ पीतल के सुन्दर कटहरे बनाये गये थे जिनके कारण सड़को की शोभा बहुत ही बढ जाती थी। सड़को के पास कही-कहीं सुन्दर मनोरम उपवन भी बने हुए थे। कुल मिलाकर यह नगर अत्यन्त ही सुन्दर था।

 

 

बेबीलोन के प्रतिकात्मक चित्र
बेबीलोन के प्रतिकात्मक चित्र

 

बेबीलोन नगर का उपर्युक्त वर्णन कल्पित नही, वरन्‌ हिरोडोट्स द्वारा लिखित इतिहास में इस नगर का ऐसा ही वर्णन आया है। यहां के लोगों के सम्बन्ध में हिरोडोट्स ने लिखा है कि लोग धार्मिक विचार के थे। देवी-देवताओं की पूजा करते थे। वहां के निवासियों के प्रसिद्ध देवता ‘बलूस’ के प्रति लोगों मे बडी श्रद्धा थी। बलूस देवता का एक मन्दिर भी नगर में बना हुआ था। यह मन्दिर बड़ा ही सुन्दर एवं अद्भुत बना हुआ था। मन्दिर के चारों तरफ चारदीवारी खिंची हुई थी और मन्दिर का घेरा हर तरफ से लगभग साढे सात सौ हाथ का था। चारदीवारी के मध्य में बलूस देवता का विशाल भव्य मंदिर बना हुआ था । मन्दिर के बाहरी भाग से ऊपर तक जाने के लिए सीढ़ियां बनी हुई थीं। मंदिर की ऊंचाई इतनी अधिक थी कि सीढ़ियों से ऊपर चढते समय दम लेने के लिये चढ़ने वाले को कई स्थानों पर रुकना पडता था।

 

इसके लिये बीच-बीच में रुकने के स्थान भी बने हुए थे। विश्राम के जो स्थान ऊपर बने हुए थे वे भी देखने में अनूठे ही थे। वे दालान की तरह थे और उनकी सजावट भी बडी अच्छी थी। वहां लोगों के बैठने के लिये मेज, कुर्सियां आदि बनी हुई थी। इस मंदिर के सबसे ऊपरी भाग में बलूस देवता की मूर्ति प्रतिष्ठित थी। जिस स्थान पर वह मूर्ति रखी गई थी, वह स्थान सजावट मे अद्वितीय था। वह मूर्ति भी बड़ी विशाल और आकर्षक थी। मूर्ति के अगल- बगल में एक लम्बा चौड़ा रिक्त स्थान था। वहीं पर स्वर्ण का बना हुआ एक सुन्दर पलंग बिछा हुआ था और उसके समीप ही सोने का बना हुआ एक अत्यन्त ही सुन्दर सिंहासन भी था’ उस सिंहासन के आस पास सोने की बनी हुईं अनेक कुर्सियां रखी हुईं थी।

 

 

लोगों का कहना है कि एक बार सोने की बनी उन मूर्तियों के मूल्य
का अन्दाजा लगाया गया था, तो पता चला कि उन मूर्तियों में लगे सोने का मूल्य ही कम से कम तीस करोड रुपये का होगा। कहते हैं कि उस मंदिर की ऊंचाई लगभग चार सौ हाथ की थी और उसके नीचे का घेरा भी चार सौ हाथ का ही था। मन्दिर के सबसे ऊपरी हिस्से मे आकाश के नक्षत्रों की जानकारी प्राप्त करने के लिये कई दूरबीनें और कई यंत्र लगें हुए थे। बादशाह नेबुकनेजर के समय तक, कहते हैं कि मन्दिर के हर हिस्से में देवताओं की पूजा हुआ करती थी।

 

 

ईसाईयो के धर्म ग्रंथ बाइबिल में महाराज नेबुकनेजर का उल्लेख
भी कई स्थानों पर मिलता है। एक स्थान पर लिखा हुआ है कि नेबुकनेजर की सोने की कई मूर्तियां थी। उनमें एक मूर्ति ऐसी थी जिसकी ऊंचाई साठ हाथ की थी। नेबुकनेजर भी कला प्रेमी और देवताओं की आराधना करने वाला था। उसने मंदिर के आस-पास और भी कितने ही सुन्दर भव्य महल बनवा दिये थे। इस प्रकार इन सब मकानों के साथ मन्दिर का प्रसार लगभग एक मील में हो गया था। उन घरों में भी पीतल के मजबूत फाटक बने हुए थे और उनके चारों तरफ परकोटे खींचे गये थे।

 

 

पर समयांतर मे यह मन्दिर भी विनाश के कराल-गाल में समा गया है। जराक्सिस नामक बादशाह के समय तक यह मन्दिर काफी अच्छी हालत में था और लोगों की अपार श्रद्धा का पूजित केंद्र था। पर जब जराक्सिस ग्रीस के युद्ध से लौटा तब उसने मन्दिर को खुदवा कर उसका सारा धन निकाल लिया। यही नहीं, उसने सोने की सभी मूर्तियों को गलवा कर सिक्के ढलवा दिए। उन्हीं मूर्तियों में कहते हैं, एक चालीस हाथ ऊंची मूर्ति भी थी। पर बाइबिल मे वर्णित नेबुकनेजर की वह साठ हाथ ऊंचाई वाली मूर्ति का कोई पता नहीं चला। पर अन्य किसी इतिहासकार के इतिहास वर्णन में भी उस कथित मूर्ति का पता नहीं चलता है। जो सारी मूर्तियां उस मन्दिर से निकाली गई थीं उनका सोना तौलने पर लगभग सात सौ मन था।

 

 

केवल उस मन्दिर को ही नहीं, कहते है कि जराक्सिस ने पूरे बेबीलोन नगर को जी भर कर लूटा-खसोटा था। उसने कितनी ही इमारतों को खुदवा कर धराशायी कर दिया था और वहां से प्राप्त धन राशि से अपना खजाना भरा था। भारत पर विजय प्राप्त करने के पश्चात्‌ सिकन्दर महान जब वापस लौटा तो वह इस नगर का कायापलट करवाना चाहता था। इस काम के लिये उसने दस हजार मजदूरों को लगाया और टूटी फूटी इमारतों और दीवारों की मरम्मत करवानी शुरू की। परंतु दुर्भाग्य से काम शुरू करवाने के दो वर्ष बाद उसकी मृत्यु हो गई और बेबीलोन नगर उजाड़ का उजाड़ ही रह गया।

 

 

बेलूस देवता के जिस मन्दिर का उल्लेख हमने ऊपर किया है, उसके समीप ही बेबीलोन के बादशाह की पुरानी इमारत भी थी। उसका घेरा पूरे चार मीलो में था। उस पुराने राजमहल के ठीक सामने युफ्रतीज नदी के उस पार नेबुकनेजर ने एक आलीशान नया राजभवन बनवाया था। कहते हैं कि महाराज नेबुकनेजर के नए राजभवन के घेरों में कई आश्चर्य चकित कर देने योग्य अन्य इमारते भी बनाई गई थी। सबसे आश्चर्य जनक वस्तु वह उद्यान था। कहते है कि महाराज नेबुकनेजर ने जितनी भी चीजें बनाई थी, उनमें तालाब और नेहरे अत्यधिक सुन्दर एवं आकर्षक बनाई गई थी।

 

 

बहुत काल से लगातार युफ्रतीज नदी की बाढ से बेबीलोन नगर के
निवासियों को अनेक दिक्कतों से गुजरना पड़ता था। बराबर इस नदी मे बाढ आती जाती रहती थी। गर्मी के दिनों में जब अर्मेनिया पर्वत की बर्फ पिघलती थी तो उसका पानी युफ्रतीज नदी मे आता था जिसके कारण नदी में तूफान आना शुरू हो जाता था। इस बाढ में नगर के अधिकतर भाग डूब जाते थे और नगरवासियों को बहुत हानि होती थी। नेबुकनेजर के गद्‌दी एर बैठने के पूर्व भी इस बाढ़ को रोकने का बहुत प्रयत्न किया गया था, पर सफलता नही मिली थी। नेबुकनेजर ने इस बाढ से नगर की रक्षा करने के लिये युफ्रतीज के पूर्वी हिस्से में ही बडी-बडी नहरें खुदवाई और उनको टाइग्रीस नदी में मिलवा दिया था। इस बाढ का पानी नहरों से होकर टाइग्रीस नदी में गिर जाता था और नगर की रक्षा हो जाती थी। टाईग्रीस नदी में पानी गिराने के इस सराहनीय प्रयत्न से नगर की रक्षा हो सकी। यह नहर बहुत ही आश्चर्य जनक थी और उनकी खुदाई में नेबुकनेजर को खजाने का बहुत सा धन खर्च करना पडा था। उसने अनेक सुन्दर तालाब भी खुदवाये थे। वह कलाप्रिय था और इसीलिए उसने नगर में कई सुन्दर बगीचे बनवाये। उसके बनवाये हुए बग़ीचों में एक से एक सुन्दर एवं आश्चर्य में डाल देने वाले थे उन्हीं में से एक था बेबीलोन का झूला हुआ बगीचा।

 

 

यही उस स्वर्ग नगरी बेबीलोन का कृत्रिम सौन्दर्य था। अब हम पुनः उस बेबीलोन के झूले बाग का उल्‍लेख करते है, जिसका जिक्र प्रारम्भ में हमने किया है एक ऊंचे मकान पर कई एक मकान बने और सबसे ऊंचाई पर एक बगीचा बनाया गया। इस उपवन का घेरा 265 हाथों का था। उसके चारों तरफ चारदीवारी थी और उस पर अनेक बडे बड़े बुर्ज बने हुए थे कहते हैं कि एक तल्‍ले मकान से दूसरे तल्‍ले पर जाने के लिये दस फीट चौडी सीढियों का एक जीना बनवाया गया था। उसी जीने से लोग ऊपर जाते थे। एकदम ऊचाई पर एक विशाल शिलाखंड रखा गया था। उस शिला खंड की लम्बाई लगभग बीस फीट और चौडाई 5 फीट की थी। उसके ऊपर लकड़ी का एक तल्‍ला मकान बनाया गया था। किसी विशेष प्रकार के मसाले से उसकी जुड़ाई की गई थी। उस मकान के ऊपर मजबूती के साथ ईंटों की जुडाई की गई थी। उस पर शीशे काफी मजबूती के साथ जड़े हुए थे।

 

 

इतना करने के बाद उस पर मजबूत मिट्टी की दीवार उठाई गई
थी। लोगों का कहना है कि नीचे जो भी काम किया गया था, वह सब इस ख्याल से कि कहीं ऊपर की मिट॒टी की दीवार नीचे खिसक कर ध्वस्त न हो जाये। जिस मिट॒टी की दीवार का उल्लेख हमने किया है, वह इतनी चौडी थी कि उस पर बड़े-बड़े सुन्दर वृक्ष स्थित थे। नीचे से ऊपर तक की बनावट इतनी मजबूती से की गई थी कि उतने बड़े-बडे़ पेडों के रहते हुए भी उसके ध्वस्त होने की कोई संभावना नही थी।

 

 

यही वह बेबीलोन का हवाई उद्यान था जिसका जिक्र हम कर रहे
है। यह उपवन इतनी खूबी से बना हुआ था कि बाहर से देखने पर मालूम पडता था कि वह कोई बड़ा घना वन है। उसमें बड़ी खूबी के साथ तरह-तरह के सुन्दर फलों व फूलों के वृक्ष लगाये गये थे जिन लोगों ने देखा है वे यही कहते हैं कि ईश्वरीय हाथो ने ही इसका निर्माण किया है। संसार मे लाखो-लाखों एक से एक सुन्दर उद्यान बने हुए है और बन रहे हैं, पर बेबीलोन के उस उपवन की महान टक्कर का उद्यान न कभी ना और न कभी बनना संभव है। उसके निर्माण की पृष्ठभूमि मे जिन कारीगरों का मस्तिष्क लगाहोगा, वे वास्तव मे श्रृद्धा के पात्र हैं।

 

उद्यान धरती से काफी ऊंचाई पर था। उसकी सिंचाई करने के लिये नदी से पानी मशीन द्वारा ऊपर चढ़ाया जाता था। उद्यान के नीचे और ऊपर जो मकान बनाये गये थे, उनकी कारीगरी भी देखने योग्य ही थी। सभी मकान सुन्दर और रंग-बिरगें बने हुए थे। ग्रीष्मकाल में जो एक बार उस उद्यान में चला जाता था, वह कभी वापस आने का नाम नहीं लेता था। सीढियों के दोनो तरफ बडे सुन्दर ढंग से रंग-बिरंगें पेड़-पौधे लगाये गये थे। चारो तरफ पहाड़ के समान मजबूत दीवारें और दीवारों के चारों तरफ विशाल मनोरम पेड़ कतारों में देखने में ऐसे सुन्दर मालूम पड़ते थे जैसे स्वर्ण के निशात बाग हो।

 

 

कहते हैं कि महाराज नेबुकनेजर ने अपनी रानी के विहार के लिये
उस अद्भुत बाग को लगवाया था। उद्यान मे बैठने पर बेबीलोन का सारा दृश्य एव बलखाती नदियों की तरंगित धाराएं साफ दिखलाईं पडती थीं। मीलो तक की भूमि और उर्वर क्षेत्र उस उद्यान से साफ दिखलाईं पडता था। बेबीलोन की महारानी का वह क्रीडा स्थल अब नहीं रहा है। विश्व का वह आश्चर्यजनक उद्यान भी समय के चपेटों में धराशायी हो गया है। अन्वेषकों के खोजपूर्ण लेख और इतिहास के पृष्ठ ही अब उसकी स्मृति अवशेष रहे हैं।

 

 

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