बूंदी राजपूताना की वीर गाथा – बूंदी राजस्थान राजपूताना

केतूबाई बूंदी के राव नारायण दास हाड़ा की रानी थी। राव नारायणदास बड़े वीर, पराक्रमी और बलवान पुरूष थे। उनके वीरत्व व पराक्रम की बहुत सी आख्यायिकाएँ राजपूताने में कही जाती है, परंतु जहां उनमे अनेक प्रशंसनीय गुण थे, वहां उनमें अफीम सेवन का बड़ा दुर्गुण भी था। कहा जाता है कि वे सात पैसे की अफीम नित्य खाया करते थे। संवत 1851 में में मांडू के पठानों ने चित्तौड़ के राणा रायमल पर चढाई की तो राव नारायण दास को उन्होंने अपनी सहायता के लिए बुलाया। नारायण दास पांच सौ वीर हाड़ाओ को साथ लेकर चित्तौड़ को चले। एक मंजिल चलकर मार्ग में कुएँ के निकट अमल- पानी लेकर पेड़ के नीचे लेट गए। सफर की थकावट से तत्काल उनको निंद्रा आ गई। उनका मुख खुला हुआ था, जिसमें कुछ मक्खियां भर गई। एक तेलिन उसी समय पानी भरने के लिए आई, जिसने राव नारायण दास के चित्तौड़ जाने का हाल सुनकर कहा– क्या हमारे राणाजी को इसके सिवाय और कोई सहायता के लिए नहीं मिला। भला जब इसे अपने शरीर की ही सुध नहीं, तो इससे इससे राणाजी की क्या सहायता हो सकेगी।

 

 

 

अमली (अफीमची) की श्रवण-शक्ति प्रबल होती है। तेलिन का वाकय सुनकर, आंखें मलते मलते रावजी उठ खड़े हुए और उसके सम्मुख जाकर उससे कहा– “रांड क्या कहती है, फिर तो कह! तेलिन डर के मारे उस बात को फिर न कह सकी, क्षमा याचना करने लगी। उस युवती के हाथ में एक लौह दंड़ था, जिसको रावजी ने उसके हाथ से लेकर और हंसली की तरह मोड़कर उसके गले में पहनाकर कहा– “जब तक हम राणाजी की सहायता कर लौट न आएं, तब तक इसे पहने रहना, यदि हमारे लौटने से पहले कोई ऐसा बलिष्ठ आ जाए जो इसको सीधा करके गले से उतार सके तो उससे उतरवा लेना”!।

बूंदी राजस्थान
बूंदी राजस्थान

जिस समय हाड़ा राव चित्तौड़ पहुंचे तो उन्होंने यह देखकर कि चित्तौड़ को शत्रुओं ने चारों ओर से घेर रखा है, एकाएक सिंह विक्रम से उन पर आक्रमण किया। हाडियो की तलवार के सम्मुख पठान लडाके ठहर न सके। उनमे से बहुत से शत्रु वहीं मारे गए और अनेक इधरउधर भाग गए, तब बूंदी राव का विजय नक्कारा बड़े जोर से बजा। राणा रायमलजी ने सुना कि शत्रु बूंदी राव के भीषण आक्रमण से चित्तौड़ छोडकर भाग गए और बूंदी राव निकट आ गए हैतो अपने सरदारों सहित गढ़ के द्वार के बाहर आ अभ्यर्थना पूर्वक राजप्रासाद में उन्हें लिवा ले गए। चित्तौड़ में प्रविष्ट होने पर रमणियों ने जातीय गीतों का गान किया और उनके ऊपर पुष्प वृष्टि की।

हाड़ा राव की अप्रतिम वीरता का वृत्तांत सुनकर राजकुमारी केतूबाई उनके गुणों पर ऐसी मोहित हो गई कि उनके साथ विवाह करने की इच्छा जताई। यह राजकुमारी राणा रायमलजी की भतीजी थी। राणाजी ने जब राजकुमारी का मनोभाव जाना तो खुश होकर उनका विवाह हाड़ा राव के साथ कर दिया। विवाह के बाद लौटते समय मार्ग में उस तेलिन की हंसली उतारते हुए वे सकुशल बूंदी पहुचे।

केतूबाई में पतिभक्ति और पतिप्रेम असाधारण था। एक रात्रि को हाड़ा राव अफीम की पीनक में रानी के मुख को अपना मुख समझकर नाखूनों से खुजाते रहे और खुजाते खुजाते घायल कर डाला, परंतु धैर्यवती रानी पति को ऐसा करने से निषेध करने मे पति का अपमान समझ चुप पड़ी रही। जब प्रातःकाल हाड़ा राव ने अपनी रानी के मुख को क्षतविक्षत देखा और रानी से उनकी इस दशा का वृत्तांत सुना तो बड़े लज्जित हुए। अफीम की डिबिया रानी के हाथ में देकर कहने लगे– आज से तुम उचित मात्रा में अफीम दिया करो। अब रानी बड़ी सावधानी से नियत समय पर अपने स्वामी को अफीम दिया करती थी और कुछ कुछ घटाती भी जाती थीं। हाड़ा राव को नियमबद्ध होकर अपनी रानी के हाथों अफीम सेवन से कष्ट तो बहुत होता था, परंतु अपने प्रण पर दृढ़ रहे। चतुर रानी ने धीरे धीरे उनकी अफीम की आदत छुड़वा दी। राव नारायणदास और केतूबाई का जीवन विवाह के पश्चात बड़े आनंद के साथ व्यतीत हुआ। यथासमय उनके एक पुत्र उत्पन्न हुआ और उसका नाम सूरजमल रखा गया। बड़े होने पर सूरजमल भी वीरता, पराक्रम में अपने पिता के समान प्रसिद्ध हुए। वे भी चित्तौड़ में ब्याहे थे और उनकी बहन सूरजाबाई राणा चित्तौड़ के साथ ब्याही गई थी। एक बार राव सूरजमल चित्तौड़ के दरबार में बैठे हुए ऊंघ रहे थे कि एक सरदार ने उपहास के तौर पर एक घास का तिनका उनके कान में प्रविष्ट किया। सूरजमल ने कान में तिनके के प्रविष्ट होते ही एक हाथ खांड़े का छेड़ने वाले सरदार को दिया, जिससे तत्काल वह फर्श पर गिर पड़ा और मर गया।

सरदार का बेटा बदलालेने की घात में रहा और उसने चालाकी से राणाजी को विश्वास करा दिया की राव सूरजमल केवल अपनी बहन से मिलने ही नहीं आते, बल्कि उनकी बहुत बड़ी महत्तवाकाक्षांएं भी है। बहन से मिलने जाने के बहाने वह यहां के सब भेंदो और कमजोरियों की जानकारी लेने आते है। वह किसी ऐसे उपयुक्त मौके की प्रतीक्षा में है, जब बूंदी के साथ साथ चित्तौड़ में भी उन्हीं का ध्वज फहरे। बार बार राणाजी के कान भरकर उसने उनके मन में यह बात पूरी तरह बैठा दी कि सूरजमल उनके लिए बहुत घातक सिद्ध हो सकता है।

इसी बीच एक दिन सूरजमल फिर राणा जी के यहां आएं। अब उनके उठने बैठने, घूमने फिरने और यहां तक कि हर बात को राणा शंका की दृष्टि से देखने लगे, किंतु अपनी यह शंका उन्होंने कभी भी सूरजाबाई पर प्रकट नहीं की, क्योंकि उन्हें लगता था कि सूरजाबाई उनकी हर शंका का विरोध करेगी। इसलिए राणा ऊपर से तो सूरजमल के प्रति बिल्कुल सामान्य व्यवहार करते थे, किन्तु उनकी शंकित दृष्टि सूरजमल की हर छोटी से छोटी हरकत में किसी षडयंत्र की बू देखती थी।

एक दिन राणा और राव दोनों साथ बैठकर भोजन कर रहे थे, और सूरजाबाई बैठी पंखा झल रही थी। सूरजमल ने सामान्य उपहास के ढंग से राणा से कहा कि आप तो बालक की तरह छोटा छोटा कौर तोड़कर खाते है। सूरजाबाई ने भी भाई के स्वर में और राणा से विनोद करते हुए कहा कि मेरे भाई सिंह की भांति भोजन करते है। राणा को यह सामान्य सा उपहास बहुत चुभा और उन्हें क्रोध तो ऐसा आया कि सूरजमल का सिर अभी धड़ से अलग कर दे, किन्तु इस क्रोध को वह बहुत कुशलता के साथ पी गए और सूरजमल तथा सूरजाबाई को इसका तनिक भी आभास नही होने दिया कि राणा को यह उपहास अप्रिय लगा है।

जब सूरजमल विदा होकर चलने लगे तो राणा ने उनसे कहा– मै आखेट के लिए बूंदी आऊंगा। बसंत के आगमन पर, बसंती वस्त्र धारण कर अपने सरदारों सहित राणा बूंदी पहुंचे तो उनके संकेतानुसार पूर्वोक्त सरदार ने राव सूरजमल की ओर तीर चलाया। राव ने संयोगवश अपनी ओर आता हुआ समझकर अपनी कमान से दूसरी ओर फेर दिया। दूसरा तीर, जो राणा ख्वाससरदारभाई ने चलाया, उसको भी राव ने फेर दिया। अब राव को उनकी ओर से संदेह हुआ। इतने में अश्वारूढ़ राणा उनकी तरफ आए और खडगाघात किया। राव धराशायी हुए, परंतु रूमाल से अपना घाव बांधकर उठे और उच्च स्वर से पुकारकर कहा– तुम भाग जाओ मेवाड़ को तुमनें कलंकित कर दिया।

वह सरदार राणा से बोला– घाव पूरा नहीं आया। यह सुनकर राणा लौटे और राव पर फिर आक्रमण किया। इस बार जब राणा ने शस्त्राघात करने को हाथ उठाया तो हाड़ा राव ने घायल शेर की भांति बडे क्रोध से उनका कपड़ा पकड़कर उन्हें घोड़े से नीचे गिरा लिया और एक हाथ से उनका कंठ दबाया और दूसरे हाथ से खांड लेकर उनके ह्रदय में घुसेड दिया। शूरवीर राव अपने वधकर्ता को अपने पांवों तले मरता हुआ देखकर संतुष्ट हुए और तत्काल ही आप भी मृत्यु को प्राप्त हुए। राव और राणा जहां मृत्यु को प्राप्त हुए थे, वहां दोनों की रानियां सती होने को गई। दो चिताएं तैयार हुई और सूरजाबाई अपने बिना सोचे समझे कथन के लिए पश्चाताप करती हुई अग्नि में भस्मीभूत होकर सती हुई। राणा की बहन राव के साथ सती हुई।

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