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बीजापुर का युद्ध जयसिंह और आदिलशाह के मध्य

बीजापुर का युद्ध

महाराजा जयसिंह जी को दक्षिण भेजते समय औरंगजेब ने उनसे कह दिया था कि शिवाजी और बीजापुर के शासक दोनों ही को सजा दी जाये। पर जयसिंह जी ने यह कह कर कि “दोनों ही मूर्खों पर एक साथ हमला करना बुद्धिमानी का कार्य न होगा। इसलिये पहले अपनी सारी शक्तियों को शिवाजी के खिलाफ़ लगा देना चाहिये। इसी अनुसार जयसिंह जी ने अपनी सारी शक्ति का प्रयोग शिवाजी के विरुद्ध किया था। पुरंदर की संधि के अनुसार महाराजा शिवाजी को अपने दो-तिहाई राज्य से हाथ धोकर मुगल साम्राज्य के आज्ञाकारी सरदारों की गिनती में अपना नाम लिख- वाना पड़ा। अतएव अब मुगल सेना की वक्र दृष्टि बीजापुर की आदिल शाही पर पड़ी। बीजापुर वालों के अपराध भी बहुत थे। सन्‌ 1657 के अगस्त की सन्धि के अनुसार उसने ( बीजापुर के शासक ने ) 1 करोड़ रुपये बतौर हर्जाने के और साथ ही साथ परेन्दा का किला उसके आस पास का प्रदेश ओर निजामशाही कोकन, सम्राट को दे देना मंजूर किया था। पर इसके बाद शाहजहाँ की बीमारी एवं तख्तनशीनी के लिये होने वाले झगड़ों से फायदा उठाकर उसने अपनी शक्ति प्रतिज्ञा का पालन नहीं किया। हाँ, औरंगजेब की तख्तनशीनी के समय उसने 86 लाख रुपये अवश्य सम्राट को नज़र किये थे। इसके अतिरिक्त सन्‌ 1665 के जनवरी मास में भी उसने अपने कोर्ट में स्थित मुगल राजदूत द्वारा सम्राट के पास 7 लाख रुपये नकद और 6 जवाहिरात से भरी हुई छोटी छोटी सन्दूकें भेजी थीं। पर यह रकम हर्जाने की कुल रकम के सामने कुछ भी नहीं थी। इसके सिवा अभी तक उसने सन्धि की शर्तों के अनुसार उक्त किला और उसके आसपास का प्रदेश भी सम्राट के सुपुर्द नहीं किया था। इसमें कोई शक नहीं कि सन्‌ 1660 के सितंबर सास में परेन्दा के किले पर मुगलों ने अधिकार कर लिया था। पर यह कार्य आदिलशाह की मर्जी से नहीं, बल्कि उक्त किले के सूबेदार को घूस देकर किया गया था। आदिलशाह की यह इच्छा नहीं थी कि किला मुगल सम्राट फो सौंप दिया जाये।

 

बीजापुर का युद्ध

 

पश्चिमीय घाट का कुछ प्रदेश शिवाजी को हमेशा के लिये दे डाला था। इस भूभाग के बदले में उन्होंने शिवाजी से 40 लाख हन अर्थात 2 करोड़ रुपया प्रति वर्ष लेना निश्चित किया। जयसिंहजी के इस बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य से मुगल-साम्राज्य का तीन तरह से फायदा हुआ। एक तो यह कि 2 करोड़ रुपया प्रतिवर्ष सम्राट के खजाने में जमा होने लगा। दूसरा शिवाजी और बीजापुर के सुल्तान के बीच झगड़ा शुरू हो गया और तीसरे यह कि मुगल सेना की उक्त जंगली प्रान्तों में जाकर युद्ध करने की तकलीफ बच गई। इतना ही नहीं, वरन इस समझौते के अनुसार शिवाजी ने जयसिंह जी को बीजापुर सुल्तान के खिलाफ 9000 सेना के साथ मदद देने का भी वचन दे दिया। महाराजा जयसिंह जी इतना ही करके चुप नहीं रह गये। उन्होंने बीजापुर के कई जमींदारों से भी मुगलों के आश्रय में आ जाने के लिये पत्र-व्यवहार शुरू कर दिया। उक्त ज़मीदारों को इस बात का प्रलोभन दिखाया गया कि अगर वे शाही आधीनता स्वीकार कर लेंगे तो उनको मुगल सेना में अच्छे अच्छे पद प्रदान किये जावेंगे। जब आदिलशाह ने इस बात का विरोध किया तो उससे कहा गया कि  के मुगल सम्राट के प्रतिनिधि हमेशा से ऐसा करते आये हैं। शरणागत की आश्रय देना उनका कर्तव्य है। कर्नाटक के जमीदार और कर्नूल तथा जंजीरा प्रान्त स्थित अबीसीनियन लोग भी जयसिंह जी द्वारा अपने पक्ष में मिला लिये गये। यहाँ तक कि बीजापुर के जनरल और,मंत्री तक मुग़लों के पक्ष में कर लिये गये। इन कार्यों में जयसिंह जी को रुपया भी बहुत खर्च करना पडा।

 

 

मुल्ला अहमद नामक एक अरब बीजापुर दरबार में अच्छे पद पर
नियुक्त था। वहाँ के प्रधान अधिकारियों में प्रधान मंत्री अबुल महमद को छोड़ कर दूसरा नंबर उसी का था। जयसिंहजी ने इसको भी अपने चंगुल में ले लिया। औरंगजेब से कह कर उसे अपनी सेना में 6000 सैनिकों का संचालक नियुक्त कर दिया। इसके अतिरिक्त 22 लाख रुपये उसे खर्च के लिये भी दिये गये।

 

 

इसमें कोई शक नहीं कि जयसिंहजी युद्ध-नीति के प्रकाण्ड परिणत थे। उन्होंने बीजापुर के सुल्तान को शान्ति कायम रखने का वचन दे दिया जिससे कि वह युद्ध की तैयारी भी न कर सका। अपनी कोटे में स्थित बीजापुर के राजदूत को उन्होंने यह कह कर समझा दिया कि “सम्राट की तरफ से बीजापुर पर आक्रमण करने का हमको कोई हुक्म नहीं मिला है। हां, खिराज के एक लम्बे अर्से से चले आये हुए झगड़े को सुलझाने का हुक्म जरूर मिला है। इधर तो बीजापुर राजदूत को इस प्रकार समझा दिया ओर उधर अपने रामा और गोविन्द नामक दो पडितों को आदिलशाह के पास इसलिये भेज दिये कि वे वहां जाकर सुल्तान के हृदय में इस बात का विश्वास जमा दें कि जयसिंह जी की इच्छा बिलकुल युद्ध करने की नहीं है। पर सच पूछा जाय तो जयसिंह जी की इच्छा शान्ति कायम रखने की कदापि नहीं थी। उन्होंने अपने एक गुप्त-पत्र में सम्राट को लिखा था कि “अगर आदिलशाह मेरे पास खिराज़ का झगड़ा तय करने के लिये अपना दूत भेजेगा तो में उसके सामने ऐसी ऐसी कठिन शर्तें पेश करूगां जिनको संभव है कि वह मंजूर ही न कर सके। इधर गोलकुंडा के सुल्तान कुतुब शाह से भी जयसिंह जी ने अपनी तरफ मिल जाने का अनुरोध किया। इस सम्बन्ध में जयसिंह जी ने औरंगजेब को जो पत्र लिखा था उसकी कुछ पंक्तियों का सारांश नीचे दिया जाता है। “अब कुतुबशाह को बीजापुर सुल्तान से विमुख करके सम्राट की
तरफ मिलाना अत्यन्त अनिवार्य है। अतएव मेंने उसको आश्वासन देकर उसके साथ मेत्री स्थापित कर ली है। अगर पर्दा खुल गया और उसको (कुतुब शाह को) असली बात का पता चल गया तो वह आदिलशाह की तरफ मिल सकता है।

 

 

जयसिंह जी की फौजी तैयारियां

 

 

इस प्रकार चारों तरफ अपनी राजनीति का जाल बिछा कर जय सिंह जी अपनी सैनिक तैयारियों करने लगे। उनकी आधीनता में इस समय 40 हजार थल सेना थी। यहाँ यह बात ध्यान में रखनी चाहिये कि उक्त 40 हजार सेना में वह सहायक-सेना शामिल नहीं है, जो कि शिवाजी तथा दूसरे सहायकों द्वारा मुगलों की मदद पर आई हुई थी। शिवाजी ने 7000 बहादुर मराठा सैनिक नेताजी परलकर की आधीनता में तथा 2000 सैनिक अपने पुत्र के साथ जयसिंह जी की मदद के लिये भेजे। पाठकों को मालूम होगा कि उक्त नेताजी परलकर अपनी बहादुरी एवं रण-पटुता के कारण महाराष्ट्र भर में “दूसरे शिवाजी” के नास से सम्बोधित होते थे। इस समय शिवाजी बीजापुर-राज्य के दूसरे प्रान्तों में स्थित किलों पर अधिकार करने तथा आसपास के मुल्कों में गड़बड़ मचाने में लगे हुए थे। इस कार्य को जयसिंह जी ने अपने लिये हितकर समझा और यही कारण था कि उन्होंने इस समय शिवाजी से मुगल सेना में सम्मिलित होने के लिये आग्रह नहीं किया। जयसिंह जी छत्रपति शिवाजी को एक चतुर सेना नायक समझते थे। इसके लिये उन्होंने एक समय अपने पत्र में बादशाह को भी लिख भेजा था। उन्होंने लिखा था कि “ इस युद्ध में शिवाजी अत्यन्त बहुमूल्य सहायक हो सकते हैं। अतएव इसमें उनकी उपस्थिति एकान्त अनिवार्य है। अब खफीखाँ शिवाजी की उपयोगिता के सम्बन्ध में क्‍या उद्धार प्रगट करते हैं, वह भी सुन लीजिये। उन्होंने कहा था कि “शिवाजी और नेताजी किलों पर अधिकार करने के कार्य में प्रकाण्ड पंडित और सिद्धहस्त हैं। चूंकि बीजापुर वालों के साथ प्रसिद्ध ‘मालिक-सेदान’ नामक तोप मौजूद थी इसलिये जयसिंह जी ने भी युद्ध शुरू करने के पहले 40-50 तोपें दक्षिण के किलों से अपने पास मंगवा लीं। इस प्रकार युद्ध सम्बन्धी तमाम तैयारियाँ कर लेने पर जयसिंह जी ने सम्राट औरंगजेब को एक पत्र लिखा। इस पत्र में उन्होंने लिखा कि “हमारी सेना बिलकुल तैयार है। अब युद्ध छेड़ने में एक दिन की भी देर करना मानो एक वर्ष का नुक्सान करना होगा क्योंकि शत्रु भी अपनी तैयारी करने में लग गया है। जयसिंहजी की इच्छा थी कि आदिलशाह को सावधान होने का मौका ही न दिया जाय और अचानक उस पर हमला कर दिया जाये। इसी समय उनको अपने बीजापुर स्थित संवाददाता से खबर लगी कि शत्रु की सेना इस समय बिलकुल अव्यवस्थित दशा में है और आपस में लड़ाई झगडू करने में लगी हुईं है। यहाँ की सेना अपने शत्रु का मुक़ाबला करने के लिये बिलकुल तैयार नहीं है। अतएव ज्योंही सम्राट की सेना यहां आ धमकेगी त्योंही आदिलशाह के बहुत से सरदार इसमें आ मिलेंगे। इस प्रकार बिना किसी कठिन प्रयास के ही बीजापुर सुल्तान हरा दिया जा सकेगा।

 

बीजापुर का युद्ध
बीजापुर का युद्ध

 

अब तो जयसिंहजी युद्ध छेड़ने के लिये बड़े उत्सुक हो गये। पर मन मसोस कर रह जाने के सिवाय वे कुछ नहीं कर सके। इस सुवर्ण अवसर का वे सदुपयोग नहीं कर सके। इसका कारण और कुछ नहीं, सिर्फ रुपयों की कमी थी। शिवाजी के साथ के युद्ध में वे 22 लाख रुपये खर्च कर चुके थे इसलिये अब उनके पास कुछ नहीं रह गया था। सिपाहियों की छः छः महीनों की तनख्वाहें चढ़ गई थीं और वे भूखों मरने लग गये थे। अतएव जयसिंह जी ने युद्ध न छेड़कर पहले सम्राट को रुपयों के लिये लिखा। जयसिंह जी ने 20 नवम्बर को ही बीजापुर पर आक्रमण करने का निश्चय किया था परन्तु रुपये समय पर न आने के कारण उनको रुकना पड़ा। निदान 12 नवम्बर को सम्राट के पास से 20 लाख रुपये आये और साथ ही 10 लाख रुपये दक्षिण के दीवान ने भी भिजवा दिये। रुपयों के आते ही जयसिंह जी ने अपने सैनिकों की तनख्वाहें चुका दीं और 19 वीं तारीख को पुरन्दर से प्रस्थान कर दिया। रास्ते में बीजापुर का अब्दुल महमद मियाना नामक सरदार अपने अफगान सिपाहियों सहित मुगल सेना में आ मिला। पर आदिलशाही सेना के अफगानों का खास जत्था जो कि अब्दुल करीम बहलोल की आधीनता में था स्वामिभक्त बना रहा। युद्ध के पहले महीने में तो जयसिंह जी को विजय पर विजय प्राप्त होती गई। किसी ने उनका विरोध तक नहीं किया। पुरन्दर से मंगल वारिया तक के तमाम बीजापुरी किलों पर मुग़लों का आधिपत्य हो गया। निदान 24वीं दिसंबर को बीजापुरी सेना से मुगल सेना का मुक़ाबिला हुआ।

 

 

बीजापुर की पहली लड़ाई

 

25 दिसम्बर के दिन दिलेर खाँ और शिवाजी अपने कैम्प से 10
मील आगे बढ़कर बीजापुरी सेना पर आक्रमण करने के लिये भेजे गये। बीजापुर सुल्तान की तरफ से शारजाखाँ ओर खबासखाँ नामक बहादुर जनरल 12000 सेना के साथ इनका मुकाबला करने के लिये आ डटे। कल्याण के सरदार यदुराव और शिवाजी के सौतेले माई बेंकोजी भी बीजापुरी सेना की तरफ से इस लड़ाई में शामिल थे। इस युद्ध में बीजापुरी सेना थे बड़ी बहादुरी और रण-कुशलता का परिचय दिया, पर दिलेरखाँ और शिवाजी के सामने उनकी एक न चली। शाम होते होते बीजापुरी सेना युद्ध- क्षेत्र से पीछे हट गई। इसका एक जनरल और 157 कप्तान काम आये। पर ज्योंहि मुगल सेना ने अपने कैम्प की तरफ मुँह फेरा कि बीजापुरी सेना ने उस पर फिर से भयंकर आक्रमण कर दिया। अब मुगल सेना को लेने के देने पड़ गये। मुगल सेना पर आपत्ति का पहाड़ टूट देख जयसिंह जी ने उसकी मदद के लिये और सेना भेजी। निदान यदुराव को गोली लग जाने के कारण बीजापुरी सेना वापस लीट गई। दोनों पक्षों का भयंकर नुक्सान हुआ।

 

 

दो दिन इस स्थान पर ठहर कर जयसिंह जी फिर आगे बढ़ने लगे। 28 तारीख की दुपहर को उन्हें ख़बर मिली कि शत्रु की सेना एक मील के अन्तर पर है और बड़े जोरों से आगे बढ़ रही है। योग्य रक्षकों की आधीनता में कैम्प को छोड़कर वे मुकाबले के लिये आगे बढ़े। भयंकर युद्ध हुआ ओर अन्त में बीजापुरी सेना मैदान छोड़कर भागी। मुगल सेना ने छः मील तक उनका पीछा किया। तारीख 29 को जयसिंह जी ने बीजापुर से 12 मील के अन्तर पर अपना पड़ाव जा डाला। हम ऊपर कह चुके हैं कि आर्थिक कठिनाई के कारण जयसिंहजी को पुरन्दर से रवाना होने में बहुत देर हो गई थी। अतएवं उनके बीजापुर के पास पहुँचने न पहुँचने तक अली आदिलशाह अपनी तमाम तैयारियाँ कर चुका था। उसने अपने आधीनस्थ तमाम सरदारों को बीजापुर में एकत्रित कर लिये थे किले की मरम्मत करवा ली थी और युद्ध में काम आने वाली समग्र सामग्री भी जुटा ली थी। उसने 30 हज़ार कर्नाटकी सिपाहियों को जो कि अपनी बहादुरी के लिये मशहूर होते हैं, तमाम आवश्यक सामग्री सहित दुर्ग की रक्षा के लिये नियुक्त कर दिये। इतना ही नहीं उसने बीजापुर के पास के नोरासपुर ओर शाहपुर नामक दोनों तालाबों के बाँध तुड़वा दिये तथा आसपास के छः छः मील तक की दूरी के कुँओ को मिट्टी से भरवा दिये जिससे कि मुगल सेना को पानी तक पीने के लिये न मिले। इधर तो शत्रु ने इतने जोरों की तैयारियाँ कर ली थीं और उधर जयसिंह जी जल्दबाजी में पूरा तोपखाना भी अपने साथ नहीं लाये थे। उनकी भारी भारी तोपें परेन्दा के किले में ही रह गई थीं।

 

 

निदान 20 हजार बीजापुरी सेना मुग़ल सेना का सामना करने के लिये मैदान में आ डटी। इसी बीच में खबर लगी कि गोलकुंडा से भी एक विशाल सेना आदिलशाह की मदद के लिये आ रही है। बीजापुर वालों द्वारा अपने आस पास के जलाशयों को नष्ट कर डालने से जयसिंहजी की सेना को केवल जल कष्ट ही उठाना पड़ा हो ऐसी बात नहीं थी, वरन उन्हें भूखों भी मरना पड़ा था। कारण की उसके साथ के अन्न से लदे हुए बैल भी घास पानी न मिलने से आगे न बढ़ सके थे। उक्त कारणों से “युद्ध की कौन्सिल ने मुगल सेना को वापस लौट जाने की सलाह दी।

 

 

सन्‌ 1666 की 5वीं जनवरी को मुगल सेना वापस लौट गई इस महीने में मुगल सेना को कई बड़ी बड़ी मुसीबतों का सामना करना पड़ा। 12वीं जनवरी को मुग़लों का बहादुर कप्तान सिकन्दर खां अपनी सेना के साथ बीजापुरियों द्वारा कत्ल कर दिया गया। तारीख 16 को पन्हाला के किले पर आक्रमण करते समय शिवाजी के एक हज़ार सिपाही शत्रुओं द्वारा काट डाले गये और शिवाजी की हार हुई। तारीख 20 के दिन समाचार मिला कि नेताजी परलकर बीजापुरियों से जा मिल है। 31 वीं जनवरी को रजाकुली की आधीनता में 12 हजार सवार और 40 हजार पैदल सेना मुगलों के खिलाफ बीजापुर के सुल्तान से आ मिली।

 

 

जयासिंह जी आपत्ति में

 

जयसिंहजी बीजापुर पर चढ़ाई करके बड़ी आपत्ति में आ फंसे उनकी दशा साँप छछूंदर की सी हो गई। वे न तो बीजापुर पर आक्रमण ही कर सकते थे और न वापस ही लौट सकते थे। वे चारों तरफ से शत्रु-सेन्य से घिर गये थे। निदान बड़ी मुश्किलों से वे वापस लौटने में समर्थ हुए। फिर भी लोहारी आदि स्थानों पर उनको शत्रु का मुकाबला करना ही पड़ा। यह लड़ाई बड़ी ही भयंकर थी। इसमें मुगल सेना के 180 आदमी मारे गये और 250 घायल हुए। इसके विपरीत शत्रु सेना के 400 आदमी मारे गये और 1000 घायल हुए बीजापुरी सेना जयसिंह जी तक आ पहुँची थी कि उनके बहादुर राजपूत सिपाहियों ने बड़ी वीरता के साथ उसे पीछे हटने को मजबूर किया। एक ही मास के अन्दर इस प्रकार की 4-5 लड़ाईयां लड़ लेने के कारण मुगल सेना बिलकुल थक गई थी। इतने ही में समाचार मिला कि मंगलवीरा के किले को शत्रु ने घेर लिया है। इससे जयसिंहजी की सेना में और भी निराशा फेल गई। जयसिंह जी ने दाऊदखाँ और कुतुबुद्दीन खाँ को किले की रक्षा के लिये जाने का हुक्म दिया, परन्तु उक्त जनरलों ने इस हुक्म पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया। इस विषय में जयसिंह जी ने बादशाह को इस प्रकार लिखा था–”इन सेना नायकों ने कुछ दिन तो व्यर्थ के वाद विवाद में बिता दिये, अन्त में जब इन पर दबाब डाला गया तो इन्होंने जाने से इन्कार कर दिया और कहा कि वामपार्श्व की सेना राजा रायसिंह जी की आधीनता में भेजी जाये तो हम जाने को तैयार हैं। में इस प्रस्ताव में सहमत होन के सिवाय और कुछ नहीं कर सका। जब ये तीनों जनरल अपनी सेना सहित मंगलबीरा पहुँचे तो शत्रु-सेन्य घेरा उठा कर लौट गई। बहलोल खाँ और नेताजी ने बिडर कल्याणी जिले में उत्पात मचा रखा था। इनको शांत करना भी अत्यंत आवश्यक था। अतएव जयसिंह जी 20 फरवरी को उधर की तरफ रवाना हुए।

 

 

भीमा-मंजीरा का युद्ध

 

अब युद्ध ने कुछ ओर ही रंग बदला। युद्ध साढ़े तीन महीने तक
रहा। इस अवधि में जयसिंहजी को 4 और भीषण युद्ध करने पड़े । हर बार बीजापुरी सेना को हारकर पीछे हटना पड़ता था। पर मुगल-सेना उसे पूर्ण रूप से नहीं हरा पाई थी। अतएव उसका मुगल सेना के आसपास चक्कर लगाते रहना और मौक़ा पाते ही उस पर आक्रमण कर देने का कार्यफिर भी जारी रहा। यद्यपि धोकी, गंजोटी ओर नीलांग के किलों पर मुगलों का अधिकार हो गया तथापि इससे विशेष फायदा कुछ नहीं हुआ। निदान मई मास में युद्ध की नयी स्कीम तैयार की गई। चूंकि मुगल सेना के साथ बहुत सा युद्ध सम्बन्धी सामान रहता था अतएव बहुत दूर तक दुश्मन का पीछा करके उसे बिलकुल परास्त कर देना उसके लिये बहुत मुश्किल था। इस कठिनाई से मुक्त होने के लिये जयसिंहजी ने अपनी सेना को बहुत कम करने का निश्चय किया। इस निश्चय के अनुसार उन्होंने युद्ध सम्बन्धी तमाम आवश्यकता से अधिक सामान को धरूर नामक स्थान में रख दिया ओर उसकी रक्षा के लिये मज़बूत सेना भी वहाँ रख दी। इस प्रकार अपनी सेना को कम करके फिर युद्ध आरम्भ कर दिया।

 

 

16 वीं मई को यह सेना संजीरा के किनारे से चलकर सीना नदी
को पार करती हुईं भीमा के किनारे पर जा पहुँची, पर यहाँ पहुँचते पहुंचते मुगल सेना बिलकुल अस्त व्यस्त हो गई थी। मुगल सैनिक खाद्य सामग्री की कमी और लम्बी मंजिलों को तय करने के कारण थक गये थे। वर्षा-ऋतु आरंभ हो गई थी अतएवं सम्राट ने जयसिंह जी को औरंगाबाद लौट जाने का हुक्म दिया। इसके साथ ही तमाम सेना को भी कुछ समय के लिये आराम करने का हुक्म दे दिया गया। इस प्रकार युद्ध स्थगित कर दिया गया।

 

 

मंगलवीरा का किला मुगल सरहद से बहुत दूर पर था जिसके कारण उसकी रक्षा के लिये वहाँ बड़ी भारी सेना का रखना आवश्यक था। अतएव जयसिंह जी ने वहाँ से अपनी सेना और युद्ध सम्बन्धी तमाम सामान हटवा लिया। जो कुछ बचा रह गया वह जला दिया गया। फल्टन के किले से भी मुगल सेना हटा ली गई और वह शिवाजी के दामाद महादजी निम्बालकर को दे दिया गया। इस प्रकार मुगलों के अधिकार में इस समय पहली विजय द्वारा प्राप्त स्थानों में से एक भी स्थान नहीं रहा। 31 वीं मार्च के दिन जयसिंह जी ने सम्राट की आज्ञानुसार उत्तर की तरफ प्रस्थान कर दिया। 10 वीं जून को जयसिंह जी भूम नामक स्थान पर पहुँचे। यहाँ साढ़े तीन महीने रहकर 28 सितंबर के दिन बीर नामक स्थान की तरफ रवाना हुए। 17 नवम्बर तक आपने यहाँ मुकाम रखा और फिर औरंगाबाद जाकर मुकाम किया। इधर बीजापुर और गोलकुंडा की सेना भी थक गई थी अतएव उन्होंने सुलह के लिये पैग़ाम भेजे।

 

 

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