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बीकानेर राज्य का इतिहास – History of Bikaner state

बीकानेर राज्य का इतिहास

बीकानेर राज्य के शासक उस पराक्रमी और सुप्रिसिद्ध राठौड़ वंश के है, जिसके शौर्य साहस और रणकौशल का वर्णन हम अपने अन्य लेखों में भी कर चुके हैं। ये उन्हीं शक्तिशाली राव जोधा जी के वंशज हैं जिनका उल्लेख हम अपने जोधपुर का इतिहास नामक लेख में कर चुके हैं। बीकानेर राज्य के मूल संस्थापक मारवाड़ के राजकुमार राव बीका जी थे। ये मारवाड़ के प्रसिद्ध वीर महाराजा जोधा जी के पुत्र थे। इन्हीं जोधा जी ने अपने राज्य की प्राचीन राजधानी मंडौर को छोड़कर सन् 1459 में जोधपुर में नवीन राजधानी स्थापित की थी।

 

 

बीकानेर राज्य का इतिहास – History of Bikaner state

 

राव बीका जी

जिस समय जोधा जी अपनी नवीन राजधानी में आये उस समय आपके वीर पुत्र राव बीका जी अपने चाचा कांधल जी के साथ तीन सौ राठौडो की सेना लेकर अपने पिता जी के राज्य की सीमा दूर दूर तक फैलाने के लिए रवाना हुए। आपके इस दिग्विजय प्रस्थान से पहले आपके भाई बीदा ने भारत के प्राचीन निवासी मोहिलो पर आक्रमण कर उन्हें अपने अधीन कर लिया था। अपने भ्राता की इस विजय से उत्साहित होकर कुमार बीका जी ने एक छोटी सी राठौड़ सेना के साथ देश विजय के लिए प्रस्थान किया। आपने जंगाल नामक सांखला नाम की प्राचीन जाति पर आक्रमण किया। घमासान युद्ध होने पर सांखला लोगों की पराजय हुई। इस विजय से आपका बल, विक्रम और साहस मरूभूमि की चारों दिशाओं में गूंज उठा। इस युद्ध में विजय प्राप्त कर आप भाटियों के पुंगल देश में पहुँचे। पुंगल-पति ने आपके प्रताप की महिमा सुन रखी थी। अतएवं उसने अपनी कन्या का विवाह आपके साथ कर दिया। चतुर पुंगल पति को यह भली भाँति ज्ञात था कि वीर बीका जी को युद्ध में दो दो हाथ दिखाने के बदले उनसे सम्बन्ध कर अपनी स्वाधीनता की रक्षा करना ही श्रेयस्कर हैं। इधर आपने देखा कि जब भाटी जाति के अधीश्वर पुंगल पति ने अपने वंश में खुद होकर कन्या दी है तो उन्हीं के राज्य को दबा बैठना उचित नहीं। अतएव आपने भाटी जाति की स्वतंत्रता में किसी प्रकार का दखल नहीं दिया। आपने कोडमदेसर नामक स्थान में एक किला बनवाया ओर आप वहीं रहने लगे। धीरे धीरे निकटवर्ती प्रदेशों को अपने अधीन कर आप अपने राज्य की सीमा बढ़ाते रहे। आपकी असीम सहासी राठौड़ सेना के विरुद्ध किसी भी जाति के अधिपति की न चली। जिस जिस जाति ने आपसे युद्ध करने का साहस किया, उसे उलटे मुँह खानी पड़ी तथा आप की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी। इस प्रकार धीरे धीरे अपने राज्य को सुदृढ़ बनाकर आपने जाट जाति पर विजय प्राप्त करने का विचार किया। जाट जाति का विस्तृत वृतान्त हम भरतपुर के इतिहास में बता चुके हैं। यह जाति उस समय कृषि से अपनी जीविका उपार्जन करती थी।आप ने जिस जाट प्रान्त पर हमला करने का विचार किया था, वहाँ के जाट अथवा जेहियाण केवल पशुओं के पालन से अपनी जीविका निर्वाह करते थे। वे “गोहरा जाट” शाखा के थे। उसकी धन सम्पत्ति तथा उनका स्वस्थ केवल पशु ही थे। जिस समय आप नवीन राज्य स्थापना की-अभिलाषा से-इन जाट लोगों के देश को जीतने के लिये आगे बढ़े, उस समय आपके उद्देश की पूर्ति के लिये बहुत से उपयुक्त साधन आपको प्राप्त हो गये। कहना न होगा कि जिस फूट से भारतवर्ष की राज्यशक्ति का विध्वंस हो गया है, यदि उसी फूट का अंश जाटों के हृदय से प्रज्वलित न होता तो आपको बिना युद्ध किये इस जाति पर विजय प्राप्त न होती। जाटों की छः सम्प्रदायों में से जाहिया और गोहरा नामक दो अत्यन्त सामर्थ्यवान शाखाओं में परस्पर अनबन थी। बस, यही एक मुख्य कारण था कि आपको अखिल जाट जाति का आधिपत्य प्राप्त हो गया। आपकी विजय का दूसरा कारण यह था कि क्रूर स्वभाव गोहिल जाति के साथ इन जाटों की भयंकर शत्रुता थी। आपके बीर भ्राता-कुमार बीदा ने, कुछ दी दिन हुए, तब अपनी राठौडों की प्रबल सेना द्वारा इस जाति का विनाश कर अपनी वीरता का परिचय दिया था। जाट लोगों के हृदय में उनकी वीरता पूर्ण रूप से अंकित थी। वे जानते थे कि वीर बीका का युद्ध में सामना करना बड़ी टेढ़ी खीर है। इसके अतिरिक्त जैसलमेर के भाटी लोग इन जाटों पर बड़े अत्याचार करते थे। इनके अत्याचारों से बचने की सम्भावना न देख, जाट जाति ने आत्मसम्पर्ण करने का निश्चय किया।

 

बीकानेर राज्य का इतिहास
बीकानेर राज्य का इतिहास

 

गोहरा जाट जाति की एक साधरण सभा हुई। इसमें निम्नलिखित
तीन प्रस्ताव स्वीकृत करने की शर्त पर जाटों ने वीर बीका जी के हाथ आत्मसम्पर्ण करने का निश्चय किया।

( 1 ) जोहिया तथा जो अन्यान्य जाट, गोहरा जाति के साथ शत्रुता और अत्याचार करते हैं, उनके खिलाफ बीकाजी युद्ध करें।

( 2) भाटी गण गाहरा जाति पर आक्रमण न करने पावे, इसलिये
उनकी पश्चिमी सीमा की रक्षा बीका जी करें।

( 3 ) यहाँ के निवासियों के चिर प्रचलित स्वत्वों में बीका जी किसी प्रकार का हस्तक्षेप न करें।”

सेखासर और रूनिया के दो जाट नेताओं ने बीकाजी के सन्मुख जाकर उपरोक्त तीनों प्रस्ताव उपस्थित किये। नीति-विशारद बीका ने इन प्रस्तावों में तुरन्त ही अपनी सम्मति प्रदर्शित की। आपके इस प्रकार सम्मति देते ही गोहरा लोगों ने आपको तथा आपके उत्तराधिकारियों को अपना अधीश्वर स्वीकृत कर लिया। आपने उक्त प्रस्ताव स्वीकृत करते हुए कहा था–“में तथा मेरे उत्तराधिकारी किसी भी समय तुम्हारे अधिकारों में हस्तक्षेप न करेंगे। यह बात ज्वलन्त रहने के लिये मैं यह नियम बनाता हूं कि में और मेरे उत्तराधिकारी राज्याभिषेक के समय में तुम और तुम्हारे दोनों नेताओं के वंशधरों से राजतिलक ग्रहण किया करेंगे ओर जब तक इस तरह राज तिलक न दिया जायगा, तब तक राज सिंहासन सूना समझा जायेगा।

 

 

गोहरा जाट जाति को इस प्रकार अपने अधीन कर आपने उनके
अधिपति के निकट यह प्रस्ताव किया कि “आपका देश मुझे दे दो, में इस स्थान पर अपनी राजधानी स्थापित करूँगा।” इस अधिकारी का नाम ‘नेरा’ था। आपके प्रस्ताव के प्रयुत्तर में नेराजी ने कहा कि, “में अपना देश आपको देने के लिये तैयार हूँ, परन्तु इस देश से मेरे सम्बन्ध की स्कृति कायम रखने के लिये आपको अपने नाम के साथ मेरा नाम जोड़ कर राजधानी का नाम रखना होगा।” यह बात भी आपने तुरन्त ही स्वीकार कर ली। यही कारण है कि आपने जो नगर बसाया उसका नाम बीकानेर रखा गया। कहने की आवश्यकता नहीं कि, आपने उपरोक्त प्रतिक्षाओं का पूरी तौर से पालन किया। आज तक दिवाली और होली के समय में शेखासर और रूणिया के प्रधान जाट नेता बीकानेर के अधीश्वर तथा समस्त राठौड़ सामन्‍तों को तिलक करते हैं।

 

राव बीका जी जोधपुर राज्य के संस्थापक
राव बीका जी बीकानेर राज्य के संस्थापक

 

जैसा कि हम ऊपर कह आये हैं जोहिया जाटों और गोहरा जाटों
में जानी दुश्मनी थी और आपने जो जोहिया लोगों को परास्त करने का गोहरा जाटों को अभिवचन दिया था। अतएवं अपने विजित प्रदेश की ठीक तौर से व्यवस्था कर लेने के पश्चात्‌ आपने वीर राठौड़ो तथा नबजीत गोहरो के साथ जोहिया जाटों पर आक्रमण किया। जोहियों के सर्व प्रधान नेता का नाम शेरसिंह था। यह मरूपाल नामक स्थान में निवास करता था। इसने अपनी समस्त सेना सहित आपके खिलाफ युद्ध करने की तैयारी कर रखी थी। बराबर कई युद्धों में विजयी होकर भी आप इस युद्ध में सरलता से विजय प्राप्त न कर सके। शत्रुगण अद्भुत पराक्रम दिखाकर आपके छक्के छुड़ाने लगे। अन्त में विजय की कोई सूरत न देख, आपने षड्यंत्र द्वारा शेरसिंह को मार डाला तथा मरूपाल स्थान पर अपना अधिकार कर लिया। विवश होकर जोहिया जाट जाति भी आपके अधीन हो गई। इस प्रकार एक के बाद एक प्रान्त जीत कर आपने एक विस्तृत प्रदेश पर अपना अधिकार कर लिया। भाटी लोगों को भी आपने पूर्ण शिकस्त दी। सन् 1489 की 15 मई को आपने बीकानेर में अपनी राजधानी स्थापित की। राजधानी स्थापन करने के पश्चात आप अधिक दिन तक राज्य न॒ कर सके। सन् 1504 की 17 जून में आपका स्वर्गवास हो गया।

 

 

राव लूणकरणजी

पाठक जानते हैं कि बीकाजी ने पुंगल-निवासी भाटियों के अधीश्वर की कन्या के साथ विवाह किया था। इन पुंगल पति की कन्या से बीका जी को लूणकरण और गड़ नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए । बीकाजी के पश्चात्‌ उनके ज्येष्ठ पुत्र लूणकरण जी अपने पिता के सिंहासन पर बिराजे। आप अपने पिता के समान ही साहसी एवं वीर नृपति थे। राजपद पर अभिषिक्त होकर आपने अपने राज्य की पश्चिमी सीमा को बढ़ाने क लिये एक एक कर भाटियों के अनेक स्थान जीत लिए। जिस समय आपने अपने बाहुबल से अपने राज्य की सीमा बढ़ा ली, उस समय आपके चारों पुत्रों में से सबसे ज्येष्ठ पुत्र ने महाजन नामक देश और 144 दूसरे ग्राम लेकर स्वतंत्र रूप से राज्य करने की इच्छा प्रकट की। आपने तुरन्त ही अपने राजकुमार की अभिलाषा पूरी कर, अपने द्वितीय पुत्र जैतसी को राज्य का उतराधिकारी नियुक्त किया । सन 1526 में आपकी मृत्य हो गई।

 

 

राव जैतसिंह जी

लूणकरण जी के पश्चात्‌ उनके द्वितीय पुत्र जैतसिंह जी राज्य गद्दी पर बैठे। आपके दो छोटे भाई और थे। इन्होंने भी आपसे दो स्वतन्त्र देश और थोड़ी सी जमीन ले ली और स्वतंत्रता पूर्वक राज्य करने लगे। आप बीकाजी के समान ही वीर थे। आपके तीन पुत्र थे जिनके नाम क्रमशः कल्याणमल, शिवजी, और अश्वपाल था। आपने नारनौल नामक देश के अधिपति को युद्ध में परास्त कर उस पर अपना अधिकार कर लिया। तथा अपने दूसरे पुत्र शिवाजी को उसका अधिपति नियुक्त किया। राव बीका जी के दिग्विजय प्रस्थान उनके भाई वीर बीदा ने अपनी सेना सहित नारनौल में आकर वहां अपनी छावनी स्थापित की थी। इस समय तक बीदा जी के वंशजों का इस छावनी पर अधिपत्य था। आपने उन्हें युद्ध में परास्त कर अपने अधीन कर लिया। तथा उन्हें प्रति वर्ष निश्चित कर देने के लिए बाध्य किया। सन् 1542 राव जैतसिंह परलोक वासी हो गए। राव जैतसिंह के परलोकवासी होने पर ज्येष्ठ पुत्र कल्याणमल पिता के सिंहासन पर विराजे। यद्यपि आपके शासन काल में बीकानेर राज्य की सीमा में कुछ भी वृद्धि न हई, और न कोई उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ। तथापि आपने एक दीर्घकाल तक अपने पूर्वजों द्वारा अधिकृत किए गए राज्य का निर्विघ्नता से उपयोग किया। आपके तीन पुत्र हुए, पहले रायसिंह दूसरे रामसिंह और तीसरे पृथ्वी सिंह। सन् 1574 में राव कल्याणमल जी भी परलोकवासी हो गए।

 

 

महाराजा रायसिंह जी

स्वर्गीय कल्याणमल जी के पश्चात उनके ज्येष्ठ पुत्र महाराजा रायसिंह जी बीकानेर राज्य के राज सिंहासन पर बैठे। आपके शासन-काल से बीकानेर राज्य के गौरव की सीमा बढ़ने लगी। आपके राजपद पर अभिषिक्त होने के पहले बीकानेर राज्य एक छोटा सा राज्य गिना जाता था। यद्यपि एक के बाद एक वीर एवं साहसी राजाओं ने इस राज्य की सीमा को दूर दूर तक फेलाया था, तथापि मान मर्यादा में बीकानेर राज्य एक सामान्य राज्य की श्रेणी में गिना जाता था। आपने सिंहासनारूढ़ होकर राजनेतिक रंणभूमि में पर्दापण किया। आपकी राजनीतिकता एवं दूरदर्शिता ने बीकानेर राज्य को गौरव के इतने ऊँचे शिखर पर पहुँचा दिया कि थोड़े ही समय में उसकी गणना एक महान शक्तिशाली राज्य में की जाने लगी। आपके शासन-समय में दिल्‍ली के सिंहासन पर सम्राट अकबर विद्यमान थे। अधिकांश राजपूत राजा दिल्ली के मुगल बादशाह की अधीनता स्वीकार कर अपने राज्यों की सीमा वृद्धि कर रहे थे। आपने निश्चय किया कि केवल बीकानेर के शासन कार्य से ही संतुष्ट होकर समय बिताना उचित नहीं है, वरन ऐसे स्वर्ण अवसर पर र उचित लाभ उठाकर अपनी बराबरी वाले अन्यान्य राजाों की तरह नाम और यश पाने की चेष्टा करना योग्य है। आप इस बात को भली भाँति जानते थे कि अवश्य ही एक दिन ऐसा आवेगा जब कि दिल्‍ली के बादशाह बीकानेर पर अधिकार करके हमें अधीन करने का प्रयत्न करेंगा। जब एक के बाद एक अनेक राजपूत राजा अकबर की अधीनता स्वीकार करने लगे तब विवश होकर, आपने भी उसे स्वीकार कर लिया।

 

 

अपने पिता के परलोकवासी होने पर आप खुद उनकी भस्म डालने के लिये गंगाजी को गये। पिता की भस्म और अस्थियों को गंगा जी में डाल कर आप अपने ध्येय की पूर्ति के लिये बादशाह की राजधानी को चले गये। आमेर के महाराजा मानसिंह जी ने ( जिनकी उस समय अकबर की सभा में विशेष ख्याति थी ) आपका परिचय सम्राट अकबर से करा दिया। सम्राट ने आपको अपने एक हिन्दू आत्मीय समझ कर बड़े आदर के साथ आपका स्वागत किया तथा चार हजार अश्वारोही सैन्य के नेता के पद पर आपको नियुक्त किया। आपको महाराज की उपाधि तथा हिसार देश के शासन का भार भी इसी समय अर्पण किया गया। जिस प्रकार वीर बीकाजी ने एक सामान्य राव की उपाधि धारण कर एक नवीन राज्य की प्रतिष्ठा की थी, उसी प्रकार ‘आप भी सबसे पहले महाराजा की उपाधि प्राप्त कर बीकानेर राज्य का गौरव बढ़ाने को अग्रसर हुए। इसी समय सम्राट ने मारवाड़ के नागोर प्रदेश को जीत कर उसका श्री अधिकार आपको दे दिया। बीकानेर वापिस लौट आने पर आपने अपने छोटे भाई रामसिंह को एक सेना सहित भेज कर भाटियों के प्रधान स्थान भटनेर पर बड़ी सरलता से अपना अधिकार कर लिया।

 

महाराजा रायसिंह बीकानेर
महाराजा रायसिंह बीकानेर

 

यद्यपि वीर बीका जी ने भाटिया जाटों को परास्त कर उन्हें अपने
अधीन कर लिया था, तथापि वे बड़े स्वाधीनता प्रिय थे और अपनी हरण की हुई स्वाधीनता को फिर प्राप्त कर लेने का प्रयत्न कर रहे थे। अतएव आपने अपने भाई रामसिंह के संचालन में एक प्रबल राठोर सेना, उनका दमन करने के लिये भेजी। इस सेना ने वही पहुँच कर भयंकर कांड उपस्थित कर दिया। प्रबल समराग्नि प्रज्वलित हो गई, हजारों जोहिया जाट गण स्वाधीनता के लिये संग्राम भूमि में प्राण विसर्जन करने लगे। वीर राठौड़ भी अपने ध्येय से न हटे। उन्होंने इस देश को यथार्थ मरुभूमि के समान कर दिया। इस प्रकार जोहिया लोगों को सब भाँति दमन कर रायसिंह जी अपनी विजयी सेना के साथ पूर्णिया जाट जाति को परास्त करने के लिये अग्रसर हुए। घमासान युद्ध होने पर यह जाति भी आपके अधीन हो गई।

 

 

विजेता रायसिंह जी ने इस नवीन अधिकृत देश में राज्य स्थापित कर वहीं निवास करने का विचार किया। परन्तु दुःख है कि वीर श्रेष्ठ रायसिंह जी कुछ ही दिनों में पूर्णिया जाटों द्वारा मारे गये। यद्यपि पूर्णिया जाटों ने आपके प्राण हर लिये, तथापि वीर राठौड़ों की सेना ने उन पर अपना अधिपत्य कायम रखा। इस प्रकार पूर्णिया जाति की स्वाधीनता हरण कर वीर रायसिंह जी ने समस्त जाट जाति को अपने अधीन कर लिया था।

 

 

यद्यपि वीर बीका जी के वंशधर रायसिंह जी ने यवन सम्राट की अधीनता स्वीकार कर समयानुसार राजनेतिक क्षेत्र में विचरण करना शुरू किया था तथापि वे बल और विक्रम में बीकाजी से किसी प्रकार कम न थे। आपके शासन-काल में वीरतामय कायक्षेत्र जितना ही विस्तरित होता था, उतना ही आपका कार्य क्षेत्र भी बढ़ता गया। आप भारत के अनेक प्रान्तों में समय समय पर अपने तथा अपने वीर राठौरों की सेना के बाहुबल का परिचय देन लगे। आपने अहमदाबाद के शासन कर्ता मिर्जाहुसेन के साथ युद्ध करके उसे परास्त कर दिया और अहमदाबाद पर शीघ्रता से अपना अधिकार कर लिया। सम्राट अकबर ने आपके शासन समय में जिस जिस प्रान्त में युद्ध उपस्थित किया उसी उसी युद्ध- क्षेत्र में पहुँच कर आपने असीम साहस के साथ अपने बाहुबल की पराकाष्ठा दिखलाई। आप बादशाह के सम्मुख बड़े वीर गिने जाते थे तथा आपका सम्मान भी सब से अधिक होता था। आपकी वीरता पर बादशाह अकबर बढ़े मुग्ध थे। सन् 1612 में आपने इस मायामय शरीर को त्याग दिया।

 

 

महाराजा कर्ण सिंह जी

महाराजा रायसिंह के स्वर्गवासी हो जाने घर उनके एक मात्र पुत्र
कर्ण सिंह जी पिता के सिंहासन पर विराजमान हुए। अपने पिता की जीवित अवस्था में ही सम्राट की अधीनता में आप दौलताबाद के शासन-कर्ता के पद पर नियक्त हुए थे। आप दाराशिकोह के विशेष अनुगत थे और आपने उसको बादशाह के दरबार में प्रवेश करने के लिये विशेष सहायता दी थी। इस कारण दारा के प्रतिद्वंदी मुगल सम्राट के प्रधान-सेनापति, जिनकी अधीनता में आप काम करते थे, आपसे चिढ़ गये। उन्होंने आपके प्राण-नाश करने का गुप्त षड़यंत्र रचा। परन्तु बूँदी के तत्कालीन महाराज ने आपको पहले से ही सावधान कर दिया। इससे आपने सहज ही में शत्रुओं की उस पाप-कामना को निष्फल कर दिया। कई वर्षों तक प्रबल प्रताप के साथ राज्य शासन कर आपने इस नश्वर शरीर को त्याग दिया। आपके चार पुत्र थे- पद्मसिंह, केशरी सिंह, मोहन सिंह और अनूप सिंह। इनमें से दो पुत्र तो सम्राट की ओर से असीम साहस दिखा कर बिजापुर युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे। तीसरे पुत्र मोहन सिंह के जीवन के वियोगान्त अभिनय का वृत्तान्त सुप्रख्यात फारसी इतिहासकार फरिश्ता ने अपने दक्षिण के इतिहास में इस प्रकार किया–‘जिस समय बादशाह की सेना दक्षिण को विजय करने के लिये जा रही थी, उस समय कर्णसिंह जी के चारों कुमार भी राठौरों की सेना के साथ गये थे। एक समय कुमार मोहन सिंह शाहज़ादे मोअज्जम के डेरों में उनके साले के साथ बातचीत कर रहे थे। उनका एक मृग के बच्चे के लिये आपस में झगड़ा हो उठा। यह झगड़ा इतना बढ़ गया कि दोनों क्रोध से उन्मत्त होकर कमर से तलवारें निकाल कर परस्पर युद्ध करने लगे। इस युद्ध में मोहन सिंह जी को मुअज्जम के साले ने मार दिया। जब यह समाचार उनके ज्येष्ठ भ्राता पद्म सिंह के कानों तक पहुँचे तो वे क्रोधित सिंह के समान कंपायमान होते हुए, नंगी तलवार हाथ में ले अपने कितने ही राठौर सेवकों के साथ उसके डेरे में पहुँचे। वहाँ पहुँच कर उन्होंने देखा कि भाई कर्णसिंह पृथ्वी पर अचेत पड़ हैं। उनका सारा शरीर रुघिर से सन रहा है ओर उनके प्राण पखरू प्रयाण कर गये हैं तथा ऐसी अवस्था में भी शत्रु उनकी छाती पर बैठा है, यह दृश्य देखकर उनकी आँखों स अग्नि की चिनगारियाँ निकलने लगीं। आपकी उस विकराल आकृति को देखकर यवन लोग अपने प्राणों के भय से कायर पुरुषों को तरह डेरों से भाग जाने को चेष्टा करने लगे। शाहजादे मुअज्जम को घटना स्थल पर उपस्थित देखकर भी आप तनिक शंकित न हुए। सिंह के समान गर्जना कर अपने भ्राता के प्राणघातक को अपनी तलवार का जौहर दिखाने के लिये आप उसके पीछे चले। आपने क्रोध से उन्मत्त होकर अपनी तलवार का एक ऐसा प्रहार किया जिससे एक स्तंभ के दो टुकड़े हो गये और उसके साथ ही साथ कर्ण सिंह की हत्या करने वाले यवन की देह के भी दो खंड होकर एक ओर को जा पड़े। अपने भ्राता के प्राणघातक को उचित दण्ड देकर आप अपने डेरे में चल आये तथा जयपुर, जोधपुर और हाड़ौती आदि देशों के राजाओं को यवनों को किसी भी प्रकार से रण में सहायता न देन के लिये उकसाने लगे। आपकी सलाह के अनुसार इन सब राजाओं ने शाहजादे मुअज्ज़म की छावनी छोड़ कर अपने अपने राज्य को प्रस्थान किया। ये लोग शाहजादे की छावनी से 20 मील को दूरी तक निकल आये। इस अवधि में शाहजादे ने अपने होशियार वकीलों द्वारा आपको तथा इन राजाओंको बहुत कुछ समझाया घुमाया, किन्तु ये अपने ध्येय से न डिंगे। अन्त में एक महान विपत्ति को सम्मुख आई देख जब शाहजादे ने खुद जाकर आपको आश्वासन दिया तथा आपकी क्षति-पूर्ति करने की प्रतिज्ञा की, तब आप वापस युद्ध में सम्मिलित हुए।

 

 

राजा अनूप सिंह जी

महाराजा कर्ण सिंह जी के तीन पुत्रों की मृत्यु तो उपरोक्त अध्याय
में बतलाये मुताबिक हो ही चुकी थी। केवल चौथे पुत्र अनूप सिंह जी बच गये थे। अतएव सन् 1764 में राजा की उपाधि धारण कर आप राज सिंहासन पर बेठे। आप एक महावीर ओर असीम साहसी पुरुष थे। बादशाह ने आपको पाँच हज़ार अश्वारोही सेना की मनसब तथा बीजापुर और औरंगाबाद आदि प्रांतों के शासन का भार अर्पणकिया। जिस समय काबुल के अफगान दिल्ली के बादशाह से विद्रोही हो गये थे, उस समय उस विद्रोह को दमन करने के लिये आप बादशाह द्वारा काबुल भेजे गये थे। आपने वहाँ पहुँच कर इस विद्रोह को दमन करने में विशेष सहायता की थी। इसके बाद भी आपने कई युद्धों में अपना पराक्रम दिखाया था। आपके मृत्यु-स्थान के विषय में मतभेद है। फारसी इतिहासकार फरिश्ता लिखता है कि- आपने दक्षिण में प्राण त्याग किये।” परन्तु राठौरों के इतिहास से यह मालूम होता है कि जिस समय आप दक्षिण में सेना सहित गये थे, उस समय मार्ग में अपने डेरा जमाने के स्थान पर बादशाह के सेनापति के साथ आपका कुछ झगड़ा हो गया। इससे आप अत्यंत्र विरक्त होकर अपने बीकानेर राज्य में विपस लौट आये। कुछ ही दिनों बाद आपने शरीर त्याग दिया। आपके स्वरूप सिंह और सुजान सिंह नामक दो पुत्र थे।

 

महाराजा अनूप सिंह
महाराजा अनूप सिंह

 

राजा अनूप सिंह जी के पश्चात्‌

महामति टॉड महोदय लिखते हैं कि—“स्वरूप सिंह जी सन् 1709 में अपने पिता के सिहासन पर बैठे, परन्तु आपने अधिक दिन तक राज्य शासन नहीं किया। आपने अपने जीवन की शेष दशा में बादशाह की सेना से अपना सम्बन्ध भी त्याग दिया था। इसी से आपको दिया हुआ ओड़नी देश भी बादशाह ने वापस ले लिया था। इस देश पर अपना अधिकार करने के लिये आपने उस पर आक्रमण किया और इसी आक्रमण में आप मारे गये।

 

स्वरूप सिंह जी की मृत्यु के पश्चात्‌ उनके छोटे भाई सुजान सिंह जी गद्दी पर बिराजे। आपके शासन-काल में कोई उल्लेखनीय घटना नहीं हुई। आपकी मृत्यु हो जाने पर सन् 1735 में राजा जोरावर सिंह जी बीकानेर के अधीश्वर के नाम से विख्यात हुए। आपका शासनकाल भी सुजान सिंह जी की तरह स्मरणीय नहीं था। दस वर्ष राज्य करने के पश्चात्‌ आपका देहान्त दो गया।

जोरावर सिंह जी की मृत्यु के पश्चात्‌ वीरश्रेष्ठ गजसिंह जी बीकानेर राज्य की गद्दी पर बैठे। आपका शासन कई उल्लेखनीय घटनाओं से परिपूर्ण था। आप वास्त्व में एक यथार्थ राठौड़ वीर थे। आपने इकतालीस वर्ष तक राज्य किया आपने अपने राज्यकाल में राज्य की सीमा बढ़ाई। बीकानेर राज्य की सीमा में स्थित भाटियों के साथ तथा भावलपुर के मुसलमान राजाओं के साथ आपने बराबर कई युद्ध करके अपने बाहुबल का परिचय दिया। राजासर, कालिया, गनियार, सत्यसर, मुतालाई आदि कितने ही छोटे छोटे प्रदेश जीत कर आपने अपने राज्य में मिला लिये। भावलपुर के अधिनायक दाऊ खाँ के साथ युद्ध करके आपने अपने राज्य की सीमा में स्थित अत्यन्त महत्वपूर्ण अनूपगढ़ नामक किले पर अधिकार कर लिया।

 

महाराजा गजसिंह जी के 61 पुत्र थे। परन्तु इनमें से क छः
पुत्र विवाहिता रानियों से उत्पन्न हुए थे। उनके नाम ये हैं:–
(१) छत्रसिंह, (२) राजसिंह, (३) सुरतानसिंह, (४) अजब सिंह,
(९) सूरतसिंह, (६) श्यामसिंह।
इन छः पुत्रों में से छत्रसिंह की मृत्यु के पश्चात्‌ राजपूत रीति के अनुसार सन्‌ 1787 में राजसिंह जी राज्य के अधीश्वर हुए, परन्तु आपकी सौतेली माता तथा सूरतसिंह की माता के हृदय में हिंसा और द्वेष की अग्नि प्रबल होने से आप पन्द्रह दिन तक भी राज्य सिंहासन को शोभायमान न कर सके। सूरत सिंह की माता ने स्वयं अपने हाथ से विष देकर आपके जीवन को समाप्त कर दिया। माता जैसी पिशाचिनी थी ठीक वैसे ही सूरत सिंह भी थे। अतएव भयभीत होकर सुरतान सिंह भौर अजब सिंह ने भी बीकानेर राज्य को छोड़ दिया और वे जयपुर मे निवास करने लगे। श्याम सिंह जी भी बीकानेर के अन्तर्गत एक छोटे से राज्य का अधिकार पाकर वहीं निवास करने लगे।

 

 

प्रताप सिंह बीकानेर राज्य

महाराजा राजसिंह के दो पुत्र थे। सूरत सिंह की माता की इच्छा
राजसिंह के प्राण हरण कर अपने पुत्र को बीकानेर राज्य के सिंहासन पर बैठाने की थी। किन्तु सूरत सिंह ने देखा कि वीर सामन्‍त तथा कार्य कुशल अमात्यगणों के सम्मुख इस शोचनीय हत्या काण्ड के पश्चात्‌ सिंहासन पर बैठना महा विपत्ति-कारक है। अतएव प्रकट रूप में अपने सौतेले भाई की मृत्यु पर शोक प्रकट कर वे भविष्य में उससे भी अधिक रोमहर्षण कार्य करने के लिये प्रवृत्त हुए। इन्होने राज्य के सामन्तों की सलाह के अनुसार स्वर्गीय राजसिंह जी के बालपुत्र प्रताप सिंह को गद्दी पर बैठाया तथा आप स्वयं राज-प्रतिनिधि रूप से राज्य शासन करने लगे। आपने अठारह वर्ष तक विशेष चतुराई और सावधानी के साथ राज्य किया। आप इस अवधि में प्रधान-प्रधान साम्नन्तों तथा अमात्यगणों को खुश करने के लिये समय समय पर उन्हें कीमती उपहार देते रहे। जब आपने देखा कि अपनी बाह्य दया ओर नम्रता से सब सामंतगण संतुष्ट हैं तो पहले पहल आपने अपने विशेष अछुगत महाजन और भादरं के दोनों सामन्तों से अपने हृदय में अठारह वर्ष तक छिपाये हुए पापी अभिप्राय को कह सुनाया। आपके अभिप्राय को सुनकर उक्त दोनों सामन्त भयभीत और दुःखी हुए किन्तु आपने उन्हें अधिक अधिक जमीन देने का प्रलोधन देकर अपना सहायक बना लिया। इस समय बीकानेर के दीवान का कार्य बख्तावर सिंह जी करते थे। आप बड़े स्वामी-भक्त थे। जब आपको सूरतसिंह के अभिप्राय का भेद मालूम हुआ तो आपने अपने सुकुमार राजा के जीवन की रक्षा करना उचित समझा। परन्तु अत्यंत दुःख का विषय है कि सूरतसिंह जी को इनका अभिप्राय भाव होते ही उन्होंने इन्हें केद कर लिया। इसके बाद सूरत सिंह ने एक बड़ी सेना एकत्रित कर अपने राज्य के सभी सामन्तों को निमंत्रित किया। बहुत से सामन्तगण आपकी पापलिप्सी जानते हुए भी उसमें बाधा डालने में अग्रसर न हुए और चुपचाप अपने किलों में बेठे रहे।

 

महाराजा सूरत सिंह बीकानेर राज्य
महाराजा सूरत सिंह बीकानेर राज्य

 

जब सुरतसिंह ने देखा कि अधिकांश सामन्तगण मेरा स्वत्व स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं तो उन्होंने अपनी एकत्रित की हुईं सेना की सहायता से उनका दमन करने का निश्वय किया। वे पहले पहल नौहर नामक स्थान में पहुँचे और भूकरका देश के सामन्तों को छल-कपट और बड़ी चतुराई सेअपने सम्मुख बुलाकर उनको नौहर के किले में बन्द कर दिया। इसके बाद इन्होंने अजितपुर नामक स्थान को लूट कर साँखू नामक स्थान पर आक्रमण किया। सांखू के सामंत दुर्जन सिंह ने असीम साहस ओर वीरता के साथ अपनी रक्षा की, किन्तु उसकी अल्पसंख्यक सेना का नाश हो जाने पर उसने आत्महत्या कर ली। इसके बाद सूरत सिंह ने बीकानेर के प्रधान वाणिज्य स्थान चुरू को जा घेरा। छः महीने तक इस नगर को घेर कर भी वे अभिलाषा पूरी न कर सके। किन्तु इस समय एक दूसरी ओर से उनके सौभाग्य का द्वार खुल गया। भूकर के सामन्त जो कि नौहर स्थान में कैद थे बीकानेर राज्य में बड़े प्रबल और सामर्थ्यवान ठाकुर गिने जाते थे। उन्होंने देखा कि सब सामन्तगण केवल अपने अपने किलों की रक्षा में नियुक्त है और एकमत होकर सूरतसिंह के खिलाफ युद्ध नहीं करते हैं तो एक दिन अवश्य ही उसकी विजय हो जायगी। अपने प्राण और स्वाधीनता खो बैठने के भय से ये सामंत सूरत सिंह को राज्य सिंहासन पर बैठाने को राजी हो गये। सूरतसिंह ने इनकी प्रतिज्ञा पर विश्वास कर इन्हें बंधन मुक्त कर दिया ओर दो लाख रुपये लेकर चुरू नगर की लूट भी छोड़ दी।

 

 

इस प्रकार सूरतसिंह अपने बाह्य बल की सहायता से प्रत्येक प्रांत
के सामन्तों को अपने अधीन कर राजधानी बीकानेर राज्य लौट आये और बाल महाराज प्रतापसिंह को संसार से सदैव के लिये बिदा करने के लिये उपाय सोचने लगे। किन्तु उनकी इस घृणित आशा की पूर्ति में अनेक विध्न उपस्थित होने लगे। सूरतसिंह ओर उनकी माता यद्यपि घोर हिंसक पशु बुद्धि के थे, तथापि उनकी बहिन कोमल हृदय वाली, दया और ममता-रस से परिपूर्ण थीं। वह इस बात को भली भाँति जानती थी कि भाई सूरतसिंह एक दिन अवश्य ही बाल महाराज के प्राण ले निष्कंटक होकर राज्य करेंगे। इस कारण वह महाराजा प्रताप सिंह को सदैव अपने पास रखती थीं। आप अब तक अविवाहिता थीं। सूरतसिंह ने अपने उद्देश की पूर्ति में इनका हस्तक्षेप देख कर इनके विवाह का प्रस्ताव उपस्थित कर दिया। इन्होंने नरवर के राजा के यहाँ कहला भेजा कि हमारी बहन के साथ आप विवाह करने के लिये तैयार हो जाइये। नरवर के नृपति भारत के विख्यात महाराजा नल के वंशधरों में से थे। महाराजा सिंधिया ने नरवर के किले पर अपना अधिकार कर तथा इनकी धन सम्पत्ति लूट कर, इन्हें दरिद्रता की घोर अवस्था में पहुँचा दिया था। अतएव ये सूरतसिंह के प्रश्ताव से शीघ्र ही सहमत हो गये। सूरतसिंह की बहिन ने इस समाचार को सुनकर सूरतसिंह के सम्मुख अपने अविवाहित रहने की इच्छा प्रकट की। बह बहुत गिड़गिडाई, उसने बहुत कुछ प्रतिवाद किया, परन्तु उसकी किसी ने न सुनी। अंत में उसका विवाह सूरत सिंह ने उक्त नरवर नृपति के साथ कर ही दिया। उसके ससुराल चले जाने के कुछ ही दिन पश्चात्‌ पाखंडी सूरतसिंह ने महाजन के सामन्तों
को बीकानेर के बाल-नृपति की हत्या करने की आज्ञा दी, परंतु वे इस कार्य में हस्तक्षेप करने को सहमत न हुए। अन्त में उसने स्वयं अपने पापी हाथों से अपने भतीजे बीकानेर के बालक महाराजा प्रताप सिंह के गले पर तलवार चलाकरउनका जीवन नष्ठ कर दिया।

 

 

महाराजा सूरतसिंह बीकानेर राज्य

महाराजा सूरतसिंह सिंह बाल महाराज प्रतापसिंह की हत्या कर दी थी । यह दुखद समाचार राज्य में चारों ओर फेल गया, किन्तु कोई भी सामन्त महाराजा सूरतसिंह को इस अत्याचार का समुचित दण्ड देने के लिये अग्रसर न हो सका। जब यह बात स्वर्गीय महाराजा राजसिंह के दोनों भाई सुरतान सिंह और अजब सिंह को ( जो अपने प्राणों के भय से पहले ही जयपुर राज्य में चले गये थे ) मिली तो वे शीघ्र ही भटनेर नामक स्थान में आ उपस्थित हुए और भटनेर के तथा बीकानेर के समस्त असन्तुष्ट सामन्तों को बुलाकर युद्ध की तैयारी करने लगे। यद्यपि भटनेर के सभी भाटीगण इनकी आज्ञा का पालन करने को तैयार हो गये, तथापि बहुतेरे राठौर सामन्त गण महाराजा सूरतसिंह के खिलाफ युद्ध करने में हिचकिचाने लगे। इधर सूरतसिंह ने भी घूस देकर अनेक सामन्तों को अपने अधीन कर लिया। उसने विचार किया कि शत्रु पर काफी सेना एकत्रित करने से पहले ही आक्रमण करना ठीक होगा। अतएव जोश में भर कर तुरन्त ही उसने एक विशाल सेना सहित उपरोक्त दोनों कुमारों पर आक्रमण कर दिया। बागौर नामफ स्थान में भयंकर संग्राम हुआ, जिसमें तीन हजार भाटियों की सेना के नाश हो जाने पर महाराजा सूरतसिंह ने विजय प्राप्त की। अपनी इस विजय की स्मृति में उसने इस रणभूमि में जयदुर्ग (फतहगढ़़) नाम का एक किला बनयाया था।

 

 

इसके पश्चात् इन्होंने भावलपुर राज्य के कई सुप्रसिद्ध किले जीत
कर अपने राज्य में मिला लिये। उस समय भावलपुर-राज्य में नवाब भावलखां राज्य करते थे। इनके बहुत से बलशाली सामन्त जिनमें किरणी जाति का खुदाबख्श नामक सामान्त मुख्य था महाराजा सूरतसिंह से जा मिले थे। नवाब भावलखां ने खुदाबख्श पर आक्रमण किया था और इसी से चिढ़ कर वह सूरतसिंह से मिल गया था। नवाब भावलखां ने बड़ी चतुराई से अपने असन्तुष्ट सामन्तों को धन तथा जमीन का प्रलोभन देकर सूरतसिंह की सेना से फोड़ लिया। इस कारण राठौरी सेना का बल धीरे धीरे घटने लगा। तब सूरतसिंह के सेनापति ने भावलपुर के नवाब को धमका कर तथा उससे बहुत सा धन लेकर उस राज्य पर आक्रमण करता छोड़ दिया।

 

भावलपुर राज्य पर आक्रमण करने के पश्चात्‌ भी राजा सूरतसिंह
जी निर्विध्नता से अधिक समय तक शान्ति न भोग सके। बागोर के युद्ध में पराजित भाटिया लोगों ने युद्ध के लिये सर उठाया। समराग्नि भड़क उठी, फिर से रणक्षेत्र वीर भाटियों के रूधिर से भीग गया। सूरतसिंह ने इस बार उनकी आाशालता को बिलकुल छिन्न भिन्न कर दिया। महामति टॉड साहब लिखते है कि यद्यपि भाटिया लोग इस द्वितीय युद्ध में भी पराजित हो गये थे, तथापि वे संवत्‌ 1761 तक मौका पाकर राजा सूरतसिंह से संग्राम करते रहे थे । उक्त संवंत में महाराजा सूरतसिंह ने उनकी राजधानी भटनेर पर आक्रमण कर उसे अपने राज्य में मिला लिया।

इस घटना के बाद राजा सूरतसिंह ने अपने बल विक्रम को प्रकाश
कर राज्य की सीमा बढ़ाने की इच्छा से फिर से रणभूमि में पर्दापण किया। इस समय पोकरन के ठाकुर सवाईसिंह जी ने जयपुर के महाराज की सहायता से धौकल सिंह को मारवाड के सिंहासन पर बैठाने के लिये समस्त राठौर सांमन्तों के साथ मानसिंह से युद्ध करने का विचार किया। सूरतसिंह जी भी सवाईसिंह जी की प्रार्थनानुसार इस युद्ध में सम्मिलित हुए। प्रथम तो आपने अपना पल विक्रम प्रकाश कर मारवाड़ के अन्तर्गत फलोदी देश पर अपना अधिकार कर लिया। परन्तु जब अन्त में आपने देखा कि धौकल सिंह के पक्ष में रह कर विजय प्राप्त करना कोई साधारण बात नहीं है, तब आप शीघ्र ही उनका पक्ष छोड़कर अपनी राजधानी में चले आये। जब राजा मान सिंह अपनी शासन-शक्ति को प्रबल कर तथा फलोदी पर अपना अधिकार कर बीकानेर पर आक्रमण करने के लिये तैयार हुए तब उन्होंने अत्यन्त भयभीत होकर उनसे सन्धि कर ली और क्षतिपूर्ति के बहुत से रुपये देकर अपनी रक्षा की। इन्होंने धौकल सिंह की रक्षा के लिये अपने राज्य की प्राय: पाँच वर्ष की आमदनी खर्च कर दी थी। इस असफलता से सूरतसिंह जी को अत्यतं मानसिक वेदना हुई। इस से ये कठिन रोग से पीड़ित हो गये। अपमान, आत्मघृणा और धन के नशे से आप मृतप्राय हो गये थे किन्तु थोड़े दिनों के बाद आपने फिर आरोग्यता प्राप्त कर ली।

आरोग्यता प्राप्त कर ये अपने राज्य में फिर से कठोर शासन करने
के लिये अग्रसर हुए। उन्होंने अपने सामान्तों के प्रति कठोर व्यवहार तथा प्रजा पर अत्याचार करना प्रारंभ कर दिया। राज्य के प्रत्येक भाग में फिर असंतोष की भयंकर अग्नि प्रज्जवलित हो गई। खाली खजाने को परिपूर्ण करने के लिये अधिकता से कर की वृद्धि की जाने लगी। इस से समस्त सामन्तों में असन्तोष फैल गया। इन सामन्तों का दमन करने के लिये सूरतसिंह जी ने उस समय भारत में एक मात्र ब्रिटिश गवर्नमेन्ट को प्रबल बलशाली जान कर सन् 1800 में उनसे सन्धि करने का प्रस्ताव कर दिया। अंग्रेजी सरकार उस समय अपनी शक्ति का विस्तार कर रही थी। अस्तु उसने तत्कालीन राजनीति के अनुसार इनका प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। इधर समस्त सामन्त यदि चाहते तो एकमत होकर सूरतसिंह जी को सहज ही में पदच्युत कर सकते थे, किन्तु वे उनके असंख्य तथा भयंकर अत्याचारों का स्मरण कर डर जाते थे। इसी कारण महाराजा सूरतसिंह के सभी अत्याचारों को सहन करते थे।

महाराजा सूरतसिंह ने अपने जीवन को अनेक प्रकार के पापों से कलंकित कर लिया था। ये पाप उनके चित्त को हमेशा कोसते रहते थे। इन पापों को नाश करने की इच्छा से वे प्रायः ब्राह्मणों को बहुत सा धन देते थे तथा गरीब ब्राह्मणों को अपने यहाँ आश्रय देकर उनका विशेष सम्मान करते थे। देश सेवा तथा धर्म कार्य में भी वे अधिक लिप्त रहते थे। यह सुअवसर पाकर उनके बचपन के साथियों तथा प्रेम पात्रों ने राज्य कार्य भार अपने हाथों में ग्रहण कर मनमाने उपद्रव मचाने शुरू कर दिए थे। इसी से राज्य में अराजकता फैल गई। चोरों और डाकुओं का उपद्रव इतना फैल गया कि प्रजा अपने धन और प्राण बचाने के लिए व्याकुल हो गई। अंत में सब सामन्तगण भी अधिक अत्याचार सहन न कर सके तो वे प्रकट रूप से महाराजा सूरतसिंह के विरोधी हो गये। राज्य में चारों ओर असंतोष की प्रबल अग्नि प्रज्जवलित होती हुई देखकर, तथा समस्त सामंतों को अपने खिलाफ देखकर महाराजा सूरतसिंह अपने प्राण और शासन की रक्षा के लिए व्याकुल हो गए। वे चारों ओर आश्रय पाने की चेष्टा करने लगे। इसी समय पिंडारियो से युद्ध करने के लिए ब्रिटिश सरकार राजपूतानें के सभी राजाओं के साथ संधि बंधन करने के लिए अग्रसर हुई। सूरतसिंह जी भलीभांति जानते थे कि अंग्रेजों की सहायता से अवश्य ही हम अपनी प्रजा को तथा अपने विद्रोही सामंतों को वश में कर लेंगे। अतएव ब्रिटिश सरकार से उन्होंने शीघ्र ही बड़े आग्रह के साथ सन्धि कर ली। इस संधि पत्र के अनुसार ब्रिटिश सरकार ने आपके राज्य में शान्ति स्थापित करने का भार अपने ऊपर ले लिया। आपने भी अफगानिस्तान काबुल आदि देशों से आने वाली वाणिज्य द्रव्य की अपने राज्य के मार्ग में भलीभांति रक्षा करने का अभिवचन दिया। तथा ब्रिटिश सरकार को आवश्यकता पड़ने पर योग्य सहायता देना भी स्वीकार किया। इस संधि में आपने ओर भी दूसरी शर्तें स्वीकार की।

राजा रायसिंह जी ने अपनी इच्छानुसार मुग़ल बादशाह की अधीनता स्वीकार करके अपनी राज्यश्री की वृद्धि की थी, किन्तु आपने अपनी प्रजा और सामन्तों से अप्रिय होकर बल शालिनी ईस्ट इंडिया कंपनी से सन्धि कर ली। यहाँ यह उल्लेख करना अनुपयुक्त न होगा, कि मारवाड़, मेवाड़ तथा आमेर आदि के प्रबल राजाओं को उक्त कंपनी के साथ सन्धि बन्धन कर जो वार्षिक कर देना पड़ता था, वह आपको न देना पडा। आपके कर देने से छुटकारा पाने का एकमात्र कारण यह था कि मराठों के दल से व्याकुल हो उपरोक्त राजाओं ने उनको चौथ स्वरूप में कर दिया था, अतएव ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी इन राजाओं से सन्धि करते समय उनसे वही कर लेने का निर्णय किया। किन्तु बीकानेर राज्य पर न तो कभी मराठों ने आक्रमण किया और न सूरतसिंह जी ने उन्हें किसी प्रकार का कर दिया। इसी कारण उक्त कम्पनी भी सूरतसिंह जी से कर न ले सकी। यद्यपि उक्त संधि-पत्र के अनुसार बीकानेर महाराज ब्रिटिश गवर्नमेंट के अधीन गिने जाते हैं, तथापि आज तक उनसे किसी प्रकार का कर नहीं लिया जाता।

ब्रिटिश गवर्मेंट के साथ महाराजा सूरतसिंह जी की सन्धि होते ही
जो सामंत इनके विरुद्ध खड़े हुए थे, वे इस समय बड़े भयभीत हुए। शीघ्र ही अंग्रेजी सेना ने बीकानेर में जाकर सूरतसिंह जी की आज्ञानुसार शान्ति स्थापना की ओर चोर डाकुओं के उपद्रवों को निवारण करके वह वापस चली गई। यद्यपि राज्य में बाहरी शान्ति हो गई थी, तथापि समस्त सामन्तों और प्रजा के हृदय में भीतर ही भीतर पहले के समान असन्तोष की प्रबल अग्नि प्रज्वलित होती रही। अंग्रेजी सेना के वापस लौट जाने पर इन असन्तुष्ट सामन्‍तों में फिर से अराजकता का साम्राज्य हो गया। सन् 1824 में
महाराजा सूरतसिंह जी की मृत्यु हो गई।

 

 

महाराजा रत्नसिंह जी बीकानेर राज्य

महाराजा सूरत सिंह जी के परलोकवासी होने पर उनके पुत्र महाराजा रत्नसिंह जी राजसिंहासन पर विराजमान हुए। आपके सिंहासन पर बेठने के साथ ही बीकानेर राज्य के सामन्‍त और समस्त प्रजा के मन का भाव भी सहसा बदल गया। महाराज सूरत सिंह जी की मृत्यु के पहले राज्य में जिस प्रकार अशान्ति, उत्पीड़न और अत्याचारों की वृद्धि हो रही थी, चोर डाकुओं के उपद्रव से जो राज्य में अराजकता फैली हुई थी, वह सब इस नवीन शासन के प्रारम्भ में शान्त हो गई। आपके सिंहासन पर बैठते ही जैसलमेर की प्रजा ने तथा राज-कमचारियों ने बीकानेर राज्य की प्रज्ञा के ऊपर घोर अत्याचार करना शुरू कर दिया। उन्होंने बीकानेर राज्य की सारी धन सम्पत्ति लूट ली। जब यह समाचार आपको मालूम हुए तो आपने जैसलमेर महाराज के पास युद्ध करने का प्रस्ताव भेजा। आपके युद्ध के प्रस्ताव को सुन कर जैसलमेर के महाराज कुछ भी भयभीत न हुए। आपने जयपुर और मेवाड़ आदि के राजाओं से सहायता मांगी। युद्ध की तैयारियाँ हो जाने पर आपने जैसलमेर पर आक्रमण कर दिया। अंग्रेजों के साथ संधि करते समय महाराज सूरतसिंह ने स्वीकार किया था कि बीकानेर के अधीश्वर किसी देशी राज्य पर आक्रमण न करेंगे। अतएव ब्रिटिश गवर्नमेंट ने आपसे कहला भेजा कि आप उक्त संधि-पत्र के अनुसार आक्रमण नहीं कर सकते। आपने गवर्नमेंट की आज्ञा पाते ही युद्ध रोक दिया। इसके बाद ब्रिटिश सरकार की अनुमति से मेवाड़ के महाराणा ने इस झगड़े में मध्यस्थ होकर दोनों राजाओं का समझौता करा दिया। इसलिये विवादाग्नि कुछ काल के लिये शान्त हो गई।

सन 1830 में आपके राज्य में भीतरी झगड़े हो गये। जिस प्रकार सूरत सिंह जी के शासन-काल में इस राज्य छे प्रमुख प्रमुख सामन्तों ने उपद्रव खड़ा किया था, उसी प्रकार इन्हीं सामन्तों ने फिर राज्यद्रोही होकर भयंकर कांड उपस्थित कर दिया। इन सामन्तों के उपद्रव से आप अत्यंत भयभीत हो गये। इनका दमन करने के लिये आपने ब्रिटिश सरकार से सहायता मांगी, किन्तु उसने आपके राज्य के अन्दरूनी झगड़ों में हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया। गवर्नमेंट ने सहायता देने से इन्कार कर देने पर आपने अपनी सेना की सहायता से विद्रोही सामन्तों को वशीभूत करने की चेष्टा की। परन्तु आपकी यह चेष्टा सफल ही न होने पाई थी कि जैसलमेर महाराज के साथ आपका किसी कारणवश फिर से झगड़ा उपस्थित हो गया। सन्‌ 1845 में यह विवाद इतना प्रबल हो गया कि ब्रिटिश गवर्मेंट को शान्ति स्थापना करने के लिये एक अंग्रेज राज्य पुरुष को मध्यस्थ करके भेजना पड़ा। उस अंग्रेज राज-पुरुष ने आप तथा जैसेलमेर के राजा के मनोमालिन्य का सन्तोषदायक निपटारा कर दिया।

कर्नल मारशिसन साहब लिखते हैं कि आपने इन उपद्रवों के बीच में ही हिसार की ओर तक अपने राज्य की सीसा का विस्तार करने के लिये दृढ़ प्रयत्न किया था, किन्तु ब्रिटिश सरकार ने इस कार्य में असन्तोष प्रकट कर कठोर नीति का अवलम्बन किया जिससे आप की अभिलाषा पूरी न हो सकी। जो अफगानिस्तान तथा काबुल का वाणिज्य द्रव्य आपके राज्य से होकर सिरसा और भावलपुर में जाया करता था उन सभी द्रव्यों पर बीकानेर राज्य की ओर से अधिक महसूल लिया जाता था, अवएव महाराजा रत्नसिंह के शासन-काल में ब्रिटिश गवर्नमेंट में यह महसूल घटा देने का प्रस्ताव किया था। पच्चीस वर्ष तक राज्य करके सन् 1852 में महाराजा रत्नसिंह परलोकवासी हो गए।

 

 

महाराजा सरदार सिंह जी बीकानेर राज्य

महाराजा रत्नसिंह जी के स्वर्गवासी हो जाने पर सन् 1852 में
उनके पुत्र महाराजा सरदार सिंह जी सिंहासन पर विराजमान हुए। आपके राज्याभिषेक के समय से बीकानेर राज्य की राज्य-शक्ति मानो क्रमश: हीन होने लगी थी। जो बल, विक्रम, शूरता, साहस आदि गुण राठौर राजाओं के भूषण थे, वे सब अग्रेज सरकार के साथ सन्धि करने से एक बार ही निर्जीव से हो गये थे। युद्धों से शान्ति मिलने से राजपूत जाति की वीरता का मानों एक बार ही लोप हो गया था। आपको राज्य करते हुए केवल पाँच ही वर्ष हुए थे कि भारत में सिपाही विद्रोह का कांड उपस्थित हो गया। इस समय आप बड़े आग्रह के साथ अपनी सेना सहित ब्रिटिश गवर्नमेंट की सहायता के लिये तैयार हुए। आपने इस समय हजारों अंग्रेजों के प्राणों की रक्षा करके उन्हें अपनी राजधानी में आश्रय दिया।

 

महाराजा सरदार सिंह बीकानेर
महाराजा सरदार सिंह बीकानेर

 

विद्रोह शान्त हो जाने पर आपकी इन बहुमूल्य सहायताओं के उपलक्ष्य मे हिसार देश के चौद॒ह हज़ार दो सौ बानवे रुपये की आमदनी वाले 41 गाँव ब्रिटिश सरकार ने आपको प्रदान किये। इसी समय महारानी विक्टोरिया की ओर से आपको सम्मान- सूचक खिलअत तथा दत्तक रखने की सनद भी प्राप्त हुई। इसवी सन्‌ 1861 में मारवाड़ ओर बीकानेर राज्य में सीमा सम्बन्धी झगड़े फिर उपस्थित हो गये। अन्त में ब्रिटिश गवर्नमेंट ने मध्यस्थ होकर सब उपद्रव शांत कर दिये। महाराजा सरदार सिंह ने अपने शासन-काल मे सामन्तों से लिय जाने वाले कर में बहुत वृद्धि कर दी। ब्रिटिश सरकार ने प्रदान किये हुए 41 ग्रामों में भी आप कर बढ़ाने की चेष्टा करने लगे। इस पर वहाँ की प्रजा बिगड़ खड़ी हुई। अन्त में ब्रिटिश सरकार के अनुरोध से आपने इन भागों के कर में किसी प्रकार की बढ़ोतरी नहीं की। सन् 1872 के जनवरी मास में महाराजा सरदार सिंह का देहान्त हो गया।

 

 

महाराजा डूंगर सिंह जी बीकानेर राज्य

महाराजा सरदार सिंह जी की पुत्रहीन अवस्था में मृत्यु होने से बीकानेर का राज्य-सिंहासन सूना हो गया। इसी कारण से ब्रिटिश
गवनमेंंट की आज्ञानुसार मंत्रि-मण्डल की सृष्टि करके उसके हाथों में शासन का भार सोंपा गया। प्रधान राजनैतिक कर्मचारी इस मंत्रि-मण्डल के सभापति होकर राज्य करने लगे। इस प्रकार कुछ काल तक राज्य-कार्य चलने के पश्चात्‌ राजरानी और सामन्तों ने नवीन महाराज नियुक्त करने का विचार किया। अतएव राज-घराने के लालसिंह नामक एक बुद्धिमान मनुष्य के पुत्र डूंगर सिंह को दत्तक ग्रहण करने का प्रस्ताव किया गया। ब्रिटिश गवर्मेंट ने स्वर्गीय महाराज सरदार सिंह जी को दत्तक लेने की सनद प्रदान कर दी थी, अतएवं उसने बिना कुछ आपत्ति किये महाराजा डूंगर सिंह जी के राज्याभिषेक के प्रस्ताव में शीघ्र ही अपनी अनुमति दे दी।अल्पावस्था ही में महाराजा डूंगर सिंह जी राजा की उपाधि धारण कर बड़ी धूम धाम के साथ बीकानेर राज्य के राज्य-सिहासन पर बिराजे।

महाराजा डूंगर सिंह अल्पवयस्क होने के कारण राजकार्य को कुछ नहीं जानते थे, इसी से आपके हाथ में सम्पूर्ण राज्य-शासन का भार देना असम्भव जानकर ब्रिटिश गवर्नमेन्ट की नीति के अनुसार एक मंत्रि-मण्डल नियुक्त हुआ। महाराजा डूंगर सिंह के पिता इस मण्डल के सभापति पद पर नियुक्त हुए तथा महाराव हरिसिंह, राव यशवन्त सिंह और मेहता मानमल आदि सदस्य पद पर नियुक्त हुए। महाराजा डूंगर सिंह जी बालिग होने पर भी मंत्रि मंडल की सहायता से राज्य-शासन करते थे। सन् 1876 में आप हरिद्वार और गया तीर्थ को गये। वहाँ से लौटते समय आपने तत्कालीन प्रिंस ऑफ वेल्स से आगरा में भेंट की।

 

महाराजा डूंगर सिंह बीकानेर राज्य
महाराजा डूंगर सिंह बीकानेर राज्य

 

महाराजा डूंगर सिंह ने अपने शासन-काल में सामन्तों से लिये जाने वाले कर में बहुत वृद्धि कर दी। प्रायः सभी सामन्तों पर दूना कर लाद दिया। सामन्तों ने मिलकर आप से प्रतिवाद किया। किन्तु आपने किसी की न सुनी। आपके कर-वृद्धि के प्रस्ताव से बीकानेर राज्य के तत्कालीन पोलिटिकल एजेट ने भी आपका पक्ष ग्रहण किया। इससे बहुत से बड़ें बड़े सामन्त डर गये थे। वे वृद्धि कर देने में सहमत भी हो गये। यद्यपि बड़े बड़े सामन्तों ने भयभीत होकर वृद्धि कर देना स्वीकार कर लिया था, तथापि बहुतेरे सामन्तों ने असन्तोष प्रकट किया। इसी समय महाराजा डूंगर सिंह जी ने बीदावाटी के सामन्तों से जो 50000 रुपया ‘कर’ लिया जाता था उसे भी बढ़ाकर 86000 रुपया कर दिया। इससे राज्य में धीरे धीरे उपद्रव होने लगा। इसके कुछ दिनो बाद कप्तान टालवट बीकानेर के पोलिटकल एजेट के पद पर नियुक्त हुए। आपने असन्तुष्ट सामंतों को बुलाकर बहुत कुछ समझाया और धमकाया किन्तु सामन्तों पर उनके कहने का कुछ भी असर न हुआ। वे राजधानी छोड़कर अपने अपने निवास स्थान को चले गये। जब सब सामन्त असन्तुष्ट होकर अपने अपने निवास स्थानों को चले गये तब महाराजा डूंगर सिंह जी ने अत्यन्त क्रोधित हो उनका दमन करने के लिए अपने प्रधान सेनापति हुकम सिंह के संचालन मे एक सेना भेज कर उन पर आक्रमण करने का विचार किया। ब्रिटिश एजेट ने भी आपके इस प्रस्ताव का समर्थन किया। अतएव हुकम सिंह अपनी सारी सेना साथ ले विद्रोही सामंतों पर आक्रमण करने के लिये रवाना हुए। यह सुन कर सभी सामन्त अपने अपने स्वार्थ की रक्षा के लिये अपनी अपनी सेना तथा कुटम्बियों को साथ ले महाजन नामक स्थान में एकत्रित हुए। जब सामन्तों ने देखा कि महाराज की सेना के साथ मुकाबला करने में वे असमर्थ हैं तो उन्होंने बीदावाटी देश के बीदासर नामक किले में आश्रय लेकर हुकुम सिंह से सामना करने का विचार किया।
बीदावाटी के सामन्तों ने भी वृद्धित ‘कर’ देना स्वीकार नहीं किया था, अतएव उन्होंने विद्रोही सामन्तों का नेतृत्व स्वीकार किया।

 

 

सामन्तों की इस प्रकार से युद्ध की तैयारी देख कर महाराजा डूंगर
सिंह जी ने पूर्ण रूप से उनका दमन करने के लिये कप्तान टालवट साहब से अंग्रेजी सेना भेजने का प्रस्ताव किया। ब्रिटिश गवर्नमेंट की अज्ञानुसार जनरल जिलेसपि के संचालन में 1800 अंग्रेजी सेना बीकानेर में आ पहुंची राज्य की सेना और अंग्रेजी सेना ने मिलकर बीदासर के किले को घेर लिया। कप्तान टालबट भी अंग्रेजी सेना के साथ ही युद्ध-स्थल पर पहुँचे थे। उन्होंने विद्रोही सामन्तों से कहला भेजा कि वे शीघ्र ही बीदासर के किले को छोड़ दे। इस पर सामन्तों ने कहला भेजा कि जब तक उनसे लिये जाने वाले कर का विचार भली भाँति न किया जायगा तब तक वे निविध्नता-पूर्वक किले में ही रहेंगें।

सामन्तों से यह धुष्टतापूर्णं उत्तर पाकर कप्तान टालवट साहब भी
भलीभाँति जान गये कि राठौर सामस्त अंग्रेजी सेना को आया हुआ देख कर कुछ भी भयभीत नहीं हुए हैं। अतएव उन्होंने उक्त किले के मुँह पर गोलों की वर्षा करने का हुक्म दिया। बहुत समय के पश्चात्‌ फिर एक वक्त समरानल ने प्रव्जलित होकर विचित्र दृश्य दिखाया। निरन्तर गोलों की वर्षा करके अंग्रेजी सेना ने बीदासर के प्राचीन किले को विध्वंस कर दिया। अंत में सामन्तों ने सन् 1883 की 23 वीं दिसंबर को अँग्रेजी सेना को आत्मसमपर्ण कर दिया। अंग्रेज़ी सेना ने बीदासर के किले के अतिरिक्त और भी कई एक किले तोड़-फोड़ डाले। बीदासर के सामन्तों के आत्म समर्पण करते ही वे राजनेतिक कैदी के रूप में देहली के किले में भेज दिये गये। अन्य विद्रोही सामन्त भी बन्दी भाव से कारागार में रखे गये। इस प्रकार राज्य में शान्ति स्थापन कर अंग्रेजी सेना वापिस चली गई। सन् 1887 में महाराजा डूंगर सिंह की मृत्यु हो गई।

 

 

महाराजा गंगा सिंह जी

महाराजा डूंगर सिंह की मृत्यु के बाद महाराजा गंगा सिंह जी बीकानेर राज्य के सिंहासन पर विराजे। महाराजा गंगा सिंह का जन्म सन्‌ 1880 की 3 अक्टूबर को हुआ था। आप राठौड़ राजपूत थे तथा स्वर्गीय महाराजा डूंगरसिंह जी के ग्रहीत पुत्र थे। महाराजा गंगा सिंह तथा स्वर्गीय महाराजा भाई भाई थे। आप महाराज लाल सिंह के पुत्र थे। सन्‌ 1887 की 31 वीं अगस्त को महाराजा गंगा सिंह जी बीकानेर राज्य की गद्दी पर बैठे। उस समय आप नाबालिग थे, अतएवं आपको शासनाधिकार प्राप्त न हुए। बाद में बालिग हो जाने पर सन्‌ 1898 की 16 दिसम्बर को आप सम्पूर्ण अधिकारों से सम्पन्न हुए। आपके शासन-भार गृह करने के कुछ ही दिनों पश्चात्‌ राज्य भर में भयंकर अकाल पड़ा। इस समय आपने अपनी प्रजा को अकाल से बचाने के लिये बहुत कोशिश की, जिसके पुरस्कार में आपको ब्रिटिश सरकार की ओर से प्रथम श्रेणी के केसर ए-हिन्द का सम्मान मिला। सन्‌ 1902 की 14 जून को आप इन्डियन आर्मी के ऑनरेरी मेजर के पद पर नियुक्त हुए। महाराजा गंगा सिंह का विवाह प्रतापगढ़ के महाराजा साहिब की कन्या के साथ हुआ था। सन्‌ 1900 के अगस्त मास में आप अपने गंगा रिसाला सहित चीन के समर में उपस्थित हुए और युद्ध खतम होने पर दिसम्बर मास में वापस लौट आये। इस सहायता के पुरस्कार-स्वरूप आपको के० सी० आई० की उपाधि प्राप्त हुई। इसके दो वर्ष पश्चात आपको एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिनका नाम महाराज कुमार श्री शार्दूलसिंह
जी रखा गया। ये ही आगे चलकर बीकानेर राज्य के भावी महाराजा बने। इसके पश्चात्‌ सन् 1906 में आपकी उपरोक्त महारानी साहिबा परलोक सिधारी। सन् 1904 में आपको भारत सम्राट के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में के० सी०आई० ई० की उपाधि मिली थी। इसके तीन वर्ष पश्चात्‌ आपको जी० सी० आई ० ई० की उपाधि भी मिल गई। सन्‌ 1908 की 3 मई को आपका विक्रमपुर के ताजिमी पट्टेदार साहब की कन्या के साथ द्वितीय विवाह सम्पन्न हुआ। इसके दूसरे वर्ष की 29 मार्च को इन महारानी से आपके विजय सिंह जी नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ। कुमार विजय सिंह जी को आपने अपने पिता लालसिंह जी की जागीर पर दत्तक रख दिया था।

 

 

महाराजा गंगा सिंह
महाराजा गंगा सिंह

सन 1910 की 3 जून को अर्थात्‌ सम्राट पंचम जॉर्ज के राज्य अभिषेक उत्सव के दिन आपको कर्नल की उपाधि मिली तथा आप सम्राट के ए० डी० सी० के पद पर नियुक्त हुए। इसके एक वर्ष पश्चात्‌ सम्राट के राज्यारोहण उत्सव में सम्मिलित होने के लिये निमन्त्रित किये जाने पर आप इंग्लेंड पधारे। इस समय आपको केंम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की ओर से एल० एल० डी० की उपाधि मिली । इसी वर्ष के दिसम्बर मास में आप देहली दरबार में जी० सी ० एस० आई० की उपाधि से विभूषित किये गये।

जिस समय यूरोप में भयंकर युद्ध की ज्वाला प्रज्वलित हुई, उस
समय आपने अपने राज्य की समस्त सेना एवं अन्य सामान भारत सरकार को अर्पण कर दिये। इतना ही नहीं, आपने युद्ध में सम्मिलित होने की अनुमती माँगी। अनुमति मिलने पर आप अपनी सेना सहित भारत सरकार की ओर से फ्रांस और इजिप्त के युद्ध-क्षेत्रों में सम्मिलित हुए। आप अधिक दिनों तक रणक्षेत्र में न ठहर सके, क्योंकि आपकी पत्नी श्री महाराज कुमारी बड़ी अस्वस्थ थीं। अतएव आप सन्‌ 1915 के फरवरी मास में वापस लौट आये। सन्‌ 1917 में युद्ध कांफ्रेंस में सम्मिलित होने के लिये आप भारतीय नरेशों के प्रतिनिधि मनोनीत किये जाने पर फिर इंग्लैंड पधारे।

इस समय आपको मेजर-जनरल की उपाधि प्राप्त हुई। एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी ने भी इस समय आपको एल० एल० डी की ऑनररी उपाधि प्रदान की। सन्‌ 1918 में आप फिर इग्लेंड पधारे तथा व्हारसेलीज के सुलह कांफ्रेंस में सम्मिलित हुए। इसके दूसरे वर्ष की पहली जनवरी को आपको जी० सी० बी० की उपाधि मिली। इसके दो वर्ष पश्चात्‌ अर्थात्‌ सन्‌ 1921 की 1 जनवरी को आप जी सी० बी० ई० की फौजी उपाधि से विभूषित किये गये। इसी वर्ष आप नरेन्द्र-मण्डल के प्रथम चॉन्सलर के पद पर चुने गये। आपका सम्पूर्ण नाम निम्न प्रकार हैः– “मेजर जनरल हिज हायनेस महाराजा राजराजेश्वर शिरोमणि श्री सर गंगा सिंह बहादुर, जी० सी० एस० आई०, जी० सी० आई ० ई०,जी० सी० बी० ओ०, जी० बी० ई०, के० सी० बी०, ए० डी० सी०, एल० एल० डी० । महाराजा गंगा सिंह को 19 तोपों की सलामी का सम्मान प्राप्त था। आपके आप्र-गणों के नाम महाराज श्री सर भैरोसिंह जी बहादुर के० सी० एच० आइ० तथा महाराज श्री जगमंगलसिंह जी आदि थे।

 

 

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