बाल गंगाधर तिलक का जीवन परिचय और विचार

स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है और मैं उसे लेकर रहूंगा” के उद्घोषक लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का स्थान स्व॒राज्य के पथ-गामियों मे अग्रणीय है। उनकी दृढता का महामंत्र देश-विदेश में विद्युत की तीव्रगति की तरह गूंजा और दलितों एवं पीड़ितों के लिए अमर संदेश बन गया। स्वतंत्र भारत का बच्चा-बच्चा इस बात से परिचित है कि उपर्युक्त मंत्र को फूंकने वाले तिलक ही थे। भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास मे आपका अद्वितीय स्थान है। देश की राजनीति को उम्र रूप देने, उसे जनसाधारण तक पहुंचाने और उसके लिये जीवन अर्पण करने वाले कार्यकर्ता तैयार करने का महत्त्वपूर्ण कार्य आपने ही सर्वप्रथम किया।

 

 

अंग्रेज उन्हें भारतीय असंतोष के जनक कहते थे। वास्तव में वह भारतीय राजनैतिक असंतोष के जनक, देश के पुण्य पुरुष, महान्‌ गरम नेता, तत्त्वज्ञानी, राजनीतिज्ञ, आदर्श पत्रकार, महान शिक्षाविद थे। वे भारतीय जनता के हृदय में निवास करने वालें आराध्यदेव थे। उनका कठोर संघर्ष पूर्ण जीवन प्रजातंत्र के निर्माण के लिए समर्पित था। वे भारतीय जनता के कल्याण हेतु जन्मे और उसी की पूर्ति हेतु मरे। जनसाधारण ने उनके अद्भुत त्याग, तपस्यामय जीवन, निर्भीकता को परखते हुए उन्हें लोकमान्य के श्रद्धापूर्ण नाम से पुकारा गया। उनकी दूरदृष्टि ने हमारे स्वाधीनता-संग्राम मे अत्यधिक सहायता पहुंचाई। वे हिमालय के समान धैर्यवान और अटल थे। निश्चित कर्त्तव्य पथ पर अंत तक डटे रहना उनका स्वाभाविक लक्षण था। देशभक्ति की अमर प्रेरणा सृजन करने वालों में वे सबके अग्रणी थे। उन्होंने इस महादेश को परतंत्रता की बेड़ियों पते जकड़े रखने वाले विदेशी शासकों के कूटनीति चक्र की वास्तविकता को ठीक-ठीक पहचानकर स्पष्ट शब्दों में हमे सचेत कर दिया था। स्वराज्य की प्रस्थापना तथा विदेशी शासन-तंत्र के उमुन्लन की मांग से लेकर राष्ट्रभाषा एवं राष्ट्रलिपि के रूप मे हिन्दी एवं देवनागरी की प्रतिष्ठा तक राष्ट्र-निर्माण विषयक सभी सूत्रों का वर्षों पूर्व ही वह मंत्रोच्चार कर चुके थे। उन्होंने बहुत पहले ही हमारे उद्धार के लिए उन अमोघ मंत्रों का निर्देश कर दिया था, जिनको अपनाकर ही अंत में हम राजनीतिक स्वतंत्रता का अपना स्वप्न पूरा कर पाए।

 

 

बाल गंगाधर तिलक का जीवन परिचय

 

 

यह एक अदुभुत संयोग है कि बाल गंगाधर तिलक सन्‌ 1856-1857 के विद्रोह से एक वर्ष पूर्व पैदा हुए जब देश का सामान्य वातावरण अंग्रेजी राज्य के विरुद्ध विद्रोह की भावना से पूर्ण था। सत्ता को चुनौती तथा अन्याय के प्रति विद्रोह तिलक की रग-रग में समाया हुआ था। उनका जन्म शिवाजी की पुण्यभूमि महाराष्ट्र में हुआ। इस महापुरुष बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई, 1856 को महाराष्ट्र के कोंकण प्रदेश के रत्नगिरि नामक स्थान पर हुआ। उनका वास्तविक नाम केशव था। किंतु बचपन का उपनाम बाल या बलवंत राव अधिक प्रसिद्ध हो गया। वे प्यार से ‘ बचपन मे संक्षेप में केवल ‘बाल’ कहकर ही संबोधित किए जाते थे। आगे चलकर सार्वजनिक रूप से भी छोटे से नाम द्वारा पिता के नाम के साथ बाल गंगाधर तिलक कहकर ही अभिहित किए जाने लगे। जिस समय बाल गंगाधर तिलक का जन्म हुआ, उस समय गदर की तैयारी हो रही थी। ब्रिटिश सत्ता को उलटने के लिए वीरों ने एक बार पुनः कमर कस ली थी। हिंदू मुस्लिम एक हो गये थे। इतिहासकार सरकार और दत्ता लिखते हैं–“इस बीच नाना साहब, अवध की बेगमें, अवध के अन्य राजे, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और आरा के पास जगदीशपुर के कुंवर सिंह ने कानों-कान गदर का मंत्र सेना में फूंकना आरंभ किया।” बाल गंगाधर तिलक के पिता श्री गंगाधर राव आरंभ में अपने कस्बे की स्थानीय पाठशाला में एक साधारण शिक्षक के रूप में काम करके ही अपना भरण-पोषण करते रहे। कालांतर में वह क्रमशः थाना तथा पूना जिले के सरकारी स्कूलों के सहायक इंस्पेक्टर हो गये थे। उनका संस्कृत ज्ञान इतनी उच्चकोटि का था कि, दिवंगत ‘रामकृष्ण गोपाल भंडारकर जैसे पूर्वी भाषाओं के विद्वान भी उनका बड़ा आदर करते थे और इसी कारण वे गंगाधर शास्त्री के नाम से प्रसिद्ध हो गये थे। अतः इसमें संदेह नहीं कि लोकमान्य मे विद्वत्ता का विकास बहुत-कुछ अपने पैतृक संस्कारों के ही फलस्वरूप हुआ था। बचपन में पिता उन्हें नित्य संस्कृत के श्लोक कंठस्थ कराया करते थे। घर पर अपने पिता के अध्यापन के कारण ही वे संस्कृत, गणित और व्याकरण जैसे विषयों में अपनी आयु के बालकों से बहुत आगे थे। अपनी तीक्ष्ण बुद्धि, निर्भीकता और दृढ़ता के कारण वे पड़ोस के अन्य बच्चों में पृथक ही दिखाई पड़ते थे।

 

 

बाल गंगाधर तिलक की शिक्षा दीक्षा

 

 

सन्‌ 1861 की विजयादशमी के शुभ दिन बालक तिलक पाठशाला भेजे गये। 8 वर्ष की अवस्था तक तिलक ने भिन्न तक गणित, रूपावली, समास-चक्र, आधा अमरकोष और ब्रह्म कर्म के बहुत-से श्लोक कंठस्थ कर लिये थे। मेघावी होने के कारण उन्होंने दो वर्षों में तीन कक्षाएं भी उत्तीर्ण की। विद्यार्थी जीवन में बाल तिलक बड़े नटखट स्वभाव के, हठीले और जबर्दस्त विवादी व्यक्ति थे। वह नज़ाकत, नाज-नखरे और थोथी शान-शौकत बघारने वालों के कट्टर शत्रु थे। वह इस देश की प्राचीन गौरव गरिमा एवं सरल जीवन ही के ह्रदय से उपासक थे। इसी कारण पाश्चात्य रंग मे रंगे सहपाठियों एवं शिक्षकों से उनका प्रायः झगड़ा बना रहता था। उन्हें तरह-तरह से तंगकर कठोर पाठ पढ़ाने के अवसर से वह कभी भी चूकते नहीं थे। अपने इसी शरारतीपन के कारण वह अपने साथियों द्वारा उन दिनों ‘डेविल’, ब्लंट! आदि विभिन्न उपनामों से संबोधित किए जाते थे। बड़ो से झगडा करने के कारण इनकी गिनती चतुर किंतु झगड़ालू अथवा बुद्धिमान होते हुए भी हठी स्वभाव वाले बालको में होने लगी। स्पष्ट है कि आरंभ से ही इनमे उद्दंड साहस, दृढ़ संकल्प और प्रतिभा का प्रकाश था। कक्षा में प्रथम आने की महत्त्वाकांक्षा उनके चित्त मे कभी न थी। वे गिनी-चुनी पुस्तकें पढ़ते थे। शेष समय को वे हास्यविनोद और अपनी अवस्था के विद्यार्थियो से विविध विषयों के वाद-विवाद मे लगा देते थे।

 

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक

 

जब 1871 ई० में वे पढ़ रहे थे और उनकी आयु 15 वर्ष थी, तभी उनका विवाह हो गया। विवाह में बहुमूल्य दहेज न लेकर तिलक ने अपने श्वसुर से पढ़ने के लिए पुस्तकें मांगी थी। इससे उनका विद्या-प्रेम भली भांति प्रकट होता है। तिलक और उनकी पत्नी दोनों मातृहीन थे। तिलक के विवाह के कुछ दिन पश्चात्‌ सन्‌ 1872 में उनके पिता का स्वर्गवास हो गया। 16 वर्ष के बालक के
ऊपर दुख का पहाड टूट पड़ा। वह संसार में अनाथ हो गया। इससे पूर्व जब वह 10 वर्ष का था तभी उसकी माता का देहान्त हो गया था। इस प्रकार बाल गंगाधर तिलक अल्पायु में ही माता-पिता के स्नेह से वंचित हो गये। पिता की मृत्यु के महीने भर बाद तिलक ने हाईस्कूल की परीक्षा दी। माता-पिता के निधन के पश्चात्‌ तिलक के पालन-पोषण का भार उनके चाचा गोविद राव पर पड़ा। तिल॒क अंत समय तक अपने चाचा जी की हर प्रकार से सेवा करते रहे। उनके पिता, उनके बड़े-बूढे सब कुछ वही थे। जहां तिलक अपने चाचा का इतना आदर करते थे, वहां चाचा के हृदय मे भी तिलक के लिए बहुत प्यार था। जब एक बार उन्हें कारावास का दंड मिला तो चाचा का मस्तक गौरव से ऊंचा हो गया। उनकी आंखों से अपने लाडले भतीजे के लिए आसुओं की धारा बह चली। तिलक ने सन्‌ 1872 मे मैट्रिक की परीक्षा पास की और पूना के डेकन कालेज में भर्ती हुए। यहां उनका मन पाठय पुस्तकों में अधिक न लगता था। उन्हें व्यायाम का चाव हो गया था। प्रातः का समय वे अखाड़े में कुश्ती करने या नदी में तैरने में व्यतीत करते थे। संध्या का समय खेल-कूद या हवाखोरी और रात का गपशप और हंसी-मजाक में व्यतीत होता था। वे कहते थे–‘पढ़ाई की परवाह न करके मुझे अपना शरीर मजबूत बनाना चाहिए।” परिणामतः वे बी० ए० में फेल हो गये परंतु उनका शरीर हष्ट पुष्ट हो गया, जो जीवन के भावी संघर्ष में एक वरदान सिद्ध हुआ।

 

 

उन्होंने 1876 ई० में प्रथम श्रेणी में बी० ए० की परीक्षा पास की उसके पश्चात्‌ एम० ए० में गणित लिया, किंतु फेल हो गये। फिर उन्होंने वकालत पढ़नी आरंभ की और 1879 ई० मे एल-एल० बी० पास हो गये। विद्यार्थी काल में ही तिलक की श्री गोपाल गणेश आगरकर से जान-पहचान हो गई थी। दोनों ही नौकरी करने के विरुद्ध थे। दोनों ने सार्वजनिक कार्य करने का संकल्प कर लिया था। बाल गंगाधर तिलक वास्तविक अर्थ में गदर की गोद मे पले थे। गदर के बीस वर्ष पश्चात्‌ इस गदर के पुत्र के विचार किसी क्रांतिकारी से कम न थे। विवेक में आस्था रखने वाला शिक्षा प्राप्त करते समय, शिक्षा द्वारा भारत का उद्धार करने की युक्त ढूंढने लगा। वह अपने मित्र आगरकर से कहते हैं,“जिस दिन साधारण जनता विचारवान बन जाएगी, उस दिन तो हम राजा ही हो जायेंगे, अंग्रेज और मराठा बराबर के मित्र बन जाएंगे। और आज की तरह उनमें स्वामी-सेवक का नाता भी न रहेगा।” आरंभ से ही वह सामाजिक सुधार की अपेक्षा राजनैतिक सुधार के पक्ष में थे। “बिना घर के, बिना स्वराज्य के सुधार कैसा ?” वह कहा करते थे।

 

जन सेवा क्षेत्र में पहला कदम

 

इन्होंने पहले-पहल 1880 ई० में श्री विष्णु शास्त्री चिपलूणकर के साथ मिलकर लोक सेवा के पथ पर एक स्कूल की स्थापना की। यह उनका अपनी योजना को व्यावहारिक रूप देने का पहला कदम था। वर्ष-भर बाद ही जन जागरण के लिए समाचारपत्रों की आवश्यकता एवं महत्त्व का अनुभव करते हुए ‘केसरी” (मराठी) और “मराठा” (अंग्रेजी) साप्ताहिक निकाले गये। तिलक “मराठा के संपादक बनाये गये। केसरी” में भी वह बीच-बीच में कानून और धर्मशास्त्र पर लेख लिखते रहते थे। कोल्हापुर राज्य के तत्कालीन कुशासन के संबध मे कुछ आलोचनात्मक सामग्री प्रकाशित करने के कारण सन्‌ 1882 ई० में ‘केसरी’ पर मानहानि का एक मुकदमा चलाया गया। सार्वजनिक क्षेत्र में कदम रखते ही मित्र सहित चार महीने के लिए कारावास का दंड भोगना पड़ा। यह घटना मानो बाल गंगाधर तिलक के लिए जन क्षेत्र में अग्रसर होने वाली प्रथम सीढ़ी थी। दमन चक्र के इस प्रथम प्रहार ने अप्रमास ही एकदम उछालकर उन्हें जनता के हृदय का हार बना दिया। जब वह जेल से मुक्त होकर वापस आए तो सहस्त्रों की संख्या में जनता ने उनका स्वागत और अभिनंदन किया।

 

 

अब तिलक को न दिन मे चेन था और न रात को नीद। वह सदव किसी-न-किसी कार्य मे संग्लन रहते थे। उन्हे न शरीर की चिंता थी और न अपने स्वास्थ्य का तनिक ध्यान था। उन्होंने विश्वाम करना कभी जाना ही नहीं। वह यंत्र की भांति दिन-रात देश के कार्य मे लगे रहते थे। इस अनवरत परिश्रम का उनके स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पडा। वे दुर्बल और क्षीणकाय हो गये। सन्‌ 1884 में डेकन एजूकेशन सोसायटी की स्थापना हुई। उसकी ओर से एक न्यू इंग्लिश स्कूल चलाने और एक स्वतंत्र कालेज खोलने का निश्चय हुआ। अपने अन्य सहयोगियों की तरह स्वभावत: तिलक ने भी नाममात्र के पारिश्रमिक पर आजन्म शिक्षण-कार्य करने का व्रत ले लिया। 1885 ई० में न्यू इंगलिश स्कूल’ के ‘फर्गयूसन कालेज मे परिणत हो जाने पर वह उसमें गणित और संस्कृत के प्राध्यापक के रूप में कार्य करने लगे। परंतु अभी कुछ ही समय व्यतीत हुआ होगा कि उनके और समिति के अन्य कार्यकर्ताओं के मध्य नीति के संबध मे गहन मतभेद उत्पन्न हो गया। फलतः 1890 ई० में उन्हें समिति ओर उससे संबंधित कार्यो से सदा के लिए अपने आपको पृथक कर लेना पडा। वस्तुतः उनकी प्रतिभा शिक्षा के इस संकुचित क्षेत्र में कुंठित-सी हो रही थी और देश भी उनके नेतृत्व से वंचित हो रहा था। देश का एक तरह से सौभाग्य ही था कि वे प्राध्यापकी से अलग हो गये और राजनैतिक क्षेत्र में उतर पड़े।

 

 

राजनीति क्षेत्र में पहला कदम

 

 

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का जब राजनैतिक प्रांगण में पर्दापण हुआ, तब देश में घोर अंधकार छाया हुआ था। दमन और अत्याचारों के काले मेघों से आकाश आच्छादित था। जनसाधारण में इतना दासत्व उत्पन्न हो गया था कि स्व॒राज्य और स्वतंत्रता का ध्यान तक उनके मस्तिष्क में नही था। राज भक्ति का प्रवाह था, सो भी एक विदेशी सत्ता के प्रति, किसी को इतना साहस न होता था कि वह अपने मुंह से ‘स्वराज्य” का नाम निकाले। ऐसे विकट काल मे प्रात: स्मरणीय लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने स्वतन्त्रता के युद्ध की बागडोर संभाली। स्वभावतर: उनके विचारों में क्रांति की आग सुलग रही थी। केसरी’ और “मराठा पत्रों के विषय में भी अपने सहयोगी आगरकर साथ गहरा मतभेद उत्पन्न हो जाने के कारण शीघ्र ही उन्हें अपना मार्ग एकदम पृथक कर लेने के लिए विवश होना पडा । उन्होंने सन्‌ 1891 में दोनों समाचार पत्रों का संपूर्ण स्वत्व-भार स्वयं खरीदकर अब स्वतंत्र रूप में उन्हें प्रकाशित करना शुरू किया। अपनी जन्मजात प्रतिभा और अदम्य कार्य शक्ति के बल पर शीघ्र ही लोकमान्य ने अकेले ही जन क्षेत्र में अपना स्थान बना लिया।

 

 

उनकी लौह लेखनी के चमत्कार से जल्दी ही ‘केसरी’ और ‘मराठा’ महाराष्ट्र के प्रतिनिधि पत्र बन गए। इन दोनों पत्रों पर सात हजार रुपये कर्ज था, जिसे उन्हें लौटाने में दस वर्ष लगे। आजीविका के लिए आपने कानून की कक्षाएं लेनी शुरू की। परंतु जब उनका सार्वजनिक उत्तरदायित्व दिन-प्रतिदिन बढने लगा तो उन्होंने अब अपना सारा समय लोक सेवा में ही लगाना आरंभ कर दिया। उन्होंने अपनी आमदनी विषयक चिंता छोड़ उक्त लॉ क्लासें लेनी भी बंद कर दी। सत्य तो यह है कि इस महापुरुष का आविर्भाव ही हुआ था केवल जनकल्याण के लिए। उसका तो एकमात्र जीवन लक्ष्य ही था इस देश की सुपुप्त आत्मा को जगाना। वह इस महिमामयी भूमि को विदेशी शासन की लौह‌ श्रृंखलाओं से मुक्त कर पुनः उसे अपने स्वय सिद्ध स्वाधिकार के स्वच्छन्द वातावरण में प्रतिष्ठापित करने का स्वप्न देखता था। उसके मत में रह-रहकर उस स्वातंत्र्य-पताका की स्मृति मंडराती थी जिसे शिवाजी ने केवल डेढ़ शताब्दी पूर्व ही मुगलों की साम्राज्य शाही का गढ़ विध्वंस कर स्वयं अपने हाथों इस महादेश के आंगन में पुनः फहराया था। वास्तव मे वह हमारी स्वातंत्य-लक्ष्मी का एक अनन्य पुजारी था, जो कि हर समय हमारे राष्ट्रीय मंदिर मे उसकी पुन प्रतिष्ठित के पुनीत स्वप्न ही मे लीन रहता था। इसी लिए इस प्रश्न पर वह किसी के आगे सिर झुकाने को कदापि तैयार नही हो सकता था।

 

स्वतंत्रता में योगदान

 

यद्यपि इसी उद्देश्य को लेकर और भी कई आवाजें देश में इसी समय उठने लगी थी, किंतु उसकी ललकार में सिंह कौ-सी हुंकार, निर्भीकता का जो भाव था, वह आधुनिक भारतीय राजनीति के उस युग के लिए एक नवीन वस्तु थी। उसे स्वतंत्रता के लिए किसी के आगे नाक रगड़ना अभीष्ट न था। वह तो स्वतंत्रा को इस देश का “जन्मसिद्ध अधिकार” घोषित करता था। इसीलिए अपने उस
खोए हुए अधिकार को प्रत्येक संभव तरीके से पुनः प्राप्त करने के लिए कमर कसकर मैदान मे उतरने को वह हमें आह्वान करता था । इस हेतु अपने अमोघ अस्त्र ‘केसरी’ के पृष्ठों में आप अपनी लौह लेखनी से विदेशी शासन-तंत्र की काली करतूतों के विरुद्ध आग धधकते अंगारे उगलने लगे। आप सरकार की निरंकुशता का निर्भयता से भंडाफोड़ करते हुए जन हृदय को स्वाधीनता के भावी
संग्राम के लिए तैयार करने लगे। स्वभावतः ही आप जन हृदय के भीतरी स्तरों में बैठकर अल्पकाल ही मे सच्चे अर्थो में ‘लोकमान्य’ बन गए। परंतु साथ ही सरकार की आखों में दिन-प्रतिदिन कांटे की तरह गड़ते-चुभते रहने के कारण एक ऐसी खटकने वाली वस्तु का रूप उसने धारण कर लिया कि अब अंग्रेज़ों को उससे अधिक भयानक कोई भी अन्य व्यक्ति भारतवर्ष में न दिखाई देने लगा।

 

1889 ई० में क्राफर्ड-प्रकरण मे भाग लेकर बाल गंगाधर तिलक ने जनता को अपनी ओर विशेष रूप से आकृष्ट किया। अंग्रेज अधिकारी क्राफर्ड ने घूस खायी थी। वह तो दोषी होने पर भी दंड से बच गया पर उसके अधीनस्थ कर्मचारियों को सजा मिली। न्याय के नाम पर किए गए अन्याय के इस हास्यास्पद नाटक से स्वभावतः ही तिलक का रोष उबल पड़ा। उन्होंने इसके विरोध में ‘केसरी’ मे लिखा, सभा की और संसद में प्रश्न उठवाया। बम्बई सरकार से इन लोगों को निर्दोष करवाया। यही नहीं, जीवन पर्यन्त इन्हे पेंशन दिलायी। इससे आपकी धाक जम गयी और अन्याय के विरुद्ध लड़ने वाले एक साहसी एवं निर्भीक व्यक्ति के रूप में आप प्रसिद्ध हो गये। साथ ही ब्रिटिश सरकार के चरित्र के खोखलेपन तथा न्याय के ढोंग का पर्दाफाश होने के नाते जन जागृति के आदोलन को भी विशेष रूप से बल मिला।

 

 

1891 ई० में संमति बिल के विषय में सर रानांडे और डा० भंडारकर सरीखे बड़े-बड़े विद्वानों से आपका वाद-विवाद हुआ। तात्त्विक दृष्टि से आप परस्पर की संमति से व्यय बढ़ाये जाने के पक्ष मे थे। परंतु सुधारकों एवं आपके मध्य वाद-विवाद का विषय यह था कि सरकार को धार्मिक विषयों में हस्तक्षेप नही करना चाहिए। यदि सुधार करना आवश्यक हो तो वह लोकमत के अनुकूल ही करे। इस वाद-विवाद से आपका नाम सारे भारत में प्रसिद्ध हुआ। अब जनता यह अनुभव करने लगी कि बाल गंगाधर तिलक हमारा प्रतिनिधित्व करने में सक्षम हैं।

 

 

1893 और 1894 मे सर्वप्रथम चलाए गए महाराष्ट्र के गणेशोत्सव तथा शिवाजी जन्मोत्सव नामक वे महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक त्योहार थे, जो तिलक के रचनात्मक प्रयत्नों के एक उज्ज्वल उदाहरण के रूप मे प्रस्तुत किए जा सकते हैं। इनके आयोजन का उद्देश्य धर्म ओर जातीय गौरव की भावना को जगाकर विकेंद्रित लोक शक्ति को सुसंगठित होने के लिए सबल रूप से बढावा देना तथा राष्ट्रीय का शक्तिशाली मोर्चा तैयार करना था। वास्तव में हिंदुओं का स्वाभिमान जागृत करने और उन्हें ऐक्य बद्ध करने के उद्वेश्य से ही शिवाजी उत्सव शुरू किया गया था। उन्होने उस महान राष्ट्र निर्माता के अमर विजय स्मारक सिंहगढ़ के किले पर मराठा-संतानों को पुनः उसकी याद जगाने के लिए आमंत्रित कर उसकी महानता के प्रति इस युग का ध्यान पहले पहल आकर्षित किया। महाराष्ट्र के युवकों में स्वधर्म-प्रेम, स्वदेश-धर्म और स्वपूर्वज प्रेम निर्माण करने में उन उत्सवों का कितना उपयोग हुआ यह आज भी जब तक की महाराष्ट्र में जाकर यह न देखे कि ये उत्सव कितने उन्माद के साथ मनाएं जाते है, मालूम नही हो सकता। उन्होंने भारतीय अशांति की मीमांसा की है, दक्षिण की वर्तमान कालीन जागृति का—उनके मन से अशांति का–मुख्य श्रेय इन्ही उत्सवों को दिया है। इससे बढ़कर उत्तम प्रमाण और क्या हो सकता है?

 

 

सन्‌ 1895 ई० में बाल गंगाधर तिलक बंबई प्रांतीय धारा-सभा के सदस्य निर्वाचित हुए और वहां अपने पहले ही भाषण में उन्होंने सरकारी नीति की कटु आलोचना कर अपनी निर्भीक देशभक्त का प्रखर परिचय दिया। इसी समय की बात है कि महाराष्ट्र पर भीषण अकाल और प्लेग की महामारी का प्रहार हुआ। जनता को सरकार के विरुद्ध जागृत करने का स्वर्ण सुयोग आपको प्राप्त हुआ। आपने सरकार की उपेक्षा और लापरवाही के विरुद्धपर्याप्त लिखा, फलतः उसके विरुद्ध सर्वत्र रोष का वातावरण उत्पन्न हो गया।

 

इसी समय चाफेकर नामक एक क्रांतिकारी महाराष्ट्रीय युवक ने पूना में प्लेग कमेटी के अध्यक्ष मि० रैण्डम की गोली मारकर हत्या कर डाली। इससे सारे देश में सनसनी फैल गयी। सरकार ने इस हत्या का संबंध तिलक द्वारा संचालित आंदोलन को जनान्दोलन के साथ जोड़ने की साज़िश और उन्हें फंसाने के लिए ‘केसरी’ मे लिखित उनके कुछ लेखों को हिंसा की प्रवृत्ति जगाने वाले बताकर उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया। 14 सितबर, सन्‌ 1897 को आपको 8 मास का कठोर कारावास का दंड मिला। भारत में इस ढंग का यह पहला राजद्रोह का केस था। इसके कारण देश-भर मे आपके प्रति सहानुभूति उत्पन्न हुई। इस मुकदमे को लड़ने के लिए कलकत्ता से दो उच्चकोटि के वकील बुलाये गये इनका सारा व्यय जनता ने ही दिया। स्थान-स्थान पर प्रदर्शन हुएं, जुलूस निकले, सभाएं हुईं। सरकार पर दबाव डाला गया कि बाल गंगाधर तिलक निर्दोष है। तिलक के जन मित्र प्रोफेसर मक्समूलर ने महारानी विक्टोरिया तक से अपील की। लोगों ने उनकी मुक्ति के लिए दिन-रात एक कर दिया। अंत में केवल एक वर्ष की सजा भुगतने के बाद ही आपको छोड़ दिया गया। जब लोकमान्य घर पहुंचे तो जनता अपने प्रिय नेता के दर्शनों के लिए मचल उठी। सरकार को राजद्रोह के कानून की भाषा में सुधार करना पड़ा। इस केस ने सरकार के प्रति लोगों के हृदयों मे सचमुच अनादर पैदा कर दिया और जनता के नेता और अधिक प्रभावशाली होने लग गये।

 

 

अब लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक एक सर्वमान्य नेता बन चुके थे। कांग्रेस मे भी उनका प्रभाव और सम्मान था। वे उसके चोटी के नेताओ में से एक थे। बाल, लाल, पाल की त्रिमूर्ति का नाम भारत के कोने-कोने में बड़े आदर से लिया जाता था। अभी तक कांग्रेस में सब ऐसे ही लोग थे जो सरकार की हां में हां मिलाकर चलना चाहते थे। वे वर्ष में एक बार बैठकर केवल सुधारो की भिक्षा माग लिया करते थे। उग्र राजनीतिक परिवर्तन और जनता के जागरण मे उनका विश्वास न था। अंग्रेज सरकार में उनका विश्वास था। वे उसे ही भारत की उन्नति के लिए आवश्यक समझते थे। इस प्रकार नरम नीति वालों का ही बोलबाला था। परंतु तिलक इस बात को पसंद नही करते थे। वे एक क्रांतिकारी विचारक थे। वे जनता मे अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध असंतोष और क्रोध पैदा करना चाहते थे। लार्ड कर्जन की कूटनीति के प्रति देश मे रोषपूर्ण प्रतिक्रिया की जो लहर उमड़ने लगी थी उससे कुछ के मन मे उग्र राजनीति की भावना भी जाग्रति पड़ी थी। ऐसे लोगो के लिए तिलक मानो एक स्वयंसिद्ध नेता प्रमाणित हुए। जब बंगाल को विभाजित करने का प्रयत्न लार्ड कर्जन ने किया तो समस्त देश में एक तूफान खडा हो गया। देश के राजनीतिक क्षेत्र मे जब कुछ सर्गर्मी उत्पन्न हुई तो बाल गंगाधर तिलक ने कांग्रेस के मंच पर उग्र या गरम दल का संगठन कर देश की इस एकमात्र राजनीतिक संस्था को कोरी वाद-विवाद समिति की स्थिति से ऊपर उठाकर मातृभूमि की वास्तविक मुक्तिवेदी में परिणत करने का प्रयत्न किया। इस आंदोलन मे भाग लेने वाले अधिकतर गरम दल के ही लोग थे। तिलक ने बंगाल से बाहर उत्तर और दक्षिण भारत मे इस आदोलन का नेतृत्व किया ! सन्‌ 1907 की सूरत कांग्रेस अधिवेशन में आंतरिक संघ ने ऐसा उग्र रूप धारण कर लिया कि अगले दस वर्षो के लिए उग्रदल को कांग्रेस से एकदम अलग हो जाना पड़ा।

 

 

बंगाल के स्वतंत्रता भिमुख तरुणों पर होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध ‘केसरी’ में आवाज उठाने पर फिर आप पर राजद्रोह का मामला चलाया गया। राजद्रोही घोषित कर छः वर्ष का काला पानी और एक हजार रुपये का दंड उनको दे दिया गया। इस दंड से सारे देश में क्रोध की एक लहर दौड़ गई। सरकार का विरोध किया गया। काले पानी का दंड बदलकर साधारण केद कर दिया गया। उन्हें कुछ दिन अहमदाबाद की जेल से रखा गया फिर बर्मा की मांडले जेल मे भेज दिया गया। जब आपको सजा का कठोर दंड सुनाया गया तब भी आपके मन मे घबराहट उत्पन्न नहीं हुई। उनके भव्य ललाट पर बल भी पड़ते न दिखाई दिए। उन्होंने केवल यही कहा–”यद्यपि जूरी ने मेरे खिलाफ राय दी है, फिर भी मैं निर्दोष हूँ। वस्तुतः मनुष्य की शक्ति से भी अधिक क्षमताशाली ‘देवी शक्ति है। वही प्रत्येक व्यक्ति और राष्ट्र के भविष्य की नियंत्रण कर्त्ता है। हो सकता है कि देव की यही इच्छा हो कि स्वतंत्र रहने के बजाय कारागार में रहकर कष्ट उठाने से ही मेरे अभीष्ट कार्य की सिद्धि में अधिक योग मिले !” उन्होंने एक बार कहा था–“साक्षात्‌ परमेश्वर भी यदि मोक्ष प्रदान करने लगें, तो भी मैं उसे कहूंगा, पहले मुझे मेरा देश पारतंत्र्य से मुक्त देखना है, क्योकि मोक्ष कितनी भी उच्चकोटि का क्यो न हो, है तो पराकोटि की स्वार्थ-साधना ही इसी प्रकार आपने घोषित किया या कि स्वतंत्रता तो मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। जब तक यह भाव मेरे हृदय में है, ,मुझे कौन लांघ सकता है! मेरी इन भावना को शस्त्र काट नही सकते, आग उसको भस्म नही कर सकती, पानी गला नही सकता और हवा उसको सुखा नहीं सकती। मेरी आत्मा अमर है। यह उनका एक अमर संदेश था जो भारत के एक-एक भारतीय की आत्मा को सर्प कर गया।

 

 

जेल में उनके लिए लकड़ी का एक बड़ा कटघरा-सा बनाया गया था,जों मनुष्य तो क्या पशुओं के भी रहने के योग्य न था। परंतु अपने देश-प्रेम के हेतु तपोपुंज लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने सब कुछ सहन करना स्वीकार किया और अपने जेल-जीवन के इन कष्ठदायी छः वर्षों का भी उन्होंने लोककल्याण के लिए ही उपयोग किया। इसी अवधि में लगभग पांच सौ ग्रंथो का गहन अध्ययन करने के बाद ‘कर्मयोग या गीता-रहस्य” नामक अपने उस अमर ग्रंथ की उन्होंने रचना की। आपके मतानुसार गीता, संसार के त्याग का, वैरागी बनने का उपदेश नहीं देती, अपितु एक प्रबल सैनिक बनकर संसार की बुराइयों से संघर्ष करने की आज्ञा देती है। उन्होंने कहा कि गीता का उद्देश्य मनुष्य को कर्म करना सिखलाता ही है, कर्म का त्याग करवाना नही। उन्होंने इस पुस्तक में ऐसा सुंदर अर्थ किया जैसा स्वामी शंकराचार्य को छोड़कर किसी ने नहीं किया था। निष्काम कर्मयोग के अमर सदेश के रूप मे उनकी यह पुस्तक मूल्यवान्‌ देन है।

 

 

सन्‌ 1914 में आप छ: वर्ष पश्चात्‌ जेल से मुक्त हुए। सारे महाराष्ट्र में उस दिन दीपावली मनाई गई। तब तक हमारे राजनीतिक आगन में जे जागरण का स्वर पर्याप्त ऊंचा उठ चुका था। महायुद्ध के कारण देश का वातावरण एक नया ही रूप धारण कर चुका था। उन्होंने श्रीमती एनीबेंसेंट के साथ ‘होमरूल आंदोलन मे जुटकर एक देशव्यापी दौरा किया। आपने अपने व्याख्यानों के द्वारा जनशक्ति का संगठन करना आरंभ किया। आपके ये भाषण क्या थे मानो उबलते हुए शोले थे जो लोगों के दिलों पर घाव कर देते थे। आपने जनता को उठ खड़े होने का संदेश दिया लोकमान्य ने उस समय जनता को चेताया जबकि सरकार के विरुद्ध बोलने की हिम्मत देश के बड़े से बड़े नेता भी नही करते थे। 23 अप्रैल, 1916 को स्व॒राज्य को मांग जोरों से करने के लिए होमरूल लीग की स्थापना की। इन्ही दिनों प्रसिद्ध लखनऊ अधिवेशन मे पूरे नौ वर्ष बाद वह फिर से कांग्रेस मे सम्मिलित हुए, जिससे कि देश के राजनीतिक वायुमंडल में पुनः एक सरगर्मी पैदा हो गई। उन्होंने प्रथम महासमर से उत्पन्न परिस्थिति से लाभ उठाने के लिए हिंदु-मुस्लिम ऐकता का लखनऊ में समझौता कराया। इस समय राष्ट्रीयता के सबसे महान नेता लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ही थे। लोग आपको अवतार और स्वतंत्रता का देवता मानकर, पूजते थे। गांधी जी के दक्षिण अफ्रीका से भारत आने पर भी लोग पथ-प्रदर्शन के लिए उन्ही की ओर टकटकी लगाए देखते थे।

 

 

जब महायुद्ध में सरकार की सहायता का मसला आया तो नरम दल के सभी नेता अंग्रेजों को पूरी सहायता देने के पक्ष मे थे। गांधी जी का कहना था कि विपत्ति के समय हमे शत्रु की भी पूरी सहायता करनी चाहिए। तिलक ने स्पष्ट कह दिया कि यदि कुछ ठोस अधिकार देने का वे वायदा करें तब तो अंग्रेजों को इस लडाई मे मदद देना सार्थक भी है। यदि अंग्रेज प्रजातंत्र के लिए लड़ रहे है, तो क्यो नही वे भारत मे प्रजातंत्र की स्थापना करते और हमे आजादी देते इस बात पर गांधी जी से उनका गहरा मतभेद हो गया। परंतु अंत में जब युद्ध समाप्त होने पर भारतीय युवकों की आहुति के बदले पंजाब के भीषण हत्याकांड और मार्शल ला का अनोखा पुरस्कार देश को मिला तो सबकी आंखें खुली और लोकमान्य के कथन का मर्म लोगों की समझ में आया।

 

 

इसी समय एक अंग्रेज़ सर चिरोल ने ‘भारतीय अशांति’ (अनरेस्ट इन इंडिया) नामक पुस्तक प्रकाशित करवायी । इसमे उन्होंने बाल गंगाधर तिलक को राजद्रोही लिखा। आपने सर चिरोल पर इंग्लैंड मे जाकर मान-हानि का दावा कर दिया। इस मुकदमे में लोकमान्य जीत नही सके, क्योकि भारत सरकार ने इंग्लेंड की सरकार पर दबाव डाला। उसने कहा कि यह अंग्रेज़ी राज्य की इज्जत का प्रश्न है। पर इस मुकदमे का एक लाभ यह हुआ कि तिलक ने ब्रिटिश न्याय के खोखलेपन का पर्दाफाश करने मे कोई कसर नही छोडी। उन्होने मुकदमे से मुक्त होकर शेष समय भारत की अवस्था पर भाषण देने मे लगाया। कांग्रेस की लंदन शाखा का भी आपने संगठन किया। जब आप इंग्लैंड में थे तभी आपको कांग्रेस के दिल्‍ली अधिवेशन का सभापति बनाया गया, पर आप देश नही लौट सके। आपके देश लौटते ही साठवी वर्षगांठ पर आपको एक लाख रुपये की थैली भेंट की गई। लोकमान्य ने यह सारा धन ‘होमरूल” आदोलन को देकर अपने देशप्रेम का अद्वितीय परिचय दिया।

 

 

बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु

 

सन्‌ 1919 में ऐतिहासिक अमृतसर का प्रसिद्ध कांग्रेस अधिवेशन हुआ। इसमे गांधी जी, मालवीय जी, मोतीलाल नेहरू तथा चितरंजन दास के साथ आप अंतिम बार काग्रेस के मंच पर बैठे। इस अवसर पर आपने गांधी जो के असहयोग आदोलन का घोर विरोध किया था। आपने कहा था, “स्वतंत्रता मांगने से नहीं मिलती, उसको छीना जाता है ।” उनका यही वाक्य बहुत प्रसिद्ध हुआ। इसी समय आपने “डिमोक्रेटिक स्वराज्य पार्टी’ की स्थापना कर चुनाव लड़ने का कार्यक्रम तैयार किया। थोड़े ही दिनो बाद आप बीमार पड़ गये और 31 जुलाई, 1920 की रात को आपने सदा के लिए आंखें मूंद ली। इस प्रकार भारतीय राजनीतिक गगन का यह सूर्य अस्त हो गया। उनका अंतिम संदेश यही था–“देश के लिए जिसने अपने जीवन को बलिदान कर दिया, मेरे हृदय मंदिर में उसी के लिए स्थान है। जिसके हृदय में माता की सेवा का भाव जाग्रत है, वही माता का सच्चा सपूत है। इस नश्वर शरीर का अब अंत होना ही चाहता है। है भारत माता के नेताओं और सपूतों ! मैं अंत में आप लोगों से यही चाहता हूं कि मेरे इस कार्य को उत्तरोत्तर बढ़ाना।” लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु का समाचार सुनकर गांधी जी ने शौक संदेश में कहा था—“मेरी ढाल छिन गई।” वस्तुतः पराधीनता की बेड़ियों को छिन्न-भिन्‍न करने वाले लोकमान्य तिलक इस राष्ट्र के प्रखर कर्णधार थे। लोकमान्य बाल गंगाधर का जीवन स्मरणीय था, परतंत्र भारत मे उनकी अंतिम यात्रा भी स्मरणीय थी। उनकी शवयात्रा में रोते, विलाप करते लगभग आठ लाख नर-वारी सम्मिलित थे। समाचार मिलते ही लाला लाजपतराय लाहौर से चल पड़े, किंतु बंबई तब पहुंचे जब लोकमान्य का पार्थिव शरीर दाह-संस्कार के लिए चिता पर रखा जा चुका था। वे सीधे स्टेशन से दाह-संस्कार के स्थान पर
पहुँचे। लालाजी के नेत्र भर आये, मुंह से कुछ न निकला। कुछ क्षणों तक मस्तक झुकाए खड़े रहे। केवल इतता कहा–“भारत में दहाड़ने वाला शेर चला गया।

 

 

उनकी अकल्पित मृत्यु पर भारतवर्ष मे ही नहीं, अपितु विदेशों में भी शोक सूचक सभाओं, व्याख्याओं और विभिन्‍न स्मारक प्रस्तावों के द्वारा जो आदर और श्रद्धा प्रकट हुई है उसका रहस्य उनकी आजीवन तपस्या है। उनके सीधे-सादे- सरल शब्दों और व्याख्यानों का प्रभाव कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक जादू की तरह होता था। वे स्वर्ग सिधार गये, पर उन्होंने जो पौधा खड़ा किया, वह मुरझाया नही, भावी पीढ़ी ने उसे पल्‍लवित किया। उन्होंने अपने जीवन की जो आहुति दी, उसी का परिणाम है कि आज देश स्वतंत्र है, और हम स्वराज्य का उपभोग कर रहे है। उनकी प्रशंसा में कतिपय नेताओं के विचार पठनीय हैं– “भारत का प्रेम लोकमान्य तिलक के जीवन का श्वासोच्छवास था। उनका धैर्य कभी कम न हुआ और निराशा उनको छू तक नहीं गई। उनके अलौकिक गुणों को धारण करना ही उनका स्मारक है।

 

 

होमरूल आंदोलन के द्वारा आपने जनता को जो जगाया उसका लाभ बाद मे गांधी जी ने उठाया। आपकी मृत्यु तक गांधी जी की बात सुनने को जनता तैयार नही हुईं। मृत्यु के पश्चात्‌ जनता की भावना स्वाभाविक रूप से ही गांधी जी की ओर झुक गयी।तिलक ने देश की जनता को उन आंदोलनो के लिए तैयार किया, जिनको उनके बाद गांधी जी ने चलाया। वस्तुतः स्वराज्य की नीव डालने वाले सर्वप्रथम महात्मा लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ही थे। आपने इस हेतु अपना सर्वस्व देश को अर्पित कर दिया था। देश को स्वतंत्र कराने में ही उनका सारा जीवन व्यतीत हुआ। आप एक जन्मजात स्वयं सिद्ध महापुरुष के रूप में लोक के सम्मुख आए ओर उसे चमत्कृत कर गए। यद्यपि वे महाराष्ट्र के थे और पूना में उनका निवास स्थान था तथापि भारत ही उनके मस्तिष्क और विचारों में सर्वोपरि था। वे महाराष्ट्र के उन संतों में से एक थे, जो संपूर्ण भारत के विषय में चितन-मनन करते थे। वह जनसेवा में त्रिकालदर्शी, स्वव्यापी परमात्मा को झलक देखते थे। “तिलक का ऐसा ही उदार दृष्टिकोण था। यह अखिल भारतीय था। यह उनमें बचपन से ही था जब बंगाल उठा तो वे बंगाल की सहायता के लिए दौड़े। उन्होंने महाराष्ट्र को बंगाल का साथ देने के लिए तैयार किया। जब बंगाल मैदान में कूद पड़ा है, तो हमें उसका साथ देना चाहिए। जो उसकी मुसीबत है, वह हमारी मुसीबत है। वे इसी प्रकार सोचते थे। इसी देशभक्ति के कारण, समग्र भारत को अपनी मातृभूमि समझने के इसी विशाल दृष्टिकोण और सर्वव्यापी देश भक्ति के कारण ही बाल गंगाधर तिलक केवल पूना के निवासी होते हुए भी, भारत माता की आत्मा बन गये थे।” इस प्रकार उनका जीवन पवित्र और देवोपम था। देश वासियों ने भी उनका आदर लोकमान्य की भांति नही, अपितु तिलक भगवान की भांति किया।

 

 

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