बड़ौदा रियासत का इतिहास – Baroda state history in hindi

बड़ौदा रियासत

जिस समय मुगल साम्राज्य का सितारा अस्ताचल की ओर जा रहा था, उस समय महाराष्ट्र में एक नई शक्ति का उदय हो रहा था, जिसकी ज्योति से सारे हिन्दु- भारत का हृदय ज्वल्यमान हो उठा था। बड़ौदा रियासत के गायकवाड़ इस शक्ति के एक प्रकाशमान रत्न थे। मरहठा साम्राज्य में खण्डेराव दाभाड़े नामक एक अत्यन्त वीर और प्रतिभाशाली महानुभाव हो गये हैं, इन्होंने मुगलों के साथ अनेक युद्ध कर आपने वीरता का अदुूभुत प्रकाश किया था, आपके इन्हीं पराक्रमों के कारण सतारा के राजा ने आपको सेनापति के उत्तरदायित्व पूर्ण पद पर बैठाया था। यह घटना ई० सन 1716 की है जब कि आप सातारा में रहते थे। दामाजी गायकवाड़ आपकी अधीनता में एक उच्च पद पर अधिष्ठित थे।कहने की आवश्यकता नहीं कि दामाजी बड़े वीर और प्रतिभा शाली महानुभाव थे। आपने अनेक युद्धों में अपूर्व वीरता का प्रकाश कर ख्याति प्राप्त की थी। आप अपने वीरत्वपूर्ण कार्यो के कारण शमशेर बहादुर की उच्च उपाधि से विभूषित किये गये थे।

 

बड़ौदा रियासत का इतिहास

 

सन्‌ 1751 में वीरवर दामाजी का स्वर्गवास हो गया और आप
के बाद आपके भतीजे पिलाजी गायकवाड़ उत्तराधिकारी हुए। आप ही बड़ौदा रियासत के आधुनिक राजवंशक जन्मदाता हैं। सेनापति महोदय ने गुजरात से खिराज (कर या मालगुजारी) वसूल करने का काम आपके कंधों पर लिया। यहाँ यह कहना आवश्यक है कि सेनापति को खिराज-वसूली का अधिकार सातारा के राजा की ओर से प्राप्त हुआ था। वीरवर पिलाजी ने सोनगढ़ में अपना खास मुकाम रखा था और वे वहां सन्‌ 1766 तक रहे इसके बाद पाटन गुजरात प्रान्त की राजधानी हुई। पिलाजी के साथ साथ कान्ताजी कदम और सदाजीराव पवार नामक दो मराठे सरदारों को उक्त गुजरात प्रान्त में खिराज वसूली का काम दिया गया था। कुछ समय तक ये तीनों वीर महाराष्ट्र नेता मिल जुल कर काम करते रहे ओर उन्होंने सूरत के 28 जिलों पर जिसे अट्टाविशी कहते हैं खिराज लगाई। सन्‌ 1723 में वीर पिलाजी ने सूरत पर कूंच किया ओर वहाँ के शासक को शिकस्त दी। उस समय से पिलाजी अव्याहत रूप से खिराज वसूली करने लगे। इसी बीच में आपका और उपरोक्त दो मराठे सरदारों का मतभेद हो गया और तब से यह व्यवस्था हुई कि मही के दक्षिण के जिलों में पिलाजी खिराज वसूल करें और उत्तर में कान्ता जी कदम। यहाँ यह न भूलना चाहिये कि उस समय पिलाजी को बड़ौदा, नादौड, चम्पानर, बरौच और सूरत के जिलों से खिराज वसूल करने का अधिकार प्राप्त हुआ था।

 

 

पेशवा बाजीराव और सेनापति के बीच हमेशा से अनबन चली
आती थी। हम ऊपर कह चुक है, कि पिलाजी सेनापति पक्ष में थे।
सन्‌ 1727 मे पेशवा ने गुजरात के नव-नियुक्त मुगल वायसराय सर बुलन्द खाँ से गुजरात मे चौथ और सरदेशमुखी प्राप्त करने का इस शर्त पर अधिकार प्राप्त कर लिया कि व उस पिलाजी के खिलाफ सहायता करे। उसी साल पिलाजी न बड़ौदा और डभोई पर अधिकार कर लिया। सन्‌ 1730 में खर बुलन्द खाँ वापस बुला लिया गया और उसके स्थान पर जोधपुर के महाराजा अभयसिंह जी गुजरात के वायसराय के पद पर अधिष्टित हुए। बाजीराव ने राजा अभयसिह जी से मेल जोल कर सेनापति को गुजरात से निकालने का विचार किया और उसका परिणाम यह हुआ कि सन 1731 में डभोई के पास भीलपुर नामक स्थान पर युद्ध हुआ। उसमें सेनापति की हार हुई ओर वे मार डाले गये। उस समय बाजीराव ने अन्य मराठा सरदारों को कुचलना अपनी सभ्यता के और संस्कृति के खिलाफ समझा,और इससे उन्होंने सेनापति के नाबालिग पुत्र यशवन्तराव दाभाड़े को अपने पिता के पद पर नियुक्त कर दिया ओर पिलाजी को उनका डेप्यूटी बना दिया। उस समय पिलाजी बडे शक्तिशाली हो गये और उन्‍हें सेनापति की तरह बहुत से साधन उपलब्ध हो गये, पर दुःख है कि वीरवर पिलाजी इस पद को अधिक दिन तक न भोग सके। सन्‌ 1732 में महाराजा अभयसिंह जी के आदमियों द्वारा डाकोर मुकाम पर वे मार डाले गये।

 

 

पिलाजी के बाद उनका पुत्र दामाजी उत्तराधिकारी हुए। पिलाजी की मृत्यु के कारण उसी समय राज्य में जो अव्यवस्था और गड़बड़ फेल गई थी उसका फायदा उठाकर राजा अभयसिंह जी ने बड़ौदा रियासत पर अधिकार कर लिया। दामाजी डभोई लौट आये। यहाँ से उन्होंन अपने दुश्मन से बदला लेना चाहा और इन्होंने अहमदाबाद पर चढ़ाई कर दी। इन्हें कुछ सफलता मिली, और इसका यह परिणाम हुआ कि बड़ौदा पर फिर से आपकी विजय-पताका उड़ने लगी। उस समय से बड़ौदा अव्याहत रूप से बड़ौदा राज्य सरकार की अधीनता में ही चला आ रहा था। दामाजी की शक्ति उसी समय से दिन दूनी और रात चोगुनी बढ़ने लगी ओर राजा अभयसिंह जी सन्‌ 1737 में गुजरात छोड़ने को बाध्य हुए। राजा अभयसिंह जी के स्थान पर मोमीन खाँ गुजरात का वायसराय नियुक्त हुआ मोमीन खाँ दामाजी की शक्ति से परिचित था, और उस यह भी मालूम था कि दामा जी से लोहा लेना टेढ़ी खीर हैं। अतएव उसने अपनी स्थिति कायम रखने के लिय उनसे मित्रता कर ली और इन्हें उक्त प्रान्त की आधी आमदनी प्रदान कर दी।

 

Baroda state history in hindi

 

जब स्वर्गीय सेनापति के पुत्र बाल सेनापति योग्य उम्र पर पहुँचे
तब भी उनमें शासन करने की क्षमता दिखलाई नहीं दी। सन्‌ 1747में स्वर्गीय सेनापति की विधवा का भी देहान्त हो गया। अएतव गुजरात में दामाजी राव ही सातारा राज्य के प्रतिनिधि के सम्माननीय पद पर नियुक्त किये गये। सन्‌ 1742 में मोमीन खाँ इस संसार से कूच कर गया, उसके लड़के फिदाउद्दीन ने अपने बाप की नीति को भूल कर दामाजी का विरोध करना शुरू किया। वह दामाजी के सेनापति रंगाजी से भिड पड़ा। और उसने उन्हे हरा दिया। उस समय दामाजी मालवे की महाराष्ट्र विजय में अपना हाथ बटा रहे थे। ज्यों ही उन्हें इस घटना का समाचार पहुँचा त्योंही गुजरात लौट गये, और उन्होंने फिदाउद्दीन पर हमला कर उसे बुरी तरह शिकस्त दी। इतना ही नहीं उन्होंने उसे गुजरात से निकाल भी दिया। उस समय से आप गुजरात के एकाधिकारी स्वामी हो गये।

 

 

सन्‌ 1749 में सातारा के राजा शाहूजी का देहान्त हो गया, और
महाराष्ट्र साम्राज्य की वास्तविक शक्ति पेशवा के हाथ में चली गई। पेशवा की इस राज्य हड़प करने की नीति के खिलाफ दामाजी शुरू ही से थे ओर इसीलिये सन्‌ 1751 में राजाराम की विधवा रानी ताराबाई ने उन्हे निमन्त्रित कर उनसे ब्राह्मणों के पंजे से मराठा साम्राज्य की रक्षा करने का अनुरोध किया। उन्होंने इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया, और 15 हज़ार फौज के साथ उन्होंने पेशवा पर चढ़ाई कर दी। निम्ब मुकाम पर विरोधी सेना से उनका मुकाबला हुआ ओर उन्होंने उसे पूरी तरह से हरा दिया। पर दुर्भाग्य से यह विजय स्थायी न हो सकी। शीघ्र ही ऐसे चिन्ह प्रगट होने लगे कि पेशवा की फौज पिलाजी की फौज को घेर कर उसका नाश कर देगी। इससे पीलाजी पेशवा से सुलह करने में बाध्य हुए, ओर इन्हें पेशवा को गुजरात का आधा मुल्क देना पडा। इसके दो वर्ष बाद दामाजी ने पेशवा की फौज की सहायता से अहमदाबाद पर घेरा डाल कर उस पर अधिकार कर लिया। उस समय मुग़ल साम्राज्य का एक प्रकार से अंत हो चुका था। परिणाम “स्वरूप गुजरात को पशवा और गायकवाड़ ने आपस में बांद लिया।

 

बड़ौदा रियासत
बड़ौदा रियासत

 

इतिहास में उलट फेर कर देने वाले, पानीपत के घनघोर संग्राम में
दामाजी ने बड़े वीरत्व का परिचय दिया था। पर उस समय भाग्य देवता मराठों के अनुकूल न थे। महाराष्ट्र सेनापति भाऊ साहेब की गलती से कहिये या कुछ अन्य कारणों से कहिये, इस युद्ध में मराठों की हार हुई, और उनकी फौजों का भयंकर नुकसान हुआ।महाराष्ट्र सेना के बड़े बड़े साधक मारे गये। उस समय दामाजी गायकवाड़ गुजरात लौटने में समर्थ हुए। लौटते ही आपने कमामुद्दीन से काड़ी परगना विजय कर लिया। उसी समय आपने सोनगढ़़ से बदल कर पाटन को अपनी राजधानी बना लिया। सन 1768 में दामाजी राव का स्वर्गवास हो गया। दामाजी के छः पुत्र थे, इनमें गद्दी के हक के लिये झगड़ा होने लगा। दामाजी के प्रथम पुत्र सयाजी राव व द्वितीय पुत्र गोविन्दराव थे। दोनों ही गद्दी के अधिकार के लिये उत्सुक थे। दोनों में इस अधिकार के सम्बन्ध में किसी प्रकार का समझौता न होने के कारण पेशवा पर इसके निर्णय का भार रखा गया। पेशवा ने एक बड़ी रकम लेकर के गोविन्दराव के पक्ष में अपना फेसला दिया। जब यह बात दामाजी के तीसरे पुत्र फतहराव को मालूम हुई तो वे पूना के महाराष्ट्र दरबार में उपस्थित हुए और उन्होंने पेशवा की उक्त आज्ञा को रद करवा दिया। इससे सयाजीराव ( सेना खास खेल ) के रूप में घोषित किये गये, और फतहसिह उनका डेप्यूटी मुकर्र किया गया। यहाँ यह कहना आवश्यक है कि सयाजी राव कमजोर तबियत के होने से राज्य करने में असक्षम थे।

 

 

फतहसिंह राव ने यह सोच कर कि कहीं भाइयों के आपसी झगड़े
और अव्यवस्थित स्थिति का फायदा उठाकर पूना के पेशवा सरकार गुजरात पर अपना पूरा अधिकार न कर ले, उन्होंने अंग्रेजों से मित्रता करने का विचार किया पर उन्होंने फतहसिंह के सुलह के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। इससे गद्दी के हकदारों में बराबर 8 वर्ष तक झगड़ा चलता रहा। अन्त में सन्‌ 1778 में फतहसिंह राव सफलीभूत हुए, और वे सेना खास खेल” की उपाधि से विभूषित किये गये। गोविन्दराव को दो लाख रुपया वार्षिक आमदनी की जागीर दे दी गई। सयाजीराव भी उस समय जिन्दा थे।

 

 

सन्‌ 1779 में जब अंग्रेज ओर पूना की पेशवा सरकार में युद्ध
छिड़ा तब फतहसिंह राव ने अंग्रेजों का पक्ष ग्रहण किया। सन 1780 में जो संधि हुई उसमें यह तय हुआ कि गायकवाड़ पेशवा से स्वतन्त्र समझे जावें और वे गुजरात का हिस्सा अपने लिये रखे, ओर उस मुल्क पर जिस पर पहले पेशवा का अधिकार था अंग्रेज अपना अधिकार कर लें। पर इसके बाद सलबाई की जो सन्धि हुई उससे उक्त संधि रद्द हो गई। सन 1789 की दिसम्बर मास में फतहसिह राव का स्वर्गवास हो गया और गोविन्दराव के प्रतिवाद करने पर भी उनके छोटे भाई मानाजीराव ने राज्य का संचालन अपने हाथ में ले लिया। सिंधिया ने गोबिंदराव के पक्ष का समर्थन किया, पर यह झगड़ा मानाजी राव की मृत्यु तक अर्थात सन 1793 तक बराबर चलता रहा।

 

 

इसके बाद गाविन्दराव को राज्याधिकार प्राप्त हुए ओर वे सेना खास खेल’ शमशेर बहादुर की उपाधि से विभूषित किये गये, पर इसके बदले में उन्हें पेशवा को एक भारी नज़र देनी पड़ी। महाराज गाविन्दराव के शासन में उनके पुत्र कुंभोजी और भतीजे मल्हारराव ने बलवे का झगड़ा उठाया पर वे शान्त कर दिये गये। गोविन्दराव महाराज के राजय-काल में पेशवा की ओर से शेलूकर नामक व्यक्ति गुजरात का कर वसूल करने के कार्य पर नियुक्त था । इसने गायकवाड़ सरकार के गाँवों से भी कर वसूल करना शुरू कर दिया, और अहमदाबाद में जो गायकवाड़ सरकार की हवेली थी उस पर अपना अधिकार कर लिया। इस कारण गायकवाड़ सरकार और उसके बीच अनबन हो गई। अन्त में गायकवाड़ सरकार और शलूकर के बीच एक लड़ाई हुई जिसमें शेलूकर हार गया।

 

 

सन्‌ 1800 में महाराज गोविन्दराव का देहान्त हो गया ओर आपके बाद आपके पुत्र अनन्दराव गद्दी पर बैठे। ये बड़े ही कमजोर तबीयत के आदमी थे। अतएव स्वर्गीय महाराजा के दासीपुत्र कंभोजी ने इनके खिलाफ बलबे का झंडा उठाया, आन्दराव और कंभोजी दोनों ने ब्रिटिश गवर्मेन्ट से सहायता मांगी। खूब सोच विचार कर ब्रिटिश सरकार ने आनन्दरा को सहायता देना स्वीकार किया। सन 1802 के जुलाई मास में अंग्रेज सरकार और महाराज गायकवाड़ के बीच एक सन्धि हुई जिसमें बड़ौदा रियासत का बहुत सा हिस्सा अंग्रेज सरकार के हाथ चला गया।

 

 

हम ऊपर कह चुके हैं कि आनन्दराव बढ़े कमजोर दिल के शासक
थे। अतएव सन 1802 से 1818 तक एक कमीशन के द्वारा बड़ौदा राज्य कार्य संचालित किया गया। इस कमीशन के अध्यक्ष रसिडेन्ट थे। कमीशन ने बहुत से उत्पाती अरबों को राज्य से बाहर निकाल दिया। वे अरब किराये के टट्टू थे। जो उन्‍हें पेसा देता उन्ही के पक्ष में लड़ने को मौजूद हो जाते थे। इन्हीं अरबों की सहायता से कंभोजी ने एक समय अनन्दराव को कैद कर लिया था। जब इन अरबों से कहा गया कि ये बड़ौदा रियासत छोड कर चले जाये तो उन्होंने जान से इन्कार किया और कहा कि हमें जब तक चढी हुई तन्खवाह नहीं मिलेगी तब तक हम नहीं जा सकते इनकी तमाम तन्खवाह चुका दी गई और ये बड़ौदा रियासत छोडने के लिए मजबूर किये गये। इसके अतिरिक्त महाराजा आनन्दराव के शासन में कोई महत्वपूर्ण घटना नहीं हुई, जिसका यहाँ उल्लेख किया जा सके। हाँ, इतना कह देना आवश्यक होगा। कि मराठा और पिंडारियों के खिलाफ युद्धों में बड़ौदा राज्य ने भारत सरकार को सहायता दी।

 

 

महाराजा अनन्दराव के पश्चात महाराजा सयाजीराव (प्रथम) बड़ौदा रियासत की गद्दी पर आसीन हुए। आपने सन 1820 से 1847 तक राज्य किया। आपके शासन में आपके और अंग्रेज सरकार के बीच दिल-सफाई न रही। आपके पश्चात्‌ महाराजा गणपतराव गद्दीनशीन हुए। आपके समय में बड़ौदा रियासत का कारोबार अंग्रेज-सरकार की विशेष निगरानी में रहा। आपके पश्चात आपके भाई महाराज खण्डेराव सन 1856 में गायकवाड़़ की मसनद पर बैठे। आप एक सुयोग्य शासक थे। अपने शासन काल में आपने कई सुधार किये। सिपाही विद्रोह के समय आपने अंग्रेजी सरकार को खासी मदद दी।

 

 

आप बड़े हृष्ट-पुष्ट और शिकार के शौकीन थे। आपको कुश्ती का
बड़ा शौक था। आपकी शासन-पटुता से खुश होकर अंग्रेज सरकार ने आपको सन्‌ 1862 में दत्तक लेने की सनद प्रदान की थी। आपने 14 वर्ष तक बड़ी योग्यता के साथ अपने राज्य का शासन किया। सन 1870 में आपकी मृत्यु हो गई। आपको कोई पुत्र न था, किन्तु उस समय आपकी रानी जमनाबाई गर्भवती थीं। अतएवं आपके कनिष्ट भ्राता महाराजा मल्हारराव इस शत पर आपके उत्तराधिकारी बनाये गये कि यदि जमनाबाई के गर्भ से पुत्र उत्पन्न हुआ तो वही गद्दी का हकदार होगा। अन्ततः जमनाबाई के गर्भ से एक कन्या उत्पन्न हुई, जिसका नाम ताराबाई रखा गया। इससे महाराजा मल्हारराव बड़ौदा राज्य की गद्दी के उत्तराधिकारी घोषित किये गये।

 

 

महाराजा मल्हारराव बड़ी नादान प्रकृति के नरेश थे। कहा जाता
है कि सन 1863 में इन्होने अपने भ्राता महाराजा खण्डेराव पर भी विष-प्रयोग करने का प्रयत्न किया था। इसी आरोप के कारण आप कुछ दिनों तक नजरकैद भी रहे थे। शासन की बागडौर हाथों में आते ही इन्होंने मनमाने कार्य शुरू कर दिये। इतना ही नहीं, इन्होंने अपने राज्य के लोगों की बहु-बेटियों पर भी कुदृष्टि डालना शुरू कर दिया। इनके केवल पाँच ही वर्ष के शासन से प्रजा में बेचैनी फेल गई। इनके कुशासन से वह बहुत घबरा उठी। उसने इनके खिलाफ सैकड़ों अर्जियाँ अंग्रेज-सरकार के पास भेजना शुरू कर दी। अन्त में अंग्रेज-सरकार की ओर से एक कमीशन द्वारा इनके कार्यों की जाँच की गई और उन्हें 18 मास में अपना शासन सुधारने का अवसर दिया गया। इस चैतावनी का महाराजा पर कुछ भी असर न हुआ। इसी समय इन्होंने लक्ष्मीबाई नामक एक स्त्री के साथ अपना विवाह-संबंध स्थापित कर लिया। विवाह के 8 ही मास पश्चात इस स्त्री के गर्भ से एक पुत्र उत्पन्न हुआ। जिसके लिये महाराज ने शानदार उत्सव मनाया। यहाँ यह कह देना उचित मालूम होता है कि इनमें और बड़ौदा रियासत के तत्कालीन रेसिडेंट में आपस में न बनती थी। इन्होंने कुछ ही दिन पहले उनके खिलाफ एक खरीता भी भेजा था। इस उत्सव में सम्मिलित होने के लिये महाराजा ने रेसिडेन्ट साहब को निमन्त्रित किया, किन्तु वे न आये। उस समय रेसिडेन्ट के पद पर कर्नल फेर थे।

 

 

इसके पश्चात् महाराजा पर रेसिडेन्ट पर विष-प्रयोग करने का आरोप रखा गया। रेसिडन्ट ने इस घटना की सूचना अंग्रेज सरकार को भी दे दी। इस सनसनी फेलाने वाले समाचार से चारों ओर खलबली मच गई और अंग्रेज सरकार ने इसकी जाँच करने के लिये एक कमीशन नियुक्त किया। इस कमीशन में 6 सदस्य नियुक्त किये गये, जिनमें 3 अँग्रेज और 3 हिन्दुस्तानी थे।हिदुस्तानी सदस्यों में महाराजा जयाजीराव सिंधिया, जयपुर के सहाराजा सवाई रामसिंह जी और रावराजा सर दिनकरराव जी थे। यद्यपि महाराजा मल्हारराव एक प्रजाप्रिय नरेश न थे, तथापि जनता और हिन्दुस्तान के अन्य सम्भ्रान्त व्यक्तियों ने उनके प्रति पूरी हमदर्दी प्रकट की। कमीशन के सामने इनकी खुली तौर पर जाँच हुई। बाइस दिन तक इनका केस चला। इसमें महाराजा की ओर से इंग्लैण्ड के सुप्रसिद्ध बेरिस्टर सारजन्ट बेलेन्टाइन आये थे। इन्होन महाराजा का खूब बचाव किया। बम्बई के सालिसिटरों ओर अन्य दूसर वकीलों ने भी मि० वेलेन्टाइन की सहायता की। सन् 1875 की 23 वीं फरवरी को बड़ौदा रेसिडेन्सी के एक विशाल भवन में यह जाँच शुरू हुई। जाँच के कार्य मे सर दिनकर राव जी ने बड़ी कार्यदक्षता दिखलाई। महाराजा जयाजीराव सिंधिया और सवाई रामसिंह जी ने भी बड़ी दिलचस्पी के साथ कार्य किया। जाँच पूरी हो जाने पर हर एक सदस्य ने अपनी राय अंग्रेज सरकार को लिख भेजी। इसमें तीन यूरोपियन सदस्यों ने महाराजा को गुनहगार ठहराया, किन्तु बाकी के तीन प्रभावशाली देशी-राज्य-सदस्थों ने उन्हें निर्दोषी माना। जब यह मामला अंग्रेज के तत्कालीन बाइसराय लॉड नॉथब्रूक के पास पहुँचा तब वे भिन्न भिन्न रायों को देखकर बड़े असमंजस सें पड़ गये। व इस कमीशन की जाँच के अधार पर महाराजा के ऊपर किसी तरह का आरोप न रख सके। आखिर में उन्होंने कुशासन का आरोप लगाकर महाराजा मल्हारराव को पदमुक्त कर देने के लिये इंग्लेण्ड की सरकार को लिख भेजा। तदसुसार स्वीकृति मिल जाने पर महाराजा मल्हारराव इस राज्य की गद्दी से अलग कर दिये गये।

 

 

इसके पश्चात् राज्य के उत्तराधिकारी चुनने का प्रयत्न शुरू हुआ और स्वर्गीय नरेश महाराजा खण्डेराव जो की विधवा रानी जमनाबाई को पुत्र गोद लेने का अधिकार दिया गया। योग्य पुत्र की खोज़ होने लगी। आखिर में बड़ौदा रियासत राज्यवंश के पूर्व पुरुष पिलाजी के तीसरे पुत्र प्रतापराव के खानदान के काशीराव के पुत्र गोपालराव इस महान पद के लिए चुन गये। यही भाग्य शाली गोपालराव महाराजा श्री सर सयाजीराव गायकवाड़ है। जब इनकी गद्दीनशीनी का मुहूर्त निश्चित हुआ था, उस समय इनकी अवस्था केवल 12 वर्ष की थी। आप सन् 1875 से बड़ौदा रियासत के सिंहासन पर विराजे। आपका नाबालिग अवस्था मे सुप्रख्यात राजनीतिज्ञ सर टी० माधवराव राज्यसूत्र का संचालन करते थे। इस समय आप बड़ौदा रियासत के दीवान थे।

 

 

श्रीमान सयाजीराव को प्रथम श्रेणी की शिक्षा दी गई। राज्यशासन की भी आपको ऊंची तालीम दी गई। सन् 1881 में श्रीमान का अंग्रेज सरकार ने बम्बई के तत्कालीन गवर्नर सर जेम्स फम्यूसन के द्वारा पूर्ण राज्याधिकार प्रदान किये। सन 1877 की 1 जनवरी को महारानी विक्टोरिया के भारत वर्ष की सम्राज्ञा पद धारण करने के उपलक्ष्य में दिल्ली में जो दरबार हुआ था, उसमे श्रीमान भी पधारे थे। इस समय आपको ‘फर्जन्द-ए-खास दौलत इग्लिशिया की उपाधि मिली।

 

 

सन्‌ 1880 में तंजौर की राज्यकन्या के साथ आपका शुभ विवाह हुआ। इनसे आपको एक कन्या ओर एक पुत्र युवराज फतहसिह राव का जन्म हुआ। दु;ख है कि इन होनहार युवराज फतहसिह राव का सन्‌ 1909 मे देहान्त ही गया। इस समय आप बिलकुल युवावस्था में थे। आप बड़े होनहार थे। स्वर्गीय राजकुमार फतह सिंह राव अपने पीछे दो कन्या ओर एक पुत्र जिनका नाम श्रीमन्त महाराज कुमार प्रताप सिंह राव है छोड गये। कहने की आवश्यकता नहीं कि यहाँ महाराज कुमार श्रीमन्त प्रताप सिंह राव बड़ौदा रियासत के भावी राज्याधिकारी हुए। पहली महारानी साहबा का स्वर्गवास हो। जाने के कारण इस्वी सन 1886 में श्रीमंत महाराजा सयाजीराव ने देवास की धाटे कुटुम्ब की कन्या चिमनाबाई के साथ अपना दूसरा विवाह किया। आपके सब से बड़े पुत्र जयसिंहराव शिक्षा-प्राप्ति के लिये इंग्लैंड भेजे गए । वहाँ आप शिक्षा-सम्बधी कई उपाधियां प्राप्त कर स्वदेश पधारे। श्रीमान्‌ के दूसरे पुत्र महाराज़ कुमार शिवाजीराव ने भी ऑक्सफोर्ड विश्विद्यालय मे शिक्षा प्राप्त की और वहाँ अपनी असाधारण प्रतिभा का परिचय दिया। पर क्रूर काल ने आपको इस संसार में अधिक दिनों तक नहीं रहने दिया। सन 1919 में आप इन्फुएन्जा की बीमारी से स्वर्गवासी हो गये। श्रीमान के सब से छोटे पुत्र महाराज कुमार धैर्यशीलराव ने भी इग्लैण्ड में शिक्षा प्राप्त की और आप आरतीय सेना में एक ऊंच पद पर रहे। श्रीमान की कन्या श्री इन्दिरा राजा कूच-बिहार के महाराजा से ब्याही गई थीं। दुःख की बात है कि आपके पति का असमय ही मे स्वर्गवास हो गया।

 

 

श्रीमान महाराजा साहब ने अपनी महारानी साहबा के साथ सन
1887 में पहले पहल युरोप की यात्रा की। इटली, स्विट्ज्वरलेड, फ्रान्स, आदि की कई मास तक सैर कर आप इलैण्ड पधारे। वहाँ आप विंडसर केंसल में श्रीमती सम्राज्ञी विक्टोरिया के मेहमान रहे । श्रीमती आपकी मुलाकात से बहुत प्रसन्न हुई और वहीं आपको जी० सी० एस० आई० की उपाधि मिली। इसके बाद राज्य कारोबार में विशेष संलग्न रहने के कारण श्रीमान का स्वास्थ्य बिगढ़ गया और सन 1888 में स्वास्थ्य-प्राप्ति के लिए श्रीमान्‌ को सुन्दर स्विट्जरलैंड की दूसरी यात्रा करनी पड़ी। इससे आपके
स्वास्थ्य में सार्क की उन्नति हुई। सन 1892, 1895, 1900 और
1905 में श्रीमान ने फिर विलायत की यांत्रांए की। इन यात्राओं में भी श्रीमती महारानी साहिबा श्रीमान के साथ थी। सन्‌ 1992 की यात्रा में श्रीमती सम्राज्ञी विक्टोरिया ने उक्त महारानी साहिबा को “इम्पीरियल ऑडर ऑफ दी क्रौन ऑफ इन्डिया की उपाधि से विभूषित किया।

 

 

सन्‌ 1910 में अस्वास्थ्य के कारण फिर महाराजा साहब को विलायत की यात्रा की आवश्यकता प्रतीत हुई और 30 मार्च को आप श्रीमती महारानी साहिबा और राजकुमारी इन्दिरा राजा सहित विलायत के लिये रवाना हो गये। अबकी बार आपने कई एशियाई मुल्कों की भी सैर की। कोलम्बो, पोनांग, हाँगकाँग, केन्टन, शंघाई, नगासाकी, कांब, योकीहामा, क्योटो, टोकियो आदि स्थानों मे सरकार के उच्च अधिकारियों ने श्रीमान का स्वागत किया। इसी सफर में श्रीमान अमेरिका के सेनफ्रांसिस्को नगर पधारे। अमेरिका के कई दर्शनीय स्थानों को देखते हुए श्रीमान न्यूयार्क तशरीफ ले गये और वहाँ से लंदन के लिये रवाना हो गये। लंदन के मॉर्लबेरों हाउस में श्रीमान का सम्राट्‌ और सम्राज्ञी ने स्वागत किया। इस वक्त आप ब्रिटिश साम्राज्य के कई सुप्रख्यात मुत्सद्दियो से भी मिले, पर अस्वास्थ्य के कारण इस वक्त श्रीमान ने शान्त जीवन व्यतीत करता ही उचित समझा।

 

 

इसके दूसरे ही वर्ष श्रीमान सयाजीराव फिर विलायत पधारे और
वहाँ आप तत्कालीन अंग्रेज सम्राट के राज्याभिषेक के उत्सव में शामिल हुए। यह घटना सन 1911 की है। इस साल आप दिल्‍ली दरबार मे पधारने के लिए भारत वर्ष का रवाना हो गये। सन 1913 और 1914 में अस्वास्थ्य के कारण श्रीमान को फिर विलायत की यात्रा करना पड़ी। चार बार की विलायत की इन यात्राओं में श्रीमान ने बड़ी सुक्ष्मता से वहाँ की राजनितिक, आर्थिक और सामाजिक स्थिति का अध्ययन किया। वहाँ की विविध संस्थाओं पर श्रीमान ने बड़ी गम्मीरता से विचार किया। आपने इन यात्राओं में इस बात का भी ध्यान मे रखा कि यहाँ के कौन कौन से उन्नतिप्रद तत्वों का अपने राज्य में उसके विकास के लिए उपयोग किया जाये।

 

 

सन् 1909 में भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड मिन्टों बड़ौदा रियासत पधारे, जिनका श्रीमान बड़ौदा नरेश ने अच्छा स्वागत किया। सन् 1919 में लार्ड चेम्सफोर्ड भी बड़ौदा रियासत पधारे थे। आपका भी बड़ी घूमधाम से स्वागत हुआ था। सन 1923 में श्रीमान्‌ फिर विलायत पधारें। अबकी बार भी आपने फ्रान्स, स्विट्जरलैंड आदि कई देशों की सैर की थी। इस समय आपको पुत्र-वियोग की कठिन यन्त्रणा सहनी पड़ी। श्रीमान जब विलायत से लौट कर बम्बई उतरे, तब हिन्दू सभा ने आपको अभिनंदन-पत्र भेंट किया जिसका श्रीमान ने समुचित उत्तर दिया था।

 

 

बड़ौदा रियासत की शासन व्यवस्था

 

बड़ौदा रियासत का विस्तार 8182 मील था। सन् 1911 में
बड़ौदा रियासत की जंनसंख्या 2032798 थी। इनमें 1696146 हिन्दू और 160136 मुसलमान 43492 जैन, 8955 पारसी 7293 ईसाई और 11541 अन्य मतावलम्बी थे।

बड़ौदा रियासत में सबसे बड़े आफिसर दीवान कहलाते थे। महाराजा बड़ौदा दीवानो के चुनाव में बड़े विचार से काम लेते थे। आपकी हमेशा यह अभिलाषा रहती है कि अच्छे से अच्छा और योग्य से योग्य दीवान मिले। आप ऐसा दीवान चुनते थे जो तन-मन से प्रजा के विकास का अभिलाषी हो। इस चुनाव में आपको जाति पाति का कुछ खयाल नहीं रहता है, केवल योग्यता या कारगुजारी का। यही कारण है कि सर साधवराव, सर रमेश चन्द्रदत्त, मि० बो० पी माधवराव जैसे विख्यात पुरुष बड़ौदा राज्य के दीवान रह चुके हैं।

 

 

दीवान की सहायता करने के लिये जाइन्ट रेवेन्यू मीनिस्टर, डेप्युटी
मिनिस्टर रहते थे। इन्हें चीफ मिनिम्टर के थोड़े बहुत अधिकार रहते थे। बड़ौदा रियासत में लेजिस्लेटिव्ह कौन्सिल थी। इसमें राज्य के लिए नियम और कानून बनाये जाते थे। दीवान साहब इस कौन्सिल के अध्यक्ष रहते थे। इसमें चार एक्स ऑफिशियो सदस्य, छः सरकारी नामजद सदस्य, पाँच गैर सरकारी नामजद सदस्य और 10 लोकनियुक्त प्रतिनिधि रहते थे।

 

 

यहाँ के सब से ऊँचे न्यायालय को वरिष्ठ कोर्ट या हाईकोर्ट कहते थे। इसके अलावा यहाँ निम्न श्रेणी के और भी न्यायालय थे। तथा 5 डिस्ट्रिक्ट जज कोर्ट, 4 डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट कोर्ट, 24 साधारण मजिस्ट्रेट के कओर्ट, 26 रेवेन्यू मजिस्ट्रेट के कोर्ट और 3 ग्राम मुन्सफ के कोर्ट और 10 ग्राम्य पंचायतों के कोर्ट थे। इन ग्राम्य पंचायतों के कोर्ट को नियमित रूप से दीवानी और फौजदारी के अधिकार भी थे।

 

 

बड़ौदा रियासत में 93 तोपें 1500 सवार और 3182 पैदल फौज के जवान थे। अनियमित फौज (irregular troops) में 2000 घोड़े और 1806 पैदल सिपाही थे। बड़ौदा रियासत लगभग 140000 रूपये सैनिक खर्च के लिये व्यय करती थी। पुलिस में 1024 अफसर और 3938 साधारण कान्स्टेबल थे, इनमें 199 सवार भी थे।

 

 

श्रीमान बड़ौदा नरेश ने शासन के प्रत्येक विभाग को बड़ी ही उत्तमता से संगठित कर रखा था। वहाँ की सुव्यवस्था देखने योग्य थी। प्रत्येकविभाग के कार्य का समय समय पर खुद महाराजा साहब निरीक्षण करते। आपने कई विभांगों में अनुकरणीय सुधार किये। आपने लैण्ड रिवेन्यू सर्वे की नींव वेज्ञानिक ढाँचे पर डाली। आपने जमीन का नया बन्दोबस्त ( New settlement ) करवा कर जमीन की दरबारी (Tenure) नियमित कर दी है। पहले अलग अलग जमीन का अलग अलग जमा था। आपने यह पद्धति बदल कर जमीन के गुणानुसार उसकी दर एक सी कायम कर दी। कर वसूल करने की पद्धति में भी बहुत सुधार कर दिए थे। इससे सब किसानों को समान सुविधाए प्राप्त हो गई। किसानों पर जो पहले कई प्रकार की लागतें लगती थीं वे सब अपने बन्द कर दी। जमीन कर भी आपने पहले से कम कर दिया है। निकास का महसूल (Transit duties) भी आपने उठा दिया था। सायर महसूल भी पहले की अपेक्षा कम किया। गाँव के लोगों के व्यापार धन्धे आदि पर जो कई प्रकार के सरकारी कर लगते थे उन्हें उठाकर इनकम टेक्स की नियमित पद्धति शुरू कर दी है।

 

 

खेती की तरक्की पर भी श्रीमान बड़ौदा नरेश का विशेष ध्यान रहा है। आप इस बात का प्रयंत्र करते रहे हैं कि किसान लोग वैज्ञानिक ढंग खेती करने लगें और अपनी उपज बढावें। इसके लिए आपने अपने राज्य में कई प्रयोग क्षेत्र (experimental farms) खोल रखे थे। इनमें खेती सम्बन्धी अनेक-प्रयोगों की आजमाइश होती थी। किसानों को वैज्ञानिक खेती की पद्धतियाँ बतलाई जाती थी। अच्छे से अच्छा बीज उन्हें दिया जाता है। किसानों को खेती के नये औजारों का उपयोग बतलाया जाता था, जिससे वे कम परिश्रम और कम मजदूरी में ज्यादा से ज्यादा उपज कर सके। चार कृषि-विद्या-विशारद ( Graduate of agriculture ) इस कार्य के लिये नियुक्त किये गये थे कि वे गाँव गाँव में दौरा कर व्यावहारिक रूप से किसानों को खेती के नये से नये तरीके बतलावें। ये लोग वैज्ञानिक खेती ओर सहकारिता पर किसानों के सामने व्याख्यान भी देते और उन्हें उनके तत्व समझाते थे।किसानों को मैजिक लेन्टर्न की तम्वीरों के द्वारा उन कीड़ों की लीलाओं को समझाते थे जो खेती का बरबाद करते हैं। पशुओं के इलाज के लिय कई सव्यवर्ती केन्द्र-स्थलों में राज्य की ओर से पशु-औषघालय खुले हुए थे। इनमें पशुओं की बीमारी का ज्ञान रखने वाले योग्य सर्जन रखे जाते थे। सन 1918-19 में इन पशु औषधालयों में 4810 पशुओं की चिकित्सा हुई थी।

 

 

सन 1918 में श्रीमान ने लोगों की आर्थिक स्थिति जाँचने के
लिए तथा बनके आर्थिक अभ्युदय के समुचित उपायों को समझाने के लिये सुयोग्य अनुभवी सज्जनों की एक कमेटी मुकर्र की थी। इस कमेटी के सामने यह सवाल भी उपस्थित था कि रियासत में अच्छे से अच्छा ऊनी माल भी तैय्यार हो सकता, है या नहीं | इसके लिए यह जाँच होने लगी कि राज्य में कहाँ कहाँ कितनी और किस श्रेणी की ऊन पैदा होती है? इसके अलावा बड़ौदा रियासत में कौन कौन से साम्पतिक द्रव्य ( Economical products) पैदा होते हैं। और उनका राज्य की आर्थिक उन्नति में किस प्रकार उपयोग किया जा सकता है, इस बात की जाँच करना भी इस कमेटी का उद्देश्य था। बड़ौदा रियासत में कौन कौन से उद्योग धन्धों के लिये अनुकूल क्षेत्र उपस्थित हैं और वे किस प्रकार सफलतापूर्वक चलाये जा सकते है, आदि बातों पर विचार करना भी इसी का काम था। इसने खोज करने के बाद कई हितकारी बातों को प्रकट किया। जाँच से मालूम हुआ कि बड़ौदा राज्य में “मेग्नेशियम सॉल्टस’” सफलतापूर्वक तैयार किये जा सकते हैं, और भी इसी प्रकार की कई बातें प्रकट की गई।

 

 

इस समय बड़ौदा रजवाड़े में कई रूई की मिलें, रासायनिक तथा रंगने के उद्योग धन्धे, मंगलोर टाइप के केवल बनाने के कारखाने, खिलौने बनाने के कारखाने आदि कई कार्य बड़ी सफलता के साथ चल रहे थे। बड़ौदा रियासत की ओर से कई अनुभवी सज्जन इसलिए नियुक्त किये गये थे कि वे जनता को आजकल के कातने बुनने के तथा दूसरे उद्योग धन्धों के नवीन सुधरे हुए यन्त्रों का उपयोग समझाएं। नवीन सुधरे हुए यंत्रों के प्रचार से राज्य की औद्योगिक उन्नति में बड़ी सहायता पहुँची है। विविध उद्योग धंधों की विविध शाखाओं में वहाँ अच्छी उन्नति हो रही थी।

 

 

जो लोग किसी प्रकार के नये उद्योग धंधे खोलना चाहते थे, उन्हें
राज्य की ओर से अच्छा उत्तेजन मिलता था। उन्‍हें रियासत के (Experts) से मुफ्त सलाह भी मिल जाती थी। कहने का अर्थ यह है कि जिन जिन बातों से लोगों की औद्योगिक और आर्थिक उन्नति हो, इन्हें करने में राज्य कभी आगा पीछा नहीं सोचता था। कृषि की उन्नति के लिए किसानों को कम ब्याज पर कर्ज मिलने के लिए राज्य ने कई सहकारी समितियाँ खोल रखी थी। सन 1918 में इस प्रकार की सहकारी समितियों की संख्या जिनका रजिस्ट्रेशन बड़ौदा रियासत में हुआ था 417 थीं। इसके अतिरिक्त वहाँ दो सेन्ट्रल बैंक, बेकिंग यूनियन, 369 एग्रिकल्चर क्रेडिट सोसायटियाँ, 7 एग्रिकल्चर नॉन- क्रेडिट सोसायटियाँ थी।

 

 

अपनी प्रिय प्रजा में शिक्षा-प्रचार करने के लिए एवं उसके अंत:करण को सुसंस्कृत बनाने के लिये महाराजा बड़ौदा ने जो कुछ किया है वह प्रत्येक भारतीय नरेश के लिए अनुकरणीय है। सन्‌ 1893 में श्रीमान ने पहले पहल प्रयोग के लिए अपने राज्य के एक तालुके में शिक्षा अनिवार्य कर दी। इसके बाद सन्‌ 1906 में श्रीमान्‌ ने अपने सारे राज्य में शिक्षा अनिवार्य कर दी। इस समय अगर कोई माता पिता अपने पुत्र या पुत्रियों को नियमित रूप से निश्चित अवस्था तक स्कूल भजने में आनाकानी करता है तो वह राज्य नियमानुसार दण्ड का भागी होता था। सन 1918 की शासन-रिपोर्ट से पता चलता है कि उस साल वहाँ 2862 शिक्षा सम्बन्धी संस्थाएँ थीं और इनमें 202034 विद्यार्थी शिक्षा लाभ कर रहे थे। सन 1917 में विद्यार्थियों की संख्या इससे भी अधिक थी । सन 1918 में यह संख्या कम होने का कारण एन्फ्लुएन्जा की बीमारी थी। बड़ौदा राज्य में अंग्रेजी शिक्षा के लिये एक कॉलेज, 15 हाईस्कूल, एक कन्या हाईस्कूल 327 एग्लोबनोक्यूलर स्कूल्स, 9 हायर स्टेन्डर्ड कॉलेज, एक प्रिन्सेज स्कूल और दो विशेष संस्थाएं (Special institutions) थे। देशी भाषा की शिक्षा के लिए पाँच ट्रेनिंग कालेज, 2316 स्कूल्स लड़कों के लिये और 379 स्कूल्स लड़कियों के लिए थे। वहाँ एक कला-भवन था जिसमें बड़ौदा रियासत के तथा भारत के अन्य प्रार्न्तों के कई विद्यार्थी उद्योग धन्धों की तथा कई प्रकार के हुनरों की शिक्षा पाते थे। इन सब के अतिरिक्त वहाँ 85 ऐसी संस्थाएँ थी जिनका सम्बन्ध विविध प्रकार की शिक्षाओं से था।

 

 

बड़ौदा कॉलेज में एक प्रिन्सिपल, एक प्राफेसर, तीन व्याख्याता
और लगभग एक दर्जन अन्य अध्यापक थे। कॉलेज में एक विशाल पुस्तकालय भी था जिसमें लगभग 10000 ग्रंथ थे। सारी रियासत में 2983 सरकारी प्राइमरी स्कूल, 23 सरकार द्वारा सहायता-प्राप्त और 30 अन्य प्राइमरी स्कूल्स थे। वहां एक सरकारी अनाथालय भी था। अनाथों की शिक्षा कां भी प्रबंन्ध था। उन्हे उद्योग-धन्धों की शिक्षा दी जाती थी। इन शिक्षा-संस्थाओं के लिए रियासत का लगभग 1200000 रुपया प्रतिसाल खर्च होता था। केबल अंप्रेजी शिक्षा के लिए 400000 रुपया व्यय होता था। सब मिलाकर शिक्षा के लिए यह रियासत प्रतिसाल 2300000 खर्च करती थी। हम समझते हैं कि एक दो रियासतों को छोड़ कर भारत की कोई रियासत शिक्षा के लिए इतना रुपया खर्च नहीं करती थी। श्रीमान बड़ौदा नरेश का यह आदर्श अवश्य ही अनुकरणीय है।

 

 

जिस कला-भवन का हम ऊपर वर्णन कर चुके हैं, उसकी नीव
सन्‌ 1890 में डाली गईं थी। इसमें विविध प्रकार केकला-कोशल्, मेंकेनिकल इंजिनियरिंग, व्यावहारिक रसायन-शास्त्र ओर विविध प्रकार की व्यापारिक और औद्योगिक शिक्षाएँ दी जाती थी। बड़ौदा रियासत में एक सुन्दर अजायब घर भी था। सन्‌ 1910-11 में बड़ौदा रियासत में श्रीमान ने शिक्षा-विभाग के अन्तर्गत एक पुस्तकालय विभाग भी खोला था। सबसे बडा पुस्तकालय खासबड़ौदा नगर में था। यह बड़ौदा सेन्ट्रल लायब्रेरी के नाम मशहूर है, इसमे कोई 64000 छपे हुए ग्रन्थ व 7000 संस्कृत के हस्तलिखित ग्रन्ध हैं। इसमें लगभग 222 समाचार तथा मासिक-पत्र आते हैं। यहां स्त्रियों के लिये भी एक पुस्तकालय है, इसमें कोई 1500 ग्रन्थ हैं। ये ग्रन्थ विशेष रूप से गुजराती भाषा में है। इसमें कई देशी भाषाओं के पत्र तथा पत्रिकाएँ भी आती हैं। इसके अतिरिक्त बड़ौदा राज्य के ग्रामो में कोई 536 पुस्तकालय थे। इन सब में मिला कर कोई 243842 ग्रन्थ थे। इसके अतिरिक्त वहाँ चलते फिरते पुस्तकालयों की पद्धति भी निकाली थीइस प्रकार के 180 पुस्तकालय ग्राम ग्राम में घुमते रहते थे। इनमें सब मिलाकर कोई 15275 ग्रन्ध थे।

 

 

श्रीमान बड़ौदा नरेश का ध्यान प्राचीन पंचायत की स्थापना की ओर भी विशेषरूप से आकर्षित हुआ था, आपके प्रयत्न से वहाँ स्थान स्थान पर ग्राम पंचायते स्थापित हो गई थी। इनमें आपने चुनाव की पद्धति भी जारी कर दी थी। उन्हें शासन-सम्बन्धी कई अधिकार भी प्रदान किये थे। ग्राम की सडकें, कुएं, धर्मशालाएँ, देव-स्थान, आदि की देख-रेख का काम भी इन पंचायतों के जिम्मे रखा गया था। इन पंचायतों को दीवानी मामलों के फैसले करने में ग्राम्य सिविल जज को सहायता देनी पडती थी। की ग्राम पंचायतों को दीवानी फौजदारी के भी अधिकार थे। सन्‌ 1904 में तालुका और डिस्ट्रिक बोर्ड़ों की भी स्थापना की गई थी। सड़कें, तालाब, कुएँ, नहर बनवाने का तथा धर्मशालायें, डिस्पेन्सरियाँ और बाजारों की देख-रेख करने का काम इनके जिम्मे किया गया था। शहर की सफाई और प्रारम्भिक शिक्षा का प्रबन्ध भी यही करते थे। अकाल के समय लोगों को सहायता पहुँचाना भी इनका कर्तव्य था। हर एक कस्बे में म्युनिसिपलटि थी। इनमें से बहुत सी म्युनिसिपेलटियाँ प्राय: स्वतन्त्र थी और वे अपना शासन आप करती थी। बड़ौदा रियासत में सब मिला कर कोई 61 अस्पताल और डिस्पेन्सरियाँ थी। इन पर राज्य लगभग 452000 रुपये खर्च करता था।

 

 

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