बंगला साहिब गुरुद्वारा हिस्ट्री इन हिन्दी – गुरुद्वारा बंगला साहिब का इतिहास

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से 3 किलोमीटर की दूरी पर गोल डाकखाने के पास बंगला साहिब गुरुद्वारा स्थापित है। बंगला साहिब गुरुद्वारे की स्थापना 1783 में सरदार बघेल सिंह जी द्वारा करवाई गई थी। यह गुरुद्वारा दिल्ली के प्रसिद्ध गुरुद्वारों में से है। बड़ी संख्या में यहां पर्यटक व श्रृद्धालु आते है।

 

 

 

गुरुद्वारा बंगला साहिब का इतिहास – गुरुद्वारा बंगला साहिब हिस्ट्री इन हिन्दी

 

6 अक्टूबर 1661 में गुरु हर कृष्ण जी सिक्ख धर्म के आठवें गुरु बने। आपका जन्म 23 जुलाई 1656 को पंजाब को रोपड़ जिले के कीरतपुर साहिब में हुआ था। आपकी माता का नाम किशन कौर (सुलक्खणी जी) था। आपके पिता गुरु हरि राय साहिब थे। आपने 5 वर्ष की अवस्था में गुरूगददी संभाल ली। 16 अप्रैल 1664 में आप ने गुरुद्वारा बंगला साहिब दिल्ली में देह त्यागी थी।

 

 

इसके अलावा इस स्थान का महत्व, जब गुरु हरकृष्ण राय जी दिल्ली आये तब राजा जय सिंह के अतिथि बने और उन्हीं के बंगले में रूके। यह वही स्थान है जहां आज बंगला साहिब गुरुद्वारा स्थापित है। रानी गुरु जी की माता सुलक्खणी के दर्शन कर अत्यंत प्रभावित हुई। औरंगजेब ने गुरु हरिकृष्ण जी को आमंत्रित किया और गुरु हरिराय साहिब को चमत्कार दिखाने की इच्छा प्रकट की। इस प्रस्ताव को गुरु जी ने मानने से इंकार कर दिया।

 

 

इस पवित्र गुरुदारे का संबंध आठवें सिख गुरु, गुरु हर कृष्ण से है, और इसके परिसर के अंदर का कुंड, जिसे “सरोवर” के रूप में जाना जाता है, को सिखों द्वारा पवित्र माना जाता है और इसे “अमृत” के रूप में जाना जाता है। इमारत का निर्माण सिख जनरल, सरदार भगेल सिंह ने 1783 में किया था, जिन्होंने मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय के शासनकाल के दौरान उसी वर्ष दिल्ली में नौ सिख मंदिरों के निर्माण की निगरानी की थी। मूल रूप से यह स्थान मिर्जा राजा जय सिंह का बंगला (“हवेली” या “बांग्ला”) था, इसलिए इसका नाम “बांग्ला साहिब” पड़ा। इसका मूल नाम जयसिंहपुरा पैलेस था। एक राजपूत, मिर्जा राजा जय सिंह, मुगल सम्राट औरंगजेब के सबसे महत्वपूर्ण सैन्य नेताओं में से एक थे और उनके दरबार के एक विश्वसनीय सदस्य थे।

 

 

 

सातवें सिख गुरु गुरु हर राय के निधन के बाद। राम राय जो सातवें गुरु के सबसे बड़े पुत्र थे और उनके मसंदों ने मुगल सम्राट औरंगजेब को गुरु हरकृष्ण को अपने दरबार में बुलाने का फरमान जारी करने के लिए उकसाया। राम राय गुरु हरकृष्ण के बड़े भाई थे। गुरु हरकृष्ण ने दिल्ली जाने का फैसला किया क्योंकि उन्हें लगा कि “संगत”, उनके अनुयायियों को गुमराह किया गया था और उन्होंने उनकी गलतफहमी को दूर करने के लिए इसमें एक अवसर देखा। इस बीच दिल्ली के सिखों ने मिर्जा राजा जय सिंह से संपर्क किया, जो सिख गुरुओं के एक मजबूत भक्त थे, ताकि गुरु हरकृष्ण को औरंगजेब या राम राय के मसंदों द्वारा किसी भी तरह की हानि से बचाया जा सके। जब राम राय को पता चला कि गुरु हरकृष्ण ने दिल्ली में अपने दरबार में औरंगजेब के सामने पेश होने के लिए सम्मन स्वीकार कर लिया है। जब से गुरु हरकृष्ण ने औरंगजेब के सामने पेश नहीं होने का संकल्प लिया था, तब से वह आनन्दित होने लगा। तो अगर गुरु हरकृष्ण दिल्ली आए और औरंगजेब से मिलने से इनकार कर दिया तो निश्चित रूप से उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा और अपमान सहना होगा। अब राम राय को लगा कि गुरु हरकृष्ण के इस कृत्य से उनके अनुयायियों के बीच उनकी प्रतिष्ठा निश्चित रूप से कम होगी और राम राय के लिए खुद को गुरु हर राय का सच्चा उत्तराधिकारी घोषित करने का मार्ग प्रशस्त होगा। मिर्जा राजा जय सिंह ने गुरु हरकृष्ण के स्वागत के लिए विस्तृत व्यवस्था की थी। गुरु हरकृष्ण का दिल्ली के बाहरी इलाके में एक शाही अतिथि की तरह स्वागत किया गया। गुरु हरकृष्ण के साथ उनके दरबार के प्रमुख सिख और उनकी माता माता सुलखनी भी थीं।

 

 

बंगला साहिब गुरुद्वारा
बंगला साहिब गुरुद्वारा

 

राजा मिर्जा जय सिंह के स्वामित्व वाली दिल्ली में एक शानदार और विशाल बंगला, जिसे मुगल सम्राट औरंगजेब के दरबार में बहुत सम्मान मिला था, अब गुरुद्वारा बंगला साहिब नामक एक पवित्र मंदिर का दर्जा प्राप्त है। आठवें गुरु श्री हरकिशन यहां राजा जय सिंह के अतिथि के रूप में कुछ महीनों के लिए रुके थे। तब से यह हिंदू और सिख दोनों के लिए तीर्थस्थल बन गया है। वे गुरु हरकृष्ण की स्मृति में अपना सम्मान देने आते हैं, जिन्हें सातवें गुरु श्री हर राय द्वारा उत्तराधिकारी के रूप में नामित किया गया था, जिन्हें उनके बड़े भाई बाबा राम राय द्वारा गुरुगद्दी को हथियाने के लिए एक गुप्त प्रयास में सम्राट औरंगजेब द्वारा दिल्ली बुलाया गया था। इससे पहले बाबा राम राय ने बादशाह को खुश करने के लिए बाणी का झूठा अनुवाद देकर उनको को बदनाम किया था। इसके लिए उनके पिता ने उन्हें अस्वीकार कर दिया था और वह औरंगजेब द्वारा पुरस्कृत किया गया था।

 

 

 

अमृत सरोवर

गुरु हर कृष्ण जी दिल्ली पहुचे तो वहां हैजा तथा चेचक की महामारी फैली गई उन्होंने अपना अधिकांश समय दीन, बीमार और निराश्रितों की सेवा में बिताया। उन्होंने जरूरतमंदों को दवाइयां, भोजन और कपड़े बांटे। उन्होंने दीवान दरगाह मल को लोगों द्वारा गुरु को दी जाने वाली दैनिक भेंट का सारा खर्च गरीबों पर खर्च करने का भी निर्देश दिया। गुरु ने अधिक प्रशंसक जीते। जल्द ही उसकी उपचार शक्तियों के बारे में कहानियाँ पूरे शहर में फैल गईं।

 

 

राजा जय सिंह ने बंगले के कुएं के ऊपर एक छोटा तालाब बनवाया था। आज भी श्रद्धालु कुएं के पास आते हैं और अपनी बीमारियों को ठीक करने के लिए उसका पानी अमृत के रूप में घर ले जाते हैं। यहां के पवित्र जल की प्रासंगिकता के बारे में एक दिलचस्प किस्सा है। शहर में चेचक और हैजा की महामारी फैल गई और गुरु हर कृष्ण ने इस घर के कुएं से पीड़ित लोगों को ताजा पानी देना शुरू कर दिया। तब से, बांग्ला साहिब का पानी दुनिया भर में सिखों द्वारा अपने उपचार गुणों के लिए पूजनीय है। यह सरोवर बड़ी और छोटी, नारंगी और हरी मछलियों का घर, यह जल निकाय मुँहासे और अन्य त्वचा रोगों के लिए रामबाण की तरह काम करता है। जबकि कई लोग डुबकी भी लगाते हैं, कई अन्य लोग अपने चेहरे पर पवित्र जल की छींटाकशी करते हैं और अनिवार्य रूप से पवित्र सरोवर की परिक्रमा करते हैं।

 

 

 

गुरुद्वारा साहिब स्थापत्य

दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन समिति गुरुद्वारा भवन के तहखाने में एक अस्पताल चलाती है और खालसा गर्ल्स स्कूल बगल की इमारत में स्थित है। 18 फीट चौड़ी परिक्रमा और 12 फीट चौड़े बरामदे के साथ 225 x 235 फीट की टंकी का निर्माण पूरी तरह से लोगों के निस्वार्थ योगदान और स्वैच्छिक श्रम के साथ किया गया है। गुरुद्वारे के तहखाने में स्थित आर्ट गैलरी भी आगंतुकों के बीच बहुत लोकप्रिय है। वे सिख इतिहास से जुड़ी ऐतिहासिक घटनाओं को दर्शाने वाले चित्रों में गहरी रुचि व्यक्त करते हैं। गैलरी का नाम सिख जनरल सरदार भगेल सिंह के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने शाह आलम द्वितीय के समय 1783 में दिल्ली में नौ सिख मंदिरों के निर्माण की निगरानी की थी।

 

 

गर्भगृह जहां श्री गुरु ग्रंथ साहिब स्थापित है। वह स्वर्ण मंडित है। यह हाल 20 फुट ऊंचा है। सम्मपूर्ण पालकी साहिब सोने की है। यह हाल 200×100 फुट है। सम्मपूर्ण गुरुद्वारा श्वेत संगमरमर के सुंदर पत्थरों से बनाया गया है। मुख्य गुरुदारे पर के ऊपर मुख्य स्वर्ण मंडित शिखर 63 फुट ऊंचा है। चारों कोनो पर चार छोटे स्वर्ण युक्त शिखर है। मुख्य द्वार पर दो चपटी स्वर्ण युक्त छतरियाँ है, गुरुदारे के चारों ओर पादुका घर बने है।

 

मुख्य प्रवेश द्वार के बाहर निःशुल्क प्रसाद वितरण देशी घी का हलुआ वितरण किया जाता है। जगह जगह पेयजल व्यवस्था है। सुंदर कार्यालय, पुस्तक घर, प्रसाद घर एवं पूजा सामग्री की दुकानें है। मुख्य गुरुद्वारा भूतल से 10 फुट ऊंची जगती पर निर्मित है। गुरुदारे के बाहर विशाल खुली जगह है जो भक्तों के संचरण एवं बैठने के कार्य में आती है। गुरुद्वारे के बाहर 100 फुट ऊंचा ध्वज स्तंभ (निशान साहिब) है। गुरुद्वारा लगभग 13 एकड़ के क्षेत्रफल में फेला है। गुरुदारे के मुख्य गेट के दांयी साईड़ एक सरोवर बना है। गुरुद्वारे के मुख्य गेट के बाहर अंडर ग्राउंड कार पार्किंग है। जिसके ऊपर सुंदर पार्क बना है।

 

 

गुरुद्वारा बंगला साहिब हॉस्पिटल

गुरुद्वारा बंगला साहिब हॉस्पिटल फ्री चिकित्सा सुविधाएं तो बहुत पहले से उपलब्ध कराता है। वर्तमान इन सुविधाओं का ओर विस्तार किया गया है। जिसकी शुरुआत करते हुए दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन समिति (DSGMC) ने गुरुद्वारा बंगला साहिब के अंदर ‘ हाल ही में भारत की सबसे बड़ी’ डायलिसिस और डाइग्नोस्टिक सुविधा शुरू की गुरु हरकिशन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च किडनी डायलिसिस हॉस्पिटल एक साथ 101 मरीजों को डायलिसिस की सुविधा देगा और यह रोजाना 500 मरीजों की सेवा कर सकता है।
अस्पताल मरीजों को अपनी सेवाएं पूरी तरह से नि:शुल्क देगा। “इस सबसे तकनीकी रूप से उन्नत अस्पताल में सभी सेवाएं पूरी तरह से मुफ्त प्रदान की जा रही हैं। कोई बिलिंग या भुगतान काउंटर नहीं है। डीएसजीएमसी कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) से कॉरपोरेट घरानों से और उन लोगों से सेवाएं लेगा जो इस तरह की पहल के लिए योगदान देने के इच्छुक हैं और विभिन्न सरकारी योजनाएं, “डीएसजीएमसी वर्तमान अध्यक्ष मनजिंदर सिंह सिरसा ने कहा। उन्होंने कहा कि क्षमता को जल्द ही मौजूदा 101 बिस्तरों से बढ़ाकर 1,000 बिस्तर कर दिया जाएगा।

आप गुरुदारे की चिकित्सा सुविधाएं प्राप्त करने के लिए इस लिंक पर क्लिक कर सकते है…….

बंगला साहिब चिकित्सा सुविधाएं

 

 

गुरुद्वारा बंगला साहिब लंगर

गुरुद्वारा बंगला साहिब में लंगर हॉल हर दिन लगभग 10 से 15 हजार लोगों को मुफ्त शाकाहारी भोजन परोसता है। समाज में जाति, पंथ, नस्ल, धर्म या आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना, यह सामुदायिक भोजन सेवा सभी आगंतुकों के लिए मुफ्त में प्रदान की जाती है। भोजन तैयार करने में मदद के लिए बड़ी संख्या में लोग सामुदायिक रसोई में अपनी स्वैच्छिक सेवा देते है। बंगला साहिब गुरुद्वारे का लंगर टाईमिंग सुबह 9बजे से दोपहर 3 बजे तक तथा शाम 7 बजे से रात्रि ग्यारह बजे तक निरंतर लंगर जारी रहता है।

 

 

गुरुद्वारा बंगला साहिब परिसर में देखने लायक चीज़ें

 

  • सरोवर या पानी की टंकी

 

  • सिख धर्म के इतिहास से संबंधित छवियों और चित्रों को दर्शाने वाली एक आर्ट गैलरी
    सांप्रदायिक रसोई या लंगर जहां हजारों लोगों के लिए भोजन पकाया जाता है और दैनिक आधार पर परोसा जाता है

 

  • बाबा बघेल सिंह सिख विरासत मल्टीमीडिया संग्रहालय।

 

  • निशान साहिब, ध्वज स्तंभ, इसकी ऐतिहासिक संरचना है और दूर से दिखाई देता है।

 

  • सिख धर्म में धार्मिक भजन गुरबानी हर समय पृष्ठभूमि में बजाया जाता है। जिसको सुनकर मन आनंदित हो उठता है।

 

  • गुरुद्वारा ‘सरोवर’ एक कृत्रिम झील है और यह कई प्रकार की रंगबिरंगी मछलियों का घर है। जो देखने मे काफी सुंदर लगता है।

 

  • पुस्तकालय यहां स्थित पुस्तकालय में आप सिख धर्म और इतिहास से संबंधित अनेक पुस्तकों का संग्रह देख सकते है। तथा उनकी खरीदारी भी कर सकते है।

 

गुरुद्वारा बंगला साहिब के बारे मे रोचक जानकारी

 

  • गुरु हर कृष्ण केवल आठ वर्ष के थे, जब उन्होंने दिल्ली के महामारी प्रभावित लोगों की मदद करने का कार्य संभाला। उन्हें बाल गुरु के नाम से भी जाना जाता है। चूंकि गुरु ने महामारी से पीड़ित स्थानीय मुस्लिम आबादी सहित सभी की मदद की, इसलिए उन्होंने उन्हें बाल पीर नाम दिया, जिसका अर्थ है बाल संत। कहा जाता है कि गुरु ने पवित्र जल चढ़ाकर लोगों को ठीक किया था। ऐसा माना जाता है कि गुरुद्वारा बंगला साहिब में सरोवर के पानी में चमत्कारी शक्तियां हैं और यह बीमारियो को ठीक कर सकता है।

 

  • यह स्थान पहले राजा जय सिंह का बंगला था। जिसके कारण इस गुरुदारे का नाम बंगला साहिब पड़ा

 

  • बगंला साहिब गुरुदारे वाले स्थान पर पहले जयसिंहपुरा पैलेस था।

 

  • इस स्थान पर गुरु हरकृष्ण साहिब जी अतिथि के रूप में रहे।

 

  • गुरु हरकृष्ण साहिब की मृत्यु भी इसी स्थान पर हुई थी

 

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