प्लूटो ग्रह क्यों नहीं है, प्लूटो ग्रह की जानकारी वो खोज

प्लूटो ग्रह की खोज किसने की और कैसे हुई यह जानकारी हम अपने इस अध्याय में जानेंगे। जैसा हमने पिछले अध्याय में पढ़ा कि नेपच्यून ग्रह की खोज के बाद खगोलविदो ने पुनः सोचा कि अब सौर-मंडल पूर्ण हो गया है। यूरेनस की कक्षा स्थिति मे जो अंतर था वह नेपच्यून की खोज मे मिट गया था। लेकिन कुछ वर्षो बाद खगोलविदों ने देखा कि यूरेनस की तरह नेपच्यून की कक्षा में भी कुछ अंतर पड़ता हैं। यह अंतर परीक्षण की गलतियों के कारण भी हो सकता था।

 

 

लावेल नामक एक खगोलविद को इस अंतर का अध्ययन करने से यह विश्वास हो गया कि नेपच्यून की कक्षा के बाहर इस ग्रह को प्रभावित करने वाला एक और ग्रह होना चाहिए। अत: लवेरी और एडम्स की तरह लावेल भी इस ‘अव्यक्त ग्रह’ की गणना करने में लग गये। नेपच्यून की कक्षा का प्रश्न अभी पूर्ण रूप से हल नही हुआ था। अतः’ लावेल ने यूरेनस को आधार मानकर उल्टी गणना शुरू कर दी।

 

प्लूटो ग्रह की खोज किसने की

 

लावेल के पास पर्याप्त साधन और सुविधाए थीं। खासकर ग्रहों के अध्ययन के लिए ही उन्होने फ्लैगस्टाफ, अफ्रीका, मे एक वेधशाला का निर्माण किया था। सन्‌ 1905 में उन्होने इस ‘अव्यक्त ग्रह’ की खोज आरंभ कर दी। लावेल की गणना के
अनुसार यह ग्रह सूर्य से लगभग 68,00,00,00,00 किमी. दूरी पर था और कुछ विचित्र मार्ग से हमारे 282 वर्षो में सूर्य की एक परिक्रमा करता था। लावेल ने सोचा कि यह ग्रह’ आकार मे बहुत ही छोटा होना चाहिए तथा वजन मे पृथ्वी से संभवत: छः गुना अधिक।

 

 

सन्‌ 1916 में लावेल की मृत्यु हो गई। अभी तक इस ‘अव्यक्त ग्रह’ को किसी ने देखा नहीं था। केवल गणित के आधार पर ही इस ग्रह का अस्तित्व निर्भर था। इधर अमेरिका में नेपच्यून को आधार मानकर वैज्ञानिक पिकरिंग इस ग्रह की खोज में लगे हुए थे। पिकरिंग और लावेल की गणनाओं मे काफी समानता थी।
सन्‌ 1919 में माउण्ट विल्सन वेधशाला मे मिल्टन हमासन ने इन गणनाओं के आधार पर प्लूटो ग्रह की खोज आरंभ कर दी।

 

प्लूटो ग्रह
प्लूटो ग्रह

 

हुमासन के लिए खगोलशास्त्र में शोध के लिए उस समय तक मौजूद लगभग सभी सुविधाएं उपलब्ध थी, जिनमें सबसे बडी सुविधा थी फोटोग्राफी की। हुमासन ने अपने प्रयत्न किए, परंतु वह इस नये ग्रह को खोज निकालने में सफल नहीं हुए। कुछ वर्ष तक इस दिशा में प्रयत्न स्थगित हो गए। सन्‌ 1929 में खगोलविदों ने पुनः लावेल की वेधशाला मे उत्साह से प्रयत्न आरंभ किए। इस समय उसके पास 3 इंच व्यास का एक ‘रिफ्रेक्टर’ था और एक ‘ब्लिक-माइक्रोस्कोप’ था। इस नए यंत्र की सहायता से फोटो प्लेटों के परीक्षण में सुविधा होती थी। टामबो ने इस नयी पार्टी का नेतृत्व स्वीकार किया। उस समय टामबो एक तरुण व उत्साही खगोलविद थे, जबकि आज वे अमरीका के ही नहीं संसार के प्रख्यात खगोलविदों में से एक माने जाते हैं। सन्‌ 1930, जनवरी की एक रात में टामबो ने मंथर गति से चलने वाले एक पिंड को देखने में सफलता प्राप्त की। यह वही ‘अव्यक्त ग्रह’ था। इस ग्रह का नाम रखा गया “प्लूटो’। यूनानी मिथकों के अनुसार प्लूटो हमारे ‘यमराज’ का ही दूसरा रूप है।

 

 

प्लूटो ग्रह का आकार-प्रकार

 

 

प्लूटो बहुत ही छोटा ग्रह निकला। यही कारण था कि आरंभ मे लावेल के हाथ नहीं लग सका था। हुमासन की असफलता को उनका दुर्भाग्य ही माना जा सकता है। वास्तव में उन्होने सन्‌ 1919 में दो बार इस ग्रह के चित्र लिए थे, परंतु वे चित्र इतने
गडबड आए थे कि उनसे इस ग्रह का पता लगाना मुश्किल था। प्लूटो ग्रह की खोज के बाद पता लगा कि यह ग्रह केवल मद ही नहीं वरन्‌ छोटा और हल्का भी है। लावेल का अनुमान था कि इस ग्रह का वजन पृथ्वी से छ: गुना अधिक है। परंतु खोज के बाद पता चला कि यह पृथ्वी से भी हल्का है।

 

 

बाद में ज्ञात हुआ कि इसका कक्षा मार्ग भी अन्य ग्रहों की अपेक्षा कुछ अजीब है। जब यह ग्रह सूर्य के निकटतम रहता है, तो यह नेपच्यून की कक्षा में चला आता है। अर्थात्‌ सूर्य – प्लूटो दूरी सूर्य-नेपच्यून दूरी से कम रहती है। यह ग्रह हमारे 248 वर्षो
में सूर्य की परिक्रमा पूर्ण कर लेता है। इस प्रकार लावेल के अनुमान में 34 वर्षो की अधिकता थी। परंतु प्लटो और यूरेनस के एक दूसरे से टकरा जाने का कोई खतरा नहीं है, क्योंकि इन ग्रहों की कक्षाएं एक दूसरे से 17 अंश का कोण बनाती हैं।

 

 

टेक्सास की मैक्डोनल्ड वैधशाला की 82 इंच व्यास वाली दूरबीन से कुइपेर ने इस ग्रह का अध्ययन किया है। उनके अनुसार प्लूटो का व्यास 6,400 मील था। (पृथ्वी का व्यास 7,900 मील है)। इसका वजन पृथ्वी के 8/10 हिस्से के बराबर है।

 

 

सन्‌ 1950 में कुइपेर ने ही हुमासन के साथ पेलोमर दूरबीन से प्लूटो का अध्ययन किया। इस बार प्लूटो का व्यास 3,600 मील निकला। इस प्रकार यह बुध को छोड़कर सौरमंडल का सबसे छोटा ग्रह साबित हुआ। पृथ्वी पर 96 पौंड का व्यक्ति प्लूटो पर 924 पौंड का हो जाएगा। अतः प्लूटो का पलायन वेग भी बहुत ऊंचा होना चाहिएं। और इसका वायुमंडल हाइड्रोजन, हीलियम और निआन से बना होना चाहिए। इस ग्रह पर तापमान शून्य के नीचे 400 डिग्री फारेनहाइट होने का अनुमान है। प्लूटो ग्रह के इतने अधिक घनत्व को कई खगोलविद मानने के लिए तैयार नहीं हैं। उनका विचार है कि प्लूटो आरंभ में बहुत गरम था। जैसे-जैसे यह ठण्डा होता गया, वैसे-वैसे इसका वायुमंडल उड़ता गया। प्रथ्वी की भी यही स्थिति रही हैं।

 

 

क्रोमोलिन ने सन्‌ 1936 में एक मत प्रस्तुत किया, जिसके अनुसार प्लूटो ग्रह के धरातल पर एक खास चिकनी जगह है और सूर्य प्रकाश केवल इसी जगह से परावर्तित होता है। इसलिए प्लूटो ग्रह का व्यास वास्तविक व्यास से कम दिखाई देता
है। ग्रिफिथ वेधशाला के आल्टेर, कण्टोन और रोकवेस नामक वैज्ञानिकों ने प्लूटो के परीक्षणो के आधार पर, क्रोमोलिन के मत का समर्थन किया। वास्तव में प्लूटो के आकार-प्रकार और वजन का प्रश्न अभी भी हल नहीं हुआ है लेकिन आशा यह है कि यदि प्लूटो का कोई उपग्रह मिल जाए तो इस ग्रह के बारे में हमें कुछ अधिक जानकारी प्राप्त हो सकती है। परंतु आज की सबसे बडी दूरवीन भी इतनी दूरी पर प्लूटो के किसी उपग्रह को खोज निकालने में असमर्थ है।

 

 

आज भी प्लूटो नेपच्यून की कक्षा से काफी दूर है। परन्तु धीरे-धीरे यह ग्रह सूर्य के निकटतम आ रहा है। सन्‌ 1969 से 2009 के बीच यह नेपच्यून की कक्षा के भीतर रहेगा। सन्‌ 1989 में प्लूटो पृथ्वी से न्यूनतम दूरी पर रहेगा और इसके बाद यह ग्रह हमसे दूर होता जाएया। सन्‌ 2013 में सूर्य से इसकी दूरी सबसे अधिक 4,50,00,00,000 मील रहेगी। इसके 50 वर्ष पहले यह ग्रह जितना धुंधला होगा, उतना ही धुंधला यह इसके 50 वर्ष बाद रहेगा अर्थात्‌ इसे केवल बड़ी दूरबीनों से ही देखा जा सकेगा।

 

 

प्लूटो की गति और आकार-प्रकार अन्य सौरमंडलीय ग्रहों से इतने भिन्‍न है कि इसे ग्रह मानने में खगोलविदों को संकोच होता है। कूइपेर का मत है कि आरंभ में प्लूटो नेपच्यून का एक उपग्रह था। यह नेपच्यून के उपग्रह टिट्रान (व्यास लगभग 30,000 मील) से थोड़ा ही बडा है और वजन में लगभग बराबर है। प्लूटो की अति दीर्घवृत्ताकार कक्षा और इस कक्षा का झुकाव भी इस मत का समर्थन करता है।

 

 

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