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पुरंदर का युद्ध और पुरंदर की संधि कब और किसके बीच हुई

पुरंदर का युद्ध

महाराजा जयसिंह जी मुगल बादशाह के सेनानायके थे। महाराजा जयसिंह जी जैसे अपूर्व रणनीतिज्ञ कुशल थे वैसे ही असाधारण राजनीतिज्ञ भी थे। जब उनके ऊपर पुरंदर किले पर आक्रमण करने और छत्रपति शिवाजी जैसे प्रबल पराक्रमी तथा शक्ति शाली पुरुष का मुकाबला करने का भार आ पड़ा तब उन्होंने अपनी सारा बौद्धिक शक्तियों को शिवाजी को कुचलने के लिये लगाना शुरू किया। वे ऐसे उपाय सोचने लगे कि जिससे शिवाजी की केन्द्रगत शक्ति को ऐसा मार्के का धक्का पहुँचाया जावे कि वह छिन्न भिन्न हो जाये। उन्होंने सब के पहले सम्राट द्वारा बीजापुर से सुल्तान की खिराज को घटाया, जिससे वह शिवाजी से नाता तोड़कर सम्राट से आ मिले। इसके अतिरिक्त उन्होंने छत्रपति शिवाजी के तमाम शत्रुओं का गुट करके उनकी संयुक्त शक्ति में मिलाकर छत्रपति शिवाजी के खिलाफ लगाने का निश्चय किया। उन्होंने फ्रान्सिस माइल और डी० के० माइल नामक दो युरोपियनों को तत्कालीन युरोपियन कोठियों के मालिकों के पास भेजकर उनसे यह अनुरोध किया कि वे शिवाजी के खिलाफ सम्राट की सहायता करें। इतने ही से महाराजा जयसिंह जी को सन्तोष नहीं हुआ। उन्होंने दक्षिण के कई राजाओं के पास ब्राह्मण राजदूत भेजकर उन्हें शिवाजी के खिलाफ भड़काना शुरू किया। जो दाक्षिणात्य राजागण भोंसला के आकस्मिक उदय से खिन्न हो उठे थे उन सब के पास इन प्रतापी मुगल सेनापति के गुप्त दूत पहुँचे और इन्हें सफलताएँ भी हुईं। बाजी, चन्द्रराव और उनका भाई गोविन्दराव मोरे-जिनसे कि शिवाजी ने जावली का परगना ले लिया था, महाराजा जयसिंह जी की सेवा में उपस्थित हुए। इनके अतिरिक्त मनकोजी धनगर भी मुगल फौज में सम्मिलित हो गये। अफ़जल खाँ का लड॒का फ़जुल खाँ अपने बाप के खून का बदला निकालने के लिये महाराजा शिवाजी के खिलाफ जयसिंह जी से आ मिला। जयसिंह जी ने इसकी पीठ ठोक कर सेना में इसे एक अग्रणय पद प्रदान किया। महाराजा जयसिंहजी ने अपने युरोपियन तोपखाने के अफसर निकोलाओ मनसीके द्वारा कल्याण के उत्तरवर्त्ती कोली देश के छोटे छोटे राजाओं का भी सहयोग प्राप्त कर लिया।

 

 

इन सब के अतिरिक्त शिवाजी के अफसरों को ऊँचे ऊंचे पदों का तथा विपुल द्रव्य का प्रलोभन देकर अपनी ओर मिलाने के भी खूब प्रयत्न किये गये और इसमें उन्हें कुछ सफलता भी हुई। महाराजा जयसिंह जी ने इस समय सारी सत्ता को अपने हाथ में केन्द्रीभूत कर लिया। शुरू शुरू में सम्राट ने उन्हें रणक्षेत्र में सेना संचालन का कार्य दिया था और शासन सम्बन्धी सारा कार्य-जैसे, अफसरों और फौज की तरक्की, सजा और बदली आदि- औरंगजेब के वायसराय के आधीन था।

 

 

पुरंदर के युद्ध का आरम्भ (1665)

 

जुनार से दक्षिण की तरफ जब हम प्राचीन मुग़ल राज्य की सीमा के आगे बढ़ते हैं, तो पहले पहल इन्द्रायनी की घाटी रास्ते में आती है। इसके किनारों पर की पर्वतमाला पर पश्चिम की तरफ लोहागढ़ और तिकोना नामक किले ओर मध्य में चाकन दुर्ग स्थित है। इसके बाद भीसा नदी की घाटी आती है जिसमें कि पूना नगर बसा हुआ है। इससे और भी दक्षिण की तरफ कार्हा की घाटी है। इसके पश्चिम के पहाड़ पर सिंहगढ़ ओर दक्षिण की पहाड़ियों पर पुरंदर का किला स्थित है। इसी घाटी के मैदान में ससबद ओर सूपा नामक गाँव हैं। इन पहाड़ों के दक्षिण में नीरा नदी की घाटी है। इस घाटी के किनारे पर शिरवाल नामक गांव, पश्चिम में राजगढ़ और तोरना नामक किले और दक्षिण पश्चिम में रोहिरा का किला है। पूना, उत्तर पश्चिम दिशा में स्थित लोहागढ़ और दक्षिण दिशा में स्थित सिंहगढ़ से समान अन्तर पर है। ससबद नामक स्थान ऐसे मौके पर बसा हुआ है कि वहां से पुरंदर, राजगढ़, सिंहगढ़ और पूना आदि स्थानों पर सुगमता से चढ़ाई की जा सकती है। इतना ही नहीं, परन्तु इस स्थान के दक्षिण में मैदान होने के कारण यहां से बीजापुर पर भी हमला किया जा सकता है तथा उधर से आने वाली शत्रु की मदद को भी रोका जा सकता है। इस समय भी ससबद में पाँच मुख्य मुख्य रास्ते मिलते हैं। इस प्रकार युद्ध की दृष्टि से ससबद एक अत्यन्त महत्त्व पूर्ण स्थान है।

 

 

महाराजा जयसिंहजी एक कुशल सेनानायक थे। उन्होंने सूक्ष्म सैनिक दृष्टि से इन सब स्थानों पर हमला करने के लिये ससबद नामक स्थान पर अपनी छावनी डाल दी। पूना पर बड़ी ही मज़बूत सैनिक किले बंदी की गई थी। लोहागढ़ के सामने एक सैनिक थाना स्थापित किया गया। जिसका काय लोहागढ़ पर दृष्टि रखना तथा उस रास्ते की रक्षा करता था जो कि उत्तर की ओर जुनार के पास मुगल सीमा से जा मिलता था। इतना हो जाने पर एक ऐसी फौजी टुकड़ी बनाई गई जो इधर उधर घूम फिरकर ससबद से पश्चिम ओर दक्षिण पश्चिम में स्थित मरहठे के गाँवों को नष्ट करे। पूर्व की ओर से आक्रमण होने की कोई सम्भावना नहीं थी क्योंकि एक तो उस ओर बीजापुर-राज्य की सीमा आ गई थी, ओर दूसरे मुगल सेना की एक टुकड़ी भी उस ओर गई हुई थी। तीसरे वहाँ की प्राकृतिक स्थिति ही कुछ ऐसी थी कि जिसके कारण दुश्मन उस ओर से आक्रमण नहीं कर सकते थे।

 

 

पुरंदर का युद्ध
पुरंदर का युद्ध

 

तीसरी मार्च के दिन जयसिंह जी पूना पहुँचे। यहां पर जयसिंह जी
ने कुछ दिन प्रजा को शान्त करने तथा ऐसे सैनिक स्थान कायम करने में बिताये जो कि उनके ख़्याल से इस युद्ध की सफलता के खास स्तंभ थे। 10 वीं मार्च के दिन पुरन्दर के किले पर घेरा डालने का निश्चय कर वे ससबद के लिये रवाना हो गये। 29 वीं तारीख को वे एक ऐसे स्थान पर जा पहुँचे जहां से एक दिन में ससबद पहुँच सकें यहाँ से ससबद जाते समय एक दर्रा पार करना पड़ता था। जयसिंहजी ने पहले दिलेर खां को अपने सवारों और तोपखाने के साथ उस दर्रे को पार करने ओर चार मील आगे चल कर ठहरने का हुक्म दिया। दूसरे दिन राजा जयसिंह जी पहाड़ को लाँघ कर दिलेर खाँ के खेमे में जा पहुँचे और दाऊद खाँ को इस लिये दर्रे के नीचे छोड़ गये कि बह दुपहर तक फौज को सकुशल दरें में प्रवेश करते हुए देखता रहे। सब से पीछे वाली फौज की टुकड़ी को भूले भटके सिपाहियों को मार्ग बतलाने का कार्य सौंपा गया था। इसी दिन ( 30 मार्च ) सुबह दिलेरखाँ अपनी टुकड़ी के साथ पड़ाव के लिये योग्य स्थान की तलाश में निकला। ढूंढ़ते ढूंढते वह पुरंदर के किले के पास जा पहुँचा। यहाँ पर मराठे बन्दूकचियों के एक बड़े भारी झुन्ड ने, जो कि एक बाड़ी में ठहरा हुआ था, शाही फौज़ पर हमला कर दिया। परन्तु शाही सेना ने उनको परास्त कर बाडी पर अधिकार कर लिया । इसके बाद दिलेर खां की सेना ने आस पास के मकानों को जला दिये और वह पुरंदर के किले के जितने नज़दीक जा सकी, चली गई। वहाँ पहुँच कर इस सेना ने किले से इतनी दूरी पर जहाँ कि गोला नहीं आ सके, पड़ाव डाला और अपनी रक्षा के लिये अपने आस पास खाइयाँ खोद लीं।

 

 

जब यह ख़बर जयसिंहजी ने सुनी तो उन्होंने तुरन्त किरत सिंह जी, रायसिंह जी चौहान, कुबदख खाँ, मित्रसेन, इन्द्रभान बुन्देला और दूसरे अधिकारियों की आधीनता में अपने 3000 सैनिक भेजे। उन्होंने दाऊद खाँ के नाम एक ज़रूरी हुक्म इस आशय का भेजा कि वह आकर पड़ाव का चार्ज ले ले; जिससे कि वे खुद घेरे की निगरानी के लिये जा सकें। परन्तु यह समाचार सुनकर दाऊद खाँ जयसिंहजी के पास न आते हुए स्वयं दिलेर खां के पास चला गया। यह दिन इसी प्रकार बीता। छावनी की रक्षा के लिये कोई उच्च अधिकारी मौजूद नहीं था इस वजह से जयसिंह जी को मजबूरन वहीं ठहरना पड़ा। परन्तु उन्होंने दिलेर खाँ की मदद के लिये बहुत से रास्ता साफ करने वाले, भिस्ती, निशाने बाज और लड़ाई का सामान पहले ही रवाना कर दिया था। दूसरे दिन सुबह (31 मार्च ) जयसिंह जी ने बड़ी सावधानी के साथ तम्बू आदि फौज का तमाम सामान स्थायी पड़ाव पर भेज दिया जो कि ससबद और पुरंदर के बीच मे निश्चित किया गया था। यह स्‍थान पुरंदर से सिर्फ चार मील के अन्तर पर था। जब जयसिंहजी ने दाऊद खां और किरत सिंह जी जहाँ थे वहाँ से किले की स्थिति पर दृष्टि डाली तब उन्हें मालूम हुआ कि पुरंदर का किला कोई एक किला नहीं है परन्तु पहाड़ियों के एक समूह की मजबूत दीवारों से घिरा है। इसलिये उसको चारों ओर से घेर लेना असम्भव है।

 

 

पुरंदर का किला घेर लिया गया

 

 

ससबद से छः मील दक्षिण में पुरंदर की पर्वतमाला है। इसकी सबसे ऊँची चोटी समुद्र की सतह से 4564 फीट और अपने आसपास के मैदान से 25000 फीट से भी ज्यादा ऊँचाई पर है। यह एक दुहरा किला है और इसके पास ही पूर्व दिशा में एक और स्वतंत्र और बहुत ही मजबूत किला है जिसका नाम वज्रगढ़ है। पुरंदर का किला इस प्रकार बना हुआ है:–एक पहाड़ी की चोटी पर एक किला है जहाँ से गोलाबारी की जा सके। इसके चारों तरफ की जमीन ढालू है। इसके 300 फीट नीचे एक और छोटा किला है जिसको माची कहते हैं। यह माची चट्टानों की एक लाइन है जो कि पहाड़ के मध्य भाग के चारों तरफ फैली हुई है। यह माची उत्तर की तरफ कुछ और फेल गई है जिससे वहाँ इसका आकार एक झरोखे के समान हो गया है। इस जगह किले के रक्षक सिपाहियों की कचहरियाँ एवं मकान बने हुए हैं। इस झरोखे की आकृति वाले स्थान के पूर्व में भैरवखिड नामक पहाड़ी स्थित है। यह पहाड़ी पुरंदर की पहाड़ी के ढाल की सतह से उठी हुई है ओर किले के ऊपरी भाग के उत्तर पूर्वीय हिस्से पर झुकी हुई है। यह भैरवखिंड नामक पहाड़ी इसी प्रकार एक मील तक पूर्व की तरफ फैली हुई है जहाँ जाकर एक टेबुल लेन्ड में इसका अन्त होता है। यह Table land समुद्र की सतह से 3618 फीट ऊँचा है और इसी पर रुद्रमाला का किला ( वर्तमान वज्रगढ़ ) बना हुआ है।

 

 

यह वज्रगढ़ पुरंदर के नीचे के किले (माची) के उस अत्यन्त महत्वपूर्ण उत्तरीय विभाग की रक्षा करता था जहाँ कि किले के रक्षक सैनिक रहते थे। इसी वज्रगढ़ के हस्तगत कर लेने के कारण इ० सन्‌ 1665 में जयसिंह जी ने और सन्‌ 1817 में अंग्रेजों ने मराठों को पुरंदर की रक्षा करने में असमर्थ बना दिया था। एक दूरदर्शी सेना नायक की तरह जयसिंहजी ने पहले वज्रगढ़ पर धावा करने का निश्चय किया। दिलेर खाँ ने अपने भतीजे, अफगान सेना, हरिभान और उदयभान गौर आदि के साथ पुरन्दर और रुद्रमंडल के बीच अपना मोर्चा कायम किया। दिलेर खाँ के आगे तोपखाने का अफसर तरकताजखाँ और जयसिंहजी के द्वारा भेजी गई टुकड़ी थी। किरतसिंह जी ने 3000 सवारों और कुछ दूसरे मन्सबदारों के साथ पुरन्दर के उत्तरीय दरवाजे के सामने मोर्चा बन्दी की। दाहिनी बाजू पर राजा नरसिंह गौर, कर्ण राठोर, नरवर के राजा जगत सिंह जी और सैयद माकूल आलम ने अपनी मोर्च बन्दी की। पुरंदर के पीछे की तरफ खिड़की के सामने दाऊद खाँ, राजा रायसिंह राठोड़, मोहम्मद सालेह तरखान, रामसिंह हाड़ा, शेरसिंह राठोर, राजसिंह गौर और दूसरे सरदार कायम किये गये थे। इस स्थान से दाहिनी बाजू पर रसूल बेग रोजभानी और उसके आधीनस्थ सेना नियुक्त थी। रुद्रमाला के सामन दिलेर खां के कुछ सिपाहियों के साथ, चर्तुभुज चौहान ने मोर्च बन्दी की ओर इनके पीछे मित्रसेन, इन्द्रभान बुन्देला और कुछ दूसरे अधिकारी गण रहे।

 

 

जयसिंह जी अपने सिपाहियों को किले के नजदीक पहाड़ी की
सतह में ले गये। इन सिपाहियों ने पहाड़ी की बाजू पर अपने डेरे गाड़ दिये। जयसिंहजी प्रति दिन खाइयों को देखने जाते, अपने आदमियों को उत्साहित करते और इस प्रकार इस घेरे का निरीक्षण करते रहते थे। पहले पहल उन्होंने अपनी सारी शक्तियाँ तोपों को ढालू और मुश्किल पहाड़ियों पर चढ़ाने की तरफ लगा दीं। अब्दुल्ला खां नामक एक तोप को रुद्रमाल के सामने के मोर्चे पर चढ़ाने में तीन दिन लग गये। इसके बाद फतेहलश्कर नामक तोप चढ़ाई गई जिसमें साढ़े तीन दिन लगे। तीसरी तोप भी जिसका नाम हाहेली था, बड़ी मुश्किल से वहाँ तक चढ़ाई गई। इसके बाद मुगल सेना ने लगातार गोलाबारी शुरू की जिससे कि किले के सामने की दीवारों का नीचे का हिस्सा नष्ट भ्रष्ट हो गया। इसके बाद रास्ता साफ करने वाले ( Pioneers) उन दीवारों की सतह में छेद करने के लिये भेजे गये। 13वीं अप्रैल अर्ध रात्रि के समय दिलेर खाँ की टुकड़ी ने किले पर भयंकर गोलाबारी करके नष्ट भ्रष्ट कर डाला और शत्रु की उसके पीछे के अहाते में हटा दिया। इस कार्य में सात आदमी काम आये और चार घायल हुए। इधर जयसिंह जी ने दिलेर खाँ की मदद के लिये अपने कुछ और आदमी भेज दिये। दूसरे दिन विजयी मुगल सेना और भी अन्दर के भाग में बढ़ी और सीढ़ियों द्वारा अन्दर जाने का प्रयत्न करने लगी। इस दिन सायंकाल के समय मुगलों के गोलाबारी से तंग आकर मराठा सैनिकों ने किले के बाहर आकर अस्त्र-शस्त्र रख दिये और आत्मसमपर्ण कर दिया । इस समय जयसिंहजी ने बड़ी बुद्धिमानी का कार्य किया। उन्होंने इन मराठा सैनिकों को सकुशल अपने अपने घर लौट जाने दिया। इतना ही नहीं, वरन इनके खास खासनेताओं को उनकी बहादुरी के उपलक्ष में बढियाँ कई बहुमूल्य राजसी पोशाकें इनाम में दीं। शत्रु के साथ यह नम्रता का बर्ताव इसलिये किया गया था कि जिस से दूसरे मराठा सरदार व सैनिक भी लड़ मरने के बजाय जल्दी ही आत्मसमर्पण कर दें। आज की लड़ाई में मुगल सेना के 80 आदमी मारे गये और 109 घायल हुए।

 

 

वज्रगढ़ पर अधिकार करना ही पुरंदर के किले पर विजय प्राप्ति
करने के मार्ग की पहली सीढ़ी थी अथवा स्वयं महाराजा जयसिंह जी के शब्दों में यों कह लीजिये कि “ वह पुरंदर के किले की कुंजी थी। अब दिलेर खां पुरन्दर के किले की तरफ अग्रसर हुआ । इधर जयसिंह जी ने छत्रपति शिवाजी के राज्य में लूट खसोट करना शुरू कर दिया। इसका कारण जैसा कि उन्होंने औरंगजेब को लिख भेजा था वह यह था “इससे शिवाजी और बीजापुर के सुल्तान को यह विश्वास हो जायगा कि मुग़लों के पास इतनी विशाल सेना है कि घेरा डालने के अतिरिक्त भी फौज बच जाती है। दूसरा फ़ायदा इस से यह होगा कि शिवाजी के राज्य में लगातार धूम मचाये रखने के कारण उनकी सेनाएँ किसी एक स्थान पर इकट्ठी नहीं होने पायेगी। इस प्रकार अपने कुछ जनरलों को इधर उधर भेज देने में उनका एक मतलब यह भी था कि उनके कुछ सेना नायक आज्ञा-पालक नहीं थे,
ओर इसलिये उनके वहां रहने से नहीं रहना ही अच्छा था। दाऊद खाँ कुरेशी किले की खिड़की पर दृष्टि रखने के लिये नियुक्त किया गया था, परन्तु कुछ ही दिन बाद यह मालूम हुआ कि मराठा लोगों का एक दल दाऊद खां की आंखों में धूल झोंक कर उस खिड़की द्वारा किले में प्रविष्ट हो गया है। इस पर दिलेर खां ने दाऊद खां को खूब लानत-मलामत की, जिससे दोनों में तनाज़ा हो गया। जब यह बात जयसिंह जी को मालूम हुई तो उन्होंने दाऊद खाँ को अपने पहले के स्थान पर वापस भेज दिया और खिड़की के सामने पुरदिलखां ओर शुभकरण बुन्देला को नियुक्त किया। परन्तु इससे भी कुछ फायदा नहीं हुआ। शुभकरण ने इस कार्य में बिलकुल दिलचस्पी नहीं दिखाई। दिलचस्पी दिखाना तो दूर रहा, वह तो शिवाजी के साथ सहानुभूति दिखलाने लगा। उधर दाऊद खाँ भी अपने स्थान पर उधम मचाने लगा। वह बार बार यह अफ़वाह फेलाने लगा कि पुरंदर के किले पर अधिकार कर लेना बिलकुल असंभव है इसलिये इस पर घेरा डालना सेना और द्रव्य का दुरुपयोग करना है। जयसिंहजी के मतानुसार यह अफवाह फलाने में दाऊद खाँ का आशय यह था कि इससे खास सेना नायक निराश हो जाये और वह दिलेर खाँ को हृदय से मदद न दे ताकि दिलेर खाँ पर घेरे का तमाम भार पड़ जाये और अन्त में वह अपने कार्य में असफल मनोरथ होकर लज्जा के साथ वापस लौट जाये

 

 

जयसिंह जी दाऊद खां के हृदयगत भावों को ताड़ गये। इसलिये उन्होंने तुरन्त एक युक्ति ढूंढ़ निकाली। एक इधर उधर घूमती रहने वाली सेना की टुकड़ी बनाई गई ओर दाऊद खाँ को उसका नायक
नियुक्त करके आसपास के भिन्न भिन्न मराठों के गाँवों पर लगातार हमले करते रहने के लिये भेज दिया। 25 वीं अप्रेल को दाऊद खां की अधीनता में 6000 मज़बूत सिपाहियों की उक्त टुकड़ी, जिसमें कि राजा रायसिंह, शरजाखाँ ( बीजापुरी जनरल ) अमरसिंह चन्दावत, अचलसिंह कछवा और खुद जयसिंहजी के 400 सिपाही भी थे। दोनों बाजुओं से उनकी सेना राजगढ़, सिंहगढ़ और रोहिरा की सीमा में लूट खसोट मचाने के लिये रवाना हुईं। इस सेना को रवाना होते समय यह हुक्म दिया गया था कि “उक्त प्रदेश में एक भी खेत व गाँव का निशान तक न रहने पाये तमाम बर्बाद कर दिये जाये”। फौज़ की एक दुसरी टुकड़ी कुतुबुद्दीनखाँ और लूदीखाँ की आधीनता में उत्तरीय ज़िलों को बर्बाद करने के लिये भी भेज दी गई कि जिससे शिवाजी सब तरह से बर्बाद होकर घबरा जांये। 27 वीं तारीख को दाऊद खाँ की सेना रोहिरा के किले के पास पहूँची। उसने क़रीब क़रीब 50 गाँवों को जलाकर बिलकुल तहस-नहस कर डाले। कुछ मुगल सैनिक चार ऐसे आबाद गाँवों में जा पहुँचे जहाँ कि मुगल-सेना पहले कभी नहीं पहुँची थी। फिर कया था। उन सैनिकों ने तमाम सेना को वहाँ बुला ली। जिन जिन ने सामना किया वे धराशायी कर दिये गये, गाँवों पर अधिकार कर लिया गया, वे लूट लिये गये और अन्त में जला दिये गये। यहां एक दिन ठहर कर मुग़ल सेना 30वीं तारीख को राजगढ़ की तरफ अग्रसर हुई। रास्ते में जो जो गाँव आये, वे सब के सब जला दिये गये। किले पर अधिकार नहीं करते हुए, जिसके लिये कि वे तेयार भी नहीं थे— उन्होंने आसपास के गांवों को लूटना और नष्ट भ्रष्ट करना शुरू किया। यह सब भयंकर कार्य राजगढ़ के किले के रक्षक सैनिक, तौपों की आड़ में बैठे बैठे देख रहे थे परन्तु मुगल सेना पर आक्रमण करने की उनकी हिम्मत नहीं हुई। इस जिले के आस पास की ज़मीन विषम और पहाड़ी थी। इस लिये मुग़ल सेना चार मील पीछे हटकर गुंजनखोरा के दर्रें के पास की सम भूमि में ठहरी। आज रात को इस सेना ने यहीं विश्राम किया। दूसरे दिन यह सेना शिवापुर पहुँची। यहाँ से दाऊद खाँ ने सिंहगढ़ की तरफ जाकर उसके आसपास के मुल्क को बर्बाद किया। अन्त में 3 मई को महाराजा जयसिंह जी के हुक्म से वह पूना जा हाज़िर हुआ।

 

 

इस समय कुतुबुद्दीन खाँ, कुनारी के किले के पास के पुरखौरा और तासीखोरा नामक दर्रों में स्थित गांवों को बर्बाद करने में लगा हुआ था। जयसिंह जी ने इसे भी एक दम पूने बुला लिया। इस नये हुक्म का कारण यह था कि शिवाजी ने इस समय लोहगढ़ के पास एक बड़ी भारी सेना एकत्रित कर ली थी जिसको कि नष्ठ करना जयसिह जी ने ज्यादा जरूरी समझा। उक्त निश्चय के अनुसार जयसिंह जी ने दाऊद खां और कुतुबुद्दीन खां को अपनी 4 टुकड़ियों के साथ लोहगढ़ की तरफ रवाना किया। पूना से प्रस्थान करके यह सेना 4 मई तारीख को चिंचचाड़ ठहरी और 5 वीं तारीख को लोहगढ़ जा पहुँची। ज्योंही मुगल सेना के कुछ सिपाही किले के पास पहुँचे त्योंही मराठी सेना के 500 सवारों और 1000 पैदल सिपाहियों ने उन पर आक्रमण कर दिया। परन्तु शाही सिपाहियों ने उन का अच्छा मुकाबला किया। इतने ही में और शाही सेना आ गई। भयंकर युद्ध होने के बाद मराठे हार गये और उनका नुकसान भी बहुत हुआ। विजयी मुग़ल सेना ने पहाड़ी की तलहटी में स्थित कई गाँवों को जला दिया। जाते समय वे कई जानवर भी पकड़ ले गये। मराठों के कई आदमी मुगलों के कैदी बने। इसके बाद मुगल सेना ने लोहगढ़, तिकोना, बिसापुर और तांगाई के किलों के आसपास के प्रदेश और बालाघाट तथा मैनघाट के प्रदेशों पर हाथ साफ किया। इतना हो जाने पर मुगल सेना वापस लौट गई। कुतुबुद्दीन खाँ पूने के पास के थाने पर चला गया और दाऊद खाँ अपने साथियों सहित 15 दिन की गेरहाज़िरी के बाद 19 वीं मई को फिर से मुग़ल सेना में जा मिला।

 

 

घेरे को विफल करने के लिये मराठों के प्रयत्न

 

इधर जयसिंह जी शिवाजी को कुचल डालने के प्रयत्न कर रहे थे।
उधर मराठा सेना नायक भी चुप नहीं बेठे हुए थे। वे मुगल सेना को त्रस्त करके घेरे को उठा देने के लिये जी तोड़ परिश्रम कर रहे थे। अप्रेल के आरंभ में नेताजी पालकर ने–जो कि शिवाजी के रिश्तेदार ओर घुड़ सवारों के नायक थे, परेन्दा के किले पर भयंकर आक्रमण किया; परन्तु सूपा नामक स्थान से मुगल सेना के आने के समाचार सुनकर मराठी सेना इधर उधर बिखर गई। इससे शत्रु का मुकाबला न हो सका। इसके बाद मई के अन्त में उरोदा नामक स्थान पर मराठे एकत्रित हुए थे, पर कुतुबुद्दीन को यह खबर लग गई। उसने वहाँ जाकर उन्हें इधर उधर बिखेर दिया । रास्ते में जो जो गाँव आये, कुतुबुद्दीन ने सबको लूट लिया। उसने जहाँ कहीं मराठों को अपने किलों के पास एकत्रित होते देखा कि तुरन्त उनको तितर बितर कर दिया। लोहगढ़ के किले पर हमला कर दिया गया और वहाँ पर स्थित मराठे सैनिक कत्ल कर दिये गये तथा भगा दिये गये। दाऊद खाँ 300 कैदियों और 3000 चौपायों के साथ वापस लौट आया। इसके पश्चात्‌ नारकोट में 3000 मराठे घुड सवार एकत्रित हुए पर पूना के नवीन थानेदार कुबदखाँ ने उनको वहाँ से भी भगा दिया। लौटते समय उक्त थानेदार कई किसानों और चौपायों को पकड़ लाया। पाठक ? उपरोक्त बातों से यह खयाल न कर लें कि मराठे जगह जगह हारते ही गये। उन्होंने भी कई जगह मुगल-सेना को बड़ी बुरी तरह झकाया था। स्वयं जयसिंहजी ने कहा था कि “कहीं कहीं हमें शत्रुओं द्वारा चली हुई चालों को रोकने में विफल मनोरथ भी होना पड़ा है।” सफीखाँ ने तो ओर भी साफ साफ कहा है कि “शत्रुओं ने कई बार अँधेरी रात में अचानक हमले करके, रास्तों तथा मुश्किल दर्रों की नाके बंदी करके और जंगलों में आग लगाकर शाही सैनिकों की गतिविधि को एकदम बन्द कर दी थी। मराठों द्वारा उपस्थित की गई उपरोक्त बाधाओं के कारण मुगलों को कई आदमी तथा चौपायों से हाथ धोना पड़ा था।अप्रैल मास के मध्य में जब वज्रगढ़ पर मुगलों का अधिकार हो गया तब दिलेरखाँ ने आगे बढ़कर माची (पुरंदर के नीचे के किले) पर घेरा डाल दिया। उसने किले के उत्तर पूर्वीय कोण तक अर्थात् खण्डकाला के किले तक खाइयाँ खुदवा दीं। किले की रक्षक सेना ने घेरा डालने वालो का विरोध किया। एक दिन रात्रि के समय उन्होंने किरत सिंह पर हमला किया, पर किरत सिंह लड़ने के लिये बिलकुल तैयार था इसलिए उसने उन्हें वापस हटा दिया। इस हमले में मराठों के बहुत से आदमी काम आये। इसके बाद एक दिन अंधेरी रात में मराठों ने रसूलबेग रोजभानी के मोर्चो पर अचानक हमला कर दिया। रसूलबेग के 15 सिपाही घायल हुए और उसकी तोपों में कीले ठोक दिये गये। पर हल्ले-गुल्ले के कारण आसपास के मोर्चों के मुगल सैनिक रसूलबेग की सहायतार्थ आ गये जिससे मराठों को वापस हट जाना पड़ा। दूसरे दिन फिर एक छोटी सी लड़ाई हुईं जिसमें मुगलों के 8 आदमी मारे गये। पर दिलेर खाँ इससे तनिक भी विचलित नहीं हुआ ओर कृतान्त के समान पुरंदर के सामने डटा ही रहा। उसके सिपाही भी बड़े उत्साह से काम करते थे। जिस कार्य को करने में दूसरा आदमी एक मास लगा देता उसी को वे एक दिन में कर डालते थे।

 

पुरंदर की बाहरी दीवार पर गोलाबारी

 

 

दिलेरखाँ ने भयानक गोलाबारी करके दोनों किलों की बाहरी दीवारों को बिलकुल नष्ट भ्रष्ट कर डाला मई के मध्य तक मुगल- सेना के मोर्चे उक्त किलों की सतह तक जा पहुँचे। अब किलों की रक्षक सेना ने शत्रुओं पर जलता हुआ तेल, बारूद की थेलियाँ, बम तथा भारी भारी पत्थर बरसाने शुरू किये। इससे मुगल सेना की गति रुक गई। यह देख जयसिंहजी ने लक्कड़ों और पटियों द्वारा एक ऊँचा मचान बनवाने तथा इस मचान पर दुश्मन का मुकाबला करने के लिये तोपें चढ़ाई जाने और साथ ही कुछ बन्दुकची भी यहाँ खड़े किये जाने का हुक्म दिया। दो वक्त मचान खड़ा किया गया, पर दोनों ही बार वह शत्रुओं द्वारा जला दिया गया। इसके लिये भी जयसिंहजी ने युक्ति ढूँढ़ निकाली। उन्होंने रूपसिंह राठोर और गिरिधर पुरोहित को हुक्म देकर पहले किले के सामने एक दीवार खड़ी करवा दी। साथ ही उन्होंने कुछ राजपूत तीरंदाजों को अपने तीरों के निशाने किले की तरफ करके खड़े कर दिये। इन्होंने मराठों को किले के ऊपर चढ़ने न दिया। इस प्रकार का बन्दोबस्त कर लेने पर मचान निर्विष्नता पूर्वक बनाया जाने लगा। इस समय सूर्यास्त होने में दो घंटे शेष रह गये थे। अभी तोपें मचान पर चढ़ाई भी नहीं गईं थीं कि कुछ रोहिले सिपाहियों ने बिना दिलेर खाँ को सूचित किये ही सफ़ेद किले पर गोले बरसाना शुरू कर दिया। मराठे सैनिकों के झुन्ड के झुन्ड दीवार पर इकट्ठे हो गये ओर उन्होंने मुगलों की गोलाबारी बन्द कर दी। पर मुगल सेना की सहायतार्थ और भी बहुत सी सेना आ गई और साथ ही दोनों तरफ के मोर्चों पर सैनिक सीढ़ियों द्वारा चढ़ चढ कर मराठों की तरफ झपटने लगे। जयसिंहजी की तरफ का भूपतसिंह पवार जो कि 500 सैनिकों का नायक था सफ़ेद किले की दाहिनी बाजू पर कई राजपूतों के साथ काम आया। बाई बाजू पर बालकृष्ण सम्बावल ओर दिलेरखाँ के कुछ अफगान सिपाही लड़ रहे थे। इसी समय किरत सिंह और अचलसिंह भी, जो कि अभी तक लकड़ी के मचान का आश्रय लिये बेठे थे, लडाई के मैदान में आ धमके। भयंकर मारकाट चलने लगी। मराठों का बहुत नुकसान हुआ और उन्होंने पीछे हटकर काले किले में जाकर आश्रय लिया। यहाँ से इन्होंने फिर मुगल-सेना पर बम गोले, बारूद, पत्थर और जलनेवाले पदार्थ फेंकना शुरू किया। आगे बढ़ना असम्भव समझ महाराजा जयसिंह जी को आज तीन ही बुर्जों पर अधिकार कर सन्तोष मानना पड़ा। उन्होंने अपनी सेना को वहीं ( जहाँ तक कि वे पहुँच गये थे ) अपने मोर्चे क़ायम करने का हुक्म दिया। और सफेद किले को अधिकृत कर उस दिन आगे बढ़ने के कार्य को उन्होंने स्थगित रखा।

 

 

इसके बाद दो दिन उक्त लकड़ी के मचान को सम्पूर्ण करने में लगे। सम्पूर्ण कर लेने पर दो हलकी तोपें भी उस पर चढ़ा दी गई। अब मुगल सेना ने यहाँ से शत्रु की काली बुर्जे पर गोलाबारी करना शुरू किया। इस गोलाबारी से तंग आकर मराठे सैनिक काली बुर्ज एवं उसके पास की दूसरी बुर्ज़ से भी पीछे हट गये। उन्होंने किले की दीवार से लगे हुए मोर्चों में जाकर शरण ली, पर अब वे अपने सिरो को ऊपर नहीं निकाल सकते थे। निदान उक्त मोर्चा में भी उनकी रक्षा नहा सकी। और आखिरकार वे उसके पीछे की खाइयों के पास चले गये। इस प्रकार पुरन्दर के नीचे के किले की 5 बुर्जो’ और किले के एक मोर्चे पर मुगलों का अधिकार हो गया। अब मराठों के हाथों में पुरंदर के रह जाने की कोई आशा नहीं रह गई थी ‘ वह तो पहिले ही करीब करीब मुगलों के अधिकार में आ सा गया था कि इधर जयसिंह जी की माँग के मुवाफिक़ बादशाह ने एक भारी तोपखाना और भी रवाना कर दिया। किले के रक्षक सिपाही गिनती में कुल 2000 थे जिनमें से कई तो लगातार दो महीने की लड़ाई में काम आ गये थे। घेरे के आरंभ में ही उनका बहादुर सेनानायक मुरार बाजीराव वीरगति को प्राप्त हो गया था। इधर मुगल सेना की संख्या मराठों की सेना से क़रीब करीब दस गुनी थी। मुरार बाजीराव ने अपने 700 चुने हुए वीर सिपाहियों के साथ दिलेर खां पर उस समय हमला किया था जब कि वह अपने 5000 अफ़गान सैनिकों व कुछ दूसरे सिपाहियों के साथ पहाड़ी पर चढ़ने की कोशिश कर रहा था। इस समय मराठे सैनिक एक दम शत्रु पर टूट पढ़े। वे शत्रु-सेना में मिश्रित हो गये। भयंकर मार-काट चलने लगी। मुरार बाजीराव ने बात की बात
में अपने सैनिकों की सहायता से 500 पठानों व दूसरे सैनिकों को धराशायी कर दिया। अब वह अपने 60 मजबूत साथियों के साथ दिलेरखां के खेमे की तरफ झपटा। उसके कई साथी मुग़लों की अगणित सेना के हाथों मारे गये। परन्तु इससे मुरार बाजीराव की गति रुकी नहीं। वह दिलेरखाँ की तरफ बढ़ता ही गया। दिलेरखाँ भी मरार बाजीराव के अद्वितीय साहस को सराहने लगा। उसने उन्हें कहला भेजा कि अगर आत्मसमर्पण कर दोगे तो हम तुम्हारे प्राणों की रक्षा करेंगे और साथ ही तुम्हें अपनी सेना में एक उच्च स्थान भी प्रदान करेंगे। पर वीर मुरार ने शत्रु के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। इतना ही नहीं, वह दिलेर खाँ पर वार करने के लिये झपटा कि इतने ही में दिलेर खाँ ने एक तीर में उसका काम तमाम कर दिया। इस प्रकार मराठा सेना-नायक वीर मुरारबाजी अपने स्वामी की सेवा करते करते परलोक सिधारा। इस लड़ाई में मराठी सेना के 300 आदमी कास आये और बाकी बचे हुए वापस किले में लोट गये। मुरारबाजी के अधीनस्थ सैनिकों की बहादुरी एवं साहस को देखकर ग्रीस के स्पार्टंन लोगों की बात याद आ जाती है। अपने सेना-नायक के वीर-गति को प्राप्त हो जाने पर भी उक्त महाराष्ट्र वीर बहादुरी के साथ मुग़लों का सामना करते रहे। वे कहते रहे कि “मुरारबाजी के मर जाने से क्‍या हुआ ? प्रत्येक सैनिक मुरारबाजी है। इसलिये हम उसी साहस और उत्साह के साथ लड़ते रहेंगे। पर जयसिंहजी भी मज़बूती और सफलता के साथ आगे बढ़ते ही गये। पुरन्दर चारों तरफ से बिलकुल घेर लिया गया। दो मास की लगातार लड़ाई के कारण उसके रक्षक सैनिकों की संख्या बहुत कम रह गईं थी। इधर नीचे के किले की पाँच बुर्जो ‘ पर मुगलों का अधिकार हो ही गया था। उक्त कारणों से अब पुरंदर की रक्षा करना मराठों के लिये दुस्साध्य हो गया। मालूम नहीं होता था कि किस समय पुरन्दर पर मुगलों का अधिकार हो जाये। छत्रपति शिवाजी को महसूस होने लग गया था कि अब किले की रक्षा करते रहना निर्थक होगा। इसके अतिरिक्त उनको यह भी ख्याल हुआ कि अगर इस दुर्ग पर मुगलों का अधिकार हो गया तो इसमें रक्षित समस्त मराठे सरदारों के कुटुम्बी जन मुग़ल सेना के हाथ पड़ जायेगे। मुगल सेना उनका निरादर करेगी। इधर उधर घूमकर देश को नष्ट भ्रष्ट करने वाली मुग़ल सेना को वे रोकने में असमर्थ हुए। इस प्रकार इस समय शिवाजी जिधर दृष्टि डालते, उधर ही उन्हें असफलता और विनाश का दृश्य दिखाई पड़ता था। मुगलों द्वारा 2 जून को प्राप्त की गई विजय तथा पुरंदर के नीचे वाले किले के अपने हाथों से निकल जाने की संभावना, आदि आदि कुछ ऐसी घटनाएँ उपस्थित हो गई थीं जिनके कारण शिवाजी ने महाराजा जयसिंह जी से मिलकर मुगलों के साथ सुलह करने का निश्चय कर लिया अपने उक्त निश्चय के अनुसार शिवाजी ने जयसिंह जी से कहला भेजा कि अगर आप शपथ के साथ मेरी प्राण-रक्षा और सकुशल वापस घर लौट आने का जिम्मा लें तो में आप से मिल सकता हूँ। यह बात दूसरी है कि मेरी शर्तें आपको मंजूर हों या न हों।

 

 

पुरंदर की संधि शिवाजी और जयसिंह जी

 

मिर्जाराजा जयसिंहजी ने पुरंदर में शिवाजी पर विजय प्राप्त की।
पुरंदर के किले एक एक करके जयसिंह जी के हाथ में आ गये। अब शिवाजी ने जयसिंहजी से मिलकर संधि की नई शर्तें पेश करने का निश्चय किया। पर साथ ही में शिवाजी ने जयसिंह जी से प्रतिज्ञा पुर्वक इस बात का आश्वासन ले लिया कि चाहे संधि की शर्तें मंजूर हों, या न हों, पर उनकी सुरक्षिता में किसी प्रकार की बाधा उपस्थित न होने पावेगी। तारीख 11 जून को शिवाजी पालकी में बैठकर जयसिंह जी से मिलने के लिये डेरे पर गये। जयसिंहजी ने अपने मंत्री उदयराज और उग्रसेन कछवा को बहुत दूर तक उनकी अगवानी के लिये भेजा, साथ ही यह भी कहलवाया कि अगर आप सब किले हमारे सुपुर्द कर देने को तैयार हों तो आवे वरना लौट जायें। शिवाजी ने यह बात स्वीकार कर ली ओर वे अपने दो आदमियों के साथ जयसिंह जी के डेरे पर आ गये। जयसिंहजी ने कुछ आगे बढ़कर उनका स्वागत किया। उन्हें अपने गले लगाया तथा अपने पास बैठाया। इतना होते हुए भी जयसिंह जी ने कुछ खतरा समझकर सहस्त्र आदमियों का पहरा रखा। आधी रात तक महाराजा जयसिंह जी और शिवाजी में बातचीत होती रही। सुलह की शर्तों के सम्बन्ध में बहुत बहस हुई। जयसिंह जी को अपनी सुदृढ़ स्थिति का पूरा पूरा विश्वास था। उनके पीछे हिन्दुस्तान के बादशाह की ताक़त का पूरा पूरा ज़ोर था। अतएव इस समय उन्‍होंने शिवाजी पर दबाव डालकर अपने अनुकुल पुरंदर संधि की शर्तें तय करवाई। वे इस प्रकार हैं:—

छत्रपति शिवाजी के किलों में से 23 किले जिनकी जमीन की आय 4 लाख है, मुगल साम्राज्य में मिला लिये जावें, शेष 12 किले जिनकी जमीन की आमदनी 1 लाख है– शिवाजी के आधीन इस शर्ते पर रहें कि वे शाही तख्त के खेरख्वाह बने रहें। इसके दूसरे दिन (12 जून को) मुगल सेना ने पुरन्दर में प्रवेश कर उस पर अधिकार कर लिया। तमाम फौजी सामान मुगल अफसरों के हाथ लगा। शिवाजी ने सुलह के अनुसार 23 किले जयसिंहजी के सुपुर्द कर दिये। इतना होने के पश्चात्‌ जयसिंहजी शिवाजी को मुगल दरबार में उपस्थित करने का प्रयत्न करने लगे। यह काम बड़ा ही मुश्किल था। क्योंकि सुलह की बातचीत के समय शिवाजी ने मुगल दरबार में हाजिर न होने के लिये साफ साफ कह दिया था। हाँ, उन्होंने अपने पुत्र को मुगल दरबार में भेजना स्वीकार कर लिया था। इसके कई कारण थे। पहली बात तो यह थी कि, शिवाजी को धूर्त औरंगजेब पर बिलकुल विश्वास न था। वे उसे पक्का विश्वासघाती और दुष्ट-स्वभाव का समझते थे। दूसरी बात यह थी कि उन्हें मुसलमान बादशाह के सामने सिर झुकाना बहुत बुरा मालूम होता था। वे बादशाह से दिली नफरत करते थे। महाराज शिवाजी स्वतंत्रता के पवित्र वायु-मंडल में पले थे। उनकी नस नस में स्वतंत्रता का पवित्र रक्त प्रवाहित हो रहा था। ऐसी दशा में उन्हें शाही तख्त के सामने हाथ जोड़े हुए खड़ा रहना कब पसन्द हो सकता था। जयसिंहजी ने शिवाजी को बहुत कुछ प्रलोभन दिया और कहा कि बादशाह आपको दक्षिण का वायसराय (सूबेदार) बनाकर भेज देंगे। साथ ही साथ इसी प्रकार के ओर भी कई प्रलोभन दिये गये। जयसिंहजी ने शपथ पूर्वक इस बात की प्रतिज्ञा की कि दिल्ली में आपको किसी प्रकार का धोखा न होगा। तब शिवाजी ने अपने कई मराठा सहयोगियों की सलाह से दिल्ली जाना निश्चय किया। सन्‌ 1666 के तीसरे सप्ताह में वे अपने बड़े पुत्र सम्भाजी, 7 विश्वासपात्र अधिकारी और 4 हज़ार सेना के सहित आगरा के लिये रवाना हुए। उन्हें मुगल सम्राट की आज्ञा से दक्षिण के खजाने से 1 लाख रुपया मार्ग-व्यय के लिये दिया गया। जयसिंहजी ने गाजीबैग नामक एक फौजी अधिकारी को शिवाजी के साथ भेजा। 9 मई को शिवाजी आगरा पहुँचे। 12 मई का दिन सम्राट से आपकी मुलाकात के लिये निश्चित किया गया।

 

 

इस दिन सम्राट औरंगजेब की 50 वीं वर्षगाँठ थी। आगरा का
किला खूब सजाया गया था। बड़े बड़े राजा महाराजा तथा अन्य दरबारी सम्राट का अभिवादन करने के लिये उपस्थित हो रहे थे। ये सब लोग शाही तख्त के सामने बढ़े अदब के साथ खड़े थे। जब शिवाजी वहाँ पहुँचे तो कुंवर रामसिंह जी ने आगे बढ़ कर उनका स्वागत किया। शिवाजी ने सम्राट को 1500 सोने की मुहरें नज़र की और 6000 उन पर न्योछावर किये। ओरंगजेब जोर से बोला “आवो राजा शिवाजी” पर थोड़ी ही देर के बाद सम्राट के संकेत से वे पीछे ले जाये गये और वे वहाँ खड़े किये गये जहाँ तीसरे दर्जे के सरदार खड़े थे। यह व्यवहार शिवाजी को बहुत बुरा मालूम हुआ। इस अपमान से उनका अन्तःकरण जलने लगा, उनकी आँखों से
मानों चिंगारियाँ निकलने लगीं। वे कुंवर रामसिंह जी से गुस्सा होकर जोर से बोलने लगे। इस समय बादशाह और सब दरबारियों का ध्यान इस घटना की ओर गया। रामसिंह जी ने शिवाजी को शान्त करने का बहुत यत्न किया, पर कोई फल नहीं हुआ।शिवाजी गुस्से से इतने बेकाबू हो गये कि वे नीचे गिर पड़े। इस पर बादशाह ने पूछा, क्या बात है ? रामसिंह जी ने उत्तर दिया “यह सिंह जंगल का जानवर है, यहाँ की गर्मी इसके लिये असहय है, इसीलिये यह बीमार हो गया है।” इसके बाद कुँवर रामसिंह जी ने मज़लिसे ए आम में शिवाजी के इस व्यवहार के लिये क्षमा प्राथना करते हुए कहा कि–“थे दक्षिणी है ओर दरबार तथा शिष्टाचार की पद्धवियों से अपरिचित हैं।” औरंगजेब ने शिवाजी को वहाँ से हटा कर एक अलग कमरे में ले जाने की आज्ञा दी, साथ ही साथ उन पर गुलाब जल छिड़कने के लिये भी कहा। दरबार से लौट जाने पर शिवाजी ने औरंगजेब पर विश्वास घात का आरोप लगाया और उसे कहलवाया कि इससे तो बेहतर है कि तुम मेरी जान ले लो। यह बात औरंगजेब के कानों तक पहुँची। वह बहुत नाराज हुआ, उसने कुँवर रामसिंह जी को आज्ञा दी कि वह शिवाजी को शहरपनाह के बाहर जयपुर हाऊस में रख दे और उसकी निगरानी के लिये जिम्मेवार बने।

 

 

बस, फिर क्या था, शिवाजी बंदीगृह में पड़ गये। वे इस व्यवहार
से महादुखी हुए। उन्होंने अपनी मुक्ति के लिये कई ज़रियों से बड़ी कोशिश की पर असफल हुए। आखिर में शिवाजी ने किस युक्ति से अपनी मुक्ति की, यह बात इतनी जनश्रुत है कि यहाँ इस पर विशेष प्रकाश डालने की आवश्यकता नहीं। हाँ, यहाँ हम एक बात पर अवश्य पाठकों का ध्यान आकर्षित करेंगे। राजा जयसिंहजी ओर उनके पुत्र रामसिंह जी ने शिवाजी की सुरक्षिता के लिये जो प्रतिज्ञा की थी, उसका यथाशक्ति पालन किया। राजा जयसिंहजी ने जब शिवाजी की इस अवस्था का समाचार सुना तो वे दुःखी हुए । उन्होंने सम्राट से यह अनुरोध किया कि शिवाजी को कैद करने या मारने से ये किसी प्रकार का लाभ न उठा सकेंगे। शिवाजी को मित्र बनाने ही से सम्राट दक्षिण में अपनी सल्तनत को मज़बूत कर सकते हैं, और इसी से वे लोगों का विश्वास भी ग्रहण कर सकते हैं। उस समय राजा जयसिंह जी ने अपने पुत्र रामसिंह जी को जो अनेक पत्र लिखे थे, उसमें शिवाजी की सुरक्षिता के लिये बड़ा अनुरोध किया गया था। कुछ फ़ारसी इतिहास वेत्ताओं का मत है कि शिवाजी के निकल भागने के षड्यंत्र में राजा जयसिंह जी ओर उनके कुँवर रामसिंह जी का भी अप्रत्यक्ष हाथ था।

 

 

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