पानीपत का द्वितीय युद्ध कब हुआ था – पानीपत का दूसरा युद्ध किसके बीच हुआ

पानीपत का प्रथम युद्ध इसके बारे में हम अपने पिछले लेख में जान चुके है। अपने इस लेख में हम पानीपत का द्वितीय युद्ध कब हुआ था और इससे जुड़े निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर जानेंगे:— पानीपत का दूसरा युद्ध कब हुआ था? पानीपत का द्वितीय युद्ध किसके बीच हुआ था? पानीपत का द्वितीय युद्ध में किसकी जीत हुई थी? पानीपत का द्वितीय युद्ध क्यों हुआ था? बादशाह हुमायूं की मृत्यु कब और कैसे हुई? शेरशाह सूरी की मृत्यु कब औ कैसे हुई थी? बादशाह अकबर का जन्म कब हुआ था? बादशाह अकबर का राज्याभिषेक कब हुआ था? आदि के बारे में विस्तार से जानेंगे, सबसे पहले हम पानीपत का द्वितीय युद्ध से पहले की परिस्थितियों के बारे में जानते हैं…

 

 

पानीपत का द्वितीय युद्ध से पहले शेरशाह ओर भारत के दूसरे राज्य

 

 

कन्नौज के युद्ध में हुमायूं की पराजय के बाद भारत के राजनीतिक क्षेत्रों में फिर परिवर्तन हुए। दिल्‍ली के मुगल बादशाह हुमायूं को जीतकर शेरशाह सूरी ने अपने राज्य को विस्तृत बनाने की चेष्टा की, अपनी प्रबल शक्तियों के साथ-साथ वह एक महान राजनीतिज्ञ था। विरोधी शक्तियों को पराजित करने और सफलता प्राप्त करने में उन दिनों वह भारत में अद्वितीय हो रहा था। शेर शाह सूरी की विजय के दो प्रमुख कारण थे, एक तो उसकी शक्तिशाली अफ़ग़ान सेना ओर दूसरी उसकी राजनीतिक चतुरता सफलता प्राप्त करने के लिए किसी प्रकार की चालों का आश्रय लेना, राजनीति में अपराध नहीं होता। इस गुण में शेर शाह अत्यन्त प्रवीण था राजनीति में असफलता अपराध है। जीवन के आरम्भ से लेकर शेर शाह की समस्त सफलताओं का कारण उसकी राजनीतिक दूरदर्शिता थी।

 

 

दिल्‍ली के इब्राहीम लोदी और चित्तौड़ में राणा सांगा को पराजित
करने के बाद बाबर ने भारत के राजनीतिक वातावरण को बहुत-कुछ शान्त बना दिया था। हुमायूं की पराजय के बाद, उस वातावरण में फिर अशान्ति उत्पन्न हो गई थी। शेर शाह के विस्तृत राज्य के दक्षिण और राजपूताना, मालवा और बुन्देलखण्ड के राज्य सुरक्षित हो रहे थे। बहादुर शाह की मृत्यु के पश्चात गुजरात और मालवा में कई एक छोटे छोटे राजा और सुलतान पैदा हो गये। मेवाड़ राज्य की अवस्था अत्यन्त असंतोषजनक चल रही थी। वहां के आपसी झगड़ो ने उस राज्य को भीतर से खोखला बना दिया था और उन्हीं परिस्थितियों में राणा सांगा का छोटा लड़का उदयसिंह राज्य का अधिकारी हुआ था। भारत के पश्चिमीय प्रदेश मालदेव के अधिकार में आ गये थे। राज्याधिकारी होने के बाद पाँच वर्ष के भीतर उसने दक्षिण को ओर आबु तक, उत्तर की ओर बहावलपुर, नागौर, बीकानेर और मकर तक एवंम पूर्व॑ की ओर अजमेर से लेकर अम्बेर राज्य तक अपने राज्य का विस्तार कर लिया था। पानीपत का द्वितीय युद्ध का वर्णन जारी है…..

 

 

 

शेर शाह के राज्य का विस्तार

 

कन्नौज के युद्ध को जीतने के बाद, शेर शाह ने ग्वालियर के किले पर घेरा डाला था। उस किले में पहले से मुगल सेना मौजूद थी और उसका कार्य किले की रक्षा करना था। लेकिन जब उसने सुना कि कन्नौज में मुगल बादशाह हुमायूं की भयानक पराजय हुई हैं और मुगल सेना का संहार करके शेर शाह ने मुगलों का पीछा किया है तो ग्वालियर के किले की मुगल सेना का साहस टूट गया और उसने अफ़गानों के साथ युद्ध करने की जो तैयारी की थी, उसे रोककर उसने अफ़गानों के सामने आत्म-सभर्पण कर दिया। ग्वालियर का किला लेकर शेर शाह ने मालवा राज्य के कई प्रदेशों पर भी अधिकार कर लिया और उसके पूर्व में रायसेन पर भी उसने आक्रमण करके कब्जा कर लिया। इन्हीं दिनों में शेर शाह के सेनापति ने मुलतान और सक्खर पर भी अधिकार कर लिया।

 

 

राजपूताना और मालवा में अब भी मालदेव की शक्तियाँ अटूट हो
रही थीं। शेर शाह ने उस पर आक्रमण किया। राजा मालदेव शक्तिशाली होने के साथ-साथ, चतुर और दूरदर्शी था। राणा साँगा की तरह उसने शेर शाह की विशाल सेना के सामने अपनी सेना को झोंक देने की कोशिश नहीं की। शेर शाह जितना राजनीतिज्ञ था, उससे कम मालदेव न था। बहुत दिनों तक शेर शाह वहाँ पर घेरा डाल कर पड़ा. रहा। बीच-बीच में दोनों ओर की सेनाओं का कई बार सामना हुआ लेकिन शेर शाह की सेना मालदेव की सेना को पराजित न कर सकी। वह किसी प्रकार विजय प्राप्त करना चाहता था। कई बार युद्ध करके वह इस परिणाम पर पहुँचा कि मालदेव को सीधे लड़ कर पराजित नहीं किया जा सकता और पराजित करना अनिवार्य आवश्यक है।

 

 

 

शेर शाह ने बहुत सोच-विचार कर अपनी एक राजनीतिक चाल की परीक्षा की। अपने शिविर से उसने मालदेव के सरदारों के ताम पत्र भेजे। उन पत्रों का मालदेव तक पहुँचना स्वाभाविक था। मालदेव को अपने सरदारों पर सन्देह पैदा हो गया और उस दशा।में होने वाली पराजय से उसने सन्धि कर लेना आवश्यक समझा। मालदेव के सरदारों ने उसके सन्धि के प्रस्ताव का विरोध किया। उस समय मालदेव को सारी परिस्थिति बतानी पड़ी। सरदारों ने मालदेव की शंका का समाधान करना चाहा, लेकिन उनका प्रयत्न बेकार गया और मालदेव की आशंका ज्यों की त्यों बनी रही। सरदारों के साथ मालदेव के अविश्वास का समाचार जब शेर शाह को मिला तो उसे बड़ी प्रसन्नता हुई। उसे अपनी चाल में सफलता मिली। इस अवसर को अनुकुल समझ कर शेर शाह ने मालदेव पर आक्रमण की तैयारी की, लेकिन मालदेव ने अपने सरदारों पर अविश्वास पैदा हो जाने के कारण युद्ध करने से इन्कार कर दिया। सरदारों की अनेक चेष्टाओं के बाद भी जब मालदेव का अविश्वास दूर न हुआ तो विवश होकर सरदारों ने युद्ध की तैयारी की और राजपूतों की एक शूरवीर सेना को लेकर उन सरदारों ने शेरशाह का सामना किया। दोनों ओर से भयानक संग्राम हुआ और बहुत से सैनिक मारे गये। लेकिन राजपूतों ने पीछे की ओर घुम कर नहीं देखा। शेर शाह समझता था कि अविश्वास के कारण अपमानित होकर सरदार राजा मालदेव का साथ न देंगे और उस दशा में मालदेव की पराजय निश्चित है। लेकिन उसका यह अनुभव असत्य निकला। मालदेव के युद्ध में न सम्मिलित होने पर भी उसके सरदारों ने शेर शाह की अफ़ग़ान सेना के छक्के छुड़ा दिये। इस बार के युद्ध में शेर शाह के सैनिक अधिक संख्या में मारे गये और उसका साहस अब टूटने लगा।

 

 

 

युद्ध बन्द करके दोनों सेनायें वापस चली गयीं। मालदेव ने यह देख कर अपने सरदारों पर फिर से विश्वास किया और अपनी भूल का पश्चत्ताप किया। शेर शाह के हृदय में मालदेव के पराजित करने की अब कोई आशा बाकी न रह गयी थी। इसलिए शेर शाह अपनी सेना लेकर वापस चला गया। राजपूताना से लौटकर शेर शाह ने कालींज़र पर चढ़ाई को और वहाँ के किले को उसने घेर लिया। उसी मौके पर उसने अपने एक सेनापति को सेना के साथ रींवा की तरफ रवाना किया। शेर शाह कालींजर में घेरा डाल कर सात महीने तक वहाँ पर पड़ा रहा। अन्त में किले के सैनिकों ने आत्म समर्पण कर दिया। लेकिन उसी बीच में एक दिन बारूद में आग लग जाने के कारण शेर शाह भयानक रूप से जल गया और सन्‌ 1545 ईसवी में शेरशाह सूरी की मृत्यु हो गयी। पानीपत का द्वितीय युद्ध का वर्णन जारी है…..

 

 

 

हुमायूं के अन्तिम पंद्रह वर्ष

 

कन्नौज में पराजित होने के दिन से लेकर आगामी पन्द्रह वर्ष हुमायूं के भयानक विपदाओं मे व्यतीत हुए। शेर शाह ने जैसा निश्चय किया था, उसने वैसा ही किया और मुग़लों का आधिपत्य कुछ दिनों के लिए, उसने भारत से मिटा दिया। हुमायूं कन्नौज से भाग कर पंजाब की ओर चला गया था, वहाँ पहुँचने पर उसे शेर शाह के पंजाब में आने का समाचार मिला। अपने भाई कामरान से उसे पंजाब में कोई सहायता मिलने की आशा न रही तो वह पंजाब से भाग कर सिन्ध चला गया। हुमायूँ ने सिन्ध से बहुत कुछ आशा की थी। परन्तु वहाँ भी उसे निराश होना पड़ा। जीवन की इन भयानक परिस्थितियों में उसका परिवार उसके साथ था और बहुत थोड़े मुगल सैनिक और सरदार जिन पर वह विश्वास करता था साथ में रह गये थे। सिन्ध पहुँचने पर भी हुमायूं को किसी प्रकार की सफलता न मिली तो वह घबरा उठा। उसे संसार में कोई स्थान ऐसा दिखाई न देता था? जहाँ पर जा कर वह अपना और अपने परिवार का जीवन-निर्वाह कर सके और बाकी जिन्दगी बिता सके। इस भीषण विपत्तियों के समय उसको मालवा-राज्य के मालदेव राजा की याद आयी। कुछ दिन पहले राजा मालदेव ने हुमायूँ को आमंत्रित किया था। उसको समझ में आया कि राजा मालदेव ऐसे समय में सहायता कर सकता है। इस आशा को लेकर हुमायूँ अपनी बेगमों, सैनिकों और सरदारों को साथ में लेकर मालवा की तरफ रवाना हुआ औ वह सिन्ध से फलोदी पहुँच गया।

 

 

 

उन्हीं दिनों में शेर शाह को मालूम हो गया कि अपनी बेगमों का
लश्कर लिए हुमायूं मालवा पहुँच गया है तो वह तुरन्त मालवा की ओर रवाना हुआ शोर डिडवाड़ा तक जाकर उसने राजा मालदेव के पास सन्देश भेजा कि हमारे शत्रु हुमायूं को अपने राज्य से निकाल कर तुरन्त बाहर करो अथवा हमें उसको निकालने दो। शेर शाह का यह सन्देश पाकर राजा मालदेव बड़े असमंजस में पड़ गया। वह दूसरों के पीछे शेर शाह की शत्रुता मोल लेना नहीं चाहता था। इसलिए विवश होकर उसने अपने राज्य से हुमायूं और उसके साथ के सभी लोगों को निकल जाने की आज्ञा दे दी। हुमायूं के लिए मालदेव की यह आज्ञा बड़ी भयानक हो गयी। राज्य को छोड़कर चले जाने के सिवा उसके पास और उपाय क्या था। अपने परिवार और थोड़े से सैनिकों के साथ, रात के अन्धकार में चुपके से निकल कर हुमायूँ मालवा-राज्य से अमरकोट की तरफ चला गया। अमरकोट के आस-पास, चारों ओर बहुत दूर तक भारत की विशाल मरूभूमि फैली हुई थी। कुछ लोगों का कहना है कि प्राचीन काल में शक लोग इसी अमरकोट में रहा करते थे। मालवा से निकल कर हुमायूँ उसी अमरकोट में अपनी बेगमों, नौकरों, सैनिकों और थोड़े-से सरदारों को लिए हुए पहुंच गया।

 

 

 

इन दिनों में हुमायूँ’ की दुर्दशा सीमा पर पहुँच गयी थी। राज्य
भ्रष्ट होकर वह मारा-मारा फिरता था। कहीं पर उसे ठहरने के लिए
स्थान न मिलता था। समूचे भारत में बहुत से छोटे-छोटे राज्य थे।
शेर शाह के भय से कोई भी राजा हुमायूं को अपने राज्य में रहने
नहीं देता था। इससे अधिक आपत्ति एक राज परिवार के सामने और क्या हो सकती थी। हुमायू के जन्म के समय ज्योतिषियों ने सौभाग्य के सैकड़ों परिचय दिये थे। जब तक बाबर जीवित रहा हुमायूं सौभाग्यशाली बना रहा। पिता के मरने के बाद उसके जीवन में विपदाओं को आंधी शुरू हो गयी। मध्य एशिया के बदख्शाँ से लेकर भारत तक हुए साम्राज्य का जो स्वामी था, वह कुछ दिनों के बाद इस भयानक विपदा में आकर पड़ेगा, इसे कौन जानता था। प्रतापी बादशाह बाबर का वह सब से बड़ा लड़का था और अपने पिता का सबसे अधिक प्यारा था। जब तक बाबर संसार में रहा, हुमायूं के जीवन का वह प्यार सुरक्षित रहा और बाबर के मरने के बाद ही उसके जीवन का समस्त सौभाग्य और प्यार दुर्भाग्य और विपदाओं में बदल गया। उन दिनों में हुमायूं का कोई अपना घर न था, कोई द्वार न था, कोई अपना न था, कोई उसका सहायक न था। साम्राज्य के साथ-साथ उसका सब कुछ छुट गया। अपने पिता-बाबर के साम्राज्य का यदि वह अधिकारी न हुआ होता तो कदाचित उसके जीवन में इन भयानक विपदाओं के आक्रमण न होते। जो जितना ही बड़ा होता है’ उसकी सुविधायें और विपदायें भी उतनी ही बड़ी और महान होती हैं।

 

 

 

राजसिंहासन पर बैठने के साथ ही सगे भाईयों के विद्रोह आरम्भ
हो गये थे और बाबर के मरने के बाद हुमायूं को अपने चारों ओर
शत्रु दिखाई देने लगे थे। उनको दबाने के लिए जिस योग्यता और
प्रभुता की आवश्यकता थी, उनका उसके जीवन में अभाव था। बाबर की भाँति कठिनाइयों में जन्म लेकर उसने जीवन में संघर्षों पर विजय प्राप्त करना नहीं सीखा था। वह एक सम्राट का पुत्र था और इसीलिए वह उस विशाल साम्राज्य का अधिकारी बना था। लेकिन वह साम्राज्य उसका पैदा किया हुआ न था, इसलिए उसके अधिकार में वह अधिक दिनों तक न रह सका। अमरकोट में पहुँचने के बाद हुमायूं की दशा और भी अधिक भयानक हो उठी। खाने-पीने की कोई व्यवस्था न थी। जहाँ पर वह पहुँच गया था, विस्तृत मरुभूमि का वह एक ऐसा स्थान था, जहाँ पर मनुष्यों के साथ-साथ, पशुओं और पक्षियों का भी प्रभाव न था। इन विपदाओं में साथ रहना और जीवित रहना सब के लिए सम्भव नहीं होता। हुमायूं के साथ के बहुत से सैनिकों और सरदारों ने उसका साथ छोड़ दिया और वहाँ से भाग कर उन लोगों ने अपने प्राणों की रक्षा की। परन्तु हुमायूं उसकी बेगमें ओर साथ के कुछ आदमी उसके बाद भी अमरकोट में हो बने रहे। उन्होंने अपने साहस को नहीं छोड़ा। पानीपत का द्वितीय युद्ध का वर्णन जारी है…….

 

 

भीषण अन्धकार में प्रकाश की किरण

 

उस भयानक रेगिस्तानी प्रदेश में बिना किसी आश्रय के जीवित
रहने की कोई अवधि होती है। हुमायूं की विपदायें सीमा पार कर गयी थीं। कभी-कभी निराश होकर वह घबराने लगता था और कुछ उपायों की कल्पनायें करता था। एक बार उसने जैसलमेर और जोधपुर के महाराजाओं से आश्रय देने की प्रार्थना की थी। परन्तु उन दोनों में मनुष्यत्व न था। इसीलिए दोनों में से एक भी हुमायूं और उसके परिवार की सहायता न कर सका। निराश होकर हुमायूं फिर अपने जीवन के दिन व्यतीत करने लगा। तवारीखे फरिश्ताँ में हुमायूँ के इन भयानक दिनों का जिम प्रकार विस्तार के साथ वर्णन किया गया है, उसे पढ़कर हृदय विर्दीण होता है।

 

 

 

पानीपत का द्वितीय युद्ध
पानीपत का द्वितीय युद्ध

 

हुमायूं सभी प्रकार निराश हो चुका था। उसे किसी के आश्रय
की आशा नहीं रह गयी थी। लेकिन अमरकोट के सोदाराज से हुमायूं की वह निराश अवस्था देखी न गयी। उसने हुमायूं और उसके परिवार को बुलाकर आदर पूर्वक अपने यहाँ स्थान दिया। उन्हीं दिनों में छायाकुंज के भीतर अमरकोट में हमीदा बेग़म से 15 अक्टूबर सन्‌ 1542 ईसवी को हुमायूं के एक पुत्र उत्पन्न हुआ, उसका नाम जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर रखा गया। अकबर के जन्म के समय हुमायूँ उपस्थित न था, इसलिए उसके पास पुत्रोत्पन्न होने का समाचार भेजा गया। इस समाचार को सुनकर हुमायूं ने ईश्वर को धन्यवाद दिया। जीवन के भीषण अन्धकार में अकबर का जन्म सूक्ष्म प्रकाश के समान था। हुमायूँ के अन्तःकरण में इस सम्बाद को सुनकर प्रसन्नता का उद्रेक हुआ । आकस्मात उसके हृदय में एक आशा का संचार हुआ। उसने सोचा कदांचित अब जीवन की विपदाओं में कुछ परिवर्तन होगा।

 

 

 

राजा अमरकोट का आश्रय मिलने से हुमायूं को कुछ सहारा मिला अकबर के जन्म से हुमायूं के अन्तःकरण में संतोष का संचार
हुआ। अपनी इन विपदाओं के समय भी उसने साहस की रक्षा की थी। भयानक निराशाओं में भी उसने अपनी आशाओं को जीवित रखा था। सचमुच जो निराश होना नहीं जानता, उसी के जीवन में परिवर्तन होते हैं और सुख तथा सुविधाओं का फिर प्रादुर्भाव होता है। हुमायूं में अनेक अच्छे गुणा भी थे। वह निराश और असाहसी कभी नहीं होता था। सिन्ध और राजपूताना के मरु-प्रदेशों में वर्षो घूमकर और साहस के साथ जीवित रहकर उसने अनेक बार भारत में राज्य-स्थापना की चेष्टायें की। लेकिन उसे सफलता न मिली। फिर भी वह निराश नहीं हुआ। साम्राज्य के अगणित सुखों और सुविधाओं में वह पाला गया था। लेकिन जीवन के संघर्षों में विजय प्राप्त करने की शिक्षा तो भीषण कठिनाइयों और विपदाओं के द्वारा मिला करती है। इस शिक्षा का उसके जीवन में अभाव था। प्रकृति उसकी पूर्ति का प्रयत्न कर रही थी। राज्य स्थापना में अफसलल होने के बाद भी हुमायू निराश नहीं
हुआ। उसके पास सैनिक शक्ति का अभाव था। उसको सहायता की आवश्यकता थी। अकबर के जन्म के बाद भी उसने कुछ दिनों तक अमरकोट में समय व्यतीत किया। परन्तु जिस शक्ति का उसके पास प्रभाव था, उसकी खोज में वह बराबर बना रहा। दुर्भाग्य और विपदाओं के दिनों में कोई किसी की सहायता नहीं करता। इस बात को हुमायूँ से अधिक कौन समझेगा जिसके सगे भाइयों ने भी उसकी कोई सहायता न की थी। अपनी सफलता के लिए हुमायूं ने बहुत-सी बातें सोच डालीं और न जाने कितनी कल्पनाओं को वह सजीव बनाने की चेष्टा करता रहा। लेकिन सही रास्ता न मिलने पर भारत छोड़कर वह फ़ारस देश की ओर चला गया। वहाँ के बादशाह शाह तहमारस्प से हुमायूं ने भेंट की। वहाँ पर कुछ दिनों तक रहने के बाद, हुमायूं ने फ़ारस के बादशाह से सैनिक सहायता प्राप्त की और उसको लेकर वह भारत की ओर लौटा। सन्‌ 1545 ईसवी में उसने अपने भाई अस्करी से कन्धार जीतकर उसे अपने अधिकार में कर लिया और अपनी सेना को लेकर सन्‌ 1547 ईसवी में उसने अपने भाई कामरान पर आक्रमण करके काबुल छीन लिया। इस समय हुमायूं की अवस्था ठीक वैसी ही थी, जैसे कि पच्चीस वर्ष पूर्व भारत में आक्रमण करने के पहले बाबर की थी। पानीपत का द्वितीय युद्ध का वर्णन जारी है…..

 

 

 

शेर शाह सूरी के वंशज

 

 

कन्नौज के युद्ध के बाद शेर शाह सूरी ने आगरा, दिल्ली और पंजाब पर भी अधिकार कर लिया था। उसकी मृत्यु के समय तक काश्मीर को छोड़कर नर्मदा नदी के उत्तर में सम्पूर्ण भारत में उसका राज्य फैल गया था। उसने बड़ी योग्यता के साथ अपने विस्तृत राज्य का शासन किया था। शेर शाह जितना ही कठोर, न्याय-प्रिय और दानशील था, उतना ही वह राजनीतिज्ञ और दूरदर्शी भी था, शासन में शेर के समान वह भयानक और शत्रु को धोखा देने में वह लोमड़ी के समान चालाक था। उसके सम्बन्ध में इतिहासकारों के इस निर्णय का कोई विरोध नहीं कर सकता। शेर शाह लड़ाकू था, छल और प्रतारण के द्वारा शत्रु को वह जीतना खूब जानता था। लेकिन प्रजा के लिए वह क्रूर तथा अत्याचारी न था। जब उसकी सेना यात्रा करती थी, तो उसका ऐसा प्रबन्ध रहता था, जिससे उसके सैनिक मार्ग में मिलने वाले ग्रामों को किसी प्रकार का नुकसान न पहुँचा सकते थे। यात्रा में जब उसका कोई सैनिक किसी खेत को हानि पहुँचाता था तो शेर शाह उसके कान कटवा लेता था और खेतों के कटे हुए अनाज के पौधों के बोझ को उसके गले में लटका कर अपराधी सैनिक को लश्कर में घुमाता था। इस प्रकार की अपनी न्याय प्रियता के लिए वह बहुत प्रसिद्ध था।

 

 

शेर शाह के मरने के बाद, उसका दूसरा लड़का जलाल खाँ इस्लाम शाह के नाम से सन्‌ 1545 ईसवी में सिहासन पर बैठा। इस्लाम शाह में शासन की योग्यता न थी। उसका परिणाम यह हुआ कि प्रजा से लेकर अधिकारियों तक सभी उससे असंतोष अनुभव कर रहे थे और कुछ इसी प्रकार की परिस्थितियों में उसके अफ़ग़ानी सरदारों में फूट पैदा हो गयी। इस्लाम शाह में इतनी योग्यता न थी। जिससे वह सरदारों की फूट को दूर कर सकता। उसका दूषित प्रभाव राज्य के ऊपर पड़ा और वह परिस्थिति यहाँ तक भयानक हो गयी कि अचानक मृत्यु हो जाने के कारण इसलाम शाह का थोड़े दिनों के बाद शासन समाप्त हो गया। उसके लड़के की अवस्था बारह वर्ष की थी और वही उस विशाल राज्य का अधिकारी था। राज्य के प्रलोभन से उस लड़के के चाचा मोहम्मद आदिल ने अपने भतीजे को मरवा डाला और मोहम्मद आदिल शाह के नाम से वह सिंहासन पर बैठ गया। वह स्वभाव का अत्यन्त कठोर और शासन में अयोग्य था। इसीलिए राज्य का सारा प्रबन्ध उसके मंत्री हेमू को करना पड़ता था। हेमू हिन्दू था, इसलिए उस राज्य के पठान उसके आधिपत्य को सहन
न कर सके और उन सब ने विद्रोह कर दिया। विद्रोहियों में इब्राहीम सूर ने दिल्‍ली तथा आगरा पर और सिकन्दर सूर ने, जो शेर शाह का दूसरा भतीजा था, पंजाब में अधिकार कर लिया। मोहम्मद आदिल शाह दिल्ली छोड़कर चित्तौड़ चला गया और वहाँ पर अपने हिन्दू मन्त्री हेमू के साथ रहकर दिल्‍ली के सिंहासन को वापस लेने की कोशिश करने लगा। पानीपत का द्वितीय युद्ध का वर्णन जारी है….

 

 

 

सरहिन्द की लड़ाई

 

दिल्‍ली राज्य के अधिकारियों में जब आपस के झगड़े पैदा हो गये थे हुमायूं कन्धार और काबुल के राज्य को अपने अधिकार में ले चुका था। यद्यपि नौ वर्षों तक भाइयों के साथ उसके लगातार युद्ध होते रहे। लेकिन अन्त में हुमायूं की ही जीत रही। उसने कामरान की आँखें निकलवा लीं। हिन्दाल युद्ध में परास्त होकर मारा गया और अस्करी मवका के रास्ते में खत्म कर दिया गया। इस प्रकार उसके भाइयों का अन्त हो चुका था। शेर शाह सूरी के वंशजों के आपसी झगड़ों को हुमायूं ने अपने लिए एक अवसर समझा और उस अवसर से उसने लाभ उठाने की चेष्टा की। हुमायू ने अपनी सेना को तैयार किया और पन्द्रह हजार लड़ाकू मुग़ल सैनिकों को लेकर सन्‌ 1555 ईस्वी में उसने पंजाब पर आक्रमण किया। सिकन्दर ने सरहिन्द के मैदान में हुमायूं का सामना किया, लेकिन उसकी फौज मुग़लों के सामने ठहर न सकी और सिकन्दर को पराजित होकर युद्ध से भागना पड़ा। मुग़ल सेना ने सिकन्दर सूर का पीछा किया। लेकिन वह बड़ी तेजी के साथ भाग कर हिमालय की तरफ चला गया।

 

 

सरहिन्द की लड़ाई में सिकन्दर को पराजित करके हुमायूँ ने पंजाब पर अधिकार कर लिया। उसका और उसकी सेना का यहीं से उत्साह बढ़ गया। हुमायूं अपनी सेना के साथ पंजाब से आगे बढ़ा और उसने दिल्‍ली एवंम आगरा में भी अपना अधिकार कर लिया। शेर शाह के वंशजों में अब॒ केवल मोहम्मद आदिल शाह बाकी रह गया जो अपने मंत्री हेमु के साथ पूर्व में शासन कर था। पानीपत का द्वितीय युद्ध का वर्णन जारी है…..

 

 

 

हुमायूं को मृत्यु कैसे हुई

कन्नौज में पराजित होकर हुमायूं ने दिल्‍ली के जिस सिंहासन को
1540 ईसवी में छोड़ा था, पन्द्रह वर्षों की भयानक यन्त्रणाओं का
सामना करने के बाद, सन्‌ 1555 ईसवी में वह फिर उसी सिंहासन पर आसीन हुआ। हुमायूं के सामने अब आदिल शाह का प्रश्न था। उसे परास्त करने के बाद वह उस शेर शाह के राज्य को मिटा देना चाहता था, जिसने भारत से मुग़ल राज्य की जड़ खोद डाली थी। और इस राज्य से जिसने एक-एक मुग़ल को भाग जाने के लिए विवश किया था। जिन दिनों में हुमायूं दिल्‍ली के राज सिंहासन पर बैठ कर आदिल शाह को परास्त करने की तैयारी कर रहा था, एक दिन सायंकाल शाही पुस्तकालय की छत से उतरते हुए पैर फिसल जाने के कारण गिर जाने पर २४ जनवरी सन्‌ 1556 ईसवी को उनचास वर्ष की अवस्था में हुमायूं की मृत्यु हो गयी। पानीपत का द्वितीय युद्ध का वर्णन जारी है….

 

 

पानीपत का द्वितीय युद्ध से पहले अकबर का राज्याभिषेक

 

हुमायूं की मृत्यु के समय उसका लड़का अकबर उसके पास न था। पंजाब के एक अफ़गान सूबेदार के विद्रोह को शान्त करने के लिए बेराम खाँ के संरक्षण में वह लाहौर गया था। जब वह वहाँ से लौट रहा था तो गुरुदासपुर के जिले में कालानूर नामक एक ग्राम के पास अपने पिता की मृत्यु का उसने समाचार सुना। पिता की मृत्यु के समाचार से अकबर को एक असह्य आधात पहुँचा। उसकी अवस्था के तेरह वर्ष पूरे हो चुके थे और उसने चोदहवें वर्ष में प्रवेश किया था। इस छोटी आयु में ही पिता की सहायता से वह वंचित हो गया। शत्रुओं की आंधियाँ चारों ओर से घेरे हुए थीं। अकबर ने साहस से काम किया और बैराम खाँ तथा अपनी सेना के साथ वह दिल्‍ली को तरफ बढ़ा। वहाँ पहुँचने के पहले ही उसे समाचार मिला कि आदिल शाह और हेमू ने अवसर पाते ही दिल्‍ली तथा आगरा पर आक्रमण करके अधिकार कर लिया है। यह समाचार अकबर के लिए और भी अधिक भयानक था।

 

 

पानीपत का द्वितीय युद्ध – पानीपत का दूसरा युद्ध

दिल्‍ली ओर आगरा का समाचार सुन कर अकबर ने बैराम खाँ
के साथ परामर्श किया परिस्थिति बहुत भयानक हो गयी थी। हमायूँ के मरते ही आदिल शाह के मन्त्री हेमू ने दिल्ली को असहाय समझ कर आक्रमण किया था। एक चतुर मन्त्री होने के साथ-साथ वह लड़ाकू और अवसरवादी भी था। उसने अपने जीवन में बाईस लड़ाइयाँ लड़ी थीं। अकबर का संरक्षक और उसकी सेना का सेनापति बैरम खाँ इन सब बातों को जानता था। वह यह भी जानता था कि यद्यपि हेमू ने अपनी चतुरता भर योग्यता से आदिल शाह तथा उसके राज्य के अन्य अधिकारियों पर शासन कर रखा है, फिर भी उसके हिन्दू होने के कारण अफ़ाान सरदार उसके साथ ईर्षा करते हैं। इस द्वेष का बहुत
बड़ा कारण यह भी था कि आदिल शाह स्वयं अयोग्ग शासक था और दिल्‍ली तथा आगरा में अधिकार कर लेने के बाद बिक्रमाजीत के नाम से हेमू ने अपने को राजा घोषित किया।

 

 

बैराम खाँ चतुर सेनापति था। हेमु की इन परिस्थितियों को समझ
कर वह निराश नहीं हुआ। मार्ग में युद्ध की सम्पूर्ण तैयारियों की मजबूत बना कर सावधानी के साथ वह दिल्ली की ओर आगें बढ़ा। हेमू को समाचार मिला कि अकबर अपनी सेना के साथ दिल्‍ली आ रहा है। उसने उसी समय युद्ध की तैयारी की और अफ़गान सेना को लेकर वह रवाना हुआ। दिल्‍ली के बाहर पानीपत के मैदान में दोनों सेनाओं का सामना पानीपत का द्वितीय युद्ध के रूप में हुआ और 5 नवम्बर सन्‌ 1556 ईसवी में पानीपत का द्वितीय युद्ध आरम्भ हो गया।

 

 

हेमू के नेतृत्व में अफगानों की एक बड़ी सेना थी। युद्ध-कला में
वह निपुण और बहादुर था। युद्ध-क्षेत्र में उसने अपनी सेना को बुद्धिमानी के साथ खड़ा किया था। उसके साथ सब मिला कर पानीपत का द्वितीय युद्ध में सैनिकों की संख्या सत्तर हजार थी। युद्ध के मैदान में बीस हजार अफ़ग़ानों और राजपूत सवारों को उसने बीच में खड़ा किया था ओर पन्द्रह सौ लड़ाकू हाथियों को उसने सेना के आगे लगा दिया था। हेमू स्वयं एक मस्त हाथी पर था और उसका नाम हवा था। पानीपत का द्वितीय युद्ध के आरम्भ होते ही हाथियों की भयंकर मार के कारण मुगल सैनिक भागने लगे। हेमू का निर्भीक हाथी युद्ध में तेजी के साथ घूम रहा था। थोड़ी देर के संग्राम में मुग़लों का साहस छुट गया ओर उनकी सेना में निराशा फैलने लगी। लेकिन बैराम खाँ ने अपनी सेना को सम्हालने का काम किया और उसकी सेना के धनुर्धारी सैनिकों ने कुछ समय तक भयानक बारों की वर्षा की। इस समय दोनों भोर से युद्ध अत्यन्त गम्भीर हो गया था और हेमु की तरफ कुछ शिथिलता और शीतलता मालुम होने लगी। यह देख कर हेमू ने आश्चर्य किया और अपनी सेना को ललकारते हुए उसने शत्रुओं पर भयानक आक्रमण करने की आज्ञा दी। उस समय राजपूत सवारों और सैनिकों के सिवा बाकी सेना आगे तो बढ़ी और उसी मौके पर अफ़ागान सैनिक और सवार मुग़ल सेना की ओर दिखाई देने लगे।

 

 

युद्ध का यह दृश्य हेमु के लिए अत्यन्त भयानक हो उठा। इसी
समय मुग़ल सेना आगे बढ़ी और थोड़े समय के भीतर ही आंख में बाण लग जाने के कारण, हेमू बन्दी हो गया। उसकी सेना पराजित अवस्था में पीछे की ओर हट गयी। मुगल सैनिकों ने बन्दी दशा में हेमू को लाकर अकबर के सामने खड़ा किया। बैराम खाँ चाहता था कि अकबर स्वयं हेमू का बध करे। अकबर ने हेमू की ओर देखा। वह एक युवक था और एक बन्दी के साथ वह कायरों के शौर्य का प्रदर्शन नहीं करना चाहता था | अकबर ने उत्तर देते हुए कहा जो आदमी जल इस समय एक मृतक के समान है, क्या समझ कर मैं उसका बध करू।

 

 

अकबर के इनकार करने पर बैराम खाँ और उसके दूसरे सरदारों
ने अपती तलवारों से हेमू का संहार किया। अफ़ग़ान सेना के परास्त होने के बाद मुगल सेना ने अफ़ग़ानों का प्रभुत्व मिटाकर दिल्ली और आगरा पर अधिकार कर लिया। पानीपत का द्वितीय युद्ध में अकबर की यह सब से पहली और बड़ी विजय थी। उसके बाद उसने सन्तोष के साथ दिल्ली में विश्राम किया। लेकिन उसके सन्तोष के दिन अभी तक न थे। शेर शाह के वंशजों का अभी तक अस्तित्व बाकी था और अकबर का सौतेला भाई मोहम्मद हकीम शत्रु हो रहा था। हुमायूँ की वसीयत के अनुसार, पंजाब और दिल्ली अकबर को मिले थे। और काबुल का राज्य मोहम्मद हकीम को दिया गया था। लेकिन मोहम्मद हकीम ने हुमायूं के मरते ही विद्रोह कर दिया और वह दिल्‍ली के राज्य पर अधिकार करने की चेष्टा करने लगा।

 

 

दिल्‍ली में एक महीने तक विश्राम करने के बाद पंजाब के अधिकारी सिकन्दर सूर को कैद करने के लिए अकबर और बैराम खाँ अपनी सेना के साथ रवाना हुए। उन्होंने काश्मीर तक उसका पीछा किया। मडक्गेट नामक स्थान पर सिकन्दर ने आत्म समर्पण कर दिया। उसे क्षमा कर के अकबर ने एक जागीर दे कर उसे पूर्व की ओर रवाना कर दिया। सन्‌ 1557 ईसवी में आदिल शाह की भी मृत्यु हो गयी और इब्राहीम सूर डर कर जंगलों की तरफ भाग गया। इसके बाद सौतेले भाई मोहम्मद हकीम के विद्रोह को छोड़ कर इस समय अकबर के जीवन में कोई संघर्ष बाकी न था।

 

 

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