पानीपत का तृतीय युद्ध – पानीपत के तृतीय युद्ध का परिणाम

पानीपत का तृतीय युद्ध मराठा सरदार सदाशिव राव और अहमद शाह अब्दाली के मध्य हुआ था। पानीपत का तृतीय युद्ध 14 जनवरी 1761 को पानीपत के ऐतिहासिक युद्ध क्षेत्र में हुआ था। इस ऐतिहासिक मैदान में पहले भी कई प्रसिद्ध लड़ाईयां लड़ी गई थी जिनमें से प्रमुख पानीपत का प्रथम युद्ध और पानीपत का द्वितीय युद्ध का उल्लेख हम अपने पिछले लेखों में कर चुके है। अपने इस लेख में हम पानीपत का तृतीय युद्ध का उल्लेख करेंगे और निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर जानेंगे:—-

 

 

पानीपत का तृतीय युद्ध कब हुआ था? पानीपत का तृतीय युद्ध क्यों हुआ था? पानीपत का तृतीय युद्ध किस किस के मध्य हुआ था? पानीपत के तृतीय युद्ध में किसकी जीत हुई थी? पानीपत का तृतीय युद्ध का कारण और परिणाम? पानीपत का तीसरा युद्ध किस किस के बीच हुआ?

 

 

मराठों की शासन सत्ता

शिवाजी के समय दक्षिण भारत में मराठों की शासन शक्तियां बहुत उन्नति पर पहुँच गयी थीं। परन्तु शिवाजी मरने के बाद, उसका लड़का सम्भा जी उस विस्तृत राज्य की रक्षा न कर सका। उसके मारे जाने के घाद, सन्‌ 1689 से 1708 ईसवी तक उसके भाई राजाराम ने शासन किया। सन्‌ 1708 ईसवी में साहू मराठा राज्य के सिंहासन पर बैठा। उसमें शासन की योग्यता न थी। उसकी अकर्मणयता और विलास-प्रियता ने उसको मुग़ल-शासन की अधीनता में रहने के लिए विवश कर दिया था। उसके मरने के पश्चात पेशवाओं का शासन आरंभ हुआ। सब से पहले पेशवा बाला जी विश्वनाथ राव था। उसके पश्चात छःपेशवा और भी हुए।बाला जी विश्वानाथ ने सफलतापूर्वक शासन किया और खानदेश, बरार बीदर, बीजापुर, औरंगाबाद के राज्यों से उसने कर वसूल किये। उसने मराठा सरदारों में एकता उत्पन्न की ओर मराठा संघ की स्थापना की।

 

 

 

बाला जी विश्वनाथ राव का पुत्र बाजीराव ने सन्‌ 1720 ईसवी
में पेशवा का पद प्राप्त किया। वह रणकुशल ओर राजनीतिज्ञ था । उसने मराठों की शक्तियां बढ़ा दी थीं और मुगल सम्राट मोहम्मद शाह ने मालवा तथा गुजरात उसे दे दिया था। सन्‌ 1740 ईसवी में
बाजीराव का लड़का बाला जी बाजीराव पेशवा की गद्दी पर बैठा
विलासी होने पर भी वह राज्य के प्रबन्ध में चतुर था। उसके शासन काल में मराठा राज्य ने बड़ी उन्नत्ति की थी। सन्‌ 1758 ईसवी में पेशवा के भाई रघुनाथ राव ने अफगानों को पराजित करके उनसे पंजाब छीनकर अपने राज्य में मिला लिया था। दक्षिण भारत में पेशवा के भतीजे सदाशिव राव भाऊ ने निजाम से कई एक जिलों को छीनकर अपना अधिकार कर लिया था और मैसूर तथा कर्नाटक के राजाओं को अधीनता स्वीकार करने के लिए उसने विवश किया था। सन्‌ 1760 ई० में मराठों की शक्तियां चरम सीमा पर पहुँच चुकी थीं।

 

 

 

मुगल साम्राज्य की व्यवस्था

 

मुग़लों का शासन उन दिनों में बहुत बिगड़ी हुई दशा में था।
उसका पतन औरंगजेब के शासन-काल में आरम्भ हुआ था और उसके बाद फिर वह लगातार गिरता गया। अनेक छोटे बड़े राजाओं और नरेशों के सिवा, अवध के नवाब और दक्षिण के निजाम अपने-अपने राज्यों के स्वतन्त्र शासक बन गये थे। बंगाल का सम्बन्ध टूटा न था, लेंकिन वहां के नवाब ने मालगुजारी भेजना कई साल से बन्द कर दिया था। दिल्ली के निकट भरतपुर के जाट और रामपुर के रहेला नवाब अपने राज्यों को स्वाधीन बना रहे थें। दक्षिण में मराठों की शक्तियां स्वतन्त्र होकर अत्यन्त प्रबल हो चुकी थीं। भारत के पश्चिम सिन्ध और पंजाब के प्रान्त अफग़ानों के अधिकार में हो च॒के थे। पूर्व में बंगाल और बिहार की अवस्था बहुत भयानक थी। वहां पर अंग्रेजों के षड़यन्त्रों का जाल फैला हुआ था और वहां के नवाबों की सत्ता पत्तों की तरह हिल रही थी।

 

 

 

इस प्रकार सम्पूर्ण भारत में उत्थान और पतन का एक भयानक
संघर्ष चल रहा था और उस संघर्ष में मुग़ल शासन बटा हुआ दिखाई देता था। देश की इन परिस्थितियों में दक्षिण में मराठों का आतंक बढ़ रहा था, पूर्व में अंग्रेजों के भीषण षडयन्त्र फैल चुके थे और पश्चिम में अफ़गानों के आक्रमण चल रहे थे। उत्तर में राजपूतों की दशा एक विचित्र हो रही थी। समस्त देश की अवस्था अत्यन्त शोचनीय थी।

 

 

अफ़गानों के आक्रमण

 

 

अफ़गानिस्तान के बादशाह नादिर शाह ने सन्‌ 1738 ईसवी में
भारत में आक्रमण किया था और दिल्‍ली का सर्वनाश करके लूट की अपरिमित सम्पत्ति के साथ दूसरे वर्ष वह अपने देश को लौट गया था। सन्‌ 1747 ईसवी में उसका कत्ल हो गया। अफ़ग़ानों में अब्दाली वंश के सरदार अहमद शाह ने कंधार का राज्य प्राप्त करके वहां के अन्य प्रदेशों पर अधिकार कर लिया और भारत पर आक़्रमण करने का निश्चय किया। कंधार से वह सन्‌ 1748 ईसवी में रवाना हुआ। उसके भारत में पहुँचते ही दिल्‍ली के शाहज़ादा अहमद शाह से सरहिन्द नामक स्थान में उसका सामना किया। उस लडाई में वह बुरी तरह पराजित हो कर भारत से भाग गया। अहमद शाह के लौट जाने के बाद एक महीने में मुगल सम्राट मोहम्मद शाह की मृत्यु हो गयी और उसका लड़का जिसका नाम भी अहमद शाह था, गद्दी पर बैठा। उसके सिंहासन पर बैठते ही अहमद शाह अब्दाली ने जो बाद में अहमद शाह दुर्रानी के नाम से प्रसिद्ध हुआ, भारत में दूसरा आक्रमण किया। मुगल साम्राज्य की भीतरी परिस्थितियां उन दिनों में बहुत खराब हो गयी थीं। इसलिए उसका बादशाह युद्ध न कर सका, और उसे मुलतान, सिन्ध और पंजाब के सूबे अहमद शाह अब्दाली को देने पड़े। सन्‌ 1754 ईसवी में मुगल सम्राट अहमद शाह की मृत्यु हो गयी और उसके स्थान पर जहाँदार शाह के लडके आलमगीर द्वितीय को सिंहासन पर बिठाया गया।

 

 

निजाम का देहवता गाजीउद्दीन मुगल साम्राज्य का प्रधान मन्त्री
था। उसमें और रुहेलों के सरदार नजीबुद्दौला में ईर्षा चल रहो थी।
दोनों ही आलमगीर पर अपना अपना प्रभुत्व रखना चाहते थे।
गाजीउद्दीन ने मुलतान पर आक़्रमण किया और अहमद शाह अब्दाली के अधिकारी को कैद कर लिया। यह समाचार सुनकर अहमद शाह ने तीसरी बार भारत में सन्‌ 1756 ईसवी में आक्रमण किया। उसके आने का समाचार सुनकर गाज़ीउद्दीन दिल्‍ली से भाग कर मराठों के पास चला गया। दिल्ली में आकर अहमद शाह ने लूटमार की और गाजीउद्दीन के स्थान पर नवाब नजीबुद्दौला को प्रधान मन्त्री बनाकर वह अपने देश को लौट गया। उसके चले जाने पर गाज़ीउद्दीन मे पेशवा के भाई रघुनाथ राव की सहायता से आलमगीर द्वितीय को मरवा डाला और उसके स्थान पर कामबख्श के लड़के को सिंहासन पर बिठाया। नजीबुद्दौला दिल्ली से भाग गया और गाजीउद्दीन फिर प्रधान मन्त्री बन बैठा।

 

 

इन्हीं दिनों में रधुनाथ राव ने अपनी सेना लेकर पंजाब में हमला
किया और अफ़॒गान सेना को परास्त कर उसने उस प्रान्त पर अपना अधिकार कर लिया। इन दिनों में महाराष्ट्र, गुजरात,मालवा, मध्य भारत, उड़ीसा और पंजाब में मराठों का झंडा फहरा रहा था।
दिल्‍ली से भाग कर अपना सारा सामाचार नजीबुद्दौला ने अहमद शाह अब्दाली के पास भेजा और उन्हीं दिनों में मराठों ने पंजाब पर अधिकार कर लिया था। इसलिए सन्‌ 1759 ईसवी में फिर एक बार भारत में आक्रमण करने के लिए अहमद शाह अब्दाली रवाना हुआ और पंजाब पर अधिकार कर के वह दिल्‍ली की ओर बढ़ा।

 

 

पानीपत का तृतीय की तैयारी और अफग़ानों और मराठों की सेनायें

 

उन दिनों में मराठा सरदार सदाशिव राव भाऊ और विश्वास राव ने दिल्ली में अधिकार कर लिया था और कामबख्श के लड॒के
को हटा कर शाह आलम को इसी बीच में दिल्‍ली के सिंहासन पर
बिठाया था। अहमद शाह के आक्रमण का समाचार पूना में पहुँचा। उसके साथ युद्ध करने के लिए मराठा सरदार सदाशिव राव भाऊ एक विशाल सेना लेकर रवाना हुआ, जिसमें सत्तर हजार सवार और पंद्रह हजार पैदल सैनिक थे। उनके सिवा उसके साथ नौ हजार चुने हुए युद्ध कुशल और भी सैनिक थे जो एक मुस्लिम सरदार के नेतृत्व में थे और जिन्होंने फ्रांसीसी सेना में रह कर लडाई का काम सीखा था। पेशवा का पुत्र विश्वास राव भी उसके साथ था।

 

 

पानीपत का तृतीय युद्ध
पानीपत का तृतीय युद्ध

 

अहमद शाह अब्दाली के साथ अफ़ग़ानों और मुगलों मिला कर
सेना में तिरपन हजार सवार और लगभग चालीस हजार पैदल सैनिक थे, उनमें भारतीय मुसलमानों की सेनायें भी शामिल थीं।
पानीपत के ऐतिहासिक युद्ध क्षेत्र में दोनों और की सेनायें एकत्रित
हुई। लेकिन किसी ओर से आक्रमण नहीं हुआ। एक-एक करके कई दिन बीत गये। दोनों ओर की सेनाओं ने अपने-अपने शिविर बना लिए थे। युद्ध को रोककर दोनों ओर के सेना नायक एक दूसरे की शक्तियों, को तौलने में लगे थे और पानीपत का तृतीय युद्ध धार्मिक युद्ध अथवा हिन्दू मुस्लिम रूप धारण करता जा रहा था।

 

 

पानीपत का तृतीय युद्ध में रसद की कठिनाई

अहमद शाह अब्दाली को इस अन्तिम बार आक्रमण करने के लिए बुलाया गया था और आरम्भ से ही उसमें धार्मिक अथवा जातीय मनोवृत्तियां काम करती हुई दिखाई पढ़ने लगी थीं। मराठों को यह मालुम हो गया था कि भारत की मुस्लिम शक्तियां अहमद शाह का साथ देंगी। इसीलिए भरतपुर के जाट राजा से और राजपूत राजाओं से मराठों ने सहायता मांगी थी। लेकिन किसी से कोई सहायता उनको न मिली। जाटों और राजपूतों ने तटस्थ रह कर दूर से ही तमाशा देखा। वे युद्ध के पास नहीं आये। इन सहायताओं के न मिलने का कारण था। भारत में मुग़ल-साम्राज्य के निर्बल पड़ जाने पर मराठों ने संगठित होकर अपनी शक्तियां मजबूत बना ली थीं और नादिरशाह के आक्रमण के पहले ही उन्होंने भारत के अनेक निर्बल राज्यों पर आक्रमण करके उनका विनाश किया था। इस विध्वंस और विनाश का दृश्य उत्तर भारत के राजपूत देख चुके थे और मराठों की उन्नत शक्तियों से वे अब॒ तक भयभीत थे।

 

 

पानीपत का तृतीय युद्ध को जीतने के लिए एक योजना यह भी
थी कि सेनाओं को रसद मिलने में बाधा डाली जावे। यह योजना दोनों ओर काम में लायी गयीं थी। लेकिन मराठों को इसमें सफलता न मिली। इसका कारण यह था कि उनके साथ मराठों के सिवा और कोई न था। युद्ध के पहले उन्होंने “हिन्दुस्तान के लिए” के नारे लगाये थे। लेकिन उनके कार्यो से बाकी हिन्दुओं को जाहिर होता था कि वे देश में हिन्दुओं के नाम पर मराठी सत्ता कायम करना चाहते हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि मराठों के सिवा हिन्दुओं में किसी ने उनका साथ न दिया। रसद की रोक में मुसलमानों को सफलता मिली। मराठा सेना को रसद मिलने के जितने रास्ते थे, वे सब रोक दिये गये और मराठा सेना के पास कहीं से भी रसद का आना बन्द हो गया। दक्षिण में हैदराबाद में और दूसरी रियासतें मुसलमानों की थीं, उनके द्वारा दक्षिण से मराठा सेना के पास जो रसद आ सकती थी, वह भी बन्द हो गयी। अगर कहीं से रसद आती थी तो वह रास्ते में लुट ली जाती थी। मराठा सेना के सामने यह भयंकर विपदा थी। लेकिन रसद की योजना में मराठों की असफलता के कारण अहमद शाह अब्दाली के साथ की सेनाओं के सामने रसद की कोई परेशानी न थी। इसलिए वह युद्धों की कुछ दिनों तक रोकना चाहता था। जो आक्रमण होते थे, वे साधारण युद्ध के बाद बन्द हो जाते थे।

 

 

पानीपत का तृतीय युद्ध का आरम्भ

 

रसद की कोई व्यवस्था न हो सकने पर मराठों के सामने भीषण
कठिनाई पैदा हो गई। विवश होकर मराठों ने युद्ध करने का निश्चय किया। अब्दाली को सूचना मिली कि मराठों की सेना आ रही है। अपनी सेना को तैयार करके वह आगे बढ़ा। उसकी दाहिनी ओर रुहेलों की सेना थी और बाई ओर नवाब नज़ीबुद्दौला और शिराजुउद्दौला अपती सेनाओं के साथ मौजूद थे।

 

 

14 जनवरी सन्‌ 1761 ईसवी को पानीपत के ऐतिहासिक मैदान में दोनों सेनाओं का पानीपत की तीसरी लड़ाई के रूप में युद्धआरम्भ हुआ। सब से पहले बन्दुकों और तोपों की मार शुरू हुईं। उसके कुछ समय बाद दोनों सेनाओं ने आगे बढ़ कर एक दूसरे पर आक्रमण किया। उस घमासान पानीपत का तृतीय युद्ध में मराठी सेना कुछ दूर तक अफ़गान सेना को पीछे की ओर ढकेल कर ले गयी और शत्रुओं के आठ हजार सैनिकों को उसने काट कर फेक दिया। इसके बाद अहमद शाह की सेना फिर आगे की ओर बढ़ी और उसने मराठों के साथ भयानक मार की। सदाशिव राव भाऊ और युवक विश्वास राव ने अब्दाली की सेना पर जोर के साथ आक्रमण किया। उस समय मराठों की मार को देख कर अब्दाली की सेना का साहस टूटने लगा। लेकिन पठान आसानी के साथ युद्ध से हटने वाले न थे उन्होंने पीछे की ओर हट कर मराठों पर भीषण आक्रमण किया। उसमें बहुत से मराठा सैनिक एक साथ मारे गये। युद्ध की यह अवस्था देख कर सदाशिव राव भाऊ अपनी सेना के साथ भयंकर मार काट करता हुआ आगे बढ़ा और उसकी सेना ने अब्दाली के बहुत से आदमियों को काट कर गिरा दिया। शाहनवाज़ खाँ वजीर का जवान लडका इसी समय युद्ध में मारा गया और घायल होकर घोड़े के गिर जाने के कारण वह स्वयं पैदल हो गया।

 

 

युद्ध की भयंकरता बढ़ती जा रही थी और दोनों ओर की सेनायें
भीषण मार करने में लगो थीं। बड़ी तेजी के साथ दोनों ओर के सैनिक मारे जा रहे थे और उनका रक्त भूमि पर गिर कर बह रहा था। युद्ध की परिस्थिति अत्यन्त विकराल हो गयी थी। अफगान सेना का मध्य भाग निर्बल पड़ने लगा और मराठों के जोर मारने पर वह बार-बार पीछे हट जाता। शाहनवाज़ खाँ के पैदल हो जाने पर मराठों ने उसको मारने की कोशिश की, उसी समय उसकी रक्षा के लिए,नवाब नजीबुद्दौला अपनी सेना के साथ आगे बढ़ा। उसको आगे बढ़ते हुए देख कर सदाशिव राव भाऊ कुछ शूरवीर मराठों के साथ सामने आया। उस स्थान पर युद्ध की दशा और भी भयानक हो उठी। अव्दाली की सेना का मध्य भाग कमजोर पड़ते ही दाहिना और बांया भाग भी निर्बल पड़ने लगा। यह देख कर अहमद शाह अब्दाली ने अपनी सेना को संभालने की चेष्टा की और उसके बाद उसके सैनिकों ने फिर भयंकर मार आरम्भ की। प्रातःकाल होते ही युद्ध आरम्भ हुआ था और दोपहर के बाद तीसरे पहर तक लड़ाई की एक सी हालत चलती रही। दोनों ओर के सैनिकों को जरा देर के लिए विश्राम लेने अथवा मार बन्द करने का अवसर न मिला। कट कर गिरने वाले घायलों की भयानक चीत्कारों, मरने वालों की कराहने की आवाजों, युद्ध के मारू बाजों, नरसिंहों तथा बन्दूकों के भयानक स्वरों और दोनों ओर के वीर सैनिकों की ललकारों ने एक साथ मिल कर पानीपत का तृतीय युद्ध क्षेत्र को भयंकर बना दिया था।

 

 

संग्राम की इस भीषण परिस्थिति में भी अहमद शाह अब्दाली के
साहस और उत्साह में किसी प्रकार की कमी नहीं आयी। निर्भिकता के साथ बहुत समय तक वह युद्ध क्षेत्र की अवस्था का अध्ययन करता रहा। उसने पहले से ही किसी विशेष अवसर के लिए अपनी एक सुरक्षित सेना, जिसमें दस हजार लड़ाकू और आक्रमणकारी सैनिक थे, पानीपत में छिपाकर रखी थी। इसी अवसर पर उसकी वह सेना प्रकट हुई ओर अचानक आकर उसने मराठा सेना पर भयानक आक्रमण किया। मराठों के बहुत से आदमी इस आक्रमण से मारे गये। लेकिन सदाशिव राव भाऊ की सेना में किसी प्रकार की घबराहट और निर्बलता नहीं पैदा हुई। भयानक रूप से युद्ध हो रहा था। अपनी सुरक्षित सेना के आक्रमण से अब्दालों ने तुरन्त मराठों को पराजित करने का अनुमान लगाया था। लेकिन युद्ध की परिस्थिति में कोई अन्तर न पड़ा। इसी दशा में बन्दुक की एक गोली राजकुमार विश्वास राव की छाती में आकर लगी। उसी समय राजकुमार अपने हाथी के हौदे पर गिर गया। सदाशिव राव भाऊ को राजकुमार के मारे जाने का समाचार मिला।उसका हृदय सहम उठा उसने राजकुमार विश्वासराव से बड़ी-बड़ी आशायें लगा रखी थीं। भाऊ शत्रुओं के साथ युद्ध करने में लगा रहा।

 

 

अफग़ानों की सुरक्षित सेना का अचानक आक्रमण व्यर्थ नहीं गया । मराठों ने साहस और वीरता के साथ उसका सामना किया। परन्तु वे शत्रुओं के घेरे में आ गये। सदाशिवराव भाऊ लड़ते हुए मारा गया। होल्कर और सींधिया की सेनाओं ने युद्ध से निकल कर बाहर का रास्ता पकड़ा। अब मराठों का कोई सेनापति न रह गया था। जो सरदार बाकी रह गए थे वे भी मारे गए। यह देखकर मराठों की बाकी सेना भी युद्धक्षेत्र से भाग गई और पानीपत का तृतीय युद्ध अहमद शाह अब्दाली ने जीत लिया।

 

 

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