नूरजहाँ हिस्ट्री इन हिन्दी – नूरजहाँ का जीवन परिचय व इतिहास की जानकारी

नूरजहाँ भारतीय इतिहास और मुगल सम्राज्य की सबसे ताकतवर महिला थी। यह मुगल सम्राट जहांगीर की पत्नी थी। अपने इस लेख में हम नूरजहाँ हिस्ट्री इन हिन्दी, नूरजहाँ की जीवनी, नूरजहाँ कौन थी, नूरजहाँ किसकी पत्नी थी, नूरजहाँ का इतिहास, जन्म, मृत्यु, माता पिता आदि सभी सवालों का विस्तार पूर्वक जवाब जानेगें।

 

 

नूरजहाँ हिस्ट्री इन हिन्दी – नूरजहाँ का जीवन परिचय

विश्व-विख्यात अकबर का दरबार लगा हुआ था। उस दरबार में एक ओर जागीरदारों की पंक्ति थी, एक ओर मंत्री बैठे हुए थे, एक ओर सेनापतियों का जमाव था, एक ओर भिन्न-भिन्न प्रान्तों के सूबेदारों की भीड़ थी। सब के वस्त्र निराले, सब की शान अनोखी। कोई अपनी सुविधाओ की चर्चा कर रहा था, कोई अपनी कठिनाइयों का चित्र खींच रहा था। बादशाह अकबर सब की सुनता था ओर मंत्रियों से परामर्श करके उचित कार्य करने का आदेश दे रहा था। ऐसे समय में एक युवक ने प्रवेश किया। युवक के साथ उसकी स्त्री भी थी। जिसकी की गोद में एक नवजात बालिका थी। उन्हे देखकर सारा दरबार उनकी ओर आकर्षित हो गया। युवक दरबार की सभ्यता से परिचित था। उसने अकबर के प्रति अपना सम्मान प्रकट करते हुए कहा–

“बन्दा, जहाँपनाह की इमदाद चाहता है”।

बादशाह अकबर आदमी पहचानता था। युवक की प्रार्थना पर उसने विचार किया और कहा — “क्या चाहते हो?

युवक बोला— “कोई खिदमत का काम। मैं अजनबी हूँ, बहुत दूर से ख़ाक छानता हुआ आपकी ख़िदमत में इसीलिए हाज़िर हुआ हूँ। युवक ने बड़े दीन भाव से उत्तर दिया।

अकबर ने उस युवक की ओर फिर देखा और एक पद पर नियुक्त कर दिया। उस युवक का नाम ग्यास था।

 

 

 

ग्यास कौन था तथा नूरजहाँ का जन्म स्थान व माता पिता

ग्यास के पिता का नाम ख्वाजा मुहम्मद शरीफ़ था। वह तेहरान का रहने वाला था। अत्यन्त योग्य और कार्यकुशल होने के कारण धीरे-धीरे उन्नति करके वह वहां का मंत्री हो गया था। जिस समय मुगलवंश का द्वितीय बादशाह, हुमायूँ, दुर्वेश की प्रेरणा से भारत की बागडोर शेरशाह के हाथों में छोड़कर हरात की ओर पहुँचा। उस समय वह वहाँ का हाकिम था। उसने ऐसे संकट काल में हुमायू की बड़ी सहायता को थी ओर यथाशक्ति उसे सुख देने के लिए प्रयत्न किया था। वह बड़ा भाग्यशाली था, परन्तु उसका पुत्र मिर्ज़ा ग्यास बेग उतना ही अभागा था।  जब तक ख्वाजा मुहम्मद शरीफ जीवित रहा, तब तक ग्यास बेग को किसी बात की चिन्‍ता नहीं थी। परन्तु उसकी मृत्यु के पश्चात्‌ ही उसे जान के लाले पड़ गये। अपनी मातृ-भूमि में उसे अपना तथा अपनी पत्नी का पेट पालना दुभर हो गया। अंत में विवश होकर एक दिन उसने सपरिवार एक क़ाकिले के साथ भारत की ओर प्रस्थान किया। कई दिनों तक मार्ग की कठिनाइयाँ झेलने के पश्चात्‌ क़ाफिला कन्धार पहुंचा। यहीं सन्‌ 1576 ई० में प्रातःकाल के समय उसकी स्त्री की कोख से एक बालिका का जन्म हुआ।

 

 

बादशाह अकबर के दरबार में आगमन

गर्दिश में फंसा हुआ ग्यास बच्ची के जन्म से  और बड़े संकट में पड़ गया। क्या करे और क्या न करे, यह वह स्वंय निश्चय न कर सका। उसकी यह दुर्दशा देखकर काफिले के एक सौदागर मलिक मसऊद को उस पर दया आ गयी। उसने धन से उसकी सहायता की और अपने साथ उसे भारत लेता आया। यहाँ अकबर के दरबार में सौदागर का बहुत सम्मान था। अतः एक दिन उचित समय देखकर उसने ग्यास को अकबर के सामने पेश कर दिया, और उसे नौकरी दिला दी।

 

 

 

बाल्यावस्था और शिक्षा

इस प्रकार अपनी मातृ-भूमि त्याग कर मिर्जा ग्यास बेग ने भारत मे शरण ली। यह योग्य था, और फ़ारसी भाषा का बड़ा विद्वान था। वह कविता भी करता था। उसकी लेखन-शैली बहुत अच्छी थी। अकबर उसके इन गुणों पर मुग्ध था, और उसे बहुत मानता था। यही कारण था कि ग्यास की पत्नी भी शाही निवास में बिना किसी रोक-ठोक के आने-जाने लगीं थी। उसकी गोद में एक बालिका थी। चांद-सी सुन्दर, गुलाब-सी कोमल। नाम था उसका मेहरुन्निसा। ( नूरजहाँ का वास्तविक नाम मेहरुन्निसा था) लोग उसे मेहर कहते थे। शाही निवास में वह भी खेलती थी, कभी अपनी मा की गोद में और कभी बेगमों की गोद में। उस फूल सी बालिका को सभी प्यार करते थे, सभी चाहते थे। शाही निवास की वह खिलौना थी।

 

 

ग़्यास की भाँति उसकी पत्नी भी बड़ी गुणवती थी। वह बड़े कुलीनवंश की थी और राज-दरबार के शिष्टाचार से भलिभांति परिचित थी। इसलिए उसका भी शाही निवास में बड़ा सम्मान होने लगा। एक बेगम से उसका बहनापा भी हो गया ओर वह उन्हीं की भाति सज-धज से रहने लगी। ऐसे वातावरण में रहने के कारण उसने मेहरून्निसा की शिक्षा का अच्छा प्रबन्ध कर दिया ओर स्वयं उसे चित्र-कला तथा कसीदा काढ़ना सिखाने लगी। थोड़े ही दिनों में उसने उसे फारसी भाषा का अच्छा ज्ञान प्राप्त करा दिया।

 

 

 

विवाह

मेहर बड़ी चंचल बालिका थी। वह रूपवती थी। राज-प्रासाद में रहने के कारण वह बड़े-बड़ों के हृदय तक पहुँच गयी थी। कुछ सयानी भी दो गयी थी। अकबर के पुत्र सलीम से भी उसका परिचय हो गया था। दोनों यौवन के प्रागण में पर्दापण कर रहे थे। ऐसी दशा में उनका एक दूसरे के प्रति आकर्षित होना स्वाभाविक था। अकबर इस बात को अच्छी तरह जानता था। परन्तु वह इसे पसन्द नहीं करता था। वह नहीं चाहता था कि उसका पुत्र उसके एक कर्मचारी की पुत्री के साथ अपना सम्बन्ध स्थापित करे। इसी कारण से अकबर ने स्वयं उसके विवाह के लिए सुयोग्य वर की खोज की।

 

इस समय राज दरबार में अलीकुली इस्ताजलू के नाम की बड़ी चर्चा थी। वह फारस का रहने वाला था। भारत में आने से पहले वह वहाँ के बादशाह द्वितीय शाह स्माइल के यहाँ सफ़रची के पद पर कार्य कर चुका था। एक दिन ग्यास की भाँति वह भी भटकता हुआ अपने पेट की ज्वाला शान्त करने के लिए भारत आया। मुलतान पहुँचने पर बैरमखाँ के पुत्र खानखाना से उसकी भेट हो गयी। वह उसे अकबर के दरबार में लाया। उस समय राजकुमार सलीम मेवाड़ के राणा से युद्ध करने के लिए जा रहा था। अत: उसने उसे अपने निजी कार्य के लिए नौकर रख लिया। थोड़े ही दिनों में अलीकुली सलीम का विश्वासपात्र हो गया। वह बड़ा योग्य, चतुर और वीर था। शिकार का उसे बडा शौक था। शेर का शिकार करने में वह बहुत प्रसिद्ध था। इसलिए सलीम उसे शेरे अफगान कहा करता था। और उसे बहुत मानता था। वह रुप में सुन्दर भी था। अकबर ने ऐसे ही वीर और सुन्दर पुरूष को मेहरून्निसा के लिए उपयुक्त समझा। इसलिए सन्‌ 1595 ई० में उसने दोनों का विवाह करा दिया और अलीकुली को बढ़वान की जागीर देकर बंगाल भेज दिया।

 

मेहरुन्निसा अलीकूली को पाकर बडी प्रमन्न हुईं। वह पति-परायण थी। अपना कर्तव्य भलिभांति समझती थी। इसलिए वह शीघ्र ही अपने पति के ह्रदय की सच्ची स्वामिनी बन गयी और दोनों एक प्रेम-सूत्र मे बेंधकर आनंदपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करने लगे। इसी बीच सलीम ने अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह किया। खलीकुली ख़ाँ ने यह कार्य अनुचित समझकर उसका साथ नही दिया। सलीम को यह बात बहुत बुरी मालूम हुई और उसने उसकी जागीर छीन ली। परन्तु अकबर की मृत्यु के पश्चात्‌ जब सन् 1605 ई० में वह जहाँगीर के नाम से सिंहासन पर काबिज हुआ तब उसने पुनः उसकी जागीर उसे लौटा दी और वह बंगाल प्रान्त में भेज दिया गया।

 

 

 

विद्रोह और शेरे अफगान की मृत्यु

इस समय बंगाल में चारों ओर उपद्रव के लक्षण दिखाई दे रहे थे। बड़े-बड़े सरदार अपनी खोई हुई शक्ति प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील थे। इस प्रकार बंगाल विद्रोहियों का अड्डा बन गया था। ऐसे वातावरण मे रहकर शेरे अफगान भी बदनाम हो गया। उसके विरूद्ध सम्राट जहाँगीर के दरबार मे शिकायत होने लगी। जहाँगीर कान का कच्चा था। इसलिए उसे शेर अफगान के विश्वासघात पर बड़ा क्रोध आया। उसने तुरन्त शेरे अफगान को दिल्ली दरबार में उपस्थित होने की आज्ञा निकाल दी।

 

उस समय कुतुबद्दीन राजा मानसिंह के स्थान पर बंगाल का गवर्नर नियुक्त हुआ था। उसमे न तो राजनीतिक बुद्धिमता थी और न कार्यकुलता ही। अतएव उसने बिना सोचे-समझे उसे गिरफतार करना चाहा। इस बात की सूचना पाते ही वीर शेरे अफ़गान का खून उबल पड़ा। कुतुबुद्दीन की सेना चारों ओर से उसका राज-भवन घेरे हुए पड़ी थी। ऐसी दशा में वह क्रोध में आकर बाहर निकला और नंगी तलवार लेकर कुतुबुद्दीन पर टूट पड़ा। कुतुबुद्दीन घायल हो गया और थोड़ी देर में उसके प्राण-प्रखेरू उड़ गये। इस दुर्घटना ने मुग़ल-सेना को उत्तेजित कर दिया। उसने अपने गवर्नर को मृत्यु का बदला लेने के लिए शेरे अफगान को भी मौत के घाट उतार दिया।

 

 

आगरे में आगमन और दूसरा विवाह

शेरे अफगान के वध से मेहरुन्निसा को बड़ा दुःख हुआ। विधि के विधान में किसी का बस नहीं चलता, यही सोचकर वह पुत्री सहित अपने पिता के घर आगरे लोट आयी, और अकबर की स्त्री सलीमा बेगम की देख-रेख में रहने लगी। एक दिन अकस्मत मीना बाज़ार से जहाँगीर से उसकी भेंठ हो गयी। पुराना प्रेम फिर हरा हो गया। जहाँगीर ने उससे विवाह का प्रस्ताव किया। इस समय शेरे अफगान को मरे हुए चार वर्ष हो गये थे। पति-वियोग का दुःख इतने दिनों मे हलका हो गया था। अतः उसने उसके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। इस प्रकार मई सन्‌ 1611 ई० में दोनों का विवाह हो गया। इस विवाह ने मुग़ल इतिहास मे एक नवीन अध्याय का सृजन किया। जहाँगीर मेहरुन्निसा को पाकर बहुत प्रसन्न हुआ। उसने उसके पिता और भाई को उच्च पद तथा जागीर देकर सम्मानित किया। इस प्रकार मेहरुन्निसा नूरमहल से नूरजहाँ हो गयी।

 

 

 

नूरजहाँ बेगम
नूरजहाँ बेगम

 

चरित्र और योग्यता

जिस समय नूरजहाँ का विवाह हुआ उस समय उसकी आयु 34 वर्ष की थी। यह उसके यौवन के उतार का समय था। परन्तु वह अब भी खिले हुए पुष्प के समान जान पड़ती थी। जैसी वह सुन्दरी थी चरित्र और योग्यता वेसी ही वह बुद्धिमती भी थी। उसमें उलझी हुई बातों को सुलझाने की अद्वितीय शक्ति थी। उस समय के बड़े-बड़े यवन राजनितिज्ञ उसकी राजनीति-पढ़ुता का लोहा मानते थे। ओर जिन राजनीतिक मामलों को सुलझाने में वह अपने आपको असमर्थ पाते ये उसके लिए उससे परामर्श लेते थे। कविता से उसे विशेष प्रेम था। वह स्वंय फारसी भाषा में अत्यंत सुन्दर कविता करती थी। उसका जीवन उदारमय था। उस समय नवीनतम फेशन की वही जन्मदात्री थी। चित्रकारी में उसकी विशेष रुचि थी।

 

नूरजहाँ कोमल थी, सुकुमार थी, फिर भी वह शारीरिक बल में किसी पुरुष से कम नही थी। वह अपने पति के साथ प्रायः शिकार खेलने जाया करती थी। उसने कई बार शेर ओर चीतों का शिकार भी किया था। जहाँगीर उनकी वीरता से बहुत प्रसन्न रहा करता था। एक बार उसने प्रसन्न होकर उसे एक लाख रूपये की लागत का हाथों का आभूषण भेंट में दिया था। और एक हजार अशर्फियाँ अपने सेवको में बांटी थीं। वह दृढतापूर्वक प्रत्येक कार्य का सचालन करती थी। वह युद्ध-कला में भी अत्यन्त कुशल थी। जिस समय वह हाथी पर बैठकर युद्धक्षेत्र में जाती थी, उस समय बड़े-बड़े योद्धा उसमे रणचंडी समझकर नतमस्तक हो जाते थे। भारत के शासन में वह जहाँगीर को पर्याप्त योगदान देती थी। पड़यंत्र रचने में भी वह अत्यन्त निपुण थी।

 

नूरजहाँ उदार महिला थी। वह पीड़ितों के दुःख का अनुभव करती थी। और उन्हें यथाशक्ति सहायता देती थी। अनाथ मुसलिम-बालिकाओ के विवाह तथा असहाय स्त्रियों के जीवन-निर्वाह के लिए मुक्तहस्त होकर वह दान दिया करती थी। अपने परिवार ओर सम्बन्धियों की सहायता करने के लिए वह सदैव तत्पर रहती थी। उसी की कृपा से उसके पिता तथा भाई को राज्य में उच्च पद प्राप्त हुए थे। वह जहाँगीर से अत्यन्त प्रेम करती थी। यही कारण था कि जहाँगीर उसके हाथों का खिलौना हो गया था। वह प्रत्येक मामले मे उसमे सलाह लेता था और जो कुछ वह कहती थी, वही करना अपना परम कर्तव्य समझता था। बड़े-बडे सरदार और जागीरदार उसके इशारे पर नाचा करते थे। सच तो यह है कि वही सब कुछ थी। जहाँगीर केवल नाम मात्र का बादशाह था।

 

 

 

सरदारों पर प्रभाव

जहाँगीर का इस प्रकार स्त्रेण हो जाना बहुत से सरदारों को खटकता था। राज्य के प्रत्येक कार्य में नूरजहाँ का हस्तक्षेप वह सहन नहीं कर सकते थे। नूरजहाँ भी अपने योवन, सौन्दर्य और सरदारों पर प्रभाव के राज-मद में चूर थी। कभी-कभी वह ऐसे कार्य कर बैठती थी जिससे उसके शत्रु और मित्र दोनों असंतुष्ट हो जाते थे। यही कारण था कि शाही निवास तथा दरबार में उसके विरुद्ध कुछ ऐसे लोग तैयार हो गये थे जो उसके प्रभाव का अन्त करना चाहते थे। महावत खाँ इस दल का मुखिया था। वह नूरजहाँ की सब चालें अच्छी तरह समझता था और सदैव उनसे सतर्क रहता था।

 

 

नूरजहाँ का षड़यंत्र

यह पहले लिखा जा चुका है कि नूरजहाँ की एक पुत्री शेरे अफ़गान से थी। इसका विवाह जहाँगीर के द्वितीय पुत्र शहरयार से हुआ था। नूरजहाँ के भाई आसफ़जाह की पुत्री मुमताज़ महल का विवाह शाहजहाँ से हुआ था जो राज्य का उचित और योग्य उत्तराधिकारी था। नूरजहाँ चाहती थी कि उसका दामाद शहरयार ही उसकी मृत्यु के पश्चात्‌ राज्य का उत्तराधिकारी बने। इसलिए उसने शाहजहाँ के विरुद्ध जहाँगीर से खूब शिकायत की ओर उसका मन उसकी ओर से फेर दिया। सन्‌ 1620 ई० में जब जहाँगीर और नूरजहाँ दोनों कश्मीर में कन्धार के बादशाह शाह अब्बास के विरुद्ध युद्ध की तैयारी कर रहे थे तब नूरजहाँ ने एक षड़यंत्र से काम लिया। उसने शाहजहाँ से कंधार पर आक्रमण करने के लिए कहा। शाहजहाँ दूरदर्शी था। वह नूरजहाँ की चाल समझ गया। इसलिए उसने क़न्धार जाने से साफ़ इंकार कर दिया। जहाँगीर को यह बात बहुत बुरी मालूम हुई। उसने शाहजहां को आज्ञा दी कि वह दक्षिण की सेना तथा वहाँ के कर्मचारियों को शीघ्र उसके हवाले कर दे। शाहजहां ने इस आज्ञा का भी उलंघन किया। अब जहांगीर का संदेह दृढ़ दो गया ऐसा सुअवसर पाकर नूरजहाँ ने घौलपुर की जागीर जिसे शाहजहां वहुत दिनों से अपने लिए चाहता था शहरयार को दिला दी और उसका पद बढ़ाकर कंधार विजय के लिए भेजवा दिया। इतने ही में कंधार हाथ से निकल गया। मुग़ल-सम्राट को उस हानि से अत्यन्त दुःख हुआ परन्तु वह विवश था। नूरजहाँ के आगे उसकी एक भी नही चलती थी।

 

 

शाहजहाँ का विद्रोह

जहांगीर के चार पुत्र थे। खुसरू, शाहजहाँ, परवेज और शहरयार। सन् 1622 ई० में शाहजहाँ ने खुसरू को दक्षिण-भारत की ओर ले जाकर मरवा डाला, ओर उसके मृतक-शरीर को प्रयाग के एक बाग मे दफना दिया। आजकल इस बार को खुसरू-बाग़ कहते हैँ। इस प्रकार एक काँटा दूर हो गया। शाहजहाँ अपने पिता से इतना असतुष्ठ नहीं था जितना नूरजहाँ से। वह जानता था कि उसके बादशाह बनने में नूरजहाँ ही बाधक हो रही है। परवेज और शाहरयार उससे छोटे थे। उसके जीवित रहते शहरयार को गद्दी मिलना अन्याय था। यह विचार कर उसने विद्रोह कर दिया। नूरजहाँ पहले से ही सतर्क थी। विद्रोह की सूचना पाते ही उसने शाही सेना भेज दी। सन्‌ 1623 ई० मे दिल्‍ली से दक्षिण की ओर विलोचपुर में प्रथम युद्ध हुआ। इसमे शाही-सेना की विजय हुई। इससे जहांगीर बड़ा प्रसन्न हुआ। वह स्वंय अपने पुत्र की सेना से युद्ध करने के लिए अजमेर गया। यह समाचार पाते ही शाहजहाँ बहुत दिनों तक इधर-उधर सहायता के लिए घुमता रहा, परन्तु कही किसी ने उसे सहायता नहीं दी। अंत में चारों ओर से निराश होकर मार्च सन्‌ 1626 ई० में उसने अपने पिता से क्षमा माँगी ली। नूरजहाँ ने इस अवसर से पूरा लाभ उठाया। उसने उससे असीरगढ़ और रोहतास का किला ले लिया। उसके दो पुत्र दारा तथा औरंगजेब भी उससे छीनकर दिल्ली के राज-भवन में रहने के लिए भेज दिये। इस प्रकार अपमानित होकर वह अपनी स्त्री और पुत्र मुराद के साथ नासिक चला गया।

 

 

महावत खाँ का विद्रोह

शाहजहां को अच्छी तरह नीचा दिखाकर नूरजहां ने महावत खाँ और परवेज़ी की शक्ति का भी अंत करना चाहा। उसने महावत ख़ाँ को बंगाल का गवर्नर बना दिया और सेनापति के पद से हठा दिया। परवेज़ बुरहानपुर में रहने के लिए भेज दिया गया। इतना ही नहीं नूरजहाँ ने उस पर उत्कोच और अपहरण का अभियोग लगाकर उस को बहुत अपमानित किया। महावत ख़ाँ बड़ा स्वामीभक्त था, परन्तु अपना तथा अपने दामाद का अपमान उससे सहन न दो सका। अन्त में उसने भी विद्रोह कर दिया।

 

महाबत ख़ाँ बड़ा शक्तिशाली था। वह राजपूतों की एक सेना लेकर झेलम नदी के तट पर बादशाह से मिला और उसे बन्दी कर लिया। उस समय नूरजहाँ भी उसके साथ थी। बादशाह के बन्दी होने का समाचार पाकर यह निकल भागी। उसके साथ शहरयार भी गया। नदी पार करके नूरजहाँ ने बड़े-बड़े मुग़ल-सरदारों की एक सभा की और यह निश्चय किया कि महाबत खाँ से युद्ध किया जाय। जहाँगीर इस विचार से सहमत नहीं था। वह महाबत खाँ और राजपूतों की शक्ति को अच्छी तरह समझता था। परंतु नूरजहाँ के आगे किसी की एक भी न चल सकी। वह स्वंय हाथी पर बैठकर ओर अपनी गोद में शरहयार की पुत्री को लेकर नदी पार करने के लिए आगे बढ़ी। यह देखकर राजपूतों की सेना ने तीरों की ऐसी घोर वर्षा की कि शाही सेना तितर-बितर हो गयी। ऐसी दशा में उसने आत्म समर्पण कर दिया। वह पकड़ ली गयी, ओर अपने पति जहाँगीर के साथ बन्दी-गृह में रहने के लिए भेज दी गयी। आसफ ख़ाँ ने अटक की ओर भागना चाहा, परन्तु वह भी पकड़ा गया ओर बन्दी-गृह मे भेज दिया गया। इस प्रकार महाबत खाँ ने सब पर विजय प्राप्त की।

 

 

शाहजहाँ का पुनः विद्रोह

जहाँगीर और नूरजहाँ दोनों बन्दी-गृह में थे। यह उनके लिए बड़े संकट का समय था। जहाँगीर का स्वास्थ्य बिगड़ रहा था। शाहजहाँ पुनः उपद्रव करने का स्वप्न देख रहा था। महाबत खाँ सब पर अपनी धाक जमाए हुए था। ऐसे अवसर पर नूरजहाँ ने बड़े धैर्य से काम लिया। वह बन्दी-गृह से मुक्त होने के लिए युक्ति सोचने लगी। अवसर पाकर एक दिन वह अपने पति के साथ भाग खड़ी हुई और आसफ खाँ के साथ कश्मीर पहुँची। इसी समय शाहजहाँ ने पुनः विद्रोह कर दिया। उसने थाटा (सिन्‍ध) के किले पर आक्रमण कर दिया। परन्तु इस बार भी वह असफल रहा। अब वह दक्षिण की ओर चला गया। वहाँ महाबत खां से उसकी भेंट हो गयी। इस समय वह भी बड़े सकंट मे था। नूरजहां ने बन्दी-गृह से मुक्त होने पर उसे ही शाहजहां के विरुद्ध थाटा की ओर भेजा था, परन्तु मार्ग मे ही शाही सेना के सिपाहियों ने उसका सारा धन लूट लिया था। इसलिए वहाँ से भागफर वह दक्षिण की ओर चला गया था। इधर शाहजहाँ भी चारों ओर से निराश होकर थक गया था। अत: एक ही अवस्था में होने कारण दोनों में मित्रता हो गयी।

 

 

जहांगीर की मृत्यु

बादशाह कश्मीर में था। मद्यपान की अधिकता के कारण उसका स्वास्थ्य बिगड़ गया था। अत: उसने कश्मीर से दिल्‍ली की ओर प्रस्थान किया। शिकार खेलने का उसे अब भी शौक था।  इस लिए बैरमकुला (बहरमगुला) में वह रुक गया। यहाँ शिकार खेलते समय अचानक एक सिपाही की मृत्यु हो गयी। इस मृत्यु से उसके ह्रदय पर बड़ी चोट लगी और उसका स्वास्थ्य इतना बिगड़ गया कि बड़े-बड़े हकीमों की चिकित्सा विफल हो गयी। अंत में 28 अक्टूबर सन्‌ 1627 ई० को वह इस संसार से चल बसा। उसका शव लाहौर के निकट दिलकुशा बाग में दफना दिया गया।

 

 

शाहजहाँ का राज्याभिषेक

जहाँगीर की मृत्यु फे पश्चात्‌ नूरजहाँ की समस्त चेष्टाएँ विफल होने लगी। आसफ ख़ाँ शाहजहाँ को बादशाह बनाना चाहता था। शाहजहाँ उसका दामाद था। नूरजहाँ शहरयार को चाहती थी। परवेज मर चुका था। इसलिए आसफ खाँ ने अपने एक विश्वासपात्र द्वारा शाहजहाँ के पास बादशाह की मृत्यु की सूचना भेज दी। इधर नूरजहाँ शहरयार के लिए प्रयत्न करने लगी। शहरयार निकम्मा था। वह इन झगड़ों से दूर रहना चाहता था, परन्तु अपनी स्त्री तथा नूरजहां से वह विवश था। अंत में उनके कहने से उसने लाहौर में अपने आपकों बादशाह घोषित कर दिया। यह देखकर आसफ खाँ ने खुमरू के पुत्र को बन्‍दी गृह से निकाल कर उसे बादशाह घोषित कर दिया और शहरयार को परास्त करने के लिए स्वयं रवाना हुआ। लाहौर घेर लिया गया और शहरयार को पकड़ कर अंधा कर दिया गया। इतने मे शाहजहाँ भी आ गया। उसने 24 जनवरी सन्‌ 1628 ई० को राजधानी में प्रवेश किया। आसफ़ खाँ को मुंह माँगी मुराद मिल गयी।

 

 

नूरजहाँ की मृत्यु

नूरजहां अपने प्रयत्न में असफल रही। जिसके लिए उसने आजीवन प्रयत्न किया वह अन्धा बना कर मार डाला गया। इस घटना से उसका कोमल हृदय चूर-चूर हो गया। उसने सार्वजनिक कार्यों से सदैव के लिए अवकाश ग्रहण कर लिया ओर अपनी एकमात्र विधवा पुत्री के साथ लाहौर की ओर प्रस्थान किया। वहाँ उसके जीवन का अंतिम समय बड़े कष्ट से व्यतीत हुआ। जिसने इतने दिनो तक मुगल-साम्राज्य के बड़े-बड़े कर्मचारियों को अपनी अंगुली पर नचाया, जिसने अपने सौंदर्य से मुगल बादशाह जहांगीर को परांस्त किया उसने भी वह दिन देखे जब उसकी ओर से सब ने अपनी आँखे फेर ली। कहाँ दिल्ली का वैभव कहाँ लाहौर का एकान्त जीवन। 17 दिसम्बर सन्‌ 1645 ई० को उसका यह जीवन भी समाप्त हो गया। उसका शव जहांगीर की कब्र के पास ही दफनाया गया। अनन्य प्रेम के दोनों पुजारी फिर एक हो गये।

 

 

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भारत के आजाद होने से पहले की बात है। राजस्थान कई छोटे बडे राज्यों में विभाजित था। उन्हीं में एक
सती उर्मिला
सती उर्मिला अजमेर के राजा धर्मगज देव की धर्मपत्नी थी। वह बड़ी चतुर और सुशील स्त्री थी। वह राज्य कार्य
श्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित
"आज तक हमारा काम परदेशी नीवं के भवन को गिराना रहा है, परंतु अब हमें अपना भवन बनाना है, जिसकी
अमृता शेरगिल
चित्रकला चित्रकार के गूढ़ भावों की अभिव्यंजना है। अंतर्जगत की सजीव झांकी है। वह असत्य वस्तु नहीं कल्पना की वायु
राजकुमारी अमृत कौर
श्री राजकुमारी अमृत कौर वर्तमान युग की उन श्रेष्ठ नारी विभूतियों में से एक है। जिन्होंने राजनीतिक क्षेत्र में भाग
कमला देवी चट्टोपाध्याय
श्रीमती कमला देवी चट्टोपाध्याय आज के युग में एक क्रियाशील आशावादी और विद्रोहिणी नारी थी। इनके आदर्शों की व्यापकता जीवनपथ
रजिया सुल्तान
रजिया सुल्तान भारतीय इतिहास की वह वीरांगना है, जिन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी भाग में दिल्ली सल्तनत पर शासन किया था।
चाँद बीबी
सुल्ताना चाँद बीबी कौन थी? उसका नाम था चाँद था। वह हरम का चाँद थी। दक्षिण भारत का चाँद थी।
राजमाता अहल्याबाई होल्कर
होल्कर साम्राज्य की महारानी अहिल्याबाई होल्कर भारतीय इतिहास की कुशल महिला शासकों में से एक रही हैं। अपने इस लेख

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