नवाब बेगम की जीवनी – सदरून्निसा नवाब सफदरजंग की बेगम

अवध के दर्जन भर नवाबों में से दूसरे नवाब अबुल मंसूर खाँ उर्फ़ नवाब सफदरजंग ही ऐसे थे जिन्होंने सिर्फ़ एक शादी की थी। इस तरह सारी नवाबी में वो अपने आप में अकेली मिसाल कहे जा सकते है। नवाब सफदरजंग की उस इकलौती” बीवी का नाम सदरुन्निसा था और जो नवाब सआदत खाँ बुरहानुलमुल्क की बेटी थी। ससुराल में उन्हें नवाब सफदरजहां बेगम का खिताब मिला था और फिर वो नवाब बेगम के नाम से मशहूर हुईं।

 

 

नवाब बेगम को अवध की सबसे खुशनसीब और अकेली मिसाल बेगम कहना चाहिए जिसकी तीनों पीढ़ियों ने नवाबी की शान पायी थी। उनके बाप नवाब थे ही फिर उनके शौहर हाकिमे सल्तनत हुए जिनके बाद उनके बेटे तख्तों मसनंद पर तशरीफ़ लाए। अपनी ज़िन्दगी के तीनों पहर शानो-शौकत से गुजारने वाली नवाब बेगम बड़ी अक्लमन्द और दानिशमन्द महिला थी। जिस वक्त शाहें दिल्ली अहमदशाह के बुलावे पर वो अपनी फ़ौज के लश्कर और अपने घायल शौहर को लेकर फ़ैजाबाद से जा रही थी, सुल्तानपुर के पास नवाब सफदरजंग का इन्तकाल हो गया।

 

 

नवाब बेगम का जीवन परिचय

 

 

इस तरह रास्ते में सुहाग लुट जाने पर भी इस औरत ने बड़े सब्र और बेहद होशियारी से काम लिया और इस राज को राज ही रखा । फ़ैजाबाद मे जब अपने महल की ड्योढ़ी में हाथी की पीठ पर कसे सुखपाल में नवाब सफदरजंग की लाश लेकर उतरी तो उन्होंने पहले अपने बेटे नवाब शुजाउद्दौला से सलाह करके फौज और किले की कमान मजबूत कर ली तब जाकर महल में से रोने-पीटने की आवाज़ें उठीं। नवाब बेगम अगर अपने सूबे का बन्दोबस्त इस खुबसूरती से न संभाल लेती तो शहर में बगावत हो जाती और तख्त हाथ-बेहाथ हो जाता। ये सन्‌ 1754 की बात थी।

 

नवाब बेगम
नवाब बेगम

 

जब नवाब सफदरजंग नहीं रहे तो उनके बेटे शुजाउद्दौला ने तख्ते अवध की’ गद्दी संभाली। नवाब बेगम बड़ी जेहनमन्द थी लेकिन अक्सर ग़रीबों और दुखियों की मदद के मौक़े पर मासूम हो जाया करती थीं। उनकी एक दासी के पास ख़ज़ाने की चाबियां रहती थीं। उस नेकबख्त को जब कभी रुपये-पैसों की ज़रूरत होती तो वो बेगम से सिक्कों को धूप दिखाने की बात करती—“मलिका ए आलिया, हर चीज को रखे-रखे सीलन खा जाती है तो फिर सिक्के भी सदमा जरूर उठाएँगे, इसलिए बेहतर है कि उन्हें वक्त-वकत पर धूप दिखा दी जाए।

 

 

फिर क्या था, फ़ैजाबाद के महल की छत पर चाँदी-सोने के सिक्के बिछा दिए जाते और उसके बाद वो बांदी रुपयों के तोड़े (गिनती की अलग-अलग थैलियाँ) लगाती तो कुछ जरूर ही कम निकलते और इस पर उस कनीज का जवाब ये होता कि हर चीज़ धूप पाकर कुछ न कुछ सूख जाती है तो इनमे से कुछ रुपये अगर धूप में खुशक हो गये तो क्या अजब नवाब बेगम सब समझते हुए भी इस बात का कुछ बुरा नही मानती थीं, सिर्फ़ हंसकर टाल देती थीं।

 

 

सन्‌ 1764 में शुजाउद्दौला को बक्सर की लड़ाई में मीर क़ासिम की तरफ़ से लड़ने जाना था। इस मुक़ाबले में अंग्रेजों से मोर्चा लेना कोई आसान बात नहीं थी लेकिन नवाब बेगम की नवाबी का क्‍या कहना ! उन्होंने अपने बेटे की खूब होसला अफ़जाई की। उन्होंने पहले भी अपने शौहर के जमाने में फरूर्खाबाद की जमीं के लिए अपने खर्चे से 11 लाख 4 हज़ार अर्शाफ़ियां दी थीं। शुजाउद्दौला अपनी माँ का बहुत अधिक आदर करते थे। बिहार की तरफ़ जंग के लिए रवाना होते समय नवाब जिस्म पर हथियार बाँधकर अपनी माँ की ड्थोढ़ी में इजाजत माँगने के लिए तशरीफ़ लाए। महल की दहलीज़ में सर पर बगुले के पंखों का-सा रुपहले सिन का ताज पहने माँ खड़ी थीं। नवाब बेगम ने बेटे के बाजू पर इमाम जामिन बाँधने के बाद खुशबूदार गिलौरियों से मह॒कते हुए सुर्ख होंठों से अपने बेटे का माथा चूमा और बड़े तम्कनत से कहा, “जाओ बैटा, हजरत अली तुम्हारे निगहबान होंगे। मेरे लाल, चुन चुन कर गोरे दुश्मनों को मारना, गिन-गिनकर उन विदेशी अंग्रेजों को ख़त्म कर देना मगर खुदा के वास्ते मेरी पीनस उठाने के लिए बारह फिरंगी जरूर बचा लेना।

 

 

हुआ ये कि बक्सर की लड़ाई में अंग्रेजों ने बुरी तरह शिकस्त दी, यही क्या “कम हुआ कि आखिरी लड़ाई के एक दिन पहले नवाब को एक लँगडी हथिनी पर बिठा कर भगा दिया गया था। खैर, जान बच गईं, मगर लेने के देने तो पड ही गए। अंग्रेज़ सरकार ने नवाब शुजाउदौला से 50 लाख रुपये तावाने जंग वसूल किया। इस हरजाने में फ़ैजाबाद का खज़ाना लूट लिया। 20 लाख की रकम तो शुजाउद्दौला की ब्याहता बीवी बहु बेगम ने अपने जेवर उतार कर पूरी की, यहां तक कि अपनी सुहाग की नथ’ तक उतारकर नवाब के आगे रख दी थी और इसी से शुजाउद्दौला जिंदगी भर बहू बेगम के एहसानमन्द रहे। बाक़ी भुगतान के लिए नवाब को इलाहाबाद का इलाका और चुनारगढ़ का क़िला कम्पनी सरकार के हवाले करना पड़ा और फिर तो कम्पनी सरकार का पांव अवध सल्तनत में ऐसा पड़ा कि अंगद का पांव बन गया।

 

 

नवाब बेगम ने जो सख्त बात अंग्रेजों के खिलाफ़ कही थी वो हवा के पर लगाकर अंग्रेज हाकिमों के कान तक जा पहुँची और फ़ैजाबाद की बेगमों से उनकी दिलशिकनी हो गई। इसी बात का बदला वारेन हेस्टिग्ज ने लिया और नवाब आसफुद्दौला पर दबाव डालकर उसने नवाब बेगम और बहू बेगम से जबरदस्ती करोड़ों रुपया वसूल लिया। नवाब आसफुद्दौला ने, लखनऊ से अपने ख़ास नायब मुर्तज़ा खाँ उफ़ मुख्तारुद्दोला को इन सास-बहू से रुपया ऐंठने के लिए फ़ौज समेत फैज़ाबाद भेज दिया।

 

 

मुख्तारद्दौला ने अपनी चालों से बहू बेगम से तो लाखों रुपये वसूल लिए लेकिन जब नवाब की दादी हज़रत पर हाथ साफ़ करने चला तो दादी ने अपने इलाक़े के सारे जमींदार और राजाओं को अपने महल के क़रीब इकट्ठा करके उनकी मौजूदगी में कहा–

“मुल्क अवध मेरे बाप–प्रथम नवाब का है, ये आसफ़द्दौला के बाप का नहीं।” बात बिलकुल सच और सही थी–अवध का सूबा दिल्‍ली दरबार की तरफ़ से प्रथम नवाब सआदत खाँ बुरहानुलमुल्क को दिया गया था जो उनके बाप थे, फिर ये मसनद उनके हक़ से ही उनके शौहर को मिली जो बाद में उनके बेटे शुजाउद्दौला यानी आसफुद्दौला के बाप को मिली। और तो और, जब नवाब आसफुदौला ने अपनी दादी के महल की तरफ़ अपनी बदनीयत फ़ौजों का मुंह मोड़ा तो नवाब बेगम घोड़े की रकाब में पैर रखने को तैयार हो चुकी थीं और उनकी फ़ौज का रिसालदार जवाहर अली खाँ ख्वाजासरा नक्‍क़ारा बजाने को था” और इसमें कोई शक नही कि सारे सिपाही और रियाया उनकी ही तरफ़दारी करते जिससे नवाब को मुंह की खानी पड़ती लेकिन बीच में हमले हो गये। बहु बेगम की आँख से आँसू बह निकले। आसफुद्दौला नवाब बेगम का इकलौता बेटा था। बेवा बहू की ममता-भरी इस फ़रियाद पर नवाब बेगम को अपना इरादा बदल देना पड़ा।

 

4 जून, 1796 को नमाज़ पढ़ते वक्त नवाब बेगम का इन्तकाल हुआ और, फिर फ़ैजाबाद में गुलाब बाड़ी में ही उनको उनके बेटे के पहलू में दफ़ना दिया गया।

 

 

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