धातुओं की खोज किसने की थी – धातुओं की प्राप्ति कब हुई

वास्तव में वर्तमान सभ्यता की आधाराशिला उस समय रखी गई जब धातु के बने पात्र, हथियार तथा अन्य उपकरणों का मानव-जीवन मे समावेश हुआ। धातुओं की ओर मनुष्य का ध्यान उनकी उपादेयता, दीर्घकालीन मजबूती तथा अन्य गुणों के कारण आकृष्ट हुआ। इन वैभवशाली नगरों के कारीगर धातुओं की खोज में भटकते रहे। इन पर्यटकों ने पारस्परिक विचार विनिमय द्वारा धातु कला का प्रसार किया। आज से लगभग आठ शताब्दियों पूर्व भूतल पर स्वच्छन्द रूप में पाईं जाने वाली कतिपय धातुओं का ज्ञान हुआ। इस समय केवल सोना, चांदी, तांबा तथा उल्काओं से गिरे हुए लौह खंडों तक ही मनुष्य का ज्ञान सीमित था। लोग शुद्ध धातुओं तथा संकर धातुओं के भेद से अनभिज्ञ थे। प्राचीन परम्पराओं तथा पुरातत्व के साक्ष्य द्वारा यह प्रतीत होता है कि ईरान के उत्तरी-पूर्वी भाग में सर्वप्रथम धातु की बनी वस्तुएं बनाई गई। इस ज्ञान का प्रसार यहां से पश्चिमी एशिया के देशों में हुआ।

 

धातुओं की खोज किसने कब और कैसे हुई

 

खनिज पदार्थ तथा ईंधन, दोनों ही कैस्पियन सागर के तटवर्ती प्रदेशों में अनेक स्थानों पर पाए गए। अतः इस क्षेत्र में धातु कला विकसित हुई और इसी केन्द्र से धातु कला का ज्ञान, अफ्रीका और यूरोप के अन्य देशों में फैला। कुछ विद्वानों का यह भी विचार है कि यह कला अन्य स्थानों पर स्वतंत्र रूप से विकसित हुई भूतल पर शुद्ध धातु उपलब्ध होना अत्यन्त कठिन है, क्योंकि अन्य तत्वों के साथ रसायनिक क्रिया द्वारा धातुओं के यौगिक बनते हैं। इन यौगिकों के साथ मिट्टी तथा अन्य पदार्थ भी मिले रहते हैं। इस मिश्रण को अयस्क कहते हैं। केस्पियन सागर के तटवर्ती देशों में अयस्कों से शुद्ध धातु निकालने के लिए लकड़ी तथा लकड़ी का कोयला जलाया जाता था। इसके विपरीत पश्चिमी एशिया के देशों में लकड़ी का अभाव होने के कारण इस भूभाग में धातुएं निकालने का कार्य नहीं होता था। यही कारण है कि नगर राज्यों की आवश्यकता पूर्ति कैस्पियन सागर के
पर्वतीय प्रदेशों में बनाई गई धातुओं के आयात द्वारा होती थी।

 

 

 

प्राकृतिक अवस्था में स्वतंत्र रूप से पाए गए तांबे का रंग हरा-बैंगनी या काला-हरा होता है। सभ्यता के प्रारंभ काल में मनुष्य इसी प्राकृतिक तांबे का उपयोग करता था। इस घटना को घटे आज लगभग छः: हजार वर्ष व्यतीत हो गएं। उस समय पृथ्वी पर उपलब्ध ताम्र अयस्कों को पीटकर हथियार बनाए गए। कालान्तर में तांबे का यह प्राकृतिक भण्डार समाप्त हो गया तथापि आज से पांच शताब्दी पूर्व तक यह कला अविकसित बनी रही, फिर भी मानव अभियान चलता रहा। मनुष्य ने पृथ्वी पर उपलब्ध अयस्कों को पहचाना और उन्हें शुद्ध तथा परिष्कृट करने का प्रयास किया। आज से पांच हजार वर्ष पूर्व लकड़ी तथा लकड़ी के कोयले की आंच द्वारा तांबे के ऑक्साइड को गलाया जाने लगा था। इस प्रकार गलाएं गए तांबे को ढालना भी प्रारंभ हो गया था। लगभग इसी समय तांबे के कार्बोनेट तथा ऑक्साइड अयस्कों से अथवा अशुद्ध तांबे से कांस्य-पात्र तथा अस्त्र-शस्त्र भी बनने लगे। लकड़ी के कोयले के ढेर में रख कर तांबा गरम करने की विधि नितान्त दोषपूर्ण थी। इस विधि द्वारा निर्मित धातु में असंख्य छिद्र बन जाते थे। दूसरा दोष यह था कि समस्त धातु ताप की न्यूनता के कारण पिघल नहीं पाती थी।

 

 

धातुओं
धातुओं की खोज

 

तांबे के शस्त्रों के चिह्न मिस्र में राज्य वंशों से पहले के काल (350 ई.पू. से 3000 ईपू.) मे मिलते हैं। इस प्रकार के हथियारों का निर्माण तीन विधियों से होता था। तांबे के अयस्कों को आकार देकर, गलाकर तथा हथौड़ों से पीटकर। तृतीय तथा द्वितीय सहस्राब्दी ई.पू. के बीच में जिस तांबे का निर्माण हुआ उसमें रांगा, अंजन तथा टिन भी मिला रहता था। इन्ही एक हजार वर्षों के अंतर्गत ताप को तीव्र करने के लिए लकड़ी के कोयले को इंधन धौंकनी द्वारा जलाया गया। प्राकृतिक वायु द्वारा धमन करके धातुएं निकालने की विधि भी ज्ञात हो चुकी थी। आज से
चार हजार वर्ष पूर्व तांबे के सल्फाइड नामक अयस्क से तांबा निकाला जाने लगा और एक हजार वर्षों के भीतर यह विधि इतनी व्याप्त हुई कि तांबे के बने अस्त्रों का प्रचलन सर्व-साधारण में भी हो गया। तांबे के सल्फाइड नामक अयस्क को तांबे के
पृथक्कीकरण के लिए आंच में जलाया जाता था और फिर इसे धमन क्रिया द्वारा उच्च ताप पर शुद्ध किया जाता था। पूर्वी यूरोप के अनेक स्थानों पर तांबा शुद्ध करने के केन्द्रों की स्थापना ईसा के जन्म से लगभग सत्रह सौ वर्ष पूर्व हुई थी। शुद्ध तांबा निकालने के लिए अयस्कों को ईंधन के साथ मिलाकर गरम किया जाता था। आग की लपटों में भस्म करने से अनेक अशुद्ध पदार्थ या तो नष्ट हो जाते थे अथवा वाष्मीकृत या द्रवीभूत होकर निकल जाते थे। इसके उपरान्त इसे मिट॒टी के पात्र मे कई बार गरम किया जाता था। इस प्रकार निकाले गए तांबे मे अशुद्धियों की मात्रा केवल पांच प्रतिशत शेष रह जाती थी। कभी-कभी पिघले हुए तांबे के ऊपर वायु का तीव्र झोंका प्रवाहित किया जाता था। इससे अशुद्धियां वायु की के संसर्ग द्वारा धरातल पर तैरने लगती थी। गरम करने पर तांबा पहले की अपेक्षा मुलायम हो जाता है, अतएवं हथियार बनाने के लिए तांबे को बिना गरम किए हीं पीटा जाता था। गरम करके तांबे के हथियार बनाने में और भी कठिनाइयां थीं। जलवायु की आक्सीजन के सम्पर्क से तांबा ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाता था और इस प्रकार उसका कुछ भाग नष्ट हो जाता था। भंगुरता बढ़ जाने के कारण हथियार बनाने में यह अनुपयोगी सिद्ध हुआ।

 

 

 

तांबे तथा टिन के मिश्रण को गलाने पर एक नवीन पदार्थ प्राप्त हुआ, जिसे कांस्य की संज्ञा दी गई। यूरोप के कतिपय प्रागैतिहासिक स्थानों के उत्खनन से ज्ञात हुआ है कि एक साथ उपलब्ध होने वाले तांबे तथा टिन को शुद्ध करने के प्रयास में कांस्य का आविष्कार हुआ। तांबे के साथ टिन मिलाकर पिघलाने पर तांबे का कड़ापन बढ़ जाता है। साथ ही साथ ढालकर वस्तुएं बनाने तथा पीटकर बढाने में सरलता हो जाती है। इस नवीन आविष्कार के कारण इतिहास में कांस्य काल (Bronze age) का प्रारंभ हुआ। कालान्तर में लोगों ने टिन का महत्व समझा और तांबे तथा टिन के मिश्रण को गर्म करके कांस्य बनाने का वैज्ञानिक प्रयोग प्रारंभ हुआ। प्राचीन काल में टिन का उल्लेख बहुत ही कम मिलता है। आज से लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व पूर्वी एशिया में टिन के अयस्कों का पता चला, किन्तु न्यून मात्रा में उपलब्ध होने के कारण इसका आयात पश्चिम के देशों से होता था। यूरोप के देशों की ही भांति एशिया के देशों में तांबे तथा टिन के मिश्रण का महत्व ज्ञात हुआ। इस मिश्रण को पिघला देने पर तांबे की वस्तुओं की शक्ति और उपयोगिता दोनो ही बढ गई। इस संकर धातु को शुद्ध करने की भी आवश्यकता न थी।

 

 

मेसोपोटामिया के उर नामक स्थान पर किए गए उत्खनन में कांस्य के पात्रों, अस्त्रों तथा अन्य वस्तुओं का उत्तम संग्रह मिला है। शनैः शनै: पूर्व के देशों का भण्डार समाप्त होता गया। यहां के व्यापारी टिन की खोज मे पश्चिम की ओर गए और डेन्यूब की घाटी में सुमेरियन परम्परा से मिलती-जुलती धातुओं का प्रसार हुआ।आज से लगभग साढ़े तीन हजार वर्ष पूर्व निरंतर प्रयोगों द्वारा यह अनुभव किया गया कि बहुत अच्छे कांस्य के निर्माण से पहले टिन को अशुद्धियों से पृथक करना पड़ेगा। इसके उपरान्त इसकी तथा तांबे की निश्चित मात्रा मिला कर पिघलाई जानी चाहिए। इस प्रकार के वैज्ञानिक प्रयोग द्वारा ऐसी संकर धातुएं बनने लगीं जिनसे हथियार, दर्पण, घंटे तथा अन्य सुन्दर वस्तुओं का निर्माण हुआ। हित्ती सभ्यता के इतिहास से यह पता चलता है कि यहां के निवासी साइप्रस से कांस्य का आयात करते थे।

 

 

 

मित्र मे कांस्य का प्रचलन आज से लगभग चार सहत्रताब्दी पूर्व हुआ। तांबे तथा टिन के मिश्रण से बनी हुई वस्तुओं में सीसा, एण्टीमनी, आसनिक तथा जस्ता भी पाया जाता है। एशिया के पश्चिमी देशों में पाई गई इस संकर धातु में टिन की मात्रा अधिक होती थी। कुछ वस्तुएं ऐसी भी हैं, जिनमें आर्सेनिक तथा एण्टीमनी भी पाया जाता है। आर्सेनिक तथा एण्टीमनी मिला कांस्य मिस्र, सिंधु घाटी, हेंगरी तथा काकेशस प्रदेश मे पाया जाता है। आर्सेनिक की उपस्थिति के कारण कांस्य और भी कड़ा हो जाता था। ढालकर वस्तुएं बनाने मे सरलता होती थी, किन्तु धातु की भंगुरता बढ़ जाती थी।

 

 

शुद्ध टिन धातु का विवरण प्लिनी के लेखों में पाया जाता है। इसके काले रंग के अयस्क को कस्तीरा या केसीटराइट कहा जाता था। आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व यूरोप के कई स्थल टिन के निर्यात के लिए प्रसिद्ध थे। स्पेन में टिन का निर्यात अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होता था। एशिया के भूभागों की अधिकांश आवश्यकता स्पेन के टिन से ही पूरी होती थी। पहले टिन के अयस्कों को तोड़ा जाता था। फिर इसे कोयले के साथ मिलाकर गर्म किया जाता था। इस प्रकार खुली भटटी में गर्म करने पर कुछ टिन पिघलकर उड़ जाता था और कुछ अशुद्धियों के साथ मिल कर बह जाता था। यही कारण है कि 500 ई.पू. से पहले टिन का प्रथम उत्पादन न हो सका। यद्यपि कांस्य बनाने में इसका उपयोग होता रहा। पूर्व के देशों की परम्परा पश्चिम के देशों से सर्वथा भिन्‍न रही है। यहां के देशों की विलक्षण प्रकृति सभ्यता की एकता और अनेकता की जन्मदात्री है। पूर्व के
देशों में टिन के साथ सोना भी पाया जाता था। यहां के कुशल स्वर्णकारों ने इसे सोने से पृथक भी कर लिया, किन्तु उनकी धारणा थी कि यह नवीन धातु का एक विशेष प्रकार का सीसा है। हित्ती सभ्यता के इतिहास से यह पता चलता हैं कि यहां के निवासी साइप्रस से टिन का आयात करते थे। मिश्र में टिन का प्रचलन लगभग एक हजार ई. पू. में हुआ। इस देश में 600 ई.पू. की बनी कब्र से एक टिन की छड़ मिली है। असीरिया के अभिलेखों से ज्ञात होता है कि टिन को ‘ श्वेत कांस्य की
संज्ञा दी गई थी।

 

 

 

जैसा कि उल्लेख किया जा चुका है कि मिस्र तथा पश्चिमी एशिया के देशों मे कांस्य के साथ आर्सेनिक तथा एण्टीमनी घातुएं भी मिश्रित होती थी। आर्सेनिक तथा एण्ट्रीमनी के अयस्क रंग, अंजन तथा औषधि बनाने के लिए प्रयुक्त होते थे। शुद्ध एण्टीमनी धातु की बनी अनेक वस्तुएं हंगरी में पाई गई हैं। इनके अतिरिक्त और भी वस्तुएं ऐसी मिली हैं, जिनमें एण्टीमनी की मात्रा लगभग बीस प्रतिशत है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह धातु उन्हीं स्थानों पर शुद्ध की जाती थी, जहां एण्टीमनी और तांबा साथ-साथ पाए जाते थे। इस प्रकार की मिश्रित धातु बनाने का न तो कोई उद्देश्य था और न कोई नियोजित विधि ही ज्ञात थी। आगे चलकर एण्टीमनी को अलग करने की क्रिया ज्ञात हुई और इसका व्यापार भी बढ़ा।

 

 

मेसोपोटामिया में कुछ एण्टीमनी धातु की बनी अनेक वस्तुएं पाई गई है। इन वस्तुओं को बनाने के लिए एण्टीमनी का अयस्क कार्केशस पर्वत के निकटवर्ती प्रदेशों से लाया जाता था। यहां पर एण्टीमनी सल्फाइड, अधिक मात्रा में मिलता था और इसे गर्म करके एण्टीमनी धातु निकाली जाती थी। यद्यपि इस समय तक
शुद्ध एण्टीमनी धातु का प्रचलन हो गया था लेकिन इसके गुणों से लोग अनभिज्ञ थे। इस कथन की पुष्टि प्लिनी तथा डायोस्कराइड्स के लेखो से होती है। इन इतिहासकारों ने व्यापारियों को चेतावनी दी कि एण्टीमनी के बने पात्रों में कुछ विशेष प्रयोग न करें अन्यथा इस धातु का सीसे में परिवर्तित हो जाने का भय रहेगा।

 

 

 

तांबे-को जस्ते के साथ गरम करके पीतल बनाया गया। रसक जस्ते का एक अयस्क है। प्राचीन काल में अधिक समय तक लोग जस्ते से अनभिन्न थे। उत्खनन से प्राप्त अतीत के पीतल पात्रों का निर्माण केवल एक आकस्मिक घटना मात्र थी। इनके बनाने का कोई प्रयत्न नहीं किया गया था। तांबे के अयस्कों के साथ प्राकृतिक अवस्था में मिश्रित जस्ते को गर्म करने पर यह परिवर्तन हो गया था। पीतल बनाने की कला बहुत प्राचीन नहीं है क्योंकि प्राचीन धातुशिल्पी इस प्रकार का धातु निर्माण करना नहीं जानते थे।

 

 

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