तुकोजीराव द्वितीय का जीवन – तुकोजीराव होलकर द्वितीय

महाराजा तुकोजीराव द्वितीय

महराजा तुकोजीराव द्वितीय का राज्याभिषेक-उत्सव सन्‌ 1844 की 27 जून को हुआ। इस समय 21 तोपों की सलामी हुईं। महाराजा को गद्दीनशीनी की सनद् लेने के लिये कहा गया। महाराजा को यह बात मजबूर होकर स्वीकार करनी पड़ी। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह बात सन्धि के खिलाफ़ थी। जिस हालत में महाराज तुकोजीराव द्वितीय होल्कर राजगद्दी के मालिक हो चुके थे, उन्हें सनद देने की कोई आवश्यकता नहीं थी। होल्कर राज्य उनके पूर्वजों की तलवार से जीता गया था न कि अंग्रेजी सरकार से वह दान में मिला था। महाराज की नाबालिग अवस्था में मा साहबा ने कौंसिल ऑफ रिजेन्सी की सहायता से राज्य- व्यवस्था का संचालन किया। राजा भाऊपन्त, रामराव नारायण पलशीकर और खासगी दीवान गोपालराव बाबा कौंसिल के सदस्य थे।

 

महाराजा तुकोजीराव द्वितीय का परिचय

 

इस समय इन्दौर के रैसिडेन्ट एक सहृदय और उदार महानुभाव थे, जिनका कि नाम हेमिल्टन था। इनकी मित्रता-पूर्ण राय से राज्य के कारोबार में बड़ी सहायता मिली थी। इनका बाल महाराज पर अगाध प्रेम था। ये महाराज को अपने पुत्र की तरह मानते थे। महाराज का हृदय भी इनसे गदगद रहता था। वे अपने जीवन भर तक इन्हें याद करते रहे। उन्होंने स्मारक-स्वरूप इन्दौर में इनकी एक भव्य मूर्ति बना रखी है।

 

 

सन्‌ 1848 में कौंसिल के सीनियर मेंबर राजाभाऊ अपने दुर्व्य –
वहारों के कारण अपने पद से हटा दिय गये और उनके स्थान पर रामराव नारायण पलशीकर नियुक्त किये गये। सन्‌ 1849 में मां साहबा का स्वर्गवास हो गया। यहाँ यह बात स्मरण रखनी चाहिये कि राज्य की सब प्रजा मा साहबा को पूज्य दृष्टि से देखती थी ओर उनका बाल महाराज पर बड़ा प्रभाव था। अब महाराज को राज्य के कारोबार पर विशेष दृष्टि रखने की आवश्यकता प्रतीत होने लगी। आप राज्य की कौंसिल में नियमित रूप से बैठ कर शासन-सस्बन्धी व्यावहारिक शिक्षा प्राप्त करने लगे। महाराजा बड़े प्रतिभा-सम्पन्न पुरुष थे और उनकी ग्राह्य-शक्ति बड़ी ही अद्भुत थी। इससे शासन-सम्बन्धी कार्यों को वे बड़ी ही स्फूर्ति के साथ हृदयगम कर लेते थे।

 

 

स्वर्गीय मा साहबा कृष्णाबाई और तत्कालीन रेसिडेन्ट मि० राबर्ट
हेमिल्टन ने बाल महाराज की शिक्षा का बड़ा ही उत्तम प्रबन्ध किया था। आप की शिक्षा का भार मुन्शी उम्मेदसिंह नामक एक अनुभवी शिक्षक पर रखा गया था। महाराजा ने संस्कृत, फारसी और अंग्रेजी भाषा का बहुत ही अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया था। मि० हेमिल्टन ने महाराज की कार्य कुशलता और शासन-प्रेम के सम्बन्ध में लिखा हैः— “बालक महाराज की बढ़ती हुई बौद्धिक प्रतिभा और राज्य-शासन के सम्बन्ध में सूक्ष्म जानकारी प्राप्त करने की उनकी उत्कृष्ट इच्छा थी। वे राज्य के भिन्न भिन्न महकमों में जाकर बैठ जाते थे और वहाँ किस तरह काम होता है इस बात को बड़ी बारीक निगाह से देखते थे। इसमें महाराज एक विशेष प्रकार का आनन्द अनुभव करते थे। यह बात तत्कालीन कौंसिल के सीनियर मेम्बर राजाभाऊ फनसे को अच्छी न लगती थी और वह इससे अप्रत्यक्ष रूप से महाराज की बुराई कराने लगा। इसमें शक नहीं कि महाराज छोटी छोटी गलतियों को झट पकड़ लेते थे और किसी की यह ताकत नहीं थी कि वह उनकी आँख बचाकर एक पैसा भी खा जाये अथवा व्यर्थ खर्च कर डाले।”

 

 

महाराजा तुकोजीराव द्वितीय
महाराजा तुकोजीराव द्वितीय

 

पहले पहल श्रीमान महाराजा तुकोजीराव फाइनेन्स और अकाउन्टेंसी का काम देखने लगे। सन्‌ 1850 की 19 दिसम्बर को श्रीमान्‌ उत्तरीय भारत की यात्रा करने के लिये इन्दौर से रवाना हुए। यह यात्रा आपने अपने घोड़े की पीठ पर ही की। सन्‌ 1851 की 3 मार्च को आप इन्दौर लौट आये। सन् 1852 में महाराज शासन-कार्य देखने लगे। महाराजा की कार्यपटुता को देखकर सर हेमिल्टन विभोहित हो गये। उन्‍होंने ( सर हेमिह्टन ने ) अंग्रेज सरकार के पास जो रिपोर्ट भेजी थी उसमें महाराजा की असाधारण योग्यता, अपूर्व ब्रह्मशक्ति, राजनीतिज्ञता तथा विलक्षण स्मरण शक्ति की बड़ी प्रशंसा की थी। इसी साल अर्थात सन्‌ 1852 की 8 मार्च को इन्दौर में एक दरबार हुआ। इसमें इन्दौर के रेसिडेन्ट सर हेमिल्टन तथा रियासत के जागीरदार, जमींदार और अमीर उमराव सब उपस्थित थे। इसमें महाराज को पूर्ण राज्याधिकार प्राप्त हुए। इस अवसर पर सर हेमिल्टन ने उपस्थित सज्जनों को सम्बोधित करते हुए कहा था–“महाराज के कर कमलों में आज से राज्य के पूर्ण अधिकार रखे जाते हैं, हर एक को उनकी आज्ञा का पालन करना चाहिये। सब ही का यह कर्तव्य है कि वे महाराज के आज्ञा कारक और राज्य भक्त रहें।” इसके दूसरे दिन फिर दरबार हुआ। इस में महाराजा ने कई लोगों को जागीरें और इनाम दिये। इसी साल के दिसम्बर मास में महाराजा ने हिन्दुस्तान की यात्रा की। इस यात्रा में आप कई
महत्वपूर्ण स्थानों में पधारे।

 

 

सन्‌ 1857 में भारत में अंग्रेज सरकार के खिलाफ भयकर
विद्रोह अग्नि सुलग उठी। शुरू शुरू में मेरठ में इसकी चिनगारी चमकी और वड़वानल की तरह यह सारे हिन्दुस्तान में फैल गईं। महिद्पुर और भोपाल में अंग्रेजों ने जो हिन्दुस्तानी सेना रखी थी, वह भी इस विद्रोह में शामिल हो गई। इसका असर बिजली की तरह इन्दौर और मऊ में भी पहुँचा। इस समय इन्दौर के लोकप्रिय रेसिडेन्ट मि० हेमिल्टन बदल चुके थे और उनके स्थान पर कर्नल डूरेन्ड आये थे। उन्हें महाराजा ने बहुत समझाया कि वे अपने स्त्री, बच्चों तथा खजाने को मऊ भेज दें। पर उन्होंने महाराजा की बात को अस्वीकार कर दिया। विद्रोहियों ने सन्‌ 1857 की 1 जुलाई को इन्दौर- रेसिडेन्सी पर हमला कर उसे बुरी तरह लूटा। इस दिन भी महाराज ने कर्नल डूरेन्ड को लिखा कि वे ( महाराजा ) उन्हें अपनी शक्ति भर सहायता करने के लिये तैयार हैं। पर साथ ही उन्होंने यह भी जतला दिया था कि मेरी फौजें मेरे अधिकार से बाहर हो गई हैं । कर्नल डूरेन्ड सिहोर की ओर चले गये। यह घटना होने के बाद महाराजा ने अपने विश्वासपात्र सैनिकों को घायल यूरोपियनों के लाने के लिये भेजा। कहने की आवश्यकता नहीं कि महाराजा ने कई घायल यूरोपियनों को आश्रय दिया और उनकी सेवा का भी अच्छा प्रबन्ध किया। उन्होंने रेसिडेन्सी से भागे हुए लोगों को भी अपने यहाँ आश्रय दिया। इन्दौर रेसिडेन्सी खजाने में जो कुछ बचा था उसे लेकर महाराजा ने मऊ के केप्टन हंगर फोर्ड के पास भेज दिया। इसके अतिरिक्त उन्होंने उक्त कर्नल को अपनी शक्ति भर सहायता दी। अमझरा और सरदारपुर में ठहरे हुए महाराजा के फौजी अफसरों ने भोपाल के पोलिटिकल एजेन्ट कर्नल हचिसन को बहुत सहायता पहुँचाई। सन्‌ 1860 में जबलपुर में जो दरबार हुआ था उसमें तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड केनिंग ने उक्त सहायताओं को मुक्तकंठ से स्वीकार किया था । पर दुःख है कि महाराजा सिन्धिया और निजाम की सेवाओं को स्वीकार कर अंग्रेज सरकार ने जिस प्रकार इन दोनों महानुभावों को पुरस्कार स्वरूप कुछ मुल्क दिया था, वैसा महाराजा तुकोजीराव द्वितीय को नहीं दिया गया। उनके हृदय में इस बात का दुःख हमेशा रहा। वे इसे अपने प्रति अन्याय समझते रहे। उनका यह ख्याल था कि इसका कारण कर्नल डूरेन्ड का पैदा किया हुआ विपरीत प्रभाव है। कर्नल डूरेन्ड सन्‌ 1857 के दिसम्बर मास तक इन्दौर के रेसिडेन्ट तथा ए० जी० जी० और बाद में अंग्रेजी-सरकार के वेदेशिक-विभाग के सेक्रेटरी रहे । ये महाराजा तुकोजीराव द्वितीय के सख्त खिलाफ थे और उनके हित का हमेशा विरोध किया करते थे।

 

 

बलवे के बाद महाराज को राज्य-कार्य में मदद देने के लिये एक योग्य दीवान की आवश्यकता प्रतीत हुईं। उन्होंने अपने प्रियमित्र मि० हेमिल्टन की राय से इस जिम्सेदारी के पद पर सुप्रख्यात्‌ राजनीतिज्ञ सर टी० माधवराव को नियुक्त किया। आप ने इस पद पर नियुक्त होते ही राज्य-शासन में अनेक सुधार करने शुरू कर दिये। आपने शासन के जुडिशियल, पुलिस, रिव्हेन्यू आदि विभागों का पुनर्संगठन किया। 1872 के 3 दिसम्बर को लॉर्ड नाथब्रक इन्दौर राज्य के अन्तर्गत बढ़वाह नामक स्थान पर पधारे। वहाँ उन्होंने कई राजा महाराजाओं तथा अंग्रेज अफसरों के सामने नर्मदा नदी के पुल का नींव का पत्थर रखा। लार्ड महोदय ने इस अवसर पर श्रीमान महाराज तुकोजीराव द्वितीय की बड़ी प्रशंसा की थी। सन् 1873 में तुकोजीराव द्वितीय दक्षिण भारत के कई तीर्थ स्थानों में पधारे। इसी समय आप बम्बई और पूना भी तशरीफ ले गये थे। पूना में आपको कई दक्षिणी सरदारों के साथ मित्रता करने का अवसर प्राप्त हुआ। आपने यहाँ जमना बाई साहब गायकवाड़ के साथ भी बड़ी सहानुभूति प्रकट की और उन्हें बड़ौदा के मामले में पूर्ण सहायता देने का वचन भी दिया। सन् 1874 में श्रीमान्‌ कलकत्ते पधारे और वहाँ व्हायसराय के अतिथि रहे। श्रीमान्‌ व्हाइसराय ने आपका बड़ा स्वागत किया। इसी समय बड़ोदा के महाराजा मलहारराव पर अंग्रेज सरकार ने एक दुर्व्यवहार का अपराध लगाया था। उनके अपराधों की जाँच करने के लिये भारत सरकार मे एक कमीशन नियुक्त किया था। वायसराय ने महाराजा तुकोजीराव द्वितीय से इस कमिशन में बैठने के लिये पूछा था। पर महाराजा ने किसी खास सिद्धान्त के कारण कमिशन में बैठने से इन्कार कर दिया था । सन् 1875 में वायसराय की प्रार्थना को स्वीकार कर श्रीमान्‌ ने अपने प्रधान मंत्री सर० टी माधवराव को बड़ौदा के प्रधान संत्रित्व का पद स्वीकार करने के लिये अनुमति दे दी। सर टी० माधवराव के स्थान पर रघुनाथराव इन्दौर के प्रधान मन्त्री हुए। इन्होंने भी सर० टी० माधवराव की तरह राज्य-शासन में अनेक प्रकार के सुधार करना शुरू किये।

 

 

सन्‌ 1875 में भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड नाथब्रक इन्दौर पधारे और वे महाराजा के अतिथि रहे। सन् 1876 में प्रिन्स ऑफ वेल्स भी इंदौर पधारे, जिनका महाराजा साहब ने अच्छा स्वागत किया। सन्‌ 1877 में दिल्ली में जो दरबार हुआ था उससे भी श्रीमान्‌ पधारे थे। श्रीमान को को जी० सी० एस० आई० की उपाधि पहले ही प्राप्त थी, अब सी० आई० ई की उपाधि भी प्राप्त हो गई। आप श्रीमती सम्राज्ञी विक्टोरिया के कौंसिलर भी हो गये थे। भारत सरकार ने आपकी तोपों की सलामी 19 से बढ़ाकर 21 कर दी। दिल्‍ली दरबार में महाराजा का प्रभाव प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होता था। दूसरे राजा महाराजा आपको अपना पथ-प्रदर्शक मानते थे। आपकी सम्मति का वे बड़ा आदर करते थे। भारत के प्रायः सब राजा महाराजाओं से आपकी मेत्री थी। सन्‌ 1879 में श्रीमान्‌ तुकोजीराव ने महाराजा सिन्धिया को अपनी राजधानी में निमन्त्रित किया था। महाराजा सिन्धिया निमन्त्रण स्वीकार कर इन्दौर पधारे और एक सप्ताह तक श्रीमान्‌ के अतिथि रहे। सन्‌ 1882 में श्रीमान तुकोजीराव द्वितीय ने अपनी महारानी साहबा सहित बद्रीनारायण की यात्रा की। रास्ते में आप जयपुर ठहरे। जयपुर नरेश महाराजा माधोसिंहजी ने आपका बड़ा स्वागत किया। बद्री नारायण से लौटते समय श्रीमान्‌ तुकोजीराव द्वितीय लार्ड रिपन से मिलने नैनीताल ठहरे। यहाँ आपने अंग्रेज अधिकारियों पर अच्छा प्रभाव डाला। सन्‌ 1886 की 17 जून को महाराजा तुकोजीराव द्वितीय ने अनेक महान्‌ कार्य करने के पश्चात्‌ इंद्रलोक यात्रा संवरण की।

 

 

होल्कर राज्यवंश में महाराजा तुकोजीराव द्वितीय एक असाधारण प्रतिमाशाली नरेश हो गये थे। आप उत्कृष्ट श्रेणी के बुद्धिमान राजनीतिज्ञ थे। राज्य-प्रबन्ध करने की आप में अच्छी योग्यता थी। महाराजा मल्हारराव को इन्दौर जैसे महान और विशाल राज्य की नीव डालने का यश प्राप्त है। श्रीमती देवी अहल्याबाई अपने दिव्यचरित्र, अलौकिक पुण्य तथा अनेक सदगुणों के कारण भारत में अपना नाम अमर कर गई है। महाराजा यशवन्तराव ने अपनी वीरता और समय सूचकता से इन्दौर-राज्य की महानता को अक्षय रखने का गौरव प्राप्त किया। पर तुकोजीराव द्वितीय ने सन्‌ 1818 की की घटी हुईं रियासत को उन्नति और समृद्धि के ऊँचे शिखर पर पहुँचाने का श्रेष्ठ गौरव प्राप्त किया।

 

 

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