तीस वर्षीय युद्ध – तीस सालों तक चलने वाला युद्ध कारण और परिणाम

तीस वर्षीय युद्ध

यूरोप मे धार्मिक मतभेदों विशेष रुप से कैथोलिक (Catholic) तथा प्रोस्टेंटस (Protestents) के बीच मतभेदों के कारण हुए युद्धों में तीस वर्षीय युद्ध भी एक है। इस तीस वर्षीय युद्ध का आरंभ 1618 तब हुआ जब पवित्र रोमन साम्राज्य के प्रोस्टेंटस धर्मावलंबी बाहुल्य वाले बोहेमिया क्षेत्र के निवासियों ने कैथोलिक धर्म में आस्था रखने वाले आस्ट्रियाई मूल के फेर्डिनंड द्वितीय(Ferdinand ll) को अपना शासक मानने से इंकार कर दिया। इसके बाद तीस वर्षीय युद्ध धीरे धीरे राजनीतिक स्वरूप लेने लगा। जब अपने अपने लाभ के लिए यूरोप के कई अन्य देश धर्म के बहाने एक दूसरे के विरुद्ध सेनाएं भेजने लगे। इस प्रकार तीस वर्षों तक यह युद्ध लगातार चलता रहा। इस तीस वर्षीय युद्ध की समाप्ति 1648 में वेस्टफेलिया की संधि के साथ हुई। अपने इस लेख में हम इसी तीस वर्षीय लड़ाई का उल्लेख करेंगे और निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर विस्तार से जानेंगे:—-

 

तीस वर्षीय युद्ध कब से कब तक हुआ? तीस वर्षीय युद्ध के कारण क्या थे? तीस वर्षीय युद्ध की प्रकृति? तीस वर्षीय युद्ध के परिणाम क्या हुए? तीस वर्षीय युद्ध के प्रभाव क्या पड़े? तीस वर्षीय युद्ध in hindi? तीस वर्षीय युद्ध का काल क्या था? 30 वर्षीय युद्ध की मूल प्रकृति क्या थी? वेस्टफेलिया की संधि के महत्व क्या थे? आग्सबर्ग की संधि क्या थी? धर्म युद्ध के परिणामों की विवेचना? Thirty years bettel in hindi?

 

तीस वर्षीय युद्ध का कारण

सहत्रवीं शताब्दी में यूरोप के देशों में शांक्ति संतुलन का व्यापक संघर्ष चला। जर्मन इतिहासकारों ने इसे तीस वर्षीय युद्ध का नाम दिया और इसका काल 1618 से 1648 तक निर्धारित किया। उन्होंने इसे धार्मिक कारणों से लड़े गये युद्धों के रूप में चित्रित किया। यद्यपि इन युद्धों को आज भी ‘तीस वर्षीय युद्ध ‘ के नाम से ही जाना जाता है, किंतु अब अधिकांश इतिहासकार इसका काल-निर्धारण 1610 से 1660 तक करते हैं ओर इन्हें पचास वर्षों तक लडे गये अलग-अलग उदेश्यों वाले युद्ध मानते हैं।

 

इसमे कोई संदेह नही कि इन युद्धों के पीछे धार्मिक कारण (जर्मन प्रोटेस्टेंटों तथा कैथोलिकों के बीच विवाद) थे किन्तु वैधानिक तथा राजनितिक प्रश्नों (Constitutional and Political Questions) की भी अवहेलना नही की जा सकती। सच तो यह है कि धार्मिक, राजनीतिक, वैधानिक तथा आर्थिक कारणों में
कौन अधिक महत्त्वपूर्ण है ओर कौन कम महत्वपूर्ण है, यह बताना लगभग असंभव ही है। हां, यह जरूर है कि धार्मिक प्रश्नों ने इन युद्धों के पीछे सैदांतिक ओर प्रचारात्क आधारो का काम किया।

 

 

तीस वर्षीय युद्ध
तीस वर्षीय युद्ध

 

तीस वर्षीय युद्ध की प्रकृति

यदि हम मान ले कि ‘तीस वर्षीय युद्ध’ 1648 में वेस्टफेलिया की सन्धि के साथ समाप्त हो गया तो इन तीस वर्षों मे कम से कम दस युद्ध लड़े गये जो इस प्रकार है:—

  1. ज्यूलिस के उत्तराधिकार का युद्ध (War of the julich succession 1609-1614)
  2. बोहेमियाई ओर पेलेटाइन युद्ध (Bohemian and Palatine war 1618-1623)
  3. ग्राउब्यूनडेन की लड़ाई (Struggle for Graubunden 1620-1639)
  4. स्वीडन और पौलेंड का युद्ध (Swedish polish war 1621-1629)
  5. डेनिश युद्ध और प्रत्यानयन का आदेश (Denish war and the edict of restitution 1625-1629)
  6. मेटोवा का उत्तराधिकार युद्ध, (war of the Mantuav succession 1628-1631)
  7. स्वीडिश युद्ध और प्राग की शांति सन्धि (Swedish war and peace of Prague 1630-1635)
  8. स्मोलेस्क का युद्ध, (War of Smolensk 1632-1634)
  9. फ्रांसीसी स्वीडिश युद्ध, (Francisco- Swedish war 1635-148)
  10. स्वीडिश-डेनिश युद्ध, (Swedish-Denish war 1643-1645)

1648 मे वेस्टफेलिया की सन्धि तो अवश्य हुई किन्तु इन्ही युद्धों की श्रृंखला में दो अन्य युद्ध भी लड़े गये:– फ्रांसीसी-स्पेनी युद्ध (Franco-spenish war 1648-1659) और प्रथम उत्तरी युद्ध (First Northern war 1655-1660)
सुविधा के लिए इन युद्धों को चार चरणों में भी विभाजित किया जाता है’

  1. पैलेटाइन
  2.  डेनिश
  3.  स्वीडिश
  4.  फ्रांसीसी

 

पैलेटइन चरण

पैलेटाइन चरण युद्ध के प्रारम्भ होने से पाच वर्ष बाद तक (1623) माना जाता है। इस चरण मे प्रोटेस्टेंट ऐक्य के अध्यक्ष फ्रेडरिक की हार हुई। सम्राट फर्डिनिंड ने बवेरिया के राजा मेक्सीमीलियन तथा कैंथोलिक संघ की सहायता से प्रोटेस्टेंट दल पर आक्रमण किया। फ्रेडरिक के कमजोर नेतृत्व तथा लापरवाही के कारण 1620 में प्राग के पास उसकी पराजय हुई। फलत: उसे देश से निर्वासित कर दिया गया तथा प्रोटेस्टेंट ऐक्य विखंडित हो गया। धीरे-धीरे कैथोलिक मत वालो के अत्याचार को देखकर प्रोठेस्टेंट एकजुट होने लगे तथा उन्होने डेनमार्क के राजा क्रिश्चियन चतुर्थ तथा इग्लैंड को सहायता के लिए प्रार्थना की।

 

डेनिश चरण

डेनमार्क के रणक्षेत्र मे कूदने से युद्ध का दूसरा चरण 1624 से प्रारम्भ हुआ। कैथोलिक लीग के प्रसिद्ध जनरल टिली और अन्य सैनिक अफसर वेलेंस्टाइन की सहायता से सम्राट फर्डिनिंड ने प्रोटेस्टेंट मत वालो को कई स्थानों पर हराया। 1625 मे हैप्सबर्ग की शक्ति से डरते हुए डेनमार्क ने उत्तरी जर्मनी पर आक्रमण कर दिया किन्तु 1629 मे उसे पराजित होना पड़ा। सम्राट फर्डिनिंड द्वितीय को सभी अधिकृत क्षेत्र रोमन कैथोलिक चर्च को लौटाने पर सहमत होना पड़ा।

स्वीडिश चरण

1630 मे स्वीडन के राजा गुस्तावस अडॉल्फूस ने फर्डिनेड के विरुद्ध प्रोटेस्टेंट जर्मन राज्यो का नेतृत्व किया किन्तु 1632 मे लुटजन के युद्ध मे चारो ओर घिरे कूहरे में शत्रु की गोलियों से घायल होकर वह गिर पडा और मर गया।

 

फ्रांसीसी चरण

1635 तक आते-आते जर्मनी ने स्वीडन को समर्थन देना बंद कर दिया। बेलेंस्टाइन की सेनाएं भी पीछे हट गयीं किन्तु इसी समय रिचल्यू के नेतृत्व में फ्रांस के हस्तक्षेप से युद्ध का रूका हुआ सिलसिला फिर से शुरू हुआ। रिचंल्यू के साथ इस चरण में इटली, हॉलैंड, स्वीडन के सैनिक थे। स्वीडन के जनरल बरनार्ड तथा डच लोगो ने मिलकर सम्राट तथा स्पेन की सेना को कई बार
हराया। इसी दौरान बरनार्ड, रिचल्यू तथा फ्रांस के शासक लुई तेरहवां की मृत्यु हो गयी।

1637 में फर्डिनेड द्वितीय की मृत्यु के बाद फर्डिनेंड तृतीय सम्राट हुआ। 1640 में शांति वार्ताएं प्रारम्भ हुईं किन्तु सन्धि न हो सकी। फ्रांस के जनरल कोण्डी तथा ट्यूरेन के नेतृत्व में सेना ने सम्राट की सेना को फ्रीबर्ग (1642) नाराडिगन (1645) और लेंस (1648), आदि कई स्थानों पर हराया। अन्ततः 1648 में वेस्टफेलिया की सन्धि के साथ युद्ध विराम हुआ।

 

तीस वर्षीय युद्ध का परिणाम

 

यूरोप के इतिहास में इस सन्धि से धर्म संशोंधन का काल समाप्त हो गया। ऑग्सबर्ग की सन्धि के अनुसार राजकुमारो को अपने राज्यों का धर्म नियत करने का अधिकार दे दिया गया। कैथोलिक, लूथर तथा काल्विन, आदि सभी मतावलबियों को बराबरी का अधिकार दिया गया। सभाओं आदि में भी उनकी संख्या बराबर नियत की गयी। कैथोलिक-प्रोटेस्टेंट मतों की जब्त की गयी संपत्ति वापस लौटा दी गयी।

 

जर्मन एकीकरण की बात समाप्त हो गयी। ब्रेडनबर्ग, बवेरिया, सैक्सोनी तथा अन्य छोटी-छोटी लगभग 350 रियासतों को पूर्ण स्वतन्त्रता मिली। अपने से सबंधित प्रत्येक कार्य का निर्णय करने का दायित्व भी उन्हें सौप दिया गया। फलत: सम्राट नाममात्र के लिए रह गया। आलसेस तथा लॉरेन दोनों प्रांत फ्रांस के अधिकार में रहे परन्तु इसका झगड़ा फ्रांस तथा जर्मनी के बीच रुक-रुक कर अनेक वर्षों तक चलता रहा। युद्ध तथा अकालों के कारण जर्मनी की आबादी एक-तिहाई अर्थात 3 करोड़ से घटकर केवल एक करोड़ 20 लाख रह गयी। इसके अलावा कृषि, उद्योग, साहित्य, कला, विज्ञान, आदि सबका ह्वास हुआ।

 

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