जनता बाजार जयपुर और जय सागर का इतिहास

राजा के नाम पर बन कर भी जयपुर जनता का शहर है। हमारे देश में तो यह पहला नगर है जो मूलत जनता के स्वस्थ आवास- प्रवास, जीविकोपार्जन एव वाणिज्य-व्यवसाय तथा सुरुचि और सौन्दर्य-बोध को सर्वोच्च प्राथमिकता देकर नियोजित और निर्मित हुआ। इतने लम्बे-चौडे परकोटे से घिरे शहर मे कोई बाजार, कोई रास्ता-गलियारा और मोहल्ला ऐसा नही जो किसी राजा या रानी की याद सजोता हो। इस जनहित-प्रेरित नगर-रचना के आदर्श ओर मूल भावना को अक्षुण्ण रखते हुए ही जयपुर की नगर परिषद ने राजामल के तालाब की जगह अपने नव-निर्मित बाजार को जनता बाजार का नाम दिया है। आज यह जनता बाजार जयपुर में खरीदारी का प्रमुख स्थल है।

 

 

जनता बाजार जयपुर और जय सागर

 

 

राजामल का तालाब दस एकड से अधिक उस काली-कलूटी, कूडा-कचरा भरी ऊबड-खाबड जमीन का नाम था जो एक ओर बरहमपुरी, दूसरी ओर ताल कटोरा, बादल महल एव जयनिवास उद्यान तथा तीसरी ओर चांदी की टकसाल आर रामप्रकाश नाटकघर से घिरी थी। तालाब तो कभी का सूख गया या सुखा दिया गया था, किन्तु यहां की नम ओर सीलन भरी मिट॒टी तथा मटमेले कचरे मे छोटे-छोटे सफेद शंख ओर सीपियां बराबर यह प्रतीति कराती थी कि कभी यहां तालाब लहराता था। तथाकथित राजामल भी ओर कोई नही, राजा अयामल खत्री था जो जयपुर आने से पहले बादशाह औरंगजेब के दरबार मे एक बडा ओहदेदार था।

 

 

सवाई जयसिंह ने उसे यहां लाकर अपना मुसाहिब बनाया, जागीर बखशी ओर हवेली पर नौबत बजाने का सम्मान भी दिया। जयपुर को बसाने मे राजा अयामल ने अपने स्वामी को भरपूर सहायता दी। जयपुर वालो ने इस पजाबी नाम का जयपुरिकरण किया तो ”अया” को तो “गया-आया” कर गये और कोरा ‘राजा-मल’ रख दिया। चूंकि राजा मल की विशाल हवेली, दीवानखाना, नोहरे, पुडलाल और हाथी के ठाण पास ही थे (इसे अब ‘रायजी का घेर कहा जाता है), लोगो ने तालाब को राजामल के नाम से ही प्रसिद्ध कर दिया। इसका अधिकृत नाम “जयसागर’ राजकीय कागज- पत्रो तथा तत्कालीन ग्रन्थों तक ही सीमित रहा।

 

 

सवाई जयसिंह और उसके पुत्र ईश्वरी सिंह के समय में जयपुर के नये-नये नगर मे इस सरोवर की शोभा और सुपमा कैसी थी, इसके लिए उनके सम-सामयिक राज-कवि देवर्षि श्रीकृष्ण भट्ट के महाकाव्य ‘ईश्वर- विलास” के कछ अंश देखिए, जिनका संस्कृत से हिन्दी भावानुवाद इस प्रकार है :– महाराजा सवाई जयसिंह ने उच्च, श्वेत ओर समृद्धिशाली कैलाश सदृश भवनों का निर्माण कर
ब्रहमपुरी बसाई जिसके तट पर ऐसा सुरम्य जलाशय है जिसके किनारे कमल-वनो के पराग से आकृष्ट भौरो के वीणा-विनदक स्वर गूजते रहते हैं। यह तालाब पौराणिक समुद्र के समान, इन्द्र के ऐरावत हाथी और उच्चैश्रवा घोडे के समान (महाराजा के) हाथी-घोडो से सुशोभित हैं। (श्लेपालकार का चमत्कार दिखाते हुए कवि कलानिधि आगे कहते है) यह पद॒मो का आश्रय है अथवा पदमा-लक्ष्मी-का पिता है। इसके मध्य में विष्णु शयन करते हे जो पुण्डरीकाक्ष है (पृण्डरीक से आशय कमल-दल तथा महाराजा के गुरु रत्नाकर पुण्डरीक, दोनों से है जिनका विशाल भवन आज भी इस जलाशय के उत्तरी तट पर खडा है)।

 

 

जनता बाजार जयपुर
जनता बाजार जयपुर

 

यह तालाब चौकोर, शोभाशाली और पवित्र है, अत इन तीन गुणो से चतुर्मुंख, श्री धर और शकर के समान है, ब्रहमा, विष्णु और महेश की त्रिमूर्ति सा प्रतीत होता है। इसमें उठने वाली तरंगो से ऐसा प्रतिभासित होता है कि (ब्रहमपुरी मे रहने वाली) विप्र सुन्दरियों की कान्ति को देखकर वह भयभीत हो कांप रहा है। उनके नेत्रो और मुख के सौन्दर्य से कमल-दल हार गये हैं, उरोजो की शोभा से चक्रवाक हार गये है, त्रिवली की शोभा से तरंग हार गईं है और केशो की शोभा से भौरे हार गये है।

 

 

“ईश्वर विलास” के रचनाकार के अनुसार सवाई जयसिंह ने “जय” शब्द के साथ तीन चीजे बनाईं-आमेर मे जयगढ़ का दुर्गम गिरि- दुर्ग, जयपुर का “श्री सदोह शोभा समूह“ नगर और जयसागर का
मनोरम जलाशय। ‘त्रितयेन वाचा संस्कृत का महावरा है। किसी बात को पक्का और स्थिर मानने के लिए आज भी लोक मे उसे तीन बार कहने की परम्परा प्रचलित है। किसी भी नीलाम की बोली तीन बार पुकारने पर ही खत्म की जाती है। अपनी सार्वजनिक सभाओं मे भाषण समाप्त करने पर प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी भी तीन बार “जय हिन्द” का उद्घोष करती और सारे जन-समूह से कराती है। इस ”त्रिवाचा” का महत्त्व प्रतिपादित करते हुए कवि भविष्यवाणी करता है कि इस जय-नयी (जयगढ़, जयनगर अथवा जयपुर और जयसागर) से “जय ‘ सुनिश्चित और असदिग्ध है। यदि फिर भी किसी को कोई शंका हो तो इस जय-त्रयी मे सवाई जयसिंह का नाम ओर जोड कर पूरा ‘जय-चतुष्क” कर ले और जयपुर के जय के विषय मे निश्चित हो जाये।

 

 

हम देख सकते है कि अपने संस्थापक सवाई जयसिंह की मृत्यु के बाद प्रे पिचहत्तर वर्षों तक गृह-युद्ध, बाहरी हमलो और लूट-पाट तथा पडयत्र-कुचको के झ़ावातों के बीच भी यह दर्शनीय नगर किस प्रकार बनता और बढता रहा है। बना ही कुछ ऐसे शकुन से है यह नगर कि ध्वंस के बीच भी निर्माण के स्वर बराबर गुंजते रहे हैं। यह जयपुर का जय नही तो क्या है कि राजस्थान बनने के बाद इसे इतने विशाल राज्य की, जो भारत का दूसरा सबसे बडा राज्य है, राजधानी बनने का गौरव प्राप्त हुआ, जबकि राजस्थान से बहुत छोटे पंजाब ने चडीगढ़़ बनाना आवश्यक समझा और गुजरात के लिए अहमदाबाद और सूरत जेसे ऐतिहासिक तथा बडौदा जैसा प्रगतिशील नगर होते हुए भी गांधीनगर का निर्माण अनिवार्य हो गया। और तो और, उड़ीसा जैसे राजस्थान से भी कही पिछडे और अल्प साधन-सम्पन्न राज्य ने भी भुवनेश्वर को नये सिरे से बनाकर अपनी राजधानी स्थापित की। जयपुर मे वह सब कुछ पहले से ही था जो इन नव-विकसित राजधानियों मे अब उपलब्ध कराया गया है।

 

 

इसमे भी संदेह नही कि राजस्थान की स्थापना के बाद इसकी यह अप्रतिम राजधानी, जिसे संसार के पाच सर्व सुन्दर नगरो में यद्यपि गिना जाता रहा, पूरे बाइस वर्षो तक शासन और स्थानीय स्वायत्त शासन, दोनो द्वारा ही उपेक्षित रही। द्वितीय विश्व-युद्ध काल में सर मिर्जा मोहम्मद इस्माइल द्वारा इस नगर में लायी गई ‘फ्यनिसिपल कान्ति” के बाद 1971 ई मे जाकर बरकतुल्ला खा के मुख्यमत्री बनने पर जयपुर के दिन फिर फिरे। बरकत साहब मानते थे कि जयपुर की सारी दुनिया मे शोहरत है और यहां जो भी सुधार का काम किया जाता है, उसकी तरफ दुनिया भर की तवोजोह अपने आप हो जाती है। इसलिए जयपुर को इसकी शोहरत के मुताबिक रखने मे उन लोगो का भी नाम ही होता है जो इस शहर मे मसनद पर बैठते हैं।

 

 

पते की बात को यो आनन-फानन में समझने वाले वरक्त मिया तो मसनद पर ही क्या, इस दुनिया में भी ज्यादा नही रह पाये, लेकिन जो शुभ काम उन्होने जयपुर के लिए छोडा था, उसे उनके उत्तराधिकारी हरिदेव जोशी ने भी उसी ताव और लगन से आगे बढाया। अपने सोचे और सपनो में सजोये गये कामो को पूस होते
देखकर जोशीजी तब बडे आनंदित होते थे। जयपुर की गंदी और कच्ची बस्तियो के काया-पलट और उनके आदर्श आधुनिक बस्तियों मे परिणत होने को वे एक ऐसी उपलब्धि मानते थे, जिससे उन्हे हार्दिक प्रसन्‍नता ही नहीं, आत्मतोष भी मिला। जनता बाजार का विकास भी ऐसा ही काम था जो जयपुर के साथ यहां के शासन और स्थानीय स्वशासन का भी जय जयकार कराने वाले है।

 

 

जयपुर के बाद जयगढ़ को लीजिये, और कवि की वाणी की सार्थकता परखिये। राजस्थान में किलो और गढ़-कोटो की कोई कमी है? गांव-गांव, शहर- शहर पर दरों की प्राचीरे झुकी है। रणथम्भौर हठी हमीर के बलिदान से आज तक उजागर है और सबका सिरमौर है गढचित्तौड, जिसके सामने और सभी किलें गढेया । इतिहास के पृष्ठो मे चित्तौडगढ़ ने यह प्रशस्ति अर्जित की है तीन-तीन साको में हजारों राजपूत रण-बाकरो को तलवार की धार पर और उनकी वीरागनाओ की जौहर की धधकती ज्वाला मे उतार कर। किंतू जयगढ़। न कोई घेरा, न युद्ध, न साका और न जौहर। ऐसे दुर्गम दुर्गों के सरक्षात्मक महत्त्व के दिन भी लद॒ गये। लेकिन जयगढ़ निकला तकदीर का सिकन्दर। पिछले दिनो खजाने की खोज के प्रसंग मे सारे संसार में क्या नाम पाया इस किले ने सारे भारत मे ही नही, यूरोप और अमरीका तक मे जयगढ ही जयगढ हो गया।।! और जयगढ का जय” अन्त तक बहाल रहा। जय -त्रयी मे तीसरा जयसागर है जिसका अब नगरपरिषद द्वारा निर्मित जनता बाजार में निंनादित हो रहा है। जयपुर की पुरानी राज्य-व्यवस्था तो इतिहास के गर्भ मे विलीन होनी ही थी, किन्‍तु जयपुर का पचरंग जनता बाजार मे एक नये रूप में पुराने राजमहल क्षेत्र के शीर्ष पर ही लहरा उठा हैं। जनता
बाजार मे वही जयपुर का रूप और रंग है, वही गुलाबी आभा से दमकती दुकाने और उन पर वही ज्यामितिक डिजायनो के कलात्मक कंगुरे। किन्तु इन दुकानो के शटर्स पांच रंगो मे रंगकर जयपुर की पंचरगी बहार जैसे फिर से निखारी गयी हैं।

 

 

जनता बाजार सारी जगह दल-दल और गंदगी से भरी थी। इसका कारण? जैसे-जैसे शहर बढा और जमीन के लिये लोगो की हविश भी, इस निचले क्षेत्र को कुडा-कचरा डालकर भरा जाने लगा और धीरे-धीरे ”इश्वर विलास” मे वर्णित कमलों से आच्छादित जयसागर सचम्‌च एक ऐसा ऊबड-खाबड भू-खण्ड बन गया जहां
गंदगी का एकछत्र साम्राज्य था। वैसे इस निचली जगह मे पानी की आवक का एकदम बन्द होना पचास वर्ष के जयपुर निवासियो की याद की बात है। पिछले तीस-चालीस बरस मे ही जय सागर या राजामल का तालाब ऐसा चिकृत हुआ था। आपात-स्थिति लागू होने के बाद जब जयपुर के प्रशस्त बाजारो की जिला प्रशासन और नगर परिषद ने सुधि ली और सब प्रकार के अतिकमण हटाये गये तो प्रश्न उठा कि बेदखल लोग कहा जायेगे? इसलिए विस्थापित थडी-होल्डरो के लिये तो इन्दिरा बाजार बना और अन्य लोगो के लिये जो अवैध कब्जे कर कही किसी केबिन तो कही किसी छोटी-सी आलमारी, कही ठेला तो कही खोचा लगाकर बैठे थे, जनता बाजार की कल्पना की गई जो यहां 489 दुकानो के निर्माण से साकार हो गई। दस एकड से कुछ अधिक भूमि पर 9 एकड मे तो दुकाने आयी हैं, दो एक क्षेत्र मे उद्यान है, 2 एकड मे सडके निकली है और 289 एकड फटपाथो तथा अन्य सुविधाओ मे खप गई है। दुकाने पाच अलग-अलग समूह या ‘ ब्लाक्स मे बनाई गई है और छठा ब्लाक बनना अभी शेष है।

 

इन्दिरा बाजार मे तो एक बने-बनाये नाले को पाटना ही था, पर जनता बाजार मे नीव के लिए दो फुट खोदते तो पानी निकल आता था। जय सागर तो सूख गया था, पर सागर सूख जाने पर भी कीचड रह जाता है, इस कहावत के अनुसार यह बाधा स्वाभाविक थी। फिर जगह-जगह गड़ढे भी थे जिनके लिये मिट॒टी की ढुलाई की जाती तो लाखो टन लानी पडती। इसलिये कुडे- कचरे से गड़ढे पाटते रहे ओर जहा भी पानी निकला उसे पम्पो से हटा-हटा कर नीवें भरी जाती रही। इस तरकीब से कम सर्च में सारी जमीन समतल भी हो गईं और काम भी ऊपर आता रहा। सारे जनता बाजार में यूकलिप्टिस के वृक्ष लगाये जा चुके थे। यह वृक्ष भू-जल को सोखने में कारगर बताया जाता है।

सन्‌ 1976 की दीपावली के प्रकाश-पर्व पर जनता बाजार पहली बार जयमगाया ओर इस अबूझ महत में इसके उदघाटन ने जेसे आश्वस्त कर दिया कि इसकी जय भी सनिश्चित है। जब सागर लहराता था तो इधर इतनी बस्ती भी कहा थी? अब तो इसके दक्षिण-पूर्व की ओर नगरपरिषद के कर्मचारियों की दो-ढाई हजार
परिवारों की आवासीय बस्ती है। उत्तर में “केलाश-शलोपमे”’ ब्रहमपरी की बस्ती भी अब प्राणपुरी नही रही, नये-तये मकानों और नये-नये लोगो से आबाद है। कमलनगर ओर जोशीनगर की बस्तिया भी नाहरगढ के ढलान तक बढ़ गई हैं– जेसे अब तक दबे हुए लोग ऊंचे और ऊंचे जाने के लिए बेताब है। यह सब इधर की जनता है जिसकी विभिन्‍न जरूरते नया जनता बाजार ही पूरी कर रहा है।

 

 

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