जइया पूजा आदिवासी जनजाति का प्रसिद्ध पर्व

जइया पूजा

जइया पूजा यह आदिवासी जनजाति पर्व है। यह पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड का प्रमुख त्यौहार है। करमा के बाद जनजातीय पर्वो में जइया पूजा का बहुत बाहुल्य है। नवरात्र के अवसर पर जइया पूजा की तैयारी एक माह पहले से शुरू हो जाती है। जई जमायी जाती है। दुर्गाष्टमी के दिन कई गांव-गांव ही क्‍या उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश, बिहार तक के आदिवासी लम्बे-लम्बे जुलूस में देवी ज्वालामुखी, बसरा, मइहर की जय-जयकार करते हुए ढोल, मजीरा मादल, छड आदि वाद्यो के साथ प्राय सिर मुंडा कर जौ की जगी हुई जइया को कसोरे मे सजाकर धूप दीप के साथ प्रज्जवलित अग्नि के कसोरे को हथेली पर रखे नाचते-गाते जब वे देवी-धाम मे पहुंचते है तो अनोखा दृश्य उपस्थित हो जाता है।

 

 

जइया पूजा कैसे की जाती है

 

 

इस जइया पूजा समारोह मे अधिकतर अगरिया जनजाति के लोग उपस्थित होते है। देवी-धाम मे पहुंच कर देवी को प्रसन्न करने के लिए ये सौ कदम पहले ही जमीन पर लौट जाते है और घिसटते हुए देवी के पास तक पहुंचते हैं, तारीफ यह है कि इनकी हथेली से प्रज्ज्वलित अग्नि की ज्वाला या जइया जमीन पर नहीं गिरती। इतना ही नहीं, लोहे के बने लगभग एक मीटर लबे तीखे तीर के समान ‘बाना” (त्रिशूल) को जीभ में घुसेड लेते है और उनका मानना है कि देवी-कृपा से रक्त की एक बूंद भी दिखलाई नहीं पडती। बैगा लोहे के बने गुटकेदार गुरदम से बार-बार पीठ, बांह पर प्रहार करते है, लेकिन वे घायल नही होंते।

 

 

जइया पूजा
जइया पूजा

जइया पूजा का यह समारोह मुख्य रूप से दुर्गाष्टमी और नौमी, दोनो दिन, दोनो नवरात्र को चलता हैं। स्त्रियां सम्मिलित नहीं होती पर घर पर पूजा, गीत, गायन करती है। यहां कुछ जिया के गीतों की पक्तियां प्रस्तुत है जिनसे पूजा और पर्यावरण पर प्रकाश पडता है।

 

 

“गइया के घियना अमवा क लकड़ी
धुअना अकासे जाइ हो माई।।
ओही में आवइनी भाई मोर काली,
घमसी लगावै दरबार हो माई ।

यानी माँ के दरबार में गाय के घी और आम की लकडी का शाकला किया गया है जिसका धुंआ आकाश तक पहुच रहा है। मान्यता है कि इससे वर्षा होती है।

 

 

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