चार्ल्स डार्विन का जीवन परिचय – चार्ल्स डार्विन का सिद्धांत क्या था?

चार्ल्स डार्विन

“कुत्ते, शिकार, और चूहे पकड़ना इन तीन चीज़ों के अलावा किसी चीज़ से कोई वास्ता नहीं, बड़ा होकर अपने लिए, और अपने घरवालों के लिए, बस एक लानत ही बनकर रह जाएगा तू।” यह थी भविष्यवाणी जो एक गुस्से में आए और तंग आ चुके एक पिता ने अपने लड़के के बारे में की थी। और यह लड़का भी और कोई नहीं चार्ल्स डार्विन था जो आगे चलकर इतिहास का एक प्रसिद्ध प्रकृति शास्त्री बना और जिसने ऑरिजिन ऑफ स्पीशीज़ बाई मीनज़ आफ नेचुरल सिलेक्शन’ नाम की प्रामाणिक पुस्तक लिखी, ग्रन्थ की स्थापना विज्ञान का एक ऐसा सिद्धान्त है जिसके विषय में उन दिनों बहुत ही वाद-विवाद उठ खड़ा हुआ था, किन्तु वनस्पति तथा प्राणि-जगत में नई किस्मों का जन्म किस प्रकार होता है। इस विषय में दिए गए चार्ल्स डार्विन के नियम को आज प्राय: माना जा चुका है।

 

 

चार्ल्स डार्विन का जीवन परिचय

 

 

चार्ल्स डार्विन का जन्म इंग्लेंड में, श्रयूजबेरी में 1809 में हुआ था। यही अब्राहम लिंकन की जन्मतिथि भी है। किन्तु दोनों परिवारों की स्थिति में बहुत ही अन्तर था। पिता रॉबर्ट एक सम्पन्न चिकित्सक था, ओर जो कुछ भी सुविधादि पैसे से उपलब्ध हो सकती है वह सब अपने बच्चों के लिए उसने जुटा दी। घर में किसी किस्म की कोई कमी नहीं थी, किन्तु ज्यों ही चार्ल्स डार्विन 8 बरस का हुआ बच्चों की मां नहीं रही। उसका दादा डाक्टर इरैज़्मस डार्विन भी अपने समय का एक प्रसिद्ध डाक्टर, प्रकृतिदर्शी, एवं लेखक था।

 

 

इस सुशिक्षित परिवार में चार्ल्स को प्रायः एक जड़बुद्धि बालक ही समझा जाता था। कभी उसके हेडमास्टर ने उसे यह फतवा दिया भी था कि वह एक निहायत ही सुस्त लड़का है। यह नहीं कि उसमें दिमाग बिलकुल न हो। असल मुश्किल यह थी कि उसकी कल्पना शक्ति इतनी सजीव थी कि स्कूल की मामूली पढाई में उसके लिए कोई स्थान था नही। सभी प्रकार के पशुओं और कीड़े मकोड़ों के प्राकृतिक अध्ययन में उसे शुरू से ही बडी रुचि थी। पिता ने जो भविष्यवाणी उसके सम्बन्ध में की थी, उसके बावजूद वह जैसे तभी से अपने जीवन के ध्येय की पूर्ति में लग चुका था, और विज्ञान के प्रमुख साधन आत्म-निरीक्षण को निरन्तर विकसित एव तीव्र करने में लगा रहता था। पीछे चलकर उसने कभी कहा भी था, किन्तु पाठक भूल से इसे एक गर्वोक्ति न समझ ले, कि मेरा विचार है मैं साधारण जन से आम चीजों को गौर से देखने में कुछ आगे हुं। मेरी आंख जहां टिक जाती है लोग आम तौर पर उसे नजर अन्दाज कर रहे होते है।

 

 

प्रत्यक्ष-निरीक्षण की यह शक्ति बालक में पिता ने अनुभव की थी, और उसकी प्रशंसा करते वह कभी कतराया नही था। किन्तु 300 पौंड की एक भारी -भरकम देह, अपने मरीजों, खास तौर पर गरीब तबके के मरीजों को देखने में इस कारण उसे कुछ मुश्किल पेश आती थी। इन बेचारो के घरों मे फर्श और सीढियों मे इतनी ताकत नही थी कि डाक्टर साहब के वजन को बरदाश्त कर सकें। सो चार्ली (बचपन में प्यार का नाम) को छोटी उम्र से ही अपने पिता के साथ जाना पडता और बीमार की हालत के बारे मे जो रिपोर्ट चार्ली ले आता उसी के आधार पर रॉबर्ट नुस्खा लिख देता। डाक्टरी के कानून उन दिनों काफी ढीले थे।

 

 

खेर, बडे खानदान मे पैदा होने की वजह से चार्ली को भी कुछ तो करना ही था। पढे-लिखे आदमी का पेशा भी कुछ इज्जतबख्श होना चाहिए। फैसला हुआ कि वह धर्म प्रचारक बनेगा। कैम्ब्रिज भेज दिया गया। किन्तु वहा वह धर्म शिक्षा ग्रहण करने की बजाय अपना वक्‍त खटमलों और कीड़ों की खोज मे बरबाद करने लगा। कीडे-मकोडो का उसका यह संग्रहालय वस्तुत एक अद्भुत वस्तु थी। 22 साल की उम्र मे उसे धर्म प्रचारक की एक डिग्री तो मिल गईं, लेकिन मिशनरी बनने की तबीयत कुछ थी नही। कैम्ब्रिज में उसका परिचय वनस्पति शास्त्र के एक युवा अध्यापक जान हेनसलों से हो गया था। उसने एक परिचय-पत्र चार्ल्स डार्विन को एक बडे जहाज एच० एम० एस० बीगल‘ के कप्तान फिटजरॉय के नाम लिख दिया। इस तरह उसे मिशनरी होकर कही जम जाने की इस नौबत से छूट निकलने का एक मौका मिल गया।

 

 

बीगल के साथ एक और बडी किश्ती भी जुडी हुई थी। और अब दक्षिणी अमेरीका की तटरेखा का निरीक्षण करने वह निकल रहा था। क्या चार्ल्स को यह पसन्द न आएगा कि वह भी इसमे एक प्रकृति-वीक्षक के तौर पर निकल चले ? हा, खर्चा सब अपना ही उठाना पड़ेगा, और दो साल से पहले शायद यह यात्रा समाप्त न हो। क्या चार्ली साथ हो लेना पसन्द करेगा पैसों की ज़रूरत थी। चार्ली अपने पिता के पास पहुचा। उसके पिता ने कहा, नही, सारी स्कीम ही बे सिर-पैर की है। मिन्नतें, और मिन्‍नतें, परिवार के सभी सदस्यो ने विचार-विमर्श किया और अन्त मे अनुमति मिल ही गई बीगल डेवलपोर्ट की बन्दरगाह से समुद्र की ओर चलना शुरू हुआ और, उधर चार्ली ने जगलें पर आकर तट की ओर निगाह डाली। उसे तब पता नही था यह घर से विदाई उसकी पांच साल तक रहेगी। किन्तु वह प्रकृति-दर्शन के इतिहास में विश्व के महानतम अभियान का साक्षी होने चला था।

 

 

चार्ल्स डार्विन में सुक्ष्म-अन्वीक्षण बुद्धि थी, प्रत्यक्ष को सही-सही अंकित करने की योग्यता थी, और वह वस्तुओं के संग्रह में कभी थकता न था। अद्भुत धैर्य और उत्सुकता के साथ वह तरह-तरह के पौधे, कीड़े-मकोड़े, पशु, चट्टानों के नमूने, और जीवाश्म इकट्ठे करता गया। ट्रकों पर ट्रक भरते गए, जहाज़ के डेक पर खाली जगह सब भरती गई। और बन्दरगाह पर जहां भी जहाज को रुकना होता, वहां से ये संग्रह घर को रवाना कर दिए जाते। यात्रा भी कोई मुसीबतों और साहसिकता से कम भरी न थी। जमीन पर कदम रखो तो आदिवासी असभ्य लोगों से और चोर-डाकुओं से डर। बुखार हो जाए या वीराने में कहीं जा फंस तो? उस पर सर्दी का मौसम और वक्‍त-बेवकत तूफानों की जिल्‍लत अलग। और दक्षिण अमेरीका के शहरों में कहीं-कहीं तो उनका स्वागत भी इन असभ्य देशों में इतना हुआ कि उन्हें अपनी ही आंखों पर विश्वास नहीं आया, सुन्दर युवतियां खूबसूरत और गोल-मटोल परियां-सी (डार्विन के शब्दों में) और निहायत ही तहजीब-याफ्ता उनके मर्द।वही तटरेखा किन्तु सभ्यता और असभ्यता के दो परस्पर विरोधी और पड़ोसी छोर-से।

 

 

चार्ल्स डार्विन
चार्ल्स डार्विन

 

यात्रा के दौरान में ही कैप्टेन फिट्जरॉय ने उन तीन जंगलियों को एक बिलकुल वीरान द्वीप में उनके अपने ही घर वापस छोड़ दिया जिन्हें पिछली बार वह बतौर एक बंधक कैद कर लाया था। उनके इस द्वीप का नाम था–टीर्रा डेलफ्यूएगो। और डार्विन ने देखा कि सभ्यता के सम्पर्क ने इन जंगलियों को उनकी प्राकृतिक कठोरता से कुछ मुक्त-सा करा कर इस थोड़े से अरसे में ही कुछ मृदु कर दिया है। चार्ल्स डार्विन स्थापनाओं का आधार प्रकृति के आंगन में किया गया व्यापकत क्षेत्र कार्य है। कितने ही ऐसे तटों का पर्यवेक्षण करके, जिनके बारे में कि भूगोल-शास्त्रियों को पहले कुछ खबर नही थी, और वनस्पति एवं प्राणि जीवन के कितने ही अदभूत रूपो का अध्ययन करके, बीगल’ ने आखिर दक्षिण अमेरीका के प्राय 500 मील पश्चिम की ओर गैलापेगोस द्वीप समूह में लंगर डाल दिए। यहां प्रकृति की अपनी ही एक प्रयोगशाला थी जहा चार्ल्स डार्विन को अपनी ‘वस्तुजात में परिवर्तेन का उद्भव” नामक स्थापना के लिए पहले-पहल कुछ राह-सी मिली थी। कितनी ही किस्मों के प्राणी उसे यहां मिले और सब असाधारण और किसी बहुत ही पुराने गुजरे-जमाने के अर्थात जीवित प्राणियों में भी परिवर्तन आते जाना अपरिहेय है। यह था उसकी वैज्ञानिक स्थापना का प्रथम संकेत। ये यह देखकर किसी के भी मन में आ सकता है कि जहा इस द्वीप समूह में शुरू-शुरू में पक्षियों की सख्या प्राय न के बराबर ही होती है, प्राणियों के एक वर्ग को प्रकृति ने जैसे एक विशेष ध्येय की पूर्ति के लिए अलग विकसित करना शुरू कर दिया था। उसने लिखा
भी, जमीन पर रेंगने वाले सापों मे, पक्षियों मे, पशुओं मे हर द्वीप हर दूसरे द्वीप से जैसे भिन्‍न हो, किन्तु कुछ समानताएं है जो अदलती-बदलती नही। यह सृष्टि का उद्भव एक ही स्थान पर और एक ही समय में हुआ हो, तो उनके अंगाग में यह इतना अधिक और सूक्ष्म भेद क्यो ? उनके जीवाश्मों का भी अध्ययन किया गया जिनकी समानता जीवित प्राणियों के कुछ कम न थी। डार्विन इस निर्णय पर पहुंचा कि कुछ नमूनों की जगह आज उनसे बहुत मिलते-जुलते कुछ और नमूने जिन्दा है।

 

चार्ल्स डार्विन की खोज

 

इन द्वीपों के एक उपशासक ने डार्विन को बताया कि वह कछुओं की शक्ल देखकर ही बता सकता है कि उनकी फला किस्म किस द्वीप से आई है। डार्विन को लगा कि इन समानताओं तथा असमानताओं को समझ सकना कुछ भी मुश्किल नहीं है यदि हम यह मान लें कि इन द्वीपों में रहने वालो के ‘पूर्व पुरुष’ एक थे जिनमें विकसित होते-होते, धीरे-धीरे परिवर्तन आने लग गए। यह थी कहानी कि विकासवाद के सिद्धान्त का बीज किस तरह डार्विन के मन में पडा था। वस्तु के मूल रूप में परिवर्तन आता चलता है, यह तो स्पष्ट ही था। किन्तु क्यों ? इस परिवर्तन का कारण क्‍या था ” प्रक्रिया क्या थी ? कैसे यह सब सम्भव हुआ ?

 

 

 

1838 में जाकर कही चार्ल्स डार्विन को इस प्रश्न का कुछ समाधान मिला जब टॉमस माल्थुस का आबादी के बारें मे एक निबन्ध’ पढ़ते हुए उसे सूझा कि जीवित प्राणियों में पीढी-दर-पीढी ये अन्तर क्यो और किस प्रकार आते है। माल्थुस की स्थापना थी कि इन्सान की आबादी इतनी तेजी के साथ बढती है कि जो रोटी उसके पास थी वह अब उसे पूरी नही पडती। रोटी के लिए परिणामत एक संघर्ष चल पडता हैं, और जीवन संघर्ष भी रोटी के लिए इस आपाधापी के अलावा और क्या होता है। डार्विन को यह भी मालूम था कि पशु-पालक लोग किस तरह उन पशुओ की सन्तान में विशेष-विशेष गुणों का आधान किया करते है। घरेलू पशुओं को उत्पन्न करते हुए हम इन गुणों का नियंत्रण कुछ करते भी हैं, वांछित गुणों से विहीन पशुओं की उत्पत्ति पर अवरोध लगाकर और गणों से युक्त पशुओं की उत्पत्ति को प्रोत्साहन देकर। किन्तु, डार्विन की साक्षी थी कि यह परिवर्तन वन्य पशुओं में भी उतना ही सामान्य है। क्योंकि यहां तो मनुष्य का हाथ नही होता, फिर ऐसा क्यो?।

 

 

माल्थुस में इसका संकेत था कि मनुष्य को अपनी रोटी जुटाने के लिए, ओर अपनी परिस्थिति के साथ अनुकुलता पूर्वक चलते रहने के लिए, संघर्ष करना पडता है। यही समस्या वन्य पशुओं के सामने भी तो उसी तरह आती है। उनके आसपास भी यदि भोजन उचित मात्रा में न हो तो वही पशु उनमें जीवित रह सकेगे जिनमें एक भोजन संग्रह के लिए समुचित सामर्थ्य होगा। जिन्दा रहने के लिए योग्यता सामर्थ्य, यह है वस्तुओं तथा प्राणियों की प्रकृति में निरन्तर परिवर्तन की कुंजी। और इस जीवन-संघर्ष मे डार्विन का कहना है, शरीर में वही परिवर्तन कुछ स्थायी रह सकेगे जो जीवन के लिए कुछ उपयोगी हो, अनुपयोगी तत्त्व स्वयं नष्ट होते जाएगें। और परिणाम यह होगा कि प्राणी की एक नई किस्म ही, जैसे अब पैदा हो जाएगी।

 

 

‘बीगल’ पर विश्वयात्रा के दौरान में प्रकृति का अध्ययन करते हुए जो स्थापनाएं डार्विन के मन में उठी उनके समर्थन मे साक्षी संग्रह करने में अब उसे 20 साल और लग गए। 1855 में एक प्रकृति विज्ञानी ऐल्फ्रेड वैलेस का एक लेख छपा–‘प्राणियों मे नई पौध के आगमन को नियन्त्रित करने वाला प्राकृतिक नियम क्‍या है ? ‘इस लेख में कितने ही ऐसे विचार प्रकट किए गए थे जो चार्ल्स डार्विन की अप्रकाशित स्थापनाओं से मेल खाते थे। डार्विन को लोगों ने कितनी ही बार परामर्श भी दिया था कि वह अपने सिद्धान्तों का कम से कम एक संक्षिप्त रूप ही प्रकाशित कर दे, किन्तु वह सुस्ती ही करता रहा। 1858 में वैलेस ने डार्विन को एक लेख की पाण्डुलिपि भेजी। शीर्षक था ‘कुछ विशेषताएं नई पौध के आते ही कुछ अनिश्चित अवधि के लिए विदा क्यो हो जाती हैं, इस प्रवृत्ति के विषय मे कुछ विचार।’ अब डार्विन को अनुभव हुआ कि इस लेख में प्राय उसका अपना सिद्धान्त सूत्र रूप में आ चुका था। इसलिए उसने निश्चय कर लिया कि मैं अपने निष्कर्षों को अब दुनिया के सामने पेश कर ही दूं। एक जुलाई, 1858 को वैलेस का यह निबन्ध और चार्ल्स डार्विन के सिद्धान्त की रूपरेखा लन्दन की लिन्तियन सोसाइटी मे अलग-अलग पहुंचे, और पढ़े गए।

 

 

नई पौधों का उद्भव अगले वर्ष प्रकाशित हो गया। इसी में चार्ल्स डार्विन का सिद्धान्त प्रस्तुत था भूगर्भ विद्या की साक्षी और पशुओ पौधों का भौगोलिक वितरण। सम्पूर्ण ग्रन्थ एक प्रकार से विकासवाद के समर्थन मे एक लम्बी युक्तिमाला है”, जैसी कि डार्विन की निजी समझ में वह आई थी। चार्ल्स डार्विन के इस सिद्धान्त के सम्बन्ध में उसके उस प्रथम प्रकाशन के समय से ही वाद-विवाद चला आता है। 1860 में दो लेख डार्विन पर आक्रमण करते हुए “ब्रिटिश एसोसिएशन फार द एंडवान्समेण्ट ऑफ साइंस’ के सम्मुख पढे गए। ऑक्सफोर्ड के बिशप ने विवाद शुरू करते हुए डार्विन और उसके समर्थक टी० एच० हकक्‍सले पर दुष्टता पृर्वक कीचड़ उछालना आरम्भ किया। पादरी ने अपना प्रसिद्ध प्रश्न प्रस्तुत किया “हक्सले का जो यह कहना है कि उसके पुरखा बन्दर थे, मैं पूछना चाहूंगा कि दादा की ओर से या दादी की ओर से? किंतु हकसले ने जवाब दिया अगर मुझे खुद चुनाव करना हो तो मैं एक बन्दर को ही अपना दादा चुनूंगा, ऑक्सफोर्ड के बिशप को नहीं और वह गडबड हुई कि मीटिंग बरखास्त हो गई।

 

 

1925 में एक स्कूल टीचर जान टी० स्कोप्स, पर टेनिसी-राज्य में विकासवाद का सिद्धान्त पढाने के जुर्म मे मुकदमा चला। अमेरीका के प्रसिद्ध वकील क्लेरेन्स डैरो ने उसकी ओर से मुकदमा लडा। सरकारी वकील भी अपने जमाने का कुछ कम मशहूर वकील नही था, विलयम जेनिश्ज़ ब्रायन। स्कोप्स क़सूरवार ठहरा, किन्तु फैसले को पीछे रदद कर दिया गया। कहने का मतलब यह कि चार्ल्स डार्विन की मृत्यु के 40 साल से ऊपर गुजर जाने पर भी, हमारे इस आधुनिक युग में भी डार्विन का सिद्धान्त पर्याप्त विवाद का विषय रहा है। डार्विन स्वयं जिसकी एक पुस्तक ने एक इतने भीषण वाद-विवाद को जन्म दिया वही डार्विन खुद, एक नम्र और सीधा-साधा आदमी था। ‘बीगल’ पर विश्व यात्रा करके जब वह वापस घर पहुंचा, वह एक मरीज़ था, सिर दर्द और मचली के दौरों का निरन्तर शिकार। 70 साल से ऊपर वह जिन्दा रहा किन्तु समुंद्र-यात्रा उसने फिर नही की।

 

 

अपने ही मामा की लडकी एम्मा वेजवुड से चार्ल्स डार्विन ने विवाह कर लिया और अपने परिवार के साथ कैंट में एक गांव में सुख से रहने लग गया। काफी आमदनी उसे हो जाती थी, इसलिए किसी प्रकार की आर्थिक चिन्ता अब उसे नही थी। अपने समय का
उपयोग वह प्राय संग्रहीत साक्षी की छानबीन में ही करता रहता, जिसका परिणाम निकला उसका प्रसिद्ध ‘विकासवाद का सिद्धान्त। मधुर और लोकप्रिय व्यक्तित्व, किन्तु सदा बीमार, फालतू समय वह अपने बगीचे में फूलो-पौधों की देखभाल करते हुए ही अक्सर देखा जाता। वनस्पति-क्षेत्र में भी उसने कुछ परीक्षण अपने सिद्धान्त की परीक्षा के लिए किए।

 

 

ऑरिजिन ऑफ स्पीशीज’ के अतिरिक्त और ग्रन्थ भी चार्ल्स डार्विन ने रचें। उसकी कीट-पतगो की करतूतों से वनस्पतियों में फुमदी की पैदाइश’ से स्पष्ट प्रमाणित है कि विश्व के इतिहास में इन क्षुद्र जन्तुओं का भी कितना महत्त्व है। किन्तु ऑरिजिन ऑफ स्पीशीज’ जैसा विप्लव कोई और किताब उसकी नही लाई। एरिस्टोटल की तरह ही डार्विन भी चकित था कि किस अद्भुत शक्ति द्वारा प्रकृति इन प्राणियों में विशेष-विशेष कार्य करने का सामर्थ्य भर जाती है। डार्विन के शब्द है ‘ “जितना ही अधिक मैं प्रकृति का अध्ययन करता हू, उतना ही और अधिक मैं प्रभावित होता चलता हु कि वस्तुओ के अंग-अंग में क्रम-क्रम से स्थिर होती चलती ये विशिष्टताएं (प्रकृति के अनुकूल अपने को ढालने के लिए ही मानो प्रस्तुत उनके स्वयमृद्भूत उपाय) अन्तर भी थोडा बहुत उनमें कही-कही दृष्टिगोचर होता है।सूक्ष्म अतिसूक्ष्म मानव बुद्धि की ऊंची से ऊची कल्पनाओं की पहुंच से सदा कितनी परे ही रहती हैं।

 

 

चार्ल्स डाविन की मृत्यु 1882 में हुईं। आज यदि उसे एक बार फिर विश्व यात्रा करनी होती, तो वह उसके लिए गैलापंगोस द्वीप समूह का चुनाव न करता। प्रकृति के स्वयवर’ के अध्ययन के लिए उपयुक्त सामग्री अब वहां नही है। वे विशाल कछुएं और लंगूर वहा अब नही रहे। वे अद्भुत पोधें और कौतूहली पंछी भी खत्म होते जा रहे है। द्वीपसमूह में आज हवाई जहाजो के अड्डे खडे किए जा चुके है और जेट जहाज़ों की गडगडाहट पशु-पक्षियों की उस चीं-चीं को उठने ही नही देती जिसे सुनने का शौक कभी डार्विन को था। डार्विन का वह ‘उद्युक्त मनोतय था जो इतिहास मे ठीक समय पर आकर अनुसधान-रत हुआ कि विकासवाद के सिद्धान्त को प्रस्तुत किया जा सके। लगता है उसे यह भी पता था कि ये परिवर्तन स्वयं वैज्ञानिक स्थापनाओं में भी उसी प्रकार से अवश्यभावी होते है जैसे कि प्राणियों के जीवन में “मुझे बिलकुल स्पष्ट है कि ‘ऑरिजिन’ का अधिकाश अन्तत कूडे़-करकट की टोकरी के लायक ही सिद्ध होगा, किन्तु फिर भी मुझे आशा है कि मेरी इन स्थापनाओं का ढांचा’ इतनी जल्दी खत्म नही हो जाएगा।

 

 

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