चाँद बीबी हिस्ट्री इन हिन्दी – चांद बीबी का जीवन परिचय व उसकी हत्या किसने की

सुल्ताना चाँद बीबी कौन थी? उसका नाम था चाँद था। वह हरम का चाँद थी। दक्षिण भारत का चाँद थी। वह सचमुच चाँद-सी सुन्दर थी। वह जन्मी थी उस समय जब सारा दक्षिण भारत स्वतंत्रता के वायुमंडल में साँस ले रहा था। बहमनी राज्य का अन्त हो चुका था, और उसके स्थान पर बीदर, बरार, अहमदनगर, बीजापुर तथा गोलकुण्डा के पाँच स्वतंत्र राज्य स्थापित हो चुके थे। अहमदनगर में निजामशाही वंश का राज्य था। इसी वंश के तृतीय बादशाह, हुसैन निजामशाह के एक पुत्री थी। इसका नाम चाँद खातून था। जो आगे चलकर चाँद बीबी के नाम से मशहूर हुई। अपने इस लेख मे हम चाँद बीबी हिस्ट्री इन हिन्दी, चाँद बीबी को किसने मारा था, चाँद बीबी का जीवन परिचय व इतिहास को विस्तार से जानेंगे।

 

 

चाँद बीबी का जन्म कब हुआ और शिक्षा

 

चाँद बीबी का जन्म सन्‌ 1544 ई० के लगभग हुआ था। वह बड़ी सुन्दर और तेजस्वी बालिका थी। उसके पिता हुसैन निज़ामशाह ने उसे बढ़े प्यार से पाला था, और उस समय के अनुसार उसे जन्म और शिक्षा दीक्षा दी थी। वह बड़ी भावुक और प्रतिभा सम्पन्न थी, इसलिए थोड़े ही दिनों में उसने मराठी, अरबी तथा फारसी भाषाओं का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया था। वह चित्रकारी भी भलिभांति जानती थी, और ऐसे सुन्दर फूल बनाती थी कि बड़े बड़े कला- पारखी उसकी हस्तकला पर मुग्ध हो जाते थे। वह वीणा भी खूब बजाती थी। जिस समय उसकी कोमल अगुलियाँ वीणा के तार पर थिरकने लगती थी, उस समय एक अभूतपूर्व समाँ बंध जाता था। कभी-कभी वह गाती भी थी। उसके स्वर में बड़ा उन्‍माद, आकर्षण और लोच था। वह अपनी माता के साथ अन्तःपुर में रहती थी। परन्तु वहाँ की कूट-नीतियों का उसके कोमल ह्रदय पर लेशमात्र भी प्रभाव न पड़ा था। इस प्रकार उसने अपने जीवन के प्रभात काल ही में उन समस्त गुणों को घारण कर लिया था, जो भविष्य में उसके लिए बड़े लाभदायक सिद्ध हुए।

 

 

 

चाँद बीबी का विवाह व दांम्पत्य जीवन

 

अब यह लगभग 10-11 वर्ष की दो चुकी थी। इसलिए निजामशाह को उसके विवाह की चिन्ता हुई। पास ही बीजापुर की सलतनत थी। अली आदिलशाह वहाँ का सुलतान था। निजामशाह ने उसी के साथ अपनी चाँद का विवाह कर दिया। इस विवाह से दोनों राज्यों में मैत्री स्थापित हो गयी। आदिलशाह ने इस नवीन सम्बन्ध को और भी दृढ करने के विचार से अपनी बहिन का विवाह अहमदनगर के राजकुमार के साथ कर दिया।

 

 

विवाह के पश्चात चाँद ख़ातून, चाँद बीबी हो गयी। वह अपना पीहर छोड़कर बीजापुर के अन्तपुर मे रहने लगी। उस समय उसके पति की अवस्था बहुत अधिक थी, इसलिए वह अंतपुर में एकान्त जीवन व्यतीत न कर सकी। वह अपने पति के साथ राज्य के सभी कामों मे भाग लेने लगी वह दरबार में भी उसके साथ जाती थी, और लोगों के सामने मुंह खोल कर बैठती थी। बालिका होने के कारण कोई भी उसके ऐसे साहस का विरोध नहीं करता था। वह घोड़े की सवारी भी करती थी, और अपने पति के साथ शिकार खेलने भी जाया करती थी। जब वह घोड़े पर पुरुषों की भाँति सज धज कर बैठती थी, तब,उसकी प्रजा अपनी किशोर अवस्था प्राप्त महारानी को देखकर हर्ष और आनन्द से परिपूर्ण हो जाती थी।

 

 

इस प्रकार जिन गुणों को उसे अपने पीहर में सीखने का अवसर नहीं मिला था, उन्हें उसने अपने पति के साथ रहकर सीख लिया था। बीजापुर की मातृभाषा कनाड़ी थी इसलिए उसने इस भाषा का ज्ञान भी अच्छी तरह प्राप्त कर लिया था। और अपनी प्रजा से उन्हीं की भाषा में अच्छी तरह बातचीत कर सकती थी इससे वह अपने राज्य मे अधिक लोकप्रिय हो गयी थी। अपने पति के प्रति वह विशेष प्रेम रखती थी। उठते-बैठते, खाते-पीते ओर सोते-जागते वह सदैव अपने पति को संतुष्ट रखने की चेष्टा किया करती थी। परन्तु उसके भाग्य अधिक समय तक पति-सुख नहीं था। किशोरावस्था से युवावस्था में पर्दापण करते ही सन्‌ 1580 ई० मे, उसके दाम्पत्य-जीवन का दीपक बुक गया। अली आदिलशाह कालकवलित हो गये,और वह विधवा हो गयी।

 

 

 

सतारा किले में बंदी जीवन

पति की असामयिक मृत्यु से चाँद बीबी को बड़ा दुःख हुआ। कली की भाँति खिलते ही वह मुरझा गयी। प्रजा भी उसके दुःख से बहुत दुखी हुई। उसने उसका शोक हल्का करने के विचार से उसके भतीजे, द्वितीय इब्राहिम आदिलशाह को बीजापुर की गद्दी पर बिठा दिया। इस समय वह केवल नौ वर्ष का था। इसलिए चाँद बीबी संरक्षिका नियुक्त की गयी। परन्तु सर्वगुण सम्पन्न होने पर भी वह इस पद पर अधिक दिनों तक सफलता पूर्वक कार्य न कर सकी। इब्राहिम अबोध बालक था। उसकी अभिभाविका यौवन की तंरगों में झूलती हुईं एक स्त्री थी। ऐसी दशा में अमीरों ने अपना स्वार्थ साधन करने के लिए पड्यन्त्र रचना आरंभ कर दिया। इन पड़यत्रकारियों में प्रधान मत्री, कमाल खाँ प्रमुख था। उसने बालक इब्राहिम और चाँद बीबी में अनबन उत्पन्न कराने की बड़ी कोशिश की, परन्तु अंत मे भेद खुल जाने पर उसे अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।

 

 

चाँद बीबी
चाँद बीबी

 

अब किशवर खाँ मंत्री बनाया गया। वह षड़यत्र रचने में कमाल ख़ाँ से भी बढकर सिद्ध हुआ। उसने सुलताना के विमल चरित्र पर कलंक लगाने की कुचेष्टा की, ओर उसके विश्वस्त बन्धु, मुस्तफा खाँ, को मौत के घाट उतार दिया। इतना ही नहीं, उसने चाँद बीबी को बन्दी बनाकर सतारा के दुर्ग में डाल दिया। प्रजा किशवर ख़ाँ का यह अंतिम अपराध न सहन कर सकी। एक दिन जब वह घोड़े पर सवार होकर नगर की प्रधान सड़क से जा रहा था, तब प्रजा ने उस पर ईट पत्थर फेंके, और गालियाँ देकर उसकी सारी शान मिट्टी मे मिला दी। इस घटना से लज्जित होकर वह भाग गया। मार्ग में मुस्तफा के किसी सम्बन्धी ने उसे मार डाला। चाँद बीवी सतारा के दुर्ग से मुक्त करके बीजापुर लायी गयी। प्रजा की हर्ष ध्वनि के बीच उसने अपनी राजधानी में पुनः प्रवेश किया।

 

 

बीजापुर पर आक्रमण

किशवर खाँ की मृत्यु के पश्चात इकबाल खाँ मंत्री पद पर नियुक्त दिया गया। वह अबीसीनिया निवासी था। उसने अपने सजातीय बन्धुओ की सहायता से सेना में फूट का बीज बो दिया। यह दशा देखकर बरार, बीदर, तथा गोलकुण्ड़ा के बादशादों ने अपनी-अपनी सेना सुसज्जित की, और बीजापुर पर आक्रमण कर दिया। चाँद बीबी ने ऐसे सकट के समय में सब बातों पर परदा डालकर अपने पति की जन्म-भूमि की रक्षा के लिए तैयारी हो गयी। एक स्त्री का इतना साहस देखकर हतोत्साह वीरों को भी जोश आ गया। इसका परिमाण यह हुआ कि विद्रोही साहस छोड़कर भाग खड़े हुए।

 

 

सन्‌ 1585 ई० में गोलकुंडा और बीजापुर मे सन्धि हो गयी और इब्राहिम आदिलशाह का विवाह गोलकुंडा के तत्कालीन बादशाह की बहिन ताज सुलताना के साथ हो गया। इस प्रकार चाँद बीबी ने अपनी युक्ति, राजनीति, दृढता और बुद्धिबल से बीजापुर पर आयी हुईं बला टाल दी। प्रजा शान्तिपूर्वक रहने लगी। दिलावर ख़ाँ सर्वेसर्वा हो गया। इसी बीच चाँद बीबी को अपने पीहर से निमत्रण मिला।

 

 

अहमदनगर में कलह

पीहर का निमंत्रण स्त्रियो को अधिक आनन्ददायक होता है, परन्तु चाँद बीबी निमंत्रण पाकर चिन्तित हो गयी। एक ओर तो उसे बीजापुर की प्रजा का ध्यान था और दूसरी ओर पीहर का निमंत्रण। अहमद नगर मे कलह अन्त में वह कुछ सोच-समझ कर अहमदनगर चली गयी। वहाँ उसके पिता की मृत्यु के पश्चात उसका भाई मुर्तजा निजामशाह शासक बना। वह दुराचारी था। उसने अपने क्रूर व्यवहारों से सब को अपना दुश्मन बना लिया था। वह बड़े-बड़े अमीरों को गालियाँ दे देता था ओर कभी-कभी पागलों का-सा आचरण भी करने लगता था। एक बार उसने अपने पुत्र, मौरान हुसेन की जान भी लेनी चाही। तब मीरान हुसेन ने प्रधान मन्त्री मिर्ज़ा ख़ाँ की सहायता से उसे बन्दी करके मार डाला। इस प्रकार पिता की जान लेकर मीरान हुसेन गद्दी पर बैठा। परन्तु वह भी अधिक दिनों तक राज्य न कर सका। एक दिन मिर्ज़ा खाँ ने उसे भी मौत के घाट उतार दिया। उस समय चाँद बीबी के दूसरे भाई बुर्हान निजामशाह के दो पुत्र इस्माइल ख़ा और इब्राहिम लोहगढ़ में बन्दी थे। मिर्ज़ा ख़ाँ ने उन्हे मुक्त करके 19 वर्षीय बालक ‘इब्राहिस को बादशाह बनाया। परन्तु जमाल ख़ाँ नाम के एक सैनिक ने इस का घोर विरोध किया। वह किले के भीतर घुस गया और फिर उसने खूब लूट-मार की। मिर्जा खाँ पकड़ कर मार डाला गया। जमाल खाँ की तूती बोलने लगी। उसने इस्माइल निजामशाह का पक्ष लिया और इब्राहिम को हटा कर उसे गद्दी पर बिठाया। स्वार्थ साधन का यह नंग्न नृत्य चाँद बीबी से न देखा गया। वह ऊब कर बीजापुर चली गयी।

 

 

इब्राहिम निजामशाह की मृत्यु

जब बुर्हान निजामशाह को इस बात की सूचना मिली, तब उसने अकबर की सहायता से अपने पुत्र को मारकर राजसिंहासन पर अधिकार जमा लिया। इस कार्य में सलाबत ख़ाँ तथा बीजापुर के प्रधान मंत्री दिलावर ख़ाँ ने भी सहायता की थी। इसलिए दिलावर ख़ाँ प्रधान मंत्री बना दिया गया। उसने बुर्हान निजामशाह को बीजापुर पर भाक्रमण करने के लिए प्रोत्साहित किया। दोनों सेना लेकर बीजापुर की ओर अग्रसर हुए। जब बीजापुर के शासक इब्राहिम आदिलशाह को यह सूचना मिली तो उसने दिलावर खाँ को प्रलोभन देकर अपनी और मिला लिया और बाद को उसे मरवा डाला। बुर्हान निजामशाह अहमदनगर लौट गया। 15 मार्च सन् 1594 को उसकी मृत्यु हो गयी। तत्पश्चात्‌ उसका पुत्र इब्राहिम, जो पहले गद्दी से उतार दिया गया था, पुनः बादशाह बनाया गया। उसका शिक्षक मियाँ मजू प्रधान मन्त्री बना। परन्तु फिर गृह-विवाद का उपक्रम होने लगा। एखलास खाँ ने मजू के विरूद विद्रोह कर दिया। चाँदवीवी अब तक अपने पीहर के कार्य-कलाप चुप- चाप देख ही रही थी। परन्तु अब वह शान्त न रह सकी। उसने इब्राहिम आदिलशाह को अहमदनगर पर आक्रमण करने के लिए उत्तेजित किया। यह सूचना पाते ही मिया मजू और एखलास खाँ मिल गये। दोनो ने मिलकर बीजापुर की सेना से युद्ध किया। इस युद्ध में इब्राहिम निजामशाह की मृत्यु हो गयी।

 

 

चाँद बीबी की चिंता

चाँद बीबी की प्रबल इच्छा थी कि इब्राहिम निजामशाह के स्थान पर उसका दुग्ध पोष्य शिशु-पुत्र बहादुर ही बादशाह हो। हब्शी सरदार एखलास खाँ भी उसकी इस मत्रणा से सहमत था। अतः उसने मिया चाँद और मजू से दस आशय का प्रस्ताव किया और चाँद बीबी को संरक्षिका नियुक्त करने की इच्छा प्रकट की मियाँ मजू को यह बात न जंची। उसने बहादुर को चावन्द-दुर्ग में बन्दी करके एक अपरिचित बालक को गद्दी पर बिठा दिया। इस पर एखलास ख़ाँ ने मिया मंजू पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में नया बादशाह मारा गया। एखलास ख़ां ने यह देखकर बहादुर को चावन्द-दुर्ग से मुक्त करने की चेष्टा की, परन्तु वह सफल न हो सका। अन्त में उसने बहादुर के सम-वयस्क मोती नामक एक बालक को बादशाह घोषित करके 12 हज़ार सिपाहियों की एक सेना बनायी। मियां मजू घबरा गया। उसने अकबर के पुत्र मुराद से सहायता के लिए प्राथना की परन्तु बाद को उसे अपनी मूर्खता पर बड़ा पछतावा हुआ। उसने अपनी भूल स्वीकार की ओर चाँदबीबी से अहमदनगर की रक्षा के लिए प्रार्थना की।

 

 

अहमदनगर की ओर प्रस्थान

चाँदबीबी अहमदनगर की जटिल परिस्थिति से भलीभाँति परिचित थी। उसे अपनी जन्म-भूमि की दुर्दशा पर दुःख भी था। वह अहमदनगर की रक्षा के लिए उत्सुक थी। ऐसे ही समय में उसे मियाँ मंजू का सहायता के लिए निमत्रण मिला। वह तुरन्त तैयार हो गयी। उसके साथ उसका दत्तक पुत्र अब्बास खाँ और उसकी धर्मपत्नी ज़ोहरा ने भी अहमदनगर के लिए प्रस्थान किया।

 

इस समय अहमदनगर में गद्दी के तीन दावेदार थे। मियाँ मजू अहमदशाह के पक्ष में था। एखलास ख़ाँ मोती की सहायता कर रहा था। और हब्शी सेनानायक नेहँग खाँ बुर्हान निजाम के एक सात वर्षीय पुत्र शाह अली को बादशाह बनाना चाहता था। बहादुरशाह इस समय भी चावन्द दुर्ग में बंदी-जीवन व्यतीत कर रहा था। चाँद बीबी यह दशा देखकर बड़े सकट में पड़ गयी। किसका पक्ष समर्थन करना चाहिए, और किसका नहीं, यह वह शीघ्र निश्चय न कर सकी। अन्त में उसने सब को मुग़ल आक्रमण से अहमदनगर की रक्षा करने के लिए उत्तेजित किया। इसका फल यह हुआ कि सब लोग आपस की शत्रुता भूलकर एक उद्देश्य से समररण मे उत्तर पड़े। चाँद बीबी ने अहमदनगर की रक्षा का कुल भार अपने ऊपर ले लिया, और वह मुगलों से युद्ध करने की तैयारी करने लगी।

 

 

मुगलों से प्रथम युद्ध

पहले लिखा जा चुका है कि मियाँ मंजू की प्राथना पर अकबर के पुत्र ने अहमदनगर की ओर प्रस्थान किया था। वह समझता था? अहमदगर गृह-कलह के कारण शीघ्र ही आत्मसमर्पण कर देगा, परन्तु चाँद बीबी के आते ही उसकी आशाओं पे पानी फिर गया। उसको आमंत्रित करने बाला मिया मंजू स्वयं उसके विरूद था। यह दशा देखकर मुग़ल-सेना-नायकों ने दुर्ग के एक ओर पाँच सुरंग बनायी और यह निश्चय किया किया दूसरे दिन प्रात काल उनमे आग लगाकर दुर्ग उड़ा दिया जाये। सौभाग्य से चाँदबीबी को रात ही मे ख्वाजा मुहम्मद खाँ शीराजी द्वारा इस भावी दुर्घटना की सूचना मिल गयी। उसने तुरन्त दो सुरंगों का पता लगाकर उन्हें नष्ट कर दिया। मुराद को जब इस बात का पता लगा तब उसने प्रधान सुरंग में आग लगा दी। इसमे प्राचीर का बहुत-सा भाग गिर पड़ा। और लोग घबरा कर भागने लगे। चाँद बीवी यह दशा देखकर रणचंडी के वेष में बाहर निकल आयी। और योद्धागण उस वीर महिला का साहस देखकर दंग रह गये। उसने सब को ललकारा और युद्ध करने के लिए उत्तेजित किया। फलस्वरूप दोनों ओर से घोर युद्ध होने लगा। चारों ओर चाँद बीबी को प्रलयकारी तलवार अपना चमत्कार दिखाने लगी। मुगल सेना के सिपाही कट-कट कर गिरने लगे। दुर्ग की खाई लाशों से पट गयी। रात के दूसरे पहर के समय युद्ध की गति धीमी पड़ गयी। चाँद बीबी ने इस अवसर से लाभ उठाकर विध्वंस प्राचीर के स्थान पर पाँच-छः फीट ऊँची दीवार खड़ी करा दी। दूसरे दिन मुराद ने जब यह देखा तब उसके होश उड़ गये। उसकी रसद भी घट गयी थी. इसलिए उसने चाँद बीवी से संधि की प्रार्थना की। चाँद बीबी के पास भी रसद नहीं थी। अतएव उसने बहादुर शाह की संरक्षिका की हैसियत से संधि पर अपने हस्ताक्षर बना दिये। बरार-प्रदेश मुगलों को मिल गया और मुराद अहमदनगर छोड़कर दिल्ली की ओर चला गया।

 

 

 

मुगलों से द्वितीय युद्ध

मुराद के चले जाने के पश्चात्‌ मियाँ मंजू ने अपने बादशाह अहमदशाह को राज-सम्मान देने का प्रस्ताव किया। चाँद बीबी को यह बात पसन्द नहीं आयी। उसने नेहेंग खाँ को चावन्द-दुर्ग की ओर भेजा और बीजापुर के बादशाह, इब्राहिम आदिलशाह से अहमदनगर का गृह-युद्ध समाप्त करने की प्रार्थना की। फलस्वरूप मियाँ मंजू बीजापुर चला गया। वहाँ उसे एक उच्च पद मिल गया। बहादुरशाह अहमदनगर का बादशाह बना दिया गया और मुहम्मद खाँ प्रधान मंत्री नियुक्त हुआ।

 

मुहम्मद ख़ाँ चाँद बीबी का विश्वासपात्र था। परन्तु उच्च पद पाते ही उसने अपना रंग बदल दिया। उसने नेहेंग ख़ाँ को कैद कर लिया। चाँद बीबी ने पुनः बीजापुर को लिखा। यह देखकर मुहम्मद ख़ाँ ने बरार के मुगल सेनापति ख़ानख़ाना से सहायता की प्रार्थना की। दुर्ग के सेनिकों को जब यह बात मालूम हुई तब उन्होंने मुहम्मद ख़ाँ को क़ेद करके चाँद बीबी के सामने उपस्थित किया। चाँद बीबी ने उसे क्षमा कर दिया और नेहेंग खाँ को कारावास से मुक्त करके प्रधान मंत्री बनाया। थोड़े ही दिनों पश्चात्‌ उसने भी विद्रोह किया ओर दुर्ग पर अधिकार जमाने की बड़ी चेष्टा की। चतुर चाँद बीबी ने उसका कोई प्रयत्न सफल न होने दिया। अंत में उसने मुगलों के अधिकृत विद-राज्य पर अधिकार कर लिया। जब अकबर को यह मालूम हुआ तब उसने शाहजी, दानियाल और ख़ानख़ाना को नेहँग ख़ाँ के विरुद्ध युद्ध करने की आज्ञा दी। नेहँग ख़ाँ भयभीत होकर अहमदनगर आया और चाँद बीबी से सहायता की प्रार्थना की। चाँद बीबी ने ऐसे विश्वासधातक को सहायता देने से इन्कार कर दिया। विवश होकर नेहँग ख़ाँ जूनार की ओर भाग गया।

 

 

चांद बीबी की मृत्यु

नेहँग ख़ाँ के पलायन से मुगल सेना को अवसर मिल गया। उसने अहमदनगर पर धावा किया। चाँद बीबी ने फिर रणचंडी मूर्ति घारण की। उसने हामिद ख़ाँ नाम के एक उच्च पदाधिकारी को बहादुरशाह की रक्षा के लिए प्रोत्साहित किया। वह तैयार तो हो गया, परन्तु अंत में उसने विश्वासघात किया। फलस्वरूप अहमदनगर की सेना चाँद बीबी के विरुद्ध हो गयी। वह दुर्ग के भीतर घुस गयी और चाँद बीबी की खोज मे उन्मत्त होकर इधर-उधर उपद्रव करने लगी। चाँद बीती ने अपनी मृत्यु निकट समझकर वीरता पूर्वक उसका सामना किया ओर हँसते-हँसते मृत्यु की गोद में सो गयी। इस प्रकार वीर बाला चांद बीवी की जीवन-लीला समाप्त हुईं। उसकी मृत्यु ने अहमदनगर की स्वतंत्रता का अन्त कर दिया। जब तक वह जीवित रही तब तक अहमदनगर में उसने किसी की दाल नही गलने दी।

 

 

चरित्र

चाँद बीबी बुद्धिमती थी, विदुपी थी। उसकी कोमल भुजाओ में असीम शक्ति थी। उसके ह्रदय में अद्भुत साहस था। वह निर्भीक थी, उसने कभी किसी के सामने झुकना नहीं सीखा। वह तुफान से लड़ती रही, कांटों पर चलाती रही, पहाड़ों से टक्कर लेती रही, परन्तु फिर भी उसने कभी आह नहीं की। उसका चरित्र निर्मल और उदार था। एक और वैधव्य जीवन, एक शोर रूप-राशि इस पर अहमदनगर और बीजापुर का सम्पूर्ण वैभव। वह चाहती तो पलंग से उत्तर कर जमीन पर पैर न रखती, परन्तु उसने इन समस्त प्रलोभनों को पैर से ठुकरा दिया और अपना जीवन त्याग और तपस्या का बनाया। अहमदनगर में, बीजापुर में, समस्त दक्षिण में, वह देवी समझी जाने लगी। अब भी उसे लोग इसी तरह याद करते हैं।

 

 

 

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