गोपालपुरा का किला जालौन – गोपालपुरा का इतिहास

गोपालपुरा जागीर की अतुलनीय पुरातात्विक धरोहर गोपालपुरा का किला अपने तमाम गौरवमयी अतीत को अपने आंचल में संजोये, वर्तमान जालौन जनपद की कोंच तहसील में स्थित है। जनपद के उत्तरी पश्चिमी कोने पर पहूज नदी के किनारे अपनी अपूर्व-छटा बिखेरता हुआ यह किला जनपद मुख्यालय उरई से पश्चिम की ओर जनपद के वृहदतम ग्राम बंगरा से होते हुए मात्र 44कि०मी० की दूरी पर अपने भग्नावशेषों के माध्यम से देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अपने बहुमूल्य सक्रिय सहभागिता का मूक-साक्षी है।

 

 

एक ओर जहाँ इसने स्वतंत्रता की देवी झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, उनकी सेना तथा अन्यान्य स्वतंत्रता के दीवानों को आतिथ्य प्रदान
कर अपना नाम इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों पर अंकित कराया वहीं दूसरी ओर आज भी प्रतिवर्ष पूर्व नाम गुपालकर, गोपाल बाबा की इस पावन तपोभूमि में हजारों श्रद्धालु-जन, मकर संक्रान्ति की पुण्य तिथि में एकत्र होकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करने में विश्वास रखते हैं। दीवान प्रतिपाल सिंह के अनुसार इसे गुपालकर भी कहते हैं। यहाँ पर मकर संक्रान्ति का मेला पूस या माघ में लगता है जिसमें लगभग 5000 लोगों का जमावड़ा होता है।

 

 

गोपालपुरा का इतिहास

 

 

यह किला जिस स्थान पर स्थित है उस गोपालपुरा का अतीत भारतीय संस्कृति के स्थापक एवं पोषक ऋषियों मनीषियों की तपोभूमि रहा है। राजा कृष्ण पाल सिंह जूदेव के अनुसार विक्रमी संवत (1000) वर्ष से पूर्वइस गोपालपुरा का नाम गोपालगिरि था। उस समय यह गोपालगिरि सुन्दर सघन वन सम्पदा से आच्छादित था। इसी प्रदेश में सिद्धपुरूष मनीषी, ऋषि मुनि सतत्‌ ब्रहम चिन्तन व अनुराग में लीन रहते थे। इसी गोपालगिरि की किसी सघन वनस्थली में गोपाल बाबा नाम के एक महात्मा निवास करते थे जिनके नाम पर ही इस स्थान का नाम गोपालपुरा पड़ा। गोपालपुरा अर्थात्‌ गोपालबाबा का स्थान। इन्ही बाबाजी की अलौकिक शक्ति का परिणाम रामसागर नामक नलकूप है जिसने इस गोपालपुरा की माटी की अतृप्त प्यास को बुझाकर, जीवन की रसधारा प्रवाहित की है।

 

 

गोपालपुरा की जागीर की स्थापना लहार (म०प्र०) के राजा रूपपाल सिंह केछोटे पुत्र आलम राव द्वारा की गई थी। महाराज आलम राव को संवत 1631 तदनुसार सन 1574 ई० में जब गोपालपुरा की जागीर प्राप्त हुई तब वे मात्र 19 वर्ष के थे परन्तु अपनी लगन व निष्ठा से उन्होंने अपने निवास हेतु राजमहल वर्तमान गोपालपुरा के किले का निर्माण कराया। गोपालपुरा में आलमराव ने सन 1575 ई० में राज्यावास का निर्माण कराया था।

 

 

इस गोपालपुरा दुर्ग के पश्चिमी ओर भद्रशीला के उस पार राजा सुदर्शन सिंह जूदेव द्वारा बागों का जीर्णोद्वार कराकर उसमें गुलाब चम्पा, बेला, चमेली आदि के साथ अनेक फलदार वृक्षों को लगवाया। राजमाता साहिबा पमारिन जूदेव के अनुसार गोपालपुरा दुर्ग के निर्माण में उस समय लगभग सोलह हजार चाँदी के रूपये व्यय हुए थे तथा यह किला 21 माह में बनकर तैयार हुआ था जिसे 50 कारीगरों एवं 150 मजदूरों ने कठिन श्रम करके तैयार किया था। सन 1975 में गोपालपुरा किले की हालत जीर्ण शीर्ण होने लगी तथा पश्चिमी भाग गिरने लगे जिनकी वजह से यह असुरक्षित हो गया तब राजा कृष्ण पाल जूदेव ने अपना निवास इस किले के पूर्व में एक अन्य निवास स्थान का निर्माण कराया तथा इस किले को छोड़ दिया। व्यापक देखरेख के अभाव में व ग्रामवासियों की ललचाई दृष्टि ने इस विशाल किले को खण्डहरों में परिवर्तित कर दिया।

 

 

गोपालपुरा के राजवंश का परिचय

 

 

इस जालौन जनपद में सेंगरों के आगमन के पश्चात चौहानों का आगमन हुआ। ये चौहान इस जनपद में कब और कैसे आये यह तथ्य ठीक प्रकार से ज्ञात नहीं है परन्तु यह सत्य है कि सन 1182 ई० में चन्देल शक्ति के पराभव के पश्चात्‌ ये लोग यहाँ पर स्थापित
हुये जिन्हें दिल्‍ली के चौहान राजा द्वारा अपने राज्य के विस्तार, सुरक्षा प्रबन्ध हेतु बसाया गया था। चौहानों के पश्चात्‌ यहां पर कछवाहे आये। परम्पराओं के अनुसार नरवर के राजा दुलहा राय के दो पुत्र थे। एक काकुल देव जिन्होंने जयपुर राज्य की शासन व्यवस्था संभाली एवं द्वितीय बैकाल देव जो कि नरवर में रहे। इसके पश्चात्‌ भुवन पाल ने लहार में अपने आपको स्थापित किया और तत्पश्चात वही से गोपालपुरा एवं रामपुरा के राजाओं की वर्तमान श्रृंखला प्रारंभ हुई।

 

 

गोपालपुरा का किला जालौन
गोपालपुरा का किला जालौन

 

प० रामसहाय भट्ट लहरी ने गोपालपुरा राजवंश का जो वंशवृक्ष वर्णन किया है उसमें दूल्हाराव को आमेर का बतलाया है तथा उनके पुत्रों का नाम वाकल देव व वीकल देव बतलाया है वाकल देव को आमेर का तथा वीकल देव को इन्दुरखी का शासक बतलाया है। वीकल देव के पश्चातू उनके पुत्र पर्वतशाह ने राज्य भार ग्रहण किया। पर्वतशाह के दो पुत्र थे। एक राजशाह जिन्हें लहार म०प्र० की जागीर प्राप्त हुयी व दूसरे आलमराव जिन्हें गोपालपुरा की जागीर संवत 1631 विक्रमी में प्राप्त हुई।

 

 

गोपालपुरा के राव शिव दर्शन सिंह लहार के राजा रूपपाल सिंह के छोटे पुत्र आलमराव द्वारा गोपालपुरा जागीर की नींव पड़ी। इस जागीर में 62 गावों की जागीरदारी सम्मिलित थी। यह जागीर ग्वालियर के सिन्धिया परिवार के कब्जा करने से पूर्व 19वीं शदी तक ज्योंकी त्यों बनी रही। इसके बाद सन 1844 ई० में यह जागीर 12 गावों तक ही सीमित रह गयी और सन 1909 ई० में यह मात्र 9 गावों तक ही केन्द्रित रह गई। रावव की उपाधि आलमराव द्वारा ग्रहण की गई तथा अब तक चल्ली आ रही है। इस गोपालपुरा राज्य का उत्तराधिकार राव लक्ष्मन सिंह के भतीजे को सन 1909 में दत्तक रूप में प्राप्त हुआ था।

 

 

महाराज आलमराव को संवत 1631 विक्रमी में गोपालपुरा की राजगद्दी प्राप्त हुई और आपके पश्चात्‌ संवत 1662 विक्रमी में आपके पुत्र दलपत राव का राज्याभिषेक हुआ। सवंत 1694 में दलपत राव के सबसे बड़े पुत्र परशुराम जूदेव को गद्दी प्राप्त हुई। संवत 1698 विक्रमी में परशुराम जूदेव के बड़े पुत्र खड़गराव जूदेव गद्दी पर बैठे और संवत 1715 विक्रमी में खड़ग राव जूदेव के पुत्र चंपत राव जूदेव ने गोपालपुरा शासन की बागडोर संभाली। संवत 1731 में अपने पिता चंपतराव जूदेव की मृत्यु के पश्चात्‌ हरसिंह राव जूदेव गद्दी पर बैठे। हरसिंह राव जूदेव के पश्चात्‌ विक्रमी संवत 1750 में उनके पुत्र हरवंश राव जूदेव ने राज्य का कार्यभार संभाला। संवत 1771 में अपने पिताश्री की मृत्यु उपरान्त जालिम सिंह जूदेव राजगद्दी पर बैठे। संवत 1792 विक्रमी में जालिम सिंह के पश्चात्‌ तिलोक सिंह गद्दी पर बैठे और संवत 1808 में जितवार सिंह जूदेव ने राजगद्दी का कार्यभार ग्रहण किया। संवत 1830 विक्रमी में राजा लक्ष्मण सिंह जूदेव का राज्याभिषेक हुआ। उनके पश्चात्‌ संवत 1869 में रामचन्द्र जूदेव, संवत 1914 में लोचन सिंह जूदेव का राज्याभिषेक हुआ। आप गोद आये थे। सन 1857 ई० में सर हयूमरोज ने जब कालपी पर अपना अधिकार कर लिया तब रानी लक्ष्मीबाई राव साहब पेशवा और बाँदा के नबाब अलीबहादुर कालपी छोड़कर चले गये। राव साहब पेशवा कालपी से भागकर गोपालपुरा पहुँचे। तात्या टोपे भी यहीं पर पेशवा से मिले तथा बाँदा के नबाब भी सहायता देने के लिए पहुँच गये। इस प्रकार से गोपालपुरा में तीनों की सेना इक्कठी हुई।

 

 

कानपुर में तात्या टोपे ने अंग्रेजों को हरा दिया और फिर वह सेना गोपालपुरा में इकट्ठी हुई। इस सेना ने ग्वालियर की ओर कूच किया। इस समय गोपालपुरा के शासक महाराज रामचन्द्र सिंह जूदेव थे। संवत 1935 में सुदर्शन सिंह जूदेव, संवत 1972 में उदयवीर सिंह जूदेव तथा संवत 1989 में राजा कृष्ण पाल सिंह जूदेव को गोपालपुरा राज्य की गद्दी प्राप्त हुई। अक्टूबर सन 1993 में पूना में आपकी मृत्यु हुई और उसके पश्चात्‌ आपके बढ़े पुत्र युवराज राजेश पाल सिंह के 12 वर्षीय पुत्र राजा ब्रजराजसिंह का’ राज्याभिषेक हुआ क्योंकि युवराज राजेशपाल सिंह, राजा कृष्णपाल सिंह जूदेव के जीवन में ही एक मोटर साईकिल दुर्घटना में स्वर्गवासी हो गये थे। वर्तमान में गोपालपुरा की गद्दी का स्वामित्व राजा बृजराजसिंह जी के अधीन है।

 

 

गोपालपुरा का किला

 

 

यह गोपालपुरा का किला ऊसर में बनी है एवं इसका मार्ग कठिन बना दिया गया है अतः यह ऐरिण दुर्ग की श्रेणी में आता है। यह किला पहुज नदी के किनारे नदी तट से लगभग 150 फुट ऊँची कगार स्थित होने के कारण गिरि दुर्ग तथा इसका परकोटा ईंट पत्थर का होने के कारण पारिध दुर्ग की श्रेणी में आता है।

 

 

गोपालपुरा का किला उत्तराभिमुख है। इसका मुख्य द्वार उत्तर की ओर है। सम्पूर्ण किला एक चक्राकार स्थान में बना है। इसके पूर्व की ओर भी एक द्वार है। इस फोर्ट के दक्षिणमें पहूज नदी की गहरी खाई है,व पश्चिमी भाग भी पहुज नदी से आरक्षित है। किले के दक्षिण व पश्चिम में ईटों से निर्मित बुर्ज स्थापित हैं जो दक्षिणी व पश्चिमी सीमा के रखवाले हैं। गोपालपुरा फोर्ट के मुख्य द्वार की दीवार 15 फुट चौड़ी है एवं दवाजा 12 फुट चौड़ा तथा 15 फुट ऊँचा है। मुख्य दरवाजा कंगूरदार मेहराब युक्त है। इस मुख्य द्वार की पूर्वी व पश्चिमी दीवारें ऊपर की ओर एक आला से युक्त है। इस द्वार के ऊपर तोड़ो मे मधा छज्जा बना है जिसके ऊपर त्रिद्वारीय कोबिल स्थित है जिसके ऊपर आयताकार फॉँक युक्त गुम्बदीय आकृति अंकित है। इस कोबिल के दोनों ओर अपेक्षाकृत छोटी गुम्बदकार आकृति अंकित हैं। मुख्य द्वार से दक्षिण की ओर जाते हुए पश्चिम की ओर मुड़कर लगभग 50 कदम की दूरी पर ऊँचाई पर स्थित किले का आन्तिरिक खुला क्षेत्र संग्रह है। जिसके मध्य में खुली छत है।

 

 

तीन मंजिलें भवन के निम्न तल पर कभी दरबार हाल रहा होगा। इस दरबार हाल के दरवाजों पर चूने की बेल बूटियां अलंकृत हैं।गोपालपुरा फोर्ट के पूर्वी द्वार के अन्दर उत्तर की ओर किले का मन्दिर स्थित था जो कि अब ध्वस्त स्थिति में है। पूरे किले में पतली ईट व चूने का कार्य है तथा बाहर से चूने का सुन्दर प्लास्टर था। इस किले का डेनेज सिस्टम अत्यन्त सुन्दर व वैज्ञानिक है। किले के दोनों बुर्ज नीचे चौड़े व ऊपर संकरे है तथा इनसे विभिन्न कक्ष संलग्न हैं। सुरक्षा की दृष्टि से ये बुर्ज अत्यन्त उपयोगी है।

 

 

फोर्ट के रोचक तथ्य

 

 

किले की रचना, आकार तथा निर्माण में तत्कालीन यथार्थ वैज्ञानिक दृष्टिकोण के स्पष्ट दर्शन मिलते हैं। किले की दक्षिण व पश्चिमी भुजा पर निरूपित बुर्ज जहाँ एक ओर दुश्मन के आगमन की पूर्व सूचना देने में निरीक्षण-चौकी के रूप में उपयोगी थे वहीं दूसरी ओर इसके पूर्व व अन्तर की निर्मित सुदृढ़ वे विशाल दरवाजे पहूज नदी से सीधी बांस चढाई शासकों की सुरक्षा के प्रति सजगता का सटीक प्रमाण है। यह दुर्ग पार्वत दुर्ग की श्रेणी में आता है। तत्कालीन उत्कृष्ट कारीगरी का नमूना किले के अन्दर निर्मित राज महल व मुख्य द्वार से मात्र 50 कदमों की दूरी पर स्थित दरबार हाल, शासकों की बहुआयामी प्रतिभा तथा न्याय प्रियता के स्तर की सोच की ओर इंगित करते हैं। अनुमान है कि इसका महज उद्देश्य प्रत्येक फरियादी का सीधे राजा से सम्पर्क व प्रशासनिक व्यवस्था को चुस्त व दुरस्त रखना था।

 

 

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