गुरु अर्जुन देव जी महाराज सिक्खों के पांचवें गुरु है। गुरु अर्जुन देव जी का जन्म 19 बैसाख, वि.सं. 1620 को गोइंदवाल साहिब में श्री गुरु रामदास जी महाराज के घर में हुआ था। गोइंदवाल आपकी ननिहाल थी तथा आप बचपन में नानके ही रहे। भाद्रपद शुक्ल दूज वि.सं. 1638 में आपको गुरूगददी प्राप्त हुई।
गुरु अर्जुन देव जी की कथा, वाणी व जीवन परिचय के बारें में
जन्म —- 19 वैसाख 1620 वि.सं. (15 अप्रैल 1563 ई.)
जन्म स्थान —- गोइंदवाल साहिब जिला अमृतसर
पिता —- गुरु रामदास जी
माता —- माता भानी जी
पत्नी —- माता गंगा जी
पुत्र —- श्री गुरु हरगोविंद साहिब जी
गुरूगददी — भाद्रो शुक्ल दूज वि.सं. 1638 ( 16 सितंबर 1581 ई.)
ज्योति ज्योत —- ज्येष्ठ शुक्ल चौथ वि.सं. 1663 ( 30 मई 1606 ई)
स्थान —- लाहौर पाकिस्तान
पृथ्वी चन्द्र का विरोध:—-
जब गुरु अर्जुन देव को गुरु गद्दी की पगड़ी पहनाई जाने लगी तो पृथ्वी चन्द्र ने विरोध किया कि पगड़ी पर मेरा अधिकार है। मैं बड़ा हूँ। तब गुरु अर्जुन साहिब ने कहा आप ही पगड़ी बांध लें।
भाई गुरदास जी का आना:—-
कुछ समय पश्चात भाई गुरदास जी भी अमृतसर आ गये। जब रात्रि के समय भोजन करने लगे तो लंगर से लांगरी मिस्सी रोटियां आपके लिए लेकर आए। भाई जी ने जब आपसे मिस्सी रोटी के बारें में पूछा तो आपने कहा माता जी से जाकर पता करें। फिर भाई गुरदास जी माता भानी के पास पहुंचे तो उन्होंने बताया कि पृथ्वी चन्द्र व महादेव संगतों में झूठा प्रचार करके सारी कार भेंट ले जाते है तब भाई जी ने संगत को सही जानकारी देकर सीधे मार्ग पर डाला। इस प्रकार फिर से गुरु घर में काफी भेंट पहुंचने लगी।
गुरु अर्जुन देव जी महाराजगुरु जी की दयालुता:—-
जब इस प्रकार सारी भेंट फिर से गुरु के घर में भाई गुरदास जी की प्ररेणा से पहुंचने लगी तो पृथ्वी चन्द्र व महादेव ने माता जी के पास आकर फिर से शोरगुल किया कि हमारा गुजारा मुश्किल हो गया है सारी सेवा तो गुरु घर में आने लगी है। तब गुरु अर्जुन देव जी ने बड़ी दया करके, गुरु बाजार की दुकानों का किराया, आढ़त आदि बड़े भाई पृथ्वी चन्द्र को तथा पासीयां की कमाई भाई महादेव को सौंप दी ताकि वह भी सुख से रह सके।
साकेदारी में ईष्या:—-
इस प्रकार गुरूघर की बढ़ोत्तरी देखकर पृथ्वी चन्द्र की ईर्ष्या बढ़ती गई। उसके घर एक बेटा मेहरबान था जबकि आपके घर पुत्र नहीं था। एक बार आपकी पत्नी गंगा ने किमती शॉल धूप दिखाने के लिए छत पर डाली तो पृथ्वी चन्द्र की पत्नी जल बुझ गई। रात में अपने पति से झगड कर कहने लगी यदि आप अपने पिता से बनाकर रखते तो आज वह कीमती शॉल उनके घर नहीं बल्कि हमारे घर आती क्योंकि आप गुरु होते। यह सब सुनकर पृथ्वी चन्द्र बोला चिंता क्यों करती हो यह सब हमारे पुत्र मेहरबान का ही तो है उनके घर तो कोई संतान नहीं। सब कुछ के मालिक हम ही तो होगें।
माता गंगा जी की परेशानी:—
यह बात गुरु घर की दासी ने सुनकर माता गंगा जी को जा बताई। माता गंगा जी ने सुना तो बहुत चिंता में पड़ गई। रात में गुरु जी घर आये तो विनती की कि महाराज माई करमो ने बड़े दिल दुखाने वाले वचन कहें है। तब गुरु अर्जुन देव जी ने माता गंगा जी से कहा कि पुत्र प्राप्ति का वरदान प्राप्त करने के लिए आप बाबा बुड्ढा जी के पास जाएं। उनके वचन अटल है व अवश्य आपका मनोरथ पूरा करेगें।
पुत्र प्राप्ति का वरदान:—-
जब माता गंगा जी बीड़ साहिब पहुंची तो बाबा बुड्ढा साहिब जी भूख से व्याकुल हो चुके थे। दूर से ही माता जी को आते हुए देखकर बहुत प्रसन्न हुए। माता जी पसीने से तर हो रही थी। लस्सी वाली चाटी सिर से उतारकर नीचे रखी और बाबा जी से प्रसाद चखने की विनती की। बाबा बुड्ढा जी मिस्से प्रसादे दही के साथ चखकर खूब प्रसन्न हुए तथा कहने लगें— कुर्बान जाऊं! माता हो तो ऐसी सचमुच ही आज माता की तरह ममतावश होकर भोजन कर गया हूँ जब प्याज पकड़ कर हथेलियों में दबाकर तोड़ने लगे तो सहज भाव से बोले — माता! आपके घर ऐसा महाबली योद्धा सुपुत्र पैदा होगा कि जिस प्रकार मैने प्याज फोड़ा है उसी प्रकार वह तुर्कों के सिर फोड़ेगा। पुत्र का वर लेकर रात्रि होते वापिस अमृतसर लौट आयीं तथा गुरु जी से सारे समाचार खुशी से बतलाये।
बाबा बुड्ढा जी के वरदान स्वरूप श्री हरगोविंद साहिब जी महाराज का जन्म हुआ और यह पावन अवसर सारे सिक्ख जगत में हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।
श्री हरिमंदिर साहिब का निर्माण:—-
जब सरोवर की कार सेवा समाप्त हुई तो गुरू जी ने अमृत सरोवर के बीचोबीच श्री हरमंदिर साहिब की नीवं प्रसिद्ध सूफी संत मियां मीर जी से रखवाई। इस मंदिर के चारों ओर चार द्वार, चार वर्णों के लिए समान रखे गये। जब हरिमंदिर जी की सेवा चालू थी तो गुरुसिखो ने अपनी आंखों से देखा कि भगवान श्री हरि मनुष्य रूप धारण कर सेवा में सम्मिलित हो रहे थे।
एक बार आप गुरू सिक्खों के एक दल के साथ अपने ननिहाल गोइंदवाल जा रहे थे तो तरनतारन में एक वृक्ष के नीचे विश्राम करने लगें तो कुछ कुष्ठ रोगी दर्शन करने आ गये। उनके दुख दूर करने के लिए 17 वैसाख 1647 को एक नये तीर्थ की रचना की, और एक सरोवर खुदवाया तथा वचन दिया कि जो कोई भी इस सरोवर में स्नान करेगा उसके सब दुख दूर होगें। आपने सरोवर के तट पर भी गुरुद्वारे की स्थापना करवाईं।
गुरु जी बारठ गये:—
एक बार गुरु बारठ साहिब, श्री गुरु नानक पातशाह के बड़े बेटे बाबा श्री चन्द्र जी के दर्शन करने गये। वहां सुखमनी साहिब की सोलह अष्टपदीयां सुनाई तो बाबा जी बहुत खुश हुए और आज्ञा दी कि प्राणी एक दिन में 24000 श्वास लेता है इसलिए आप आठ 8 अष्टपदीयां और रचना कर पूरी 24 कर देवें ताकि 24 घंटे प्राणियों के श्वास सफल हो सकें। गुरु जी ने कहा आगे आप रचना कर देवें तो बाबा जी ने आदि सचु जुगादि सचु है भि सचु नानक होसी भि सचु। श्लोक पढ़कर कहा कि आगे आप रचना पूरी करें सो गुरु जी ने 24 अष्टपदियां सम्मपूर्ण की।
श्री गुरु ग्रंथ साहिब की रचना:—
गुरु जी ने गुरूद्वारा रामसर में बैठकर, कनाते लगवाकर, भाई गुरदास आदि प्रमुख सिक्खों से पोथियां इकट्ठी करवाई तथा श्री गुरु ग्रंथ साहिब की सम्पादना की। इस स्थान पर वृक्षों के तले एक छोटी सी पोखर थी। जिसमें बारिश का पानी इकटठा हो जाया करता था। गुरु जी ने इसे ही रामसर सरोवर का स्वरूप प्रदान किया। भाद्रपद शुक्ल एक, वि.सं. 1661 को पोथी साहिब का श्री हरिमंदिर साहिब में प्रथम प्रकाश हुआ और बाबा बुड्ढा साहिब जी प्रथम ग्रंथी नियुक्त किये गये।
गुरु अर्जुन देव जी की शहीदी:—
गुरु अर्जुन देव जी की शहीदी गाथा सुनकर प्रत्येक दिल दर्द से व्याकुल हो उठता है। कि कैसे लाहौर के दीवान चन्दूलाल ने ज्येष्ठ महीने की गर्म कड़कती धूप में आपको कष्ट पहुंचाया। आग जलाकर, लोहे के तवे गर्म करवाकर, आपको उस गर्म तवे पर बिठाया तथा सिर पर गर्म बालू के कड़छे भर भर कर डलवाये, गर्म देकची के पानी में उबलवाया।
वह सद्गुरु सच्चा पातशाह श्री हरिमंदिर साहिब में गद्दी पर बिराजने वाले जिनके शीश पर छत्र झूलते थे, चंवर होते थे उन्हें गर्म तवे पर बिठाया तो आप उसे ही तख्त समझकर उस मीठे साजन की रजा में आलती पालती लगाकर बैठे, यह पंक्ति गा रहे थे। ” तेरा भाणा मीठा लागै, हरिनाम पदार्थ नानक मांगैं” मेरे दातार पातशाह ने लाखों कष्ट सहकर, अकह व असह जुल्म बर्दाश्त करके सिक्ख कौम का पौधा अपने खून से सींचा है। जिसके बाद सिक्ख पंथ को सद्गुरु जी की ओर सेवा सिमरन तथा बलिदान की धरोहर प्राप्त हुई है और पंथ आज तक चढ़दी कला में है। गुरु अर्जुन देव जी के अंदर कुर्बानी की इतनी शक्ति कैसे आई? श्री गुरु ग्रंथ साहिब सा नाम का जहाज प्यार करने का सामर्थ्य कहां से पाया। पिता जी भी गुरु थे और आप भी गुरु थे। आपकी माता भानी जी सेवा के पुंज थे।
गुरु अर्जुन देव जी महाराजप्रथम आशीष:—-
बीबी भानी जी ने अपने प्यारे पिता श्री गुरु अमरदास जी की अथाह सेवा करके “गुरूगददी घर में ही रहे” का वरदान मांगा तो तीसरे पातशाह ने अपनी पुत्री बीबी भानी जी से कहा था, प्यारी बच्ची यह गुरियाई बहुत महंगी पडेगी। आपके सोढ़ी वंश को महान कुर्बानियां करनी पड़ेगी। फिर बीबी भानी को आंख मूंद कर, जो जो कुछ विपदाएं सोढ़ी वंश पर आने वाली थी का सारा कौतूहल शांत कर दिया था, पर बीबी भानी ने फिर भी हौसला नहीं छोड़ा न ही डोलायमान हुई। अपने वचनों पर अडिग रहते हुए, बड़ी बड़ी दलेरी व नम्रता पूर्वक विनती की कि पिता जी अपनी कृपा द्वारा बल प्रदान करें, ताकि मेरा वंश हंसते मुस्कुराते सारी कुर्बानियां कर सकें। गुरु पिता ने कहा अच्छा बच्ची जैसे तेरे विचार है वैसे ही फलीभूत होगें।
दूसरी बार आशीष:—-
गुरु अर्जुन देव जी अभी दो तीन साल के ही थे कि माता भानी जी एक रोज दीवान में बच्चे को गोद में लिए बैठी थी। बाल्यावस्था होने के कारण जम कर नहीं बैठते थे, चारों ओर लुढ़कते फिर रहे थे। भोले पातशाह श्री गुरु अमरदास जी अपने चांद से प्यारे दोहते गुरु अर्जुन देव को गोद में बिठाकर दुलारने लगे तथा बोले — मेरा दोहता वाणी का बोहिथा। महान वाणी की रचना करके गृहस्थी जीवों का पार उतारा। इसके द्वार के बड़े बड़े वेदांती यती, योगी, ज्ञान प्रसाद लेकर तृप्त होगें। यह संसार के पर्दे ढांपेगा तथा सिक्ख कौम की जड़े पाताल में ले जावेगा इत्यादि।
इन ऐतिहासिक घटनाओं से स्पष्ट है कि कोई आम आदमी इतनी बडी कुर्बानी नहीं कर सकता। पंचम पातशाह अपने बुजुर्ग गुरु नाना जी तथा प्यारे पिता श्री गुरु रामदास जी महाराज की सेवा आज्ञा में रहकर और उनके आशीर्वाद से आत्मिक स्तर पर बलवान बने। इतना ही नहीं हरिमंदिर साहिब से सचखंड की सृजना की जो गृहस्थियों के लिए मुक्ति का केन्द्र बन गया। पंचम पातशाह जी ने अपने खून से सिक्खी का श्रृंगार किया। श्री गुरु तेगबहादुर जी ने धर्म की रक्षा करने के लिए चांदनी चौक, दिल्ली में बलिदान दिया, भाई मती दास जी आरे के साथ चिराये गये, भाई दयाला जी भी उबलते हुए पानी की देग में बिठाये गये। बाबा दीप सिंह जी ने शीश हथेली पर संभाला, वर्तमान समय में भी सिक्ख पंथ पर सदा चढ़दी कला में रखा। ज्येष्ठ शुक्ल चौथ, 1663 वि.सं. में आप ज्योति ज्योत में समा गये।
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