गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब का इतिहास – गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब हिस्ट्री इन हिन्दी

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से 5 किलोमीटर दूर लोकसभा के सामने गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब स्थित है। गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब की स्थापना सन् 1783 में सरदार बघेल सिंह जी द्वारा करवाई गई थी। दिल्ली के पर्यटन स्थलों में यह गुरुद्वारा महत्वपूर्ण स्थान रखता है। बड़ी संख्या में श्रृद्धालु और पर्यटक यहां आते है।

 

 

 

गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब का इतिहास

 

गुरु के दो बहादुर सिख, भाई लखी शाह बंजारा और उनके बेटे, भाई नघैया ने गुरु के वध के बाद दिल्ली के चांदनी चौक से श्रद्धेय नौवें सिख गुरु के सिर रहित शरीर को बचाया। इन दोनों ने गुरु जी के शरीर को कपास और खाद्य पदार्थों की गांठें ले जाने वाली कई बैल चालित गाड़ियों के काफिलेद्वारा से बचाया था। तेज धूल भरी आंधी के कारण, ये बहादुर सिख मुगल सैनिकों को दिखाई दिये बिना गुरु के शरीर को उठाने में कामयाब रहे, सैनिकों को यह पता ही नहीं चल पाया कि क्या चल रहा था। ये दोनों सिख तूफान की आड़ में शरीर को बड़ी तेजी से उठाने में कामयाब हुए और फिर शव को रुई की गांठों के नीचे बैल गाड़ी में छिपा दिया। फिर वे जल्दी से रायसीना गाँव की ओर चल पड़े, जहाँ वे रहते थे। अपने निवास पर पहुंचने पर उन्होंने मुगल अधिकारियों के किसी भी संदेह से बचने लिए भाई लखी शाह बंजारा ने गुरू के शव को अपने बिस्तर पर रखा और उसने अपने पूरे घर में आग लगा दी। इस जगह को रकाबगंज के नाम से जाना जाने लगा। गुरु और उनके समर्पित साथियों की यह दुखद मृत्यु 11 नवंबर, 1675 को मुगल सम्राट औरंगजेब के आदेश के तहत हुई थी। एक और समर्पित सिख, भाई जैता, शीशगंज, चांदनी चौक से 500 किमी (300 मील) दूर आनंदपुर साहिब में गुरु जी के सिर को ले गए थे।

 

 

 

गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब के स्थान पर सिक्ख धर्म के नौवें गुरु, गुरु श्री तेगबहादुर जी महाराज के धड़ का संस्कार हुआ था। गुरु तेगबहादुर जी शीशगंज साहिब चांदनी चौक वाले पवित्र स्थान पर 11 नवंबर 1675 को शहीद हुए थे। सतगुरु का पवित्र शीश आनंदपुर साहिब ले जाया गया वहां उनका संस्कार किया गया। तथा गुरु जी के धड़ का संस्कार इस स्थान पर किया गया। जब जत्थेदार सरदार बघेल सिंह ने दिल्ली फतह की तब उन्होंने इस स्थान पर गुरु जी की यादगार कायम की।

 

 

गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब
गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब

 

गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब का निर्माण

 

भव्य गुरुद्वारे का वर्तमान स्थान नई दिल्ली में पंत रोड पर है, जो संसद भवन और केंद्रीय सचिवालय के उत्तरी ब्लॉक के सामने है। आधुनिक इमारत मुख्य रूप से सफेद संगमरमर से बनी है जो एक खूबसूरत बगीचे से घिरी हुई है। अधिकांश अन्य सिख तीर्थस्थलों की तरह इस गुरुद्वारे में चार तरफ से प्रवेश द्वार हैं जो इस बात का प्रतीक हैं कि वे बिना किसी जाति या पंथ के भेद के सभी के लिए खुले हैं। इस ऐतिहासिक गुरुद्वारा को उस समय 25 लाख रुपये की लागत से बनाया गया था और इसे बनने में 12 साल लगे थे।

 

 

ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि सरदार बघेल सिंह ने नौवें गुरु श्री तेग बहादुर की स्मृति को बनाए रखने के लिए 1783 में रायसीना गांव में एक गुरुद्वारे का निर्माण किया था। उसने चार अन्य कमांडरों के साथ 30,000 सिख योद्धाओं की सेना का नेतृत्व करके दिल्ली पर विजय प्राप्त की थी। 1783 से पहले दिल्ली के मुसलमानों ने इसी जगह पर मस्जिद बनाई थी। सिखों ने अपने गुरु के बलिदान की याद में इस स्थान को अपना पवित्र स्थान होने का दावा किया। मुसलमानों ने दावे का विरोध किया, और मस्जिद को तोड़ने पर कड़ी आपत्ति जताई थी। विरोधी पक्ष तलवारें खींचे खड़े थे और माहौल तनावपूर्ण था – कुछ भी हो सकता था। हालाँकि, सिखों ने मुसलमानों के लिए अपने स्वयं के खर्च से मस्जिद के पुनर्निर्माण की पेशकश करते हुए कहा, कि इस स्थान की खुदाई की जाये यदि सम्मानित गुरु की राख वाला कलश वहाँ खड़ी मस्जिद के नीचे दफन नहीं पाया गया। तो वह अपना दावा छोड़ देगें। इससे माहौल शांत हुआ और पारा ठंडा हुआ। खुदाई का काम मुगल अधिकारियों की मौजूदगी में शुरू हुआ। सिखों द्वारा किया गया दावा सही साबित हुआ और उन्हें बादशाह शाह आलम द्वितीय द्वारा गुरुद्वारा रकाब गंज के निर्माण की अनुमति दी गई। उन्होंने सिखों को दो सनद भी दिए। एक सनद में सरदार भगेल सिंह को एक गुरुद्वारा और एक बगीचे के निर्माण के लिए भूमि पर कब्जा करने की अनुमति दी गई। तथा दूसरी सनद में बादशाह ने गुरुदारे को 101 बीघा और 5 बिस्वास पुखता लगभग 63 एकड़ के बराबर और 3 कुओं की भूमि, राजस्व से मुक्त भेंट की। इन रियायतों के एवज में मुगल राजधानी में अपने धार्मिक स्थलों के निर्माण के बाद सिख सेना दिल्ली क्षेत्र से शांतिपूर्वक हटने के लिए सहमत हो गई।

 

 

 

1857 के गदर के बाद सिक्ख रियासतों के उत्थान के बाद इस गुरुद्वारे के चारों तरफ पक्की दीवार बनाई गई। सन् 1914 में जब अंग्रेजों ने दीवार को गिरा दिया तो पंथ में रोष की लहर दौड़ गई। सिक्खों के आक्रोश को देखकर अंग्रेजों ने इस दीवार का पुनः निर्माण कराया। गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब की इमारत की सेवा सरदार हरनाम सिंह ने करवाई।

 

 

गुरुदारे का मुख्य भवन जिसमें श्री गुरू ग्रंथ साहिब स्थापित है वह 6फुट ऊंची जगती पर 60×60 वर्ग फुट में बना है। दरबार हाल दो मंजिल का है। चारों प्रवेशद्वार चांदी से मंडित है। दक्षिण की तरफ श्री गुरु ग्रंथ साहिब विराजमान है। यहां सदैव शबद कीर्तन होता रहता है। गुरुदारे के द्वारों की सज्जा नित्य सुंदर फूलों से की जाती है। दरबार हाल की छत पर सुंदर चित्रकारी की गयी है। दरबार हाल के दक्षिण की तरफ 4×4 की सोने पालकी साहिब पर श्री गुरु ग्रंथ साहिब विराजमान है। मुख्य भवन के बाहर चारों कोनों पर सुंदर छतरियां बनी है। लगभग 80-90 फुट ऊंचा निशान साहिब (ध्वज स्तंभ) है। चारों ओर परिक्रमा मार्ग है। गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब का शिखर लगभग 60 फुट ऊंचा है।

 

 

इसके अलावा गुरुद्वारा परिसर में बड़ी पार्किंग एवं जूता घर स्थापित है। जूता घर के अंदर बड़े बड़े करोड़पति भक्तों के जूतों पर निःशुल्क पालिश करते है और गुरुद्वारे में झाडू पोछा भी लगाते है। और बाथरूम भी साफ करते है। गुरुदारे में लक्खी शाह, बनजारा हाल, व लंगर हाल स्थापित है।

 

 

गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब का क्षेत्रफल लगभग 10 एकड़ से अधिक है। गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी द्वारा संचालित दो अतिथिगृह में अनेक कमरे ठहरने की उपयुक्त व्यवस्था से साथ उपलब्ध है। यहां एक बारात घर भी बना हुआ है। प्रतिवर्ष लगभग 250 विवाह सम्पन्न होते है। लंगर हाल में प्रतिदिन लगभग  2000 भक्त निःशुल्क लंगर छकते है। यहां पर सभी गुरुओ की जयंती व उत्सव हर्षोल्लास के साथ बड़ी धूम धाम से मनाये जाते है।

 

 

हमारे यह लेख भी जरूर पढ़ें:—-

 

 

पटना साहिब के फोटो
बिहार की राजधानी पटना शहर एक धार्मिक और ऐतिहासिक शहर है। यह शहर सिख और जैन धर्म के अनुयायियों के
हेमकुंड साहिब के सुंदर दृश्य
समुद्र तल से लगभग 4329 मीटर की हाईट पर स्थित गुरूद्वारा श्री हेमकुंड साहिब (Hemkund Sahib) उतराखंड राज्य (Utrakhand state)
नानकमत्ता साहिब के सुंदर दृश्य
नानकमत्ता साहिब सिक्खों का पवित्र तीर्थ स्थान है। यह स्थान उतराखंड राज्य के उधमसिंहनगर जिले (रूद्रपुर) नानकमत्ता नामक नगर में
शीशगंज साहिब गुरूद्वारे के सुंदर दृश्य
गुरुद्वारा शीशगंज साहिब एक ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण गुरुद्वारा है जो सिक्खों के नौवें गुरु तेग बहादुर को समर्पित है।
आनंदपुर साहिब के सुंदर दृश्य
आनंदपुर साहिब, जिसे कभी-कभी बस आनंदपुर आनंद का शहर" कहा जाता है के रूप में संदर्भित किया जाता है, यह
हजूर साहिब नांदेड़ के सुंदर दृश्य
हजूर साहिब गुरूद्वारा महाराष्ट्र राज्य के नांदेड़ जिले में स्थापित हैं। यह स्थान गुरु गोविंद सिंह जी का कार्य स्थल
स्वर्ण मंदिर अमृतसर के सुंदर दृश्य
स्वर्ण मंदिर क्या है? :- स्वर्ण मंदिर सिक्ख धर्म के अनुयायियों का धार्मिक केन्द्र है। यह सिक्खों का प्रमुख गुरूद्वारा
दुख भंजनी बेरी के सुंदर दृश्य
दुख भंजनी बेरी ट्री एक पुराना बेर का पेड़ है जिसे पवित्र माना जाता है और इसमें चमत्कारी शक्ति होती
श्री अकाल तख्त साहिब अमृतसर के सुंदर दृश्य
यह ऐतिहासिक तथा पवित्र पांच मंजिलों वाली भव्य इमारत श्री हरमंदिर साहिब की दर्शनी ड्योढ़ी के बिल्कुल सामने स्थित है।
गुरूद्वारा बाबा अटल राय जी के सुंदर दृश्य
गुरूद्वारा बाबा अटल राय जी अमृतसर का एक प्रसिद्ध गुरुद्वारा है। हर साल हरमंदिर साहिब जाने वाले लाखों तीर्थयात्रियों में
पांवटा साहिब के सुंदर दृश्य
गुरुद्वारा पांवटा साहिब, हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के पांवटा साहिब में एक प्रसिद्ध गुरुद्वारा है। पांवटा साहिब पर्यटन स्थल
तख्त श्री दमदमा साहिब के सुंदर दृश्य
यह तख्त साहिब भटिंडा ज़िला मुख्यलय से 35 किमी दूर तलवांडी साबो में बस स्टेशन के बगल में स्थापित है
गुरू ग्रंथ साहिब
जिस तरह हिन्दुओं के लिए रामायण, गीता, मुसलमानों के लिए कुरान शरीफ, ईसाइयों के लिए बाइबल पूजनीय है। इसी तरह
पांच तख्त साहिब के सुंदर दृश्य
जैसा की आप और हम जानते है कि सिक्ख धर्म के पांच प्रमुख तख्त साहिब है। सिक्ख तख्त साहिब की
खालसा पंथ
"खालसा पंथ" दोस्तों यह नाम आपने अक्सर सुना व पढ़ा होगा। खालसा पंथ क्या है। आज के अपने इस लेख
गुरूद्वारा गुरू का महल के सुंदर दृश्य
गुरूद्वारा गुरू का महल कटड़ा बाग चौक पासियां अमृतसर मे स्थित है। श्री गुरू रामदास जी ने गुरू गद्दी काल
गुरूद्वारा शहीदगंज साहिब के सुंदर दृश्य
गुरुद्वारा शहीदगंज साहिब बाबा दीप सिंह जी सिक्खों की तीर्थ नगरी अमृतसर में स्थित है। गुरूद्वारा शहीदगंज साहिब वह जगह
लोहगढ़ साहिब के सुंदर दृश्य
अमृतसर शहर के कुल 13 द्वार है। लोहगढ़ द्वार के अंदर लोहगढ़ किला स्थित है। तत्कालीन मुगल सरकार पर्याप्त रूप
सिख धर्म के पांच ककार
प्रिय पाठकों अपने इस लेख में हम सिख धर्म के उन पांच प्रतीक चिन्हों के बारें में जानेंगे, जिन्हें धारण
तरनतारन गुरूद्वारा साहिब के सुंदर दृश्य
तरनतारन गुरूद्वारा साहिब, भारत के पंजाब राज्य में एक शहर), जिला मुख्यालय और तरन तारन जिले की नगरपालिका परिषद है।
गुरूद्वारा मंजी साहिब आलमगीर लुधियाना के सुंदर दृश्य
गुरूद्वारा मंजी साहिब लुधियाना के आलमगीर में स्थापित है। यह स्थान लुधियाना रेलवे स्टेशन से 16 किलोमीटर की दूरी पर
मंजी साहिब गुरुद्वारा, नीम साहिब गुरूद्वारा कैथल के सुंदर दृश्य
मंजी साहिब गुरूद्वारा हरियाणा के कैथल शहर में स्थित है। कैथल भारत के हरियाणा राज्य का एक जिला, शहर और
दुख निवारण साहिब पटियाला के सुंदर दृश्य
दुख निवारण गुरूद्वारा साहिब पटियाला रेलवे स्टेशन एवं बस स्टैंड से 300 मी की दूरी पर स्थित है। दुख निवारण
गोइंदवाल साहिब के सुंदर दृश्य
गुरू श्री अंगद देव जी के हुक्म से श्री गुरू अमरदास जी ने पवित्र ऐतिहासिक नगर श्री गोइंदवाल साहिब को
नानकसर साहिब कलेरा जगराओं के सुंदर दृश्य
गुरूद्वारा नानकसर कलेरा जगराओं लुधियाना जिले की जगराओं तहसील में स्थापित है।यह लुधियाना शहर से 40 किलोमीटर और जगराओं से
गुरूद्वारा चरण कंवल साहिब माछीवाड़ा के सुंदर दृश्य
गुरूद्वारा चरण कंवल साहिब लुधियाना जिले की माछीवाड़ा तहसील में समराला नामक स्थान पर स्थित है। जो लुधियाना शहर से
मुक्तसर साहिब के सुंदर दृश्य
मुक्तसर फरीदकोट जिले के सब डिवीजन का मुख्यालय है। तथा एक खुशहाल कस्बा है। यह प्रसिद्ध तीर्थ स्थान भी है।
गुरूद्वारा गुरू तेग बहादुर धुबरी साहिब के सुंदर दृश्य
गुरूद्वारा श्री तेगबहादुर साहिब या धुबरी साहिब भारत के असम राज्य के धुबरी जिले में ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे स्थित
गुरूद्वारा नानक झिरा साहिब के सुंदर दृश्य
गुरूद्वारा नानक झिरा साहिब कर्नाटक राज्य के बीदर जिले में स्थित है। यह सिक्खों का पवित्र और ऐतिहासिक तीर्थ स्थान
नाड़ा साहिब गुरूद्वारा पंचकूला
नाड़ा साहिब गुरूद्वारा चंडीगढ़ रेलवे स्टेशन से 5किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। नाड़ा साहिब गुरूद्वारा हरियाणा प्रदेश के पंचकूला
गुरुद्वारा पिपली साहिब पुतलीघर अमृतसर
गुरुद्वारा पिपली साहिब अमृतसर रेलवे स्टेशन से छेहरटा जाने वाली सड़क पर चौक पुतलीघर से आबादी इस्लामाबाद वाले बाजार एवं
गुरुद्वारा पातालपुरी साहिब, यह गुरुद्वारा रूपनगर जिले के किरतपुर में स्थित है। यह सतलुज नदी के तट पर बनाया गया
गुरुद्वारा कतलगढ़ साहिब चमकौर
गुरुद्वारा कतलगढ़ साहिब श्री चमकौर साहिब में स्थापित है। यह गुरुद्वारा ऐतिहासिक गुरुद्वारा है। इस स्थान पर श्री गुरु गोबिंद
गुरुद्वारा बेर साहिब सुल्तानपुर लोधी
गुरुद्वारा बेर साहिब सुल्तानपुर लोधी नामक कस्बे में स्थित है। सुल्तानपुर लोधी, कपूरथला जिले का एक प्रमुख नगर है। तथा
गुरुद्वारा हट्ट साहिब
गुरुद्वारा हट्ट साहिब, पंजाब के जिला कपूरथला में सुल्तानपुर लोधी एक प्रसिद्ध कस्बा है। यहां सिख धर्म के संस्थापक गुरु
गुरुद्वारा मुक्तसर साहिब
मुक्तसर जिला फरीदकोट के सब डिवीजन का मुख्यालय है तथा एक खुशहाल कस्बा है। यह प्रसिद्ध तीर्थ स्थान भी है।
दरबार साहिब तरनतारन
श्री दरबार साहिब तरनतारन रेलवे स्टेशन से 1 किलोमीटर तथा बस स्टैंड तरनतारन से आधा किलोमीटर की दूरी पर स्थित
गुरुद्वारा बिलासपुर साहिब
गुरुद्वारा बिलासपुर साहिब हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर शहर मे स्थित है बिलासपुर, कीरतपुर साहिब से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर
मोती बाग गुरुद्वारा साहिब
मोती बाग गुरुद्वारा दिल्ली के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है। गुरुद्वारा मोती बाग दिल्ली के प्रमुख गुरुद्वारों में से
गुरुद्वारा मजनूं का टीला साहिब
गुरुद्वारा मजनूं का टीला नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से 15 किलोमीटर एवं पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से 6 किलोमीटर की दूरी
बंगला साहिब गुरुद्वारा
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से 3 किलोमीटर की दूरी पर गोल डाकखाने के पास बंगला साहिब गुरुद्वारा स्थापित है। बंगला
लखनऊ गुरुद्वारा गुरु तेगबहादुर साहिब
उत्तर प्रदेश की की राजधानी लखनऊ के जिला मुख्यालय से 4 किलोमीटर की दूरी पर यहियागंज के बाजार में स्थापित लखनऊ
नाका गुरुद्वारा
नाका गुरुद्वारा, यह ऐतिहासिक गुरुद्वारा नाका हिण्डोला लखनऊ में स्थित है। नाका गुरुद्वारा साहिब के बारे में कहा जाता है
गुरुद्वारा गुरु का ताल आगरा
आगरा भारत के शेरशाह सूरी मार्ग पर उत्तर दक्षिण की तरफ यमुना किनारे वृज भूमि में बसा हुआ एक पुरातन
गुरुद्वारा बड़ी संगत नीचीबाग बनारस
गुरुद्वारा बड़ी संगत गुरु तेगबहादुर जी को समर्पित है। जो बनारस रेलवे स्टेशन से लगभग 9 किलोमीटर दूर नीचीबाग में

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *