गणगौर व्रत कथा – गणगौर क्यों मनाई जाती है तथा गणगौर व्रत विधि

गणगौर का व्रत चैत्र शुक्ला तृतीया को रखा जाता है। यह हिंदू स्त्री मात्र का त्यौहार है। भिन्‍न-भिन्‍न प्रदेशों की प्रथा एव भिन्‍न भिन्‍न कुल परम्परा के भेद से पूजन के तरीको में थोडा-बहुत अंतर हो सकता है। परन्तु इसकी धारणाओ मे भेद नही है। सौभाग्यवती स्त्रियाँ बहुत प्राचीनकाल से इस प्नत को रखती आई हैं। गणगौर का त्यौहार वैसे तो पूरे भारत में हर्षोल्लास के साथ स्त्रियों द्वारा मनाया जाता है। किंतु राजस्थान में यह मुख्य रूप से मनाया जाता है। इस व्रत को गणगौर तीज के नाम से भी जाना जाता है। तथा इस दिन व्रत रखकर गणगौर के गीतों पर नाचा गया जाता है

 

 

गणगौर व्रत कैसे रखा जाता है

 

 

मध्यान्ह तक उपवास रखकर, पूजन के समय रेणुका की गौर स्थापित करके, उस पर चूंडी, महावर, सिन्दूर, नए वस्त्र, चन्दन, धूप, अक्षत, पुष्प और नैवेद्य आदि अर्पण किया जाता है। उसके बाद कथा सुनकर व्रत रखने वाली स्त्रियां गौर पर चढा हुआ सिन्दुर अपनी मांग में लगाती हैं । गणगौर पूजा का प्रसाद पुरूषों को नही दिया जाता है।

 

 

गणगौर व्रत की कथा — गणगौर तीज की कहानी

 

 

गणगौर व्रत के सम्बन्ध मे जो लोक-कथा आमतोर पर गाँवो में प्रचलित है तथा जिससे गणगौर का इतिहास पता चलता है वह इस प्रकार है:—–
एक बार देवर्षि नारद के सहित भगवान्‌ शंकर विश्व-पर्यटन के लिए निकले । सती पार्वती भी उनके साथ थी। तीनो एक गाँव मे गए। उस दिन चैत्र शुक्ला तृतीया थी। गाँव की सम्पन्न स्त्रियाँ शिव- पार्वती के आने का समाचार पावर बडी प्रसन्न हुईं और उन्हें अर्पण करने के लिए तरह-तरह के स्वादिष्ट भोजन बनाने लगी। परन्तु गरीब स्त्रियाँ जो जहाँ जैसे बैठी हुई थी, वैसे ही हल्दी-चावल अपनी- अपनी थालियो मे रखकर दौडी और शिव-पार्वती के पास पहुँच गई।

 

 

हमारा देश तो गरीबो का देश है। गरीबी का उपास्य भगवान शंकर के अलावा और कौन देवता हो सकता है, जिसके पास पहनने को बढ़िया वस्त्रो के बजाय बाघंबर मात्र है एवं रहने के लिए फूँस की भोपडी भी नहीं है। फिर भी गरीबो के उस देवता की शक्ति अपरम्पार है। विश्व की कोई भी निधि ऐसी नही है जो उस देवता के चरणों पर न लौटती हो। इसलिए झपनी सेवा में आई हुई गाँव की ग़रीब और सीधी-सादी महिलाओं के झुंड को देखकर शिव गदगद हो गए और उनके सरल एवं निष्कपट भाव से अरपण किये हुए पत्र-पुप्प को स्वीकार करके आनंद मग्न हो गए। अपने पति को हर्ष से भरा हुआ देखकर, सती पावती का मन भी आनंद से नाच उठा । उन्होंने आंगतुक महिलाओं के ऊपर सुहाग रस ( सौभाग्य का टीका लगाने की हल्दी ) छिडक दी। वे महिलाएँ सौभाग्य दान पाकर अपने अपने घर चली गई। इसके बाद सम्पन्न कुलों की स्त्रियाँ आई। वे सब सोलह श्रृंगार से सुसज्जित थी। उन पर चमकते हुए आभूषणों और सुन्दर वस्त्रों की बहार थी। चाँदी और सोने की थालो मे वे अनेक प्रकार के पकवान बनाकर लाई थी। उन्हें देखकर आशुतोष शंकर ने पार्वती से पूछा– देवी ! तुमने पूरा सुहाग रस तो अपनी दीन पुजारिनो को दे दिया। अब इन्हें क्या दोगी ? अन्नपूर्णा पार्वती ने कहा–‘ इन्हें मैं अपनी अंगुली चीरकर रक्त का सुहाग रस दूंगी। जब वे स्त्रियाँ वहाँ आकर पूजन करने लगी तब अन्नपूर्णा पार्वती ने अपनी अंगुली को काटकर सब पर उसका रक्त छिड़क दिया और कहा– बढिया वस्त्रों और चमकीले आभूषणों से अपने- अपने पतियों को रिझाने की अपेक्षा अपने प्रत्येक रक्त की बुंद को स्वामी सेवा मे अर्पण करके तुम सौभाग्यशालिनी कहलाओगी।

 

 

सेवा धर्म का यह अनोखा उपदेश प्राप्त करके वे बहू-बेटियां अपने अपने घर को लौट गयी और अपने परिवार की सेवा में मग्न हो गईं। इसके उपरान्त उन्होंने स्वयं भी भगवान शिव से आज्ञा लेकर–भगवान शिव तथा महर्षि नारद को वही छोड–कुछ दूर जा नदी में स्नान किया और बालू के शिव बनाकर श्रद्धापूर्वक उनका पार्थिव पुजन किया। प्रदक्षिणा करके उन्होने उस शिव प्रतिमा से यह निवेदन किया कि मेरे दिये हुए वरदान को सत्य करने की शक्ति आप मे ही है इसलिए प्राणेश्वर ! मेरी सेवा से प्रसन्‍न होकर मेरे वचनो को पूर्ण करने का वरदान प्रदान कीजिए। भगवान शंकर अपने पार्थिव रूप में साक्षात्‌ प्रकट हुए और सती से कहा-देवी ! जिन स्त्रियों के पतियों का अल्पायु योग है उन्हें मैं यम के पाश से मुक्त कर दूँगा। पार्वती वरदान पाकर कृत्य हो गई और शिव वहाँ से अंतर्ध्यान होकर फिर उसी स्थान पर आ पहुँचे जहाँ पार्वती उन्हें छोडकर गई थी।

 

 

पूजन के उपरान्त जब सती पार्वती लौटकर आईं तो शिव ने उनसे देर से आने का कारण पूछा–प्रिये ! देवर्षि नारद यह जानने को उत्सुक हैं कि तुमने इतना समय कहाँ लगाया ? पार्वती ने उत्तर दिया–देव! नदी के छोर पर मेरे भाई और भावज आदि मिल गए थे। उनसे बातचीत करने मे विलम्ब हो गया। उन्होने बडा आग्रह किया कि हम अपने साथ दूध भात आदि लाए है, आपको को अवश्य खाना पडेगा। उनके आग्रह के कारण ही मुझे देर हुई है। अपनी पूजा को गुप्त रखने के अभिप्राय से उन्होंने बात को इतना घुमा फिराकर कहा था। यह भगवान शंकर को अच्छा नही लगा। इसलिए उन्होने पार्वती से कहा– यदि ऐसी बात है तो देवर्षि नारद को भी अपने भाई भावज के यहाँ का दूध भात खिलाने की व्यवस्था करो तभी कैलाश चलेंगे।

 

 

पार्वती बड़े असंमजस में पडी, क्योकि उन्हें यह आशा नही थी कि शंकर उनकी परीक्षा लेने को तैयार हो जाएँगे। अतः उन्होंने मन ही मन शिव से प्राथना की कि उन्हें इस सकट से पार करें। फिर भी उन्होने ऊपरी मन से कहा–अवश्य चलिए, वे लोग यहाँ से थोडी हो दूर पर हैं। देवर्षि नारद को साथ मे लिये हुए शंकर पार्वती सहित उसी ओर चलने को उठ खडे हुए। कुछ दूर जाने पर एक सुन्दर भवन दिखाई पडने लगा। जब ये लोग उस भवन के अन्दर पहुंचे तो भगवान शंकर के साले और सलहज ने आगे बढ़कर उनका जोरदार स्वागत किया। देवर्षि नारद सहित बडे प्रेम से उन्हें धूद-भात खिलाया। दो दिन तक बड़ी अच्छी मेहमाननवाजी हुई। तीसरे दिन सब लोग विदा होकर कैलाश की ओर चल दिये।

 

गणगौर व्रत
गणगौर व्रत

 

देवी पार्वती के इस कौशल व सामर्थ्य को देखकर भगवान शंकर प्रसन्न भी बहुत हुए। परंतु धार्मिक अनुष्ठान को असभ्य के आचरण मे दबाये रखना उन्हें उचित नही लग रहा था। वह देवी सती का भांडाफोड़ कर निष्कपट नारी होने की शिक्षा सती को देना चाहते थे। क्योंकि निष्कपट नारी ही सृष्टिकर्ता की सर्वश्रेष्ठ कृति है। कुछ दूर आने पर भगवान शंकर ने कहा —- अन्नपूर्णे! तुम्हारे भाई के घर पर मे अपनी माला भूल आया। पार्वती जी माला लाने के लिए तत्पर हो गई।

 

 

 

इसी बीच देवर्षि नारद बोले–ठहरो देवी! इस छोटे से काम को करने का अवसर मुझे ही प्रदान भी करे। आप यहाँ भगवान शंकर के साथ ठहरो, मैं माला लेकर अभी आता हूँ। पार्वती जी चकरा गईं। उन्होंने भगवान शंकर के आशय को समझ लिया। परन्तु करती भी क्या ? देवर्षि नारद तो उनके गुरू थे। उनका आग्रह कैसे टालती? भगवान शंकर ने मुस्कुरा कर उन्हें आज्ञा प्रदान कर दी। नारद उधर की ओर चल दिए।

 

 

किंतु उस स्थान पर पहुँच कर उन्होंने देखा कि न तो वहाँ कोई मकान है और न मनुष्य के रहने का संकेत। चारो तरफ घना जंगल ही जंगल। स्वच्छन्द रूप से दौडते-भागते हुए जगली जानवरो का झुंड एव सघन अंधकार। मेघो से घिरा हुआ आकाश और जंगल की बीह्‌डता को बढाने वाली सियारो और उल्लुओं की बोलियाँ। नारद यह देखबर सोचने लगे कि में कहाँ आ पहुँचा। मगर आसपास का हृश्य वही था। केवल वे महल, मकान और सती के भाई- भावज आदि वहाँ कुछ भी नहीं था। अचानक उसी समय बिजली की चमक के प्रकाश में देवर्षि नारद ने एक पेड पर लटकती हुई माला देखी। उसे लेकर जल्दी-जल्दीं पैर बढ़ाते हुए वह भगवान शंकर के पास पहुंचे ओर उनसे जंगल की भयावता का वर्णन करने लगे।

 

 

शिव बोले–देवर्षि ! आपने जो कुछ अब तक देखा यह सब आपकी शिष्या महारानी पार्वती की अद्भुत माया का चमत्कार था। वह अपने पार्थिव पूजन के भेद को आपसे गुप्त रखना चाहती थी, इसीलिए नदी से देर से लौटकर आने के कारण को दूसरे ढंग से प्रकट किया। देवर्षि बोले–महामाये! पूजन तो गोपनीय ही होता है, परन्तु आपकी भावना और चमत्कारी शक्ति को देखकर मुझे आप पर हर्ष है। आप विश्व की नारियो मे पतित्व धर्मं की प्रतीक हैं। मेरा आशीर्वाद है कि जो देवियाँ गुप्त रूप से पति का पूजन करके उनकी मंगल कामना करेंगी उन्हें भगवान्‌ शंकर के प्रसाद से दीर्घायु पति के सुख का लाभ मिलेग। फिर शिव और पार्वेती उन्हें प्रणाम करके केलाश की ओर चले गए।

 

 

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