क्रीमिया का युद्ध कब हुआ – क्रीमिया युद्ध का कारण एवं परिणाम

क्रीमिया का युद्ध

तुर्क साम्राज्य के ईसाइयों को सुरक्षा प्रदान करने के बहाने रूस अपने भू-क्षेत्र का विस्तार कॉस्टेंटिनोपल (Constantinople) तक करके भूमध्य सागर के बंदरगाहों पर अधिकार पाना चाहता था। जब जुलाई, 1853 में रूस ने तुर्की के मोल्दाविया और वलेशिया (Walachia) प्रदेश पर आक्रमण करके अधिकार कर लिया तो तुर्की ने अक्टूबर में रूस के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। मार्च, 1854 में ब्रिटेन, फ्रांस और सारडिनिया (Sardinia) भी उसकी मदद के लिए आ गये क्योकि उन्हें भी इस क्षेत्र में रूसी विस्तार से भय होने लगा था। अक्तूबर, 1854 में चारों मित्र राष्ट्रों ने काला सागर के क्रीमिया तटवर्ती रूसी नगर सेवास्तोपोल (Sebastopol) पर बमबारी की और क्रीमिया युद्ध के नाम से प्रसिद्ध यह युद्ध लगभग दो साल तक चलता रहा। अन्त में, रूस ने पराजय स्वीकार करके मार्च, 1856 में मित्र राष्ट्रों के साथ सन्धि कर ली। अपने इस लेख में हम इसी क्रीमिया संघर्ष का उल्लेख करेंगे और निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर विस्तार से जानेंगे:—

 

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क्रीमिया युद्ध के कारण

 

यद्यपि इस युद्ध का कारण रोमन कैथोलिक चर्च और ग्रीक कैथोलिक चर्च के बीच पेलेस्टाइन (Palestine) के धार्मिक स्थानों के संरक्षण के सवाल को लेकर चल रहा धार्मिक विवाद था किन्तु यूरोपीय देशों के आपसी वैमनस्य को भी नजरअंदाज नही किया जा सकता। वास्तव मे बात यह थी कि रूस कमजोर होते तुर्की साम्राज्य के कुछ क्षेत्रों पर कब्जा करके कोंस्टेंटनोपल तथा भू मध्यसागर तक अपने साम्राज्य का विस्तार करना चाहता था। उसके लिए यही एक अच्छा अवसर था। फलत: ईसाइयों के अधिकारों की सुरक्षा तथा पेलेस्टाइन के धार्मिक स्थानों के संरक्षण के भार का दावा करते हुए जुलाई, 1853 को रूस ने तुर्की के मोल्दाविया (Moldavia) और वलेशिया (Walachia) भू-क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया।

 

 

इधर, ब्रिटेन और फ्रांस यूरोप के इन भू-क्षेत्रो पर रूस की बढ़ती शक्ति को देखकर सशंकित हो उठे। रूस यूरोपीय शक्ति न बन जाये, इसलिए ब्रिटेन और फ्रांस ने तुर्की का साथ देने का संकल्प किया। अब एक ओर रूस तथा दूसरी ओर ब्रिटेन, फ्रांस, तुर्की तथा सारडिनिया, चार ‘मित्र राष्ट्र’ (Allied Countries) थे।

 

 

दरअसल दोनो पक्ष किसी भी तरह युद्ध चाहते थे ताकि साम्राज्य विस्तार, यश एवं धन सम्पत्ति पाने की उनकी महत्त्वाकांक्षाएं पूरी हो सकें। ईसाइयों के बीच आपसी मतभेद उनके लिए एक बहाना था, जिसकी आड मे वे अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते थे। रूस तुर्की साम्राज्य का विघटन चाहता था। 1844 मे रूसी सम्राट जार निकोलस ने ब्रिटेन को तुर्की साम्राज्य के विभाजन के लिए कहा था। 1853 में पुन इस इच्छा को दोहराते हुए रूस ने ब्रिटेन को आश्वासन दिया कि काला सागर मे उसे जो अधिकार प्राप्त होगे, बदले मे वह उसे मिस्र व तुर्की मे अधिकार देने को तैयार है।

 

 

किन्तु ब्रिटेन तुर्की का विघटन नही चाहता था। इसलिए वह आवश्यकता पड़ने पर तुर्की की सहायता करता था। एक अन्य कारण भी था तत्कालीन ब्रिटिश राजदूत रूसी सम्राट का विरोधी था। 1832 मे जार ने रूस मे उस राजदूत का विरोध किया था। अत ब्रिटेन उस अपमान से भी हलका होना चाहता था। फ्रांस के शासक नेपोलियन तृतीय (Nepolian lll) की महत्त्वाकांक्षा
नेपोलियन महान (Great Nepolian) बनने की थी, इसलिए वह प्रत्येक अंतर्राष्ट्रीय झगड़े के समय किसी न किसी तरह यश, धन, भू-सम्पत्ति पाने की तथा फ्रांस के लाभ की बात सोचा करता था। उसका शासन रोमन कैथोलिकों एव सैनिको के समर्थन पर आधारित था। अत उसके लिए इन दोनो को संतुष्ट करना भी जरूरी था।

 

 

क्रीमिया का युद्ध
क्रीमिया का युद्ध

 

क्रीमिया का युद्ध प्रारम्भ

 

5 अक्तूबर, 1853 को तुर्की ने रूस से वलेशिया तथा मोल्दाविया को खाली करने की मांग की किन्तु रूस ने इस मांग को अस्वीकार कर दिया। फलत: तुर्की ने रूस के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। मार्च, 1854 मे ब्रिटेन, फ्रांस और सारडिनिया भी आ मिले और उन्होने रूस के खिलाफ काला सागर मे अपने जहाजी बेडे भेज दिये। रूस ने तुरन्त वलेशिया एवं मोल्दाविया को खाली कर दिया। इस प्रकार युद्ध का कारण समाप्त हो गया किन्तु मित्र राष्ट्र ने युद्ध को बंद नही किया बल्कि 17 अक्तूबर, 1854 को रूस के प्रसिद्ध दुर्ग सेवास्तोपोल (Sevastopol) का घेरा बांधकर भारी बमबारी शुरू कर दी। दरअसल उनका उद्देश्य रूस की शक्ति को पूरी तरह कुचल देना था।

 

 

क्रीमिया का युद्ध दो वर्ष तक जारी रहा। इस दौरान दोनो पक्षो को अत्यन्त हानि उठानी पडी। पांच लाख से अधिक व्यक्तियों की मृत्यु हुई तथा अरबो रुपयों की हानि हुई। जन-धन की यह अपार क्षति 25 अक्तूबर को बालाकलवा (Balaklava) तथा 5 नवम्बर की इंकरमैन (Inkermen) की दो प्रमुख लड़ाइयों में हुई। इस दशा में युद्ध को जारी रखना उपयोगी नही था। रूस भी युद्ध से तंग आ चुका था। उसे खतरा था कि कही ऑस्ट्रिया भी शत्रुओं के साथ सम्मिलित न हो जाये, क्योंकि वह भी बाल्कन प्रायद्वीप मे अपनी शक्ति का विस्तार करना चाहता था। रूस उसके लिए सबसे बड़ी रुकावट था। अन्ततः सितम्बर, 1855 को सेवास्तोपोल की घेराबंदी टूटी और ‘मित्र राष्ट्रो’ की विजय हुई। अंतिम रूप से युद्ध फरवरी, 1856 में खत्म हुआ और मार्च मे दोनों पक्षो के बीच पेरिस में सन्धि हुई।

 

 

क्रीमिया युद्ध का परिणाम

 

क्रीमिया की सन्धि के अनुसार रूस ने तुर्की साम्राज्य की स्वतन्त्रता स्वीकार कर ली। उसने तुर्की के आंतरिक मामलो मे किसी भी तरह का हस्तक्षेप न करने की बात भी मान ली। यद्यपि लगातार दुर्बल होते तुर्की साम्राज्य की दशा मे इस सन्धि से कोई सुधार नहीं आया। काला सागर को शांति क्षेत्र (Zone Of Peace) माना गया और ऐसी व्यवस्था की गयी ताकि कोई भी देश अपने जंगी जहाज़ों का बेड़ा वहां नही रख सके और न ही उसके तट पर युद्ध के लिए सामान जमा कर सके।

 

रूस मानता आया था कि रूमानिया और सर्बिया को सुरक्षा प्रदान करने का अधिकार उसे है किन्तु उसके इस अधिकार को समाप्त कर सभी यूरोपीय देशों ने इन दोनो देशों के स्वतन्त्र अस्तित्व को मान्यता दे दी। इस युद्ध से रूस की प्रतिष्ठा को बहुत धक्का लगा और ब्रिटेन की नीति पूर्णत सफल हुई। तुर्की साम्राज्य को कायम रखकर रूस की महत्त्वाकांक्षा पर अंकुश रखा जा सकता है, ब्रिटेन के इस विचार को पूर्ण रूप से सफलता मिली।

 

 

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