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केरल की वेषभूषा

केरल की वेषभूषा – केरल का पहनावा

प्रत्येक प्रदेश की भोगोलिक स्थिति और आबोहवा का प्रभाव उस प्रदेश के अधिवाधियों के रहन-सहन, वेशभूषा, खानपान तथा सामान्य सभ्यता पर अनिवार्य रूप से पड़ता है।केरल की पहाड़ी भूमि समुद्र के किनारे उष्ण मेखला में स्थित है। यहां हर साल अक्सर छः महीने बराबर पानी बरसता रहता है। इस प्रदेश में कभी पानी का अभाव या कमी नहीं होती। इसलिए यहां की उपजाऊ भूमि सदेव पेड़-पौधों से हरी-भरी रहती है। हर कहीं हरियाली दिखती है मानों प्रकृति-रमणी स्वयं हरे रंग की रेशमी किनारेदार सुन्दर साड़ी में आवेष्टित होकर सब को अपनी ओर आकर्षित कर रही हो। इस वेभव पूर्ण प्रकृति की सुखद गोद में विहार करने वाले केरल के लोगों पर बदलती हुई ऋतुओं का विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। वे कभी कड़ी शीत या गर्मी के शिकार नहीं होते । इसलिए वे अपने को प्रकृति-माता के हरे आंचल में क्रीड़ा करने वाले अबोध बालकों की भाँति अद्ध-नग्न रखने में कोई आपत्ति नहीं मानते हैं। इतना ही नहीं, केरल के स्वच्छ जल में सायं-प्रातः स्नान करके स्वयं सुन्दर और साफ़ रहना वे आवश्यक और अनिवार्य समझते हैं। इसी कारण केरल के लोग अन्य प्रदेशों के लोगों की अपेक्षा स्तान-प्रिय, स्वच्छ एवं साफ़- सुथरे रहते हैं और अपने शरीर ढाँकने के लिए अधिक कपड़ों का उपयोग नहीं करते हैं। केरल के अधिवासी अपने साफ़-सुथरे, बे-सिले, सादे सफ़ेद वस्त्रों के लिए भारत भर में बहुत ही मशहूर हैं। केरल का पहनावा अन्य प्रदेशों से अलग है। केरल की वेषभूषा के बारे में नीचे विस्तार से जानेंगे।

केरल की वेषभूषा – केरल का पहनावा

मुण्टु और तोर्त्तु

साधारणतः केरल के पुरुष लोग ‘मुण्टु” (धोती) और तोर्त्तु’ (अंगोछा) मात्र पहनते हैं। “मुंण्टु’ चार साढ़े चार हाथ लम्बी और तीन हाथ चौड़ी होती है जिसे लोग नाभि के करीब लपेट कर पहनते हैं। उसका छोर लेकर लाँग नहीं लगाते हैं। “तोर्त्तु” अंगोछा या तो अपने कंधे पर डालते हैं या ओढ़ लेते हैं। गरीब लोग “मुंण्टु ‘ के बदले अंगोछा या तोर्त्तु मात्र पहनते भी हैं। ‘मुण्टु. और “तोर्त्तु’ प्रायः किनारे दार शुभ वस्त्र ही होते हैं। रंगीन कपड़े केरलीय स्वच्छता के लिए अनुकूल और उपयुक्त नहीं माने जाते हैं। साधारणतः अंगोछा तीन साढ़े तीन हाथ से लेकर पांच हाथ तक लंबा और ढाई या तीन हाथ चौड़ा होता है।

लोग मुण्टु और तोर्त्तु के अलावा कुर्त्ता पहनना भी आवश्यक मानने लगे हैं तो भी देहातियों तथा बूढ़े-बुजुर्गों में कुर्ते का अधिक प्रचार नहीं हुआ है। अंग्रेजों की नकल करने वाले यहां के कई पढ़े-लिखे लोग उनकी पोशाक का भी विशेष आदर करने में गर्व का अनुभव अवश्य करते हैं। लेकिन उनकी पोशाक का प्रचार प्रदेश में नहीं के बराबर है। स्वतंत्रता संग्राम, स्वदेशी आन्दोलन तथा स्व॒राज्य-लाभ से केरल के लोगों की वेषभूषा में भी भारतीयता का प्रभाव जरूर पड़ा है ओर कुछ लोग उत्तर भारत के लोगों की तरह ढीला कुर्ता, पाजामा, लंबी धोती, शाल-दुशाला आदि पहनने लगे हैं। लेकिन टोपी या पगड़ी शायद ही कोई पहनता है। जूते या चप्पल ज़्यादा लोग नहीं पहनते। कई लोग खड़ाऊं पहने बाग- बगीचों या खेतों में टहल कर खेती-बारी की निगरानी करते हैं। आजकल जूते-चप्पलों के इस्तेमाल करने की प्रथा भी शुरू हुई है।

केरल की स्त्रियाँ अकसर दो वस्त्र कमर से लपेट कर पहनती हैं। पहले एक-छ: हाथ लंबा और ढाई या तीन हाथ चौड़ा कपड़ा कमर से लपेट कर उसके एक छोर को कसकर लाँग लगाती हैं। फिर उसके ऊपर से एक दूसरी किनारीदार धोती जो पुरुषों की मुण्टु के बराबर चार या साढ़े चार हाथ लंबी और तीन हाथ चौड़ी होती है, पहन लेती हैं। पुराने ज़माने में पुरुष की तरह स्त्रियां भी नाभि के ऊपर के शरीर को खुला रखती थीं या एक अंगोछे मात्र से ढका करती थीं। लेकिन इस रीति को अधुनिक यूग की स्त्रियां बिलकुल असभ्य समझकर छोड़ चुकी हैं। आज प्रायः सभी स्त्रियां कुर्ते-चोलियांपहनकर ऊपर से अंगोछा भी ओढ़ लेती है। इसके अलावा अब स्त्रियों में मुण्टु और अंगोछे के स्थान पर साड़ी पहनने की प्रथा भी खूब प्रचलित हो गयी हैं। पहले यहां की स्त्रियां केवल सफ़ेद रंग के धुले कपड़े मात्र पहना करती थीं, लेकिन अब रंगीन साड़ियों का आकर्षण भी अधिक हो गया है। साड़ियों के प्रचार से केरल की स्त्रियों के समाज में भी रंगों की बहार आ गयी है। यहां की स्त्रियां अपने केरल के पहनावे में भी राष्ट्रीयता और भारतीयता का एक सामान्य रूप लाने की अपनी साधना में अग्रसर हो रही हैं। लेकिन यह सच है कि कुछ पुराने विचार की बुढ़ी स्त्रियां पहले ही तरह आज भी दो कपड़े मात्र पहनती हैं और अपनी छाती कभी ढांकती नहीं हैं। ईसाई और मुसलमान स्त्री- पुरुषों के पहनावे में कुछ विचित्रताएं ओर केरलीयता भी दिख पड़ती है।

केरल की वेषभूषा
केरल की वेषभूषा

चोटी बढ़ाने की प्रथा

केरल राज्य में स्त्रियों की भांति पुरुष भी पहले केश बढ़ाया करते थे। वे अपने सिर के बाल या चोटी काटना अधर्म मानते थे। वे अपनी चोटी सामने की ओर बढ़ाकर एक विचित्र प्रकार से बांधा करते थे जो देखने में सांप के फन की तरह लगती थी। कई विद्वानों का कहना हैं कि इस तरह चोटी बांधने की रीति यहां के लोगों की “नाग-पूृजा’ की प्रथा की वजह से प्रचलित हुई हैं। लेकिन आजकल बहुत कम लोग ऐसी चोटी रखते हैं। पुरुषों की चोटी का वह पुराना रूप, इस समय के कुछ बुढ़े लकीर के फकीर लोगों में ही हम पा सकते हैं।

केरल की रित्रियों में केश बढ़ाकर बांधने, संवारने और गूंथने की कई कलापूर्ण रीतियां प्रचलित हैं। यह केरल की वेषभूषा का अभिन्न अंग है। केरल की स्त्रियांरोज़ तेल मलकर तथा नहा-धोकर अपने सिर के बालों को साफ रखती हैं जिससे उनके केश खूब लंबे व घने होते हैं ओर भारत के अन्य प्रान्तों की स्त्रियों के लिए बहुधा ईर्ष्षा का कारण बन जाते हैं। पुराने ज़माने में यहां स्त्रियां अपने लंबे बालों को संवारकर सिर के ऊपर एक तरफ हटाकर इस तरह बांधती थीं कि वह जूड़ा एक छोटे पंखे के से आकार का लगता था। आज भी कुम्हार जैसी निम्न जाति की स्त्रियां सिर के उपर ही की तरफ अपना जुड़ा बांधती हैं। लेकिन अधिकांश रमणियां अब पीछे की तरफ़ ही अपना जड़ा बांधती हैं ओर सुन्दर सुगन्धित फूलों से उसे सजाती हैं।

केरल की वेषभूषा में गहने आभूषण

प्राचीन काल में केरल के स्त्री-पुरुष विविध प्रकार के सोने-चांदी के गहने पहना करते थे। पुरुषों के मुख्य गहने कटुक्कन, माला, कंकण और मोतिरम थे। कानों में पहनने के सोने के आभूषण को कटुक्कन कहते हैं जो आकार में प्रायः बहुत छोटे होते हैं। वे कई प्रकार के होते हैं। दो-दो अंगूठियों की तरह लगने वाले कटुक्कन अत्यन्त पुराने समय के माने जाते हैं जिन्हें आज भी सोमयातिरी नामक कुछ यज्ञकर्ता नम्पूतिरी ब्राहमण अपने धार्मिक गौरव के निशान के रूप में पहनते हैं। कटुक्कनों में हीरा, पुष्पराग, मरकत आदि बहुमूल्य रत्न भी जड़े रहते हैं। कुंडल प्राचीन काल का राजकीय कर्णाभूषण माना जाता है। आज यद्यपि बहुत कम लोग कटुक्कन पहनते हैं तो भी उसकी पूरी उपेक्षा यहां के पुरुषों ने नहीं की है। कई बुढ़े और जवान पुरुष इस समय भी कटुक्कन पहनते हैं।

गले में पुरुष भी पहले सोने की “माला ” पहना करते थे। लेकिन इस समय उसका प्रचार नहीं के बराबर है। पुलिनख (व्याघ्र नख) माला नामक एक मशहूर गहना है जो छोटे बालकों के गले में पहनाया जाता है। कंकण हाथों में पहनने के कडे होते हैं। यहां के राजा लोग पहले कंकण और बालिबन्ध (कुहनी के ऊपर बाहु में पहनने का भूषण) पहना करते थे। लेकिन अब पुरुषों में शायद ही कोई कंकण पहनता है। आज तो रिस्ट वाच याने कलाई की घड़ी का युग हैं। अंगुठी को “मोतिरम्‌ ” कहते हैं। “मोतिरम्‌ ” पहनने का रिवाज इस समय भी जारी है। शादी के वक्‍त वर और वधू दोनों एक-दूसरे को मोतिरम्‌ पहनाना निहायत’ ज़रूरी समझते हैं। यहां के कई पुरुष अपने दोनों हाथों की अनामिका ओर कनिष्ठिका उंगलियों में अंगूठियां पहना करते हैं।

यहां की स्त्रियाँ कई प्रकार के गहनों से अपने शरीर को सजाया करती हैं। पुराने ज़माने की स्त्रियों के कर्णभूषण का नाम “तोटा ” या “ तक्का “ है जो बहुत बड़े होते हैं। इसलिए उनको पहनने के लिए स्त्रियां बचपन से ही अपने कानों के निचले छोर को छेदकर सुराख बना लेती थीं और कठिन पीड़ा झेलकर उसे काफ़ी बढ़ाया करती थीं जिससे उनके विचित्र तरोने (तरकियां) कंधों तक लटक जाते थे। यहां की मुस्लिम और ईसाई स्त्रियां कानों के ऊपरी हिस्से पर भी छेद बनाकर कड़े के आकार वाले विचित्र एवं बड़े गहने पहनती हैं जो बराबर झूमते रहते हैं। लेकिन आज “तक्का या “तोटा” आदि पुराने गहनों की तरफ़ स्त्रियों का मोह कम हो गया है। वे नये फैशन के अनुसार “ कम्मल, “ बाली ”, “स्टड्ड ” आदि
जड़ाऊ गहने पहनने लगी हैं।

गले मे पहनने के लिए ” पतक्कम “, “ताली” आदि कई प्रकार के केरलीय गहने मिलते हैं। “पतक्कम ” एक तरह का रत्न-जड़ित कण्ठ-भूषण है। “नागफण-ताली ”, “पू-ताली ” आदि “ताली-माला” के विविध प्रकार हैं। “मोतिरम्‌” (अंगूठी) प्रायः सभी स्त्रियां अपनी उंगलियों में पहनती हैं।पाँव के गहनों में “तण्टा ”, “ चिलम्पु ” (नुपुर), पादस्व ” आदि सोने या चांदी के आभूषण विशेष मुख्य हैं। आजकल की युवतियां आधुनिक सिनेमा-तारों की वेश-भूषा की नकलें भी प्रायः किया करती हैं ओर कई नये ढंग के गहने बनवा लेती हैं जिनका परिचय देना यहां आवश्यक नहीं प्रतीत होता है।

नम्पूतिरी स्त्रियों को छोड़कर केरल की किसी भी जाति की
स्त्रियों में कभी पर्दे का रिवाज नहीं था। वे स्वतन्त्रता पूर्वक पुरुषों से मिल-जुलकर रह सकती हैं। लेकिन नम्पूतिरी स्त्रियां जब बाहर निकलती थीं तब कंधे के ऊपर तक अपने सारे शरीर को एक लंबी सफ़ेद चादर से लपेट लेती थीं और ताड़ के पत्ते का बना देशी छाता सिर के ऊपर तानकर उसी में अपने तन को छिपा लेती थीं। छाता पर्दे का-सा काम देता था। अभी कुछ साल पहले तक छाते के बिना नम्पूतिरी स्त्रियों का बाहर निकलना बिलकुल अनुचित समझा जाता था। इसलिए जब दो-तीन नम्पूतिरी रमणियां सड़क पर एक साथ चलती थीं, तब चलता फिरता एक छप्पर जैसा दृश्य नज़र आता था। नम्पूतिरी स्त्रियों के प्राचीन काल के आभूषण भी अन्य, स्त्रियों से बिलकुल भिन्‍न थे। अमीर से अमीर नम्पूतिरी वधुएँ भी हाथों में पीतल या काँसे के आठ-दस कड़े पहनती थीं जिससे उनकी कलाइयों में उन कड़ों के जंग या मेल के कारण हरे रंग की’ अमिट लकीरें अंकित रहती थीं। कोई भी सुहागिन औरत इन चूड़ियों को छोड़ नहीं सकती थी । गले में सूत की डोरी में प्रोयी हुई “ताली माला” पहनना भी उनके लिए अनिवार्य था जो उनका सौभाग्य-चिहन माना जाता था। अब समाज-सुधारकों ने इन प्रथाओं को करीब बन्द कर डाला है। कहा जाता है कि नम्पूतिरी स्त्रियों से “ पातिव्रत्य ” के कठोर नियम का पालन कराने के लिए ये प्रथाएं चलायी गयी थीं। इसलिए अब भी उनमें से कुछ कुलीन स्त्रियों को छाते के अन्दर “पर्दे की बीबी ” (अंतर्ज॑नम) बनी रहना अनिवार्य माना जाता है। लेकिन अब वास्तव में जागृत नारियों की तरफ़ से इन पुरानी प्रथाओं की उपेक्षा ज्यादा जोरों से हो रही है।

छतरी की प्रधानता

केरल के निवासियों की वेशभूषा का परिचय देते समय एक साधारण सी बात का भी उल्लेख करना जरूरी प्रतीत होता है। यहां के प्रायः सभी लोग चाहे स्त्रियां हों या पुरुष, बच्चे हों या बूढ़े, छतरी के बिना चलते-फिरते नहीं नज़र आते। पुराने समय के लोग साधारणतः ताड़ के पत्ते के छाते पहने नज़र आते थे। अब प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में काले रंग के कपड़े की एक छोटी या बड़ी छतरी अक्सर पायी जाती है। इसलिए यहां छतिरियों का इतना अधिक प्रचार देखकर इस प्रदेश को भारत के अन्य प्रान्तों के लोग “छतरियों का प्रदेश ” भी कहा करते हैं। वास्तव में वर्षा की अधिकता और धूप की कड़ाई की वजह से ही केरल में प्रायः सभी लोग, चाहे के स्त्रियां हों या पुरुष अवश्य “ छतरीधारी ” होते हैं।

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Naeem Ahmad

CEO & founder alvi travels agency tour organiser planners and consultant and Indian Hindi blogger

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