कालिंजर का किला या कालिंजर दुर्ग कहा स्थित है?:— यह दुर्ग बांदा जिला उत्तर प्रदेश मुख्यालय से 55 किलोमीटर दूर बांदा-सतना रोड़ पर कालिंजर पहाड़ी पर स्थित है। यह भारत का प्राचीन किला है। इस किले की प्रसिद्धि हर युग मे रही है। सतयुग में यह रत्नकूट, त्रेता युग में महागिरि, द्वापरयुग में पिंगलगिरि, तथा कलयुग में यह क्षेत्र कालिंजर के नाम से प्रसिद्ध हुआ है। प्राचीन काल में यह एक नगर तथा तीर्थ स्थल के रूप में विख्यात था। उस समय यहां अनेक मंदिर और सरोवर थे।

 

 

कालिंजर किले का इतिहास इन हिन्दी – कालिंजर फोर्ट रहस्य – कालिंजर का परिचय

 

कालिंजर दुर्ग का निर्माण कब हुआ था? तथा कालिंजर किले का निर्माण किसने कराया था?:— सुप्रसिद्ध इतिहास लेखक फरिस्था के अनुसार कालिंजर किले का निर्माण सातवीं शताब्दी में केदार बर्मन ने कराया था।

 

 

कालिंजर का युद्ध कब हुआ था? कालिंजर युद्ध का इतिहास:— इस किले की सेनाओं ने कन्नौज नरेश जयपाल की सेनाओं के साथ सन् 978 ई. में गजनी के सुल्तान पर आक्रमण किया था और उसे परास्त किया था। जिसका बदला लेने के लिए महमूद गजनवी की सेना ने सन् 1023 ई. में कालिंजर पर आक्रमण किया था। उस समय यहां का नरेश नन्द था। इसके पश्चात सन्  1182 ई. में दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान ने चन्देल नरेश परमार्दि देव को पराजित किया था। इसके पश्चात सन्  1202 या 1203 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने परमार्दि देव को हराकर इस किले को अपने अधीन कर लिया था।

 

 

मुगल शासक हुमायूं ने भी इस किले को जितने का प्रयत्न किया था। इसके पश्चात शेरशाह सूरी ने सन्  1544 या 1545 में इस किले पर आक्रमण किया और उसे जीत लिया, किंतु तोपखाने में आग लगने के कारण उसकी मृत्यु वहीं हो गई। उसके बाद जलाल खॉ ने इस किले को अपने अधिकार में कर लिया तथा वह सलामशाह के नाम पर यहां दिल्ली की गद्दी पर बैठा। इसके बाद सन् 1569 में अकबर बादशाह के सेना नायक मजनूँ खाँ न इस फोर्ट को अपने अधिकार में कर लिया, और बाद में यह बीरबल की जागीर बन गया। औरंगजेब के शासन काल में यह किला बुन्देलों के अधिकार में आ गया। छत्रसाल की मृत्यु के बाद पन्ना नरेश ह्रदय शाह इस किले के शासक रहे। सन् 1812 में यह किला अंग्रेजों के अधिकार में आ गया। सन् 1866 में 1857 की क्रांति का परिणाम देखते हुए इस दुर्ग का विध्वंस किया गया ताकि यह सामरिक महत्व का न रह जाये।

 

 

कालिंजर का किला
कालिंजर का किला

 

कालिंजर फोर्ट त्रिकूट पहाड़ी पर जमीन से 700 अथवा 800 फीट ऊंचाई पर तथा इस किले का परकोटा 50 फिट ऊंचा है। यह परकोटा कही कही पर नष्ट हो चुका है और कहीं कहीं नष्ट होने की स्थिति में है। इस किले में प्रवेश करने के लिये परकोटे से लगे हुए अनेक दरवाजे है। ये दरवाजे निम्न नामों से प्रसिद्ध है:—

1. आलम अथवा आलमगीर दरवाजा
2. गणेश दरवाजा
3. चण्डी अथवा चौबुर्जी दरवाजा
4. बुधभद्र दरवाजा
5. हनुमान दरवाजा
6. लाल दरवाजा
7. बड़ा दरवाजा

 

 

इस किले में चढ़ने वाले मार्ग को तुर्क और मुगलशासक काफिर घाटी के नाम से पुकारते थे। इस दुर्ग में अनेक सीढियां बनी हुई हैं, इनके माध्यम से इस किले में चढ़ा जा सकता है। चण्डी दरवाजा के पास एक अन्य दरवाजा भी है, जो किले के ऊपर जाता है। इस द्वार के समीप पीछे की तरफ दुर्ग रक्षक का निवास स्थल है। चौथा दरवाजा जिसे बुधभद्र के नाम से पुकारा जाता है। उस दरवाजे का निर्माण तदयुगीन युद्धों को ध्यान में रखकर किया गया था। पांचवां द्वार हनुमान द्वार के नाम से प्रसिद्ध है। यहां पर हनुमान कुंड नाम का जलाशय है। ये सदैव जल से परिपूर्ण रहता है। तथा इसके बाद जो द्वार आता है, वहां एक तोप रखने का भी स्थान है। तथा एक चट्टान के सामने एक हनुमान जी की प्रतिमा भी है।

 

 

इसके बाद छठा द्वार आता है जिसे लाल दरवाजा के नाम से जाना जाता है। थोड़ी दूर चलने पर दो दरवाजों के बीच में एक दरवाजा और दिखाई देता है। जो सिद्ध गुफा की ओर जाता है। लाल दरवाजे के बाद सातवां द्वार पड़ता है। जिसमें संवत् 1691- 92 का एक अभिलेख उपलब्ध होता है। यही पर भगवान शिव और पार्वती की प्रतिमा भी है। इस दरवाजे के समीप पत्थरों पर दो तोपें भी रखी हुई है। ये तोपें बहुत वजनी है। और लोहे की बनी है। इसी के समीप छत्रसाल के पुत्र ह्रदय शाह का एक अभिलेख उपलब्ध हुआ है।

 

 

दुर्ग के ऊपर अनेक धार्मिक स्थल भी उपलब्ध होते है। इन धार्मिक स्थलों मे सेज, सीता कुंड, पाताल गंगा आदि है। पाताल गंगा में 25 फिट नीचे जलकुंड है। इस जल का प्रयोग सैनिक आपातकाल में किया करते थे। पाताल गंगा के समीप एक दुसरा जल कुंड है। जो पांडव कुंड के नाम से प्रसिद्ध है। यहां भगवान शिव की छोटी छोटी 6 प्रतिमाएं है। जब हम किले के उत्तर पूर्व दिशा की ओर चलते है तो हमें अंग्रेजी शासनकाल के स्तंभों के अनेक टुकड़े मिलते है। जिससे यह ज्ञात होता है कि इस किले का विध्वंस ब्रिटिश सैनिकों ने किया था। तथा इसी स्थल में मूर्तियों के भग्नावशेष बिखरे पड़े हुए है। ये समस्त पुरातात्विक महत्व की है। ये मूर्तियां कभी स्तंभों से जुड़ी हुई थी।

 

 

यही से आगे बढ़ने पर मैदान आता है तथा इसके दाहिनी ओर अनेक भवनों के भग्नावशेष दिखाई पड़ते है। इन भग्नावशेषों में कुछ भग्नावशेष मंदिरों की है। इन मंदिरों में कोई मूर्ति नहीं है। तथा इसी के समीप दो सरोवर दिखाई पड़ते है। जिन्हें बुड्ढा-बुढिया ताल के नाम से पुकारा जाता है। ये सरोवर 50 गज लंबे और 25 गज चौड़े है। लोग यहां स्नान करने के उद्देश्य से आते है।

 

 

यहां से थोड़ी दूर पर किले के नीचे की ओर सिद्धि की गुफा नामक स्थान है। यह क्षेत्र पूरा का पूरा त्रिकोणीय स्थिति में पन्ना दरवाजे से जुड़ा हुआ है। यहां पर तीन दरवाजे है जिनमें दो नीचे की ओर जाते है। वर्तमान समय में इन दोनों दरवाजों को बंद कर दिया गया है। इसके दाहिनी ओर अनेक अभिलेख दिखाई पड़ते है। इससे कुछ ही दूर चलने पर पूजा के अनेक स्थान है किंतु इन्हें बंद कर दिया गया है।

 

 

पन्ना दरवाजे के बाद मृगधारा नामक स्थान है। इस स्थल में नीचे की ओर दो कमरे बने हुए है। और उसके ऊपर छत पड़ी है। अंदर वाले कमरे में एक प्राकृतिक जलधारा प्रवाहित होती हैं। तथा यही पर मृगों की सात मूर्तियां भी है। यहां से थोडी दूर आगे चलने पर दो सुखे कुंड है जिनमे पानी नहीं है। तथा इसके पास लोहे की दो तोपें रखी हुई है। कालिंजर नीलकंठ मंदिर के पीछे एक ढाल है। जहां अनेक मूर्तियां है। इन मूर्तियों में वराह भगवान की प्रतिमा है। जो भगवान विष्णु के अवतार है। इसमें से एक प्रतिमा नीलंकठ के मार्ग पर है। तथा यहा एक नंदी की मूर्ति भी है। जिसके ऊपर शिवलिंग है। इस मूर्ति का निर्माण बड़े सुंदर ढंग से किया गया है। इसके समीप कोटि तीर्थ ताल है। इस तीर्थ में स्नान करने का धार्मिक महत्व है। यह ताल 100 गज लम्बा है तथा इसका निर्माण चट्टान काट कर किया गया है।

 

जनश्रुति व कथाएं

 

कालिंजर अति प्राचीन काल से हिन्दुओं की धार्मिक आस्था का केंद्र रहा है। तथा यह दुर्ग विन्ध्याचल पर्वत श्रेणी की एक पहाडी में स्थित है। तथा वैदिक काल में इस किले का महत्व रहा है। कालिंजर फोर्ट से जुड़ी हुई अनेक जनश्रुतियां एवं कथाएं है। एक कथा के अनुसार कालिंजर दुर्ग का निर्माण राजा भरत ने कराया था। जिनके नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा। एक दूसरी कथा के अनुसार यह भगवान शिव का निवास स्थल था। कहते है कि भगवान शिव ने इस स्थल पर गरलपान किया था। इसीलिए इस स्थल का नाम कालिंजर पड़ा। एक अन्य कथा चंदेल नरेशों से जुड़ी हुई है। जिसके अनुसार चंद्र वर्मा ने इस किले का निर्माण कराया। पृथ्वीराज रासो में इस कथा का वर्णन मिलता है। कि यहां के नरेश परमार्दिदेव को पृथ्वीराज ने सन् 1182 में परास्त किया था। उसके बाद यह दुर्ग दिल्ली के शासक कुतुबुद्दीन ऐबक के हाथो में सन् 1803 में चला गया। कालान्तर में यह दुर्ग धीरे धीरे नष्ट होता गया। अब इसके भग्नावशेष ही शेष है। जब कोई यात्री इस दुर्ग को देखने के लिए आता है और वह बड़ी शांतिपूर्वक सातो दरवाजों को पार करके ऊपर पहुंचता है, तो उसे यह मालूम पड़ता है कि दुर्ग के सातो दरवाजों का नाम अति प्राचीन काल में नक्षत्रों के नाम से रखा गया था। बाद में इन दरवाजों के नाम बदल दिये गये और नये नाम रख दिये।

 

 

चंदेल वंश

 

चंदेलों की उत्पत्ति कब हुई इस संबंध में यहां एक कथा प्रचलित है। इस वंश की उत्पत्ति हेमवती नाम की ब्राह्मण कन्या और चन्द्रमा के संयोग से हुई। कहते है कि चंदेल वंश के प्रथम पुरुष का नाम चंद्र वर्मा था। नीलकंठ मंदिर के दरवाजे में एक अभिलेख उपलब्ध हुआ है। जिस अभिलेख में इस वंश की जानकारी मिलती है।

 

 

कालिंजर का युद्ध कब हुआ:– चंदेल नरेश धंगदेव के शासन काल में महमूद गजनवी का आक्रमण यहा 1027 के लगभग हुआ था तथा महमूद गजनवी ने कालिंजर की लड़ाई तीन महीने यहां रहकर लड़ी। तदयुगीन नरेश धंगदेव ने 3600 घुड़सवार, 45000 पैदल सैनिक और 600 हाथियों के साथ मुकाबला किया था। इस युद्ध में धंगदेव हार गया तथा उसने महमूद गजनवी से संधि कर ली। महमूद गजनवी यहां से काफी धन सम्पत्ति लूट ले गया तथा उसने यहां के धार्मिक स्थलों को भी नष्ट किया।

 

मूर्ति वास्तुकला

 

इस किले के ऊपर हिन्दू और मुसलमानों के कई स्थानों पर प्राचीन स्मृति चिन्ह मिलते है। अनेक मृत्यु स्मारक दूर दूर तक फैले है। वास्तु शिल्प कला की दृष्टि से यहा दुर्लभ मूर्तियां है। तथा कुछ महलो के अवशेष भी मिलते है। कोटि तीर्थ ताल के निकट राजा अनान सिंह का महल है। इसे बुंदेली वास्तुशिल्प का उत्कृष्ट नमूना माना जा सकता है। इस महल के बाहरी भाग में नृत्य करते हुए मयूरों के चित्र बने है। तथा अनेक प्रकार की पत्थरों की प्रतिमाएं भी यहां है। इन मूर्तियों में नृत्य, गणेश, नंदी तथा अन्य महिलाओं की मूर्तियां, देवी देवताओं की मूर्तियां, यक्ष यक्षिणियों की मूर्तियां, पशु पक्षियों की मूर्तियां शामिल है। जो यह सिद्ध करती हैं कि मूर्ति कला शिल्प की दृष्टि से यह किला महत्वपूर्ण है।

 

 

दुर्ग में ही नीचे उतरने पर काल भैरव की एक प्रतिमा है। इस प्रतिमा की 18 भुजाएँ है। तथा यह प्रतिमा गले में नरमुंड माला पहने है। तथा बगल में काली देवी की एक प्रतिमा है। यही पर एक सती स्तंभ भी है। कहा जाता है कि किसी राजपूत महिला ने अपने सम्मान की रक्षा के लिए यहा जौहर किया था। कहते है कि शेरशाह आक्रमण के पूर्व यहां कीर्ति सिंह चंदेल का राज्य था। उसकी पुत्री का नाम दुर्गावती था। जिसने गौड़ नरेश दलपतिशाह से विवाह किया था। तथा जिसका युद्ध अकबर बादशाह से गौड़वाने में हुआ था। वह बहादुरी में झांसी की रानी से किसी भी स्थिति में कम नहीं थी।

 

 

औरंगजेब के शासनकाल के समय बुंदेलखंड के छत्रसाल ने इस दुर्ग को जीत लिया था। छत्रसाल की मृत्यु सन् 1732 के लगभग हुई तथा छत्रसाल ने अपने राज्य का एक चौथाई भाग मराठों को दे दिया था किंतु कालींजर परिक्षेत्र बुंदेलों के अधिकार में सन् 1812 तक बराबर बना रहा। आज भी कालिंजर का महत्व पवित्र गंगा नदी के समान है। इस क्षेत्र में अनेक ऋषि मुनियों ने सिद्धि प्राप्त करने के लिए तपस्या की। यह दुर्ग अपनी गौरव गाथा स्वतः कर रहा है।

 

 

हमारे यह लेख भी जरूर पढ़े:—–

 

 

भारत की राजधानी दिल्ली के निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन तथा हजरत निजामुद्दीन दरगाह के करीब मथुरा रोड़ के निकट हुमायूँ का मकबरा स्थित है। यह Read more
कुतुबमीनार के सुंदर दृश्य
पिछली पोस्ट में हमने हुमायूँ के मकबरे की सैर की थी। आज हम एशिया की सबसे ऊंची मीनार की सैर करेंगे। जो Read more
भारत की राजधानी के नेहरू प्लेस के पास स्थित एक बहाई उपासना स्थल है। यह उपासना स्थल हिन्दू मुस्लिम सिख Read more
पिछली पोस्ट में हमने दिल्ली के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कमल मंदिर के बारे में जाना और उसकी सैर की थी। इस पोस्ट Read more
प्रिय पाठकों पिछली पोस्ट में हमने दिल्ली के प्रसिद्ध स्थल स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर के बारे में जाना और उसकी सैर Read more
Hawamahal Jaipur
प्रिय पाठकों पिछली पोस्ट में हमने हेदराबाद के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल व स्मारक के बारे में विस्तार से जाना और Read more
प्रिय पाठकों पिछली पोस्ट में हमने जयपुर के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल हवा महल की सैर की थी और उसके बारे Read more
Hanger manger Jaipur
प्रिय पाठको जैसा कि आप सभी जानते है। कि हम भारत के राजस्थान राज्य के प्रसिद् शहर व गुलाबी नगरी Read more
पिछली पोस्टो मे हमने अपने जयपुर टूर के अंतर्गत जल महल की सैर की थी। और उसके बारे में विस्तार Read more
प्रिय पाठको अपनी पिछली अनेक पोस्टो में हमने महाराष्ट्र राज्य के अनेक पर्यटन स्थलो की जानकारी अपने पाठको को दी। Read more
ताजमहल का इतिहास
प्रिय पाठको अपनी इस पोस्ट में हम भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के एक ऐसे शहर की यात्रा करेगें जिसको Read more
शेखचिल्ली यह नाम सुनते ही आपके दिमाग में एक हास्य कलाकार की तस्वीर और उसके गुदगुदाते चुटकुलो की कल्पना करके Read more
प्रिय पाठको अपने इस लेख में आज हम आपको एक ऐसी रोचक जानकारी देने जा जिसके बारे में बहुत कम Read more
India gate history in hindi
इंडिया गेट भारत की राजधानी शहर, नई दिल्ली के केंद्र में स्थित है।( india gate history in Hindi )  राष्ट्रपति Read more
कोणार्क सूर्य मंदिर के सुंदर दृश्य
कोणार्क' दो शब्द 'कोना' और 'अर्का' का संयोजन है। 'कोना' का अर्थ है 'कॉर्नर' और 'अर्का' का मतलब 'सूर्य' है, Read more
राजगढ़ का किला के सुंदर दृश्य
पुणे से 54 किमी की दूरी पर राजगढ़ का किला महाराष्ट्र के पुणे जिले में स्थित एक प्राचीन पहाड़ी किला Read more
ओरछा दर्शनीय स्थल के सुंदर दृश्य
शक्तिशाली बुंदेला राजपूत राजाओं की राजधानी ओरछा शहर के हर हिस्से में लगभग इतिहास का जादू फैला हुआ है। ओरछा Read more
कुम्भलगढ़ का इतिहास
राजा राणा कुम्भा के शासन के तहत, मेवाड का राज्य रणथंभौर से ग्वालियर तक फैला था। इस विशाल साम्राज्य में Read more
बीजापुर पर्यटन स्थलों के सुंदर दृश्य
बीजापुर कर्नाटक राज्य का एक प्रमुख शहर है। बीजापुर अपने मध्ययुगीन स्मारकों के लिए जाना जाता है, जो इस्लामी वास्तुकला Read more
गुलबर्गा पर्यटन स्थलों के सुंदर दृश्य
गुलबर्गा कर्नाटक का एक प्रमुख शहर है. यह गुलबर्गा जिले का प्रशासनिक मुख्यालय और उत्तर कर्नाटक क्षेत्र का एक प्रमुख Read more
हम्पी की ऐतिहासिक धरोहरों के सुंदर दृश्य
हुबली से 160 किमी, बैंगलोर से 340 किमी और हैदराबाद से 377 किमी दूर, हम्पी उत्तरी कर्नाटक के तुंगभद्र नदी Read more
बादामी के पर्यटन स्थलों के सुंदर दृश्य
बागलकोट से 36 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बादामी, जिसे वाटापी भी कहा जाता है, कर्नाटक के बागलकोट जिले में Read more
एहोल के दर्शनीय स्थलों के सुंदर दृश्य
बागलकोट से 33 किमी, बादामी से 34 किमी और पट्टाडकल से 13.5 किलोमीटर दूर, एहोल, मलप्रभा नदी के तट पर Read more
पट्टदकल स्मारक परिसरों के सुंदर दृश्य
बागलकोट से 45 किलोमीटर, बादामी से 21 किमी और एहोल से 13.5 किलोमीटर दूर, पट्टदकल, मालप्रभा नदी के तट पर Read more
बीदर के दर्शनीय स्थलों के सुंदर दृश्य
हैदराबाद से 140 किमी दूर, बीदर कर्नाटक के उत्तर-पूर्वी हिस्से में स्थित एक शहर और जिला मुख्यालय है। बिदर हेदराबाद Read more
बेलूर दर्शनीय स्थलों के सुंदर दृश्य
चिकमंगलूर से 25 किमी की दूरी पर, और हसन से 40 किमी की दूरी पर, बेलूर कर्नाटक राज्य के हसन Read more
फतेहपुर सीकरी के सुंदर दृश्य
विश्व धरोहर स्थलों में से एक, फतेहपुर सीकरी भारत में सबसे अधिक देखे जाने वाले स्थानों में से एक है। Read more
नालंदा विश्वविद्यालय के सुंदर फोटो
बिहार राज्य की राजधानी पटना से 88 किमी तथा बिहार के प्रमुख तीर्थ स्थान राजगीर से 13 किमी की दूरी Read more
देवगढ़ के सुंदर दृश्य
देवगढ़ उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में बेतवा नदी के किनारे स्थित है। यह ललितपुर से दक्षिण पश्चिम में 31 किलोमीटर Read more
भठिंडा का किला या किला मुबारक
पंजाब में भठिंडा आज एक संपन्न आधुनिक शहर है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस शहर का एक खूबसूरत इतिहास Read more
शाहपुर कंडी किला
शाहपुर कंडी किला शानदार ढंग से पठानकोट की परंपरा, विरासत और इतिहास को प्रदर्शित करता है। विशाल किले को बेहतरीन कारीगरी Read more
अजयगढ़ का किला
अजयगढ़ का किला महोबा के दक्षिण पूर्व में कालिंजर के दक्षिण पश्चिम में और खुजराहों के उत्तर पूर्व में मध्यप्रदेश Read more
रसिन का किला
रसिन का किला उत्तर प्रदेश के बांदा जिले मे अतर्रा तहसील के रसिन गांव में स्थित है। यह जिला मुख्यालय बांदा Read more
मड़फा दुर्ग
मड़फा दुर्ग भी एक चन्देल कालीन किला है यह दुर्ग चित्रकूट के समीप चित्रकूट से 30 किलोमीटर की दूरी पर Read more
खत्री पहाड़ का दुर्ग व मंदिर
उत्तर प्रदेश राज्य के बांदा जिले में शेरपुर सेवड़ा नामक एक गांव है। यह गांव खत्री पहाड़ के नाम से विख्यात Read more
रनगढ़ दुर्ग या जल दुर्ग
रनगढ़ दुर्ग ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रतीत होता है। यद्यपि किसी भी ऐतिहासिक ग्रन्थ में इस दुर्ग Read more
भूरागढ़ का किला
भूरागढ़ का किला बांदा शहर के केन नदी के तट पर स्थित है। पहले यह किला महत्वपूर्ण प्रशासनिक स्थल था। वर्तमान Read more
कल्याणगढ़ का किला मंदिर व बावली
कल्याणगढ़ का किला, बुंदेलखंड में अनगिनत ऐसे ऐतिहासिक स्थल है। जिन्हें सहेजकर उन्हें पर्यटन की मुख्य धारा से जोडा जा Read more
महोबा का किला
महोबा का किला महोबा जनपद में एक सुप्रसिद्ध दुर्ग है। यह दुर्ग चन्देल कालीन है इस दुर्ग में कई अभिलेख भी Read more
सिरसागढ़ का किला
सिरसागढ़ का किला कहाँ है? सिरसागढ़ का किला महोबा राठ मार्ग पर उरई के पास स्थित है। तथा किसी युग में Read more
जैतपुर का किला या बेलाताल का किला
जैतपुर का किला उत्तर प्रदेश के महोबा हरपालपुर मार्ग पर कुलपहाड से 11 किलोमीटर दूर तथा महोबा से 32 किलोमीटर दूर Read more
मंगलगढ़ का किला
मंगलगढ़ का किला चरखारी के एक पहाड़ी पर बना हुआ है। तथा इसके के आसपास अनेक ऐतिहासिक इमारते है। यह हमीरपुर Read more
मनियागढ़ का किला
मनियागढ़ का किला मध्यप्रदेश के छतरपुर जनपद मे स्थित है। सामरिक दृष्टि से इस दुर्ग का विशेष महत्व है। सुप्रसिद्ध ग्रन्थ Read more
बरूआ सागर का किला
बरूआ सागर झाँसी जनपद का एक छोटा से कस्बा है। यह मानिकपुर झांसी मार्ग पर है। तथा दक्षिण पूर्व दिशा पर Read more
गढ़कुंडार का किला
गढ़कुण्डार का किला मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ जिले में गढ़कुंडार नामक एक छोटे से गांव मे स्थित है। गढ़कुंडार का किला बीच Read more
चिरगाँव का किला
चिरगाँव झाँसी जनपद का एक छोटा से कस्बा है। यह झाँसी से 48 मील दूर तथा मोड से 44 मील Read more
एरच का किला
उत्तर प्रदेश के झांसी जनपद में एरच एक छोटा सा कस्बा है। जो बेतवा नदी के तट पर बसा है, या Read more
उरई का किला और माहिल तालाब
उत्तर प्रदेश के जालौन जनपद मे स्थित उरई नगर अति प्राचीन, धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व का स्थल है। यह झाँसी कानपुर Read more
कालपी का किला
कालपी का किला ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अति प्राचीन स्थल है। यह झाँसी कानपुर मार्ग पर स्थित है उरई Read more
दतिया महल या दतिया का किला
दतिया जनपद मध्य प्रदेश का एक सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक जिला है इसकी सीमाए उत्तर प्रदेश के झांसी जनपद से मिलती है। यहां Read more
बड़ौनी का किला
बड़ौनी का किला,यह स्थान छोटी बड़ौनी के नाम जाना जाता है जो दतिया से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर है। Read more
ग्वालियर का किला
ग्वालियर का किला उत्तर प्रदेश के ग्वालियर में स्थित है। इस किले का अस्तित्व गुप्त साम्राज्य में भी था। दुर्ग Read more
चंदेरी का किला
भारत के मध्य प्रदेश राज्य के अशोकनगर जिले के चंदेरी में स्थित चंदेरी का किला शिवपुरी से 127 किमी और ललितपुर Read more
छतरपुर का किला
छतरपुर का किला मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में अठारहवीं शताब्दी का किला है। यह किला पहाड़ी की चोटी पर Read more
सिंगौरगढ़ का किला
मध्य भारत में मध्य प्रदेश राज्य के दमोह जिले में सिंगौरगढ़ का किला स्थित हैं, यह किला गढ़ा साम्राज्य का Read more
पन्ना के दर्शनीय स्थल
पन्ना का किला भी भारतीय मध्यकालीन किलों की श्रेणी में आता है। महाराजा छत्रसाल ने विक्रमी संवत् 1738 में पन्‍ना Read more
राजनगर का किला
राजनगर मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में खुजराहों के विश्व धरोहर स्थल से केवल 3 किमी उत्तर में एक छोटा सा Read more
बटियागढ़ का किला
बटियागढ़ का किला तुर्कों के युग में महत्वपूर्ण स्थान रखता था। यह किला छतरपुर से दमोह और जबलपुर जाने वाले मार्ग Read more
बिजावर का किला
बिजावर भारत के मध्यप्रदेश राज्य के छतरपुर जिले में स्थित एक गांव है। यह गांव एक ऐतिहासिक गांव है। बिजावर का Read more
धमौनी का किला
विशाल धमौनी का किला मध्य प्रदेश के सागर जिले में स्थित है। यह 52 गढ़ों में से 29वां था। इस क्षेत्र Read more
पथरीगढ़ का किला
पथरीगढ़ का किला चन्देलकालीन दुर्ग है यह दुर्ग फतहगंज से कुछ दूरी पर सतना जनपद में स्थित है इस दुर्ग के Read more
कुलपहाड़ का किला
कुलपहाड़ भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के महोबा ज़िले में स्थित एक शहर है। यह बुंदेलखंड क्षेत्र का एक ऐतिहासिक Read more
तालबहेट का किला
तालबहेट का किला ललितपुर जनपद मे है। यह स्थान झाँसी - सागर मार्ग पर स्थित है तथा झांसी से 34 मील Read more
इलाहाबाद का किला
इलाहाबाद  का किला जो यमुना तट पर स्थित है, इस किले साथ अकबर के समय से लेकर अंग्रेज़ों के पतन Read more
जगम्मनपुर का किला
उत्तर प्रदेश राज्य के जालौन जिले में यमुना के दक्षिणी किनारे से लगभग 4 किलोमीटर दूर बसे जगम्मनपुर ग्राम में यह Read more
रामपुरा का किला
जालौन  जिला मुख्यालय से रामपुरा का किला 36 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। 46 गांवों की जागीर का मुख्य Read more
गोपालपुरा का किला जालौन
गोपालपुरा जागीर की अतुलनीय पुरातात्विक धरोहर गोपालपुरा का किला अपने तमाम गौरवमयी अतीत को अपने आंचल में संजोये, वर्तमान जालौन जनपद Read more
रंग महल कालपी
उत्तर प्रदेश राज्य के जालौन जिले के कालपी नगर के मिर्जामण्डी स्थित मुहल्ले में यह रंग महल बना हुआ है। जो Read more
चौरासी गुंबद कालपी
चौरासी गुंबद यह नाम एक ऐतिहासिक इमारत का है। यह भव्य भवन उत्तर प्रदेश राज्य के जालौन जिले में यमुना नदी Read more
बारह खंभा कोंच
उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में कोंच नगर के मुहल्ला भगत सिंह नगर में यह बारह खंभा भवन स्थित हैं तथा Read more